हैदर अली पार्ट 3

अंग्रेजों से जंग

हैदर अली एक बहादुर व जंगजू सिपाही और मैसूर के अवाम में बेहद मकबूल और हर दिल अज़ीज़ था, हालांकि अवाम की अकसरियत हिन्दू थी और उनके मुकाबले में मुसलमानों की आबादी बहुत कम थी। हैदर अली अवाम की खुशहाली चाहता था। उसने कई ऐसे इकदामात और इन्तिज़ामात किए जिससे रियासत का ख़ाली ख़ज़ाना भरने लगा। जल्द ही रियासत की हालत सुधरने लगी और अवाम खुशहाल होने लगी। उसने आस-पास के इलाकों को सलतनते खुदादाद मैसूर में शामिल करना शुरू कर दिया। इससे उसकी ताकत में इज़ाफ़ा होने लगा। वह एक बड़ी फौजी ताकत बनकर उभर रहा था और इस बात को अंग्रेज़ ख़तरा समझते थे।
अंग्रेजों को ख़तरा था कि अगर हैदर अली इसी तरह अपनी ताकत बढ़ाता रहा तो एक दिन मद्रास पर भी कब्जा कर लेगा और हो सकता है कि एक दिन वह उन्हें हिन्दुस्तान से भी निकाल दे। चुनांचे उन्होंने मरहटों और निज़ाम हैदराबाद को बहला-फुसला कर अपने साथ मिलाया और तीनों की फौजों ने मिल कर मैसूर पर हमला कर दिया।
निज़ाम हैदराबाद, मरहटों और अंग्रेजों ने मिलकर मैसूर पर चढ़ाई की लेकिन हैदर अली ज़रा भी न घबराया। उसने डट कर मुकाबला किया और दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। इस जंग में हैदर अली ने में दुश्मन फौजों को ऐसी ज़िल्लतआमेज़ शिकस्त दी कि उन्होंने घुटने टेक दिए और हैदर अली के साथ सुलह करने पर मजबूर हो गए। अंग्रेजों से समझौता. हैदर अली ने सुलह के लिए अपनी शर्ते पेश कीं। अंग्रेज़ उसकी शर्ते मानने पर मजबूर थे। चुनांचे हैदर अली और अंग्रेजों के बीच सुलह का एक समझौता तय हुआ। यह निहायत अहम था। इस समझौते
में अंग्रेजों की तरफ से यह वादा किया गया था कि अगर आइंदा कभी मरहटों ने मैसूर पर हमला किया तो अंग्रेज़ हैदर अली की मदद करेंगे।

जंग की तफसील

हैदर अली ने पिछली जंग में अंग्रेजों को हराया था और मद्रास तक उनका पीछा किया था जो अंग्रेजों की छावनी थी। दक्षिण अरकाट के इलाके में उसका मुकाबला कर्नल जोज़फ़ स्मिथ से हुआ। वहां भी हैदर अली और उसके बहादुर बेटे टीपू सुलतान ने अंग्रेजों को बुरी तरह हराया। अंग्रेज़ हैदर अली की फ़ौजों को आगे बढ़ने से रोकने में बुरी तरह नाकाम रहे। अंग्रेज़ मेजर जीराल्ड और कर्नल टाड ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन हैदर अली ने उनकी फौजों को काट कर रास्ता बनाया और आगे बढ़ता चला गया। मद्रास के रास्ते में तिरपत पुरा के किले में अंग्रेज़ फ़ौज मौजूद थी। उस किले को फ़तह किए बगैर आगे बढ़ना हैदर अली के लिए ख़तरनाक हो सकता था, क्योंकि यहां की फौज पीछे से हैदर अली पर हमला करके नुकसान पहुंचा सकती थी। चुनांचे हैदर अली ने ज़बरदस्त जंग करके तिरपत पुरा का किला फ़तह कर लिया।

रास्ते में अंग्रेज़ फ़ौज कर्नल अम्बर को कियादत में हैदर अली का रास्ता रोकने आई, मगर हैदर अली ने कर्नल अम्बर को ऐसी इबरतनाक शिकस्त दी कि वह काफी समय तक किसी बड़ी जंग में हिस्सा लेने के काबिल न रहा। दूसरी तरफ़ हैदर अली का एक जरनेल मालाबार के साहिली इलाके में अंग्रेज़ फ़ौज का मुकाबला कर रहा था। इस जरनेल का नाम लुत्फ़ अली बैग था, लेकिन उसके पास हथियार और फ़ौज की कमी थी। उसने हैदर अली को मदद के लिए पैगाम भेजा तो हैदर अली ने फौरन अपने बेटे टीपू सुलतान को उसकी मदद के लिए पहुंचने का हुक्म दिया। टीपू उस वक्त बंगलौर में अंग्रेज़ों से जंग कर रहा था। बंगलौर पर मेजर गार्डन और कैपटन हैदर अली
वाइन के नेतृत्व में अंग्रेज़ फ़ौज ने कब्जा कर रखा था। ने
हैदर अली का पैगाम मिलते ही टीपू सुलतान अपनी फ़ौज के साथ लुत्फ़ अली बैग की मदद के लिए पहुंचा और अंग्रेजों को बुरी तरह हराया। हैदर अली आंधी और तूफ़ान की तरह बंगलौर पहुंचा और अंग्रेज़ों को बंगलौर से निकाल दिया। अंग्रेज़ फ़ौज को बड़ी जिल्लतआमेज़ शिकस्त हुई और उन्हें यकीन हो गया कि अब वे हैदर अली को मद्रास पहुंचने से नहीं रोक सकेंगे। चुनांचे अपने फ़ौजी ठिकाने मद्रास को बचाने के लिए ही उन्हें हैदर अली से सुलह का समझौता करना पड़ा था। से

समझौते की खिलाफ वर्जी वर्जी के साथ अंग्रेजों ने हैदर अली से मजबूरन सुलह की थी। क्योंकि अगर वे सुलह न करते तो हैदर अली उनका ख़ातिमा कर देता। लेकिन इसके बाद अंग्रेज़ों ने इस सुलह को कोई अहमियत न दी। असल में वे सुलह के ज़रिए मोहलत हासिल करना चाहते थे ताकि अपनी ताकत जमा करके हैदर अली के ख़िलाफ़ फैसलाकुन जंग लड़ सकें।

हैदर अली और फ्रांसीसी

उस ज़माने में यूरोप में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच जंग छिड़ी हुई थी। हिन्दुस्तान में फ्रांसीसियों की भी तिजारती कम्पनियां थीं। मगर उनकी ताक़त अंग्रेज़ों के मुकाबले में बहुत कम थी और अंग्रेज़ उन्हें यहां से बिल्कुल निकाल देने की कोशिश कर रहे थे। हैदर अली के बारे में बताया जा चुका है कि वह फ्रांसीसियों का हलीफ़ (सहयोगी) था। हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच अकसर लड़ाई रहती थी। मकामी रियासतों के लिए ज़रूरी हो गया था कि वे दोनों में से किसी एक का साथ दें। हैदर अली का ख़याल था कि फ्रांसीसियों के इरादे ख़तरनाक नहीं, वे महज़ अपने तिजारती मफ़ादात हैदर अली

पर ध्यान देते हैं। लेकिन अंग्रेज़ तिजारत की आड़ में हिन्दुस्तान पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे हालात में हैदर अली अंग्रेजों का दोस्त किस तरह बन सकता था। वह अंग्रेजों को हिंदुस्तान से निकाल देने का इरादा रखता था। अंग्रेज़ भी हैदर अली के इरादों से बेख़बर न थे।

चुनांचे उन्होंने नवम्बर 1769 ई. में हैदर अली से अहद शिकनी (वादा ख़िलाफ़ी) और सुलहनामे की ख़िलाफ़ वर्जी की। मरहटे हैदर अली से पिछली शिकस्तों का बदला लेने के लिए बेताब थे। उन्होंने एक बार फिर मैसूर पर चढ़ाई का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने पहले अंग्रेजों से बात की कि क्या वे सुलहनामे के मुताबिक हैदर अली का साथ देंगे? अंग्रेज़ तो खुद चाहते थे कि हैदर अली की फौजी ताकत को कमज़ोर किया जाए। चुनांचे उन्होंने न सिर्फ मरहटों को मैसूर पर हमला करने के लिए उकसाया बल्कि उन्हें यह भी यकीन दिलाया कि वे सुलह के समझौते की ख़िलाफ़ वर्जी करते हुए हैदर अली का हरगिज़ साथ नहीं देंगे। ܘ ܟܕܟ

अंग्रेजों के इस जवाब से मरहटों के होसले बढ़ गए और उन्होंने मुतमइन होकर नवम्बर 1769 ई. में मैसूर पर हमला कर दिया। उन्हें यकीन था कि इस लड़ाई में उनका मुकाबला सिर्फ हैदर अली की फ़ौज से होगा और अंग्रेज़ फ़ौज हैदर अली की मदद के लिए मैदान में नहीं आएगी। और ऐसा ही हुआ। अंग्रेजों ने समझौते की ख़िलाफ़वर्जी करते हुए इस जंग में हैदर अली की कोई मदद न की।

मरहटों का हमला. हैदर अली जानता था कि मरहटे हिन्दुस्तान के निवासी हैं, वे इसी मुल्क में रहेंगे। चुनांचे उसकी ख्वाहिश थी कि मरहटों के साथ संबन्ध इतने ख़राब न हों कि हमेशा की दुश्मनी की बुनियाद पड़ जाए और

— उनसे बार-बार जंग करके उसकी वह ताकत कमज़ोर पड़ जाए जो वह अंग्रेजों के खिलाफ़ इस्तेमाल करना चाहता था। वह मरहटों को साथ मिलाकर अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकालने का इरादा रखता था। उसकी हिकमते अमली यह थी कि मरहटों के साथ कोई बड़ी जंग न की जाए, बल्कि अपनी सुरक्षा और इलाके की सलामती के लिए मरहटों को परेशान करने और मामूली नुकसान पहुंचाने के बाद उन्हें मैसूर की सरहदों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया जाए। मरहटों ने मैसूर पर हमला किया तो हैदर अली ने अंग्रेजों के

साथ किए गए सुलहनामे के मुताबिक अंग्रेजों को ख़बर दी कि मरहटों ने मैसूर पर चढ़ाई कर दी है, इसलिए समझौते के मुताबिक़ उसकी मदद के लिए आएं। लेकिन अंग्रेजों ने हैदर अली की मदद करने से इन्कार कर दिया। हैदर अली को अंग्रेजों की इस अहद शिकनी और वादा ख़िलाफ़ी पर सख्त गुस्सा आया और उसने अकेले ही मरहटों से पागाकरि र निमटने का फैसला कर लिया।

जंगी सूरतेहाल

सदर का प्राकमागास प्राली का न की
जंगी हिकमते अमली के तहत हर अली ने अपने बहादुर बेटे टीपू सुलतान को फ़ौज देकर रवाना किया कि वह मरहटों को मैसूर की सरहदों से हट जाने पर मजबूर कर दे। टीपू सुलतान अपनी फ़ौज के साथ तेजी से आगे बढ़ा। उसने मैसूर से बाहर मरहटा रियासत के दारुल-हुकूमत (राजधानी) पुणे से आने वाली फ़ौज के हरावल दस्तों को रास्ते में रोकने की कोशिश की। लेकिन मरहटे मैसूर की सरहदों से हटने पर तैयार न थे। बल्कि वे समझते थे कि चूंकि अंग्रेज़ हैदर अली का साथ नहीं देंगे, इसलिए उनकी जीत होगी। इस सूरतेहाल की ख़बर होने पर हैदर अली ने टीपू सुलतान को –
हुक्म भेजा कि मरहटों के पेशकदमी को पूरी ताकत से रोककर उन्हें
शिकस्त दी जाए। लेकिन उस वक्त तक जंगी सूरतेहाल टीपू सुलतान और हैदर अली की फौजों के काबू से बाहर हो चुकी थी।

श्रीरंगापटनम पर चढ़ाई

मरहटा फ़ौज की पेशकदमी जारी रही और हैदर अली की फौज श्रीरंगापटनम की तरफ पीछे हटने लगी।

मरहटे श्रीरंगापटनम की तरफ बढ़ रहे थे। इस सूरतेहाल से हैदर अली की फौजों को काफी नुकसान पहुंचने लगा और मरहटा फौजें श्रीरंगापटनम के बिल्कुल करीब पहुंच गई। हैदर अली की फ़ौजें उनकी पेशकदमी रोकने में कामयाब न हो सकी और पीछे हटते हुए फौज अपने पीछे बहुत साज़ व सामान छोड़ आई जिस पर दुश्मन फ़ौज ने कब्जा कर लिया।

मरहटे श्रीरंगापटनम के करीब पहुंचे तो बहुत खुश थे कि हैदर अली की फौज उनका रास्ता नहीं रोक सकती। उन्हें यकीन हो गया कि अब उनके लिए श्रीरंगापटनम को फ़तह करना ज़रा भी मुश्किल नहीं रहा। वे अपनी ताकत और फ़तह से खुश हो रहे थे और आगे बढ़ने की बजाए माल की तकसीम में मसरूफ़ हो गए।

हैदर अली के लिए यह अच्छा मौका था जिससे वह फायदा उठा सकता था। चुनांचे जब मरहटा फ़ौज माल की तकसीम में उलझी हुई थी, हैदर अली ने तेजी से श्रीरंगापटनम के सुरक्षा के इंतिज़ामात ने के को बेहतर और मजबूत बना लिया।

मरहटों की हार

मरहटों को हैदर अली के इकदामात की ख़बर न थी। वे श्रीरंगापटनम के आस-पास के इलाकों को लूटने और माल तकसीम करने में मसरूफ़ रहे। जब वे लूट-मार से फ़ारिग होकर श्रीरंगापटनम के किले के सामने

पहुंचे तो हैदर अली के सिपाही उनके स्वागत के लिए तैयार थे। मरहटों का ख़याल था कि हैदर अली की फौज उनकी ताकत से खौफ़ज़दा होकर किले में पनाह लेने पर मजबूर हो गई है और वे मुहासिरा करके एक ही हमले में किला फ़तह कर लेंगे, किले में बन्द हैदर अली की फ़ौज उनका मुकाबला न कर सकेगी।

लेकिन हैदर अली अचानक ही अपनी फ़ौज के साथ किले से निकला और मरहटों पर खौफ़नाक हमला कर दिया। मरहटों के लिए उसका हमला उम्मीद के बरख़िलाफ़ था। उनके वहम व गुमान में भी न था कि हैदर अली इतना भरपूर हमला करेगा। हमला इतना शदीद और अचानक था कि मरहटा फ़ौज के कदम उखड़ गए और वे बेशुमार लाशें छोड़कर श्रीरंगापटनम से पीछे हटने लगे। हैदर अली की फ़ौज टीपू सुलतान की कियादत में उनका पीछा कर रही थी। मरहटे श्रीरंगापटनम से शिकस्त खाकर बिजनौर की तरफ भाग रहे थे। किया कि

मरहटों को इस हार का बहुत दुख था। उन्होंने इरादा रास्ते के तमाम शहरों को लूटकर इस हार का बदला लेंगे। लेकिन हैदर अली की फौज ने उनके इरादे पूरे न होने दिए और उन्हें संभलने का मौका ही न दिया. मरहटों से सुलह

मैसूर के कई सरहदी इलाकों पर मरहटों का कब्जा था। उन्होंने सरहदी इलाकों में लूट-मार करके मैसूर की सलतनत को बहुत नुकसान पहुंचाया। इन हालात का तकाज़ा था कि जंग बन्द कर दी जाए। हैदर अली ने इस पर सोच-विचार किया। इस जंग में उसे दो बातों का पता चल गया। एक तो यह कि लम्बे समय जंगों में मसरूफ रहने से मैसूर की फौज पहले जैसी ताकतवर नहीं रही थी। दूसरी अंग्रेज़ों की अहद शिकनी (समझौते की खिलाफ़वीं)। मैसूर की फ़ौज ताकतवर रास्ता रोकेंगे बल्कि फ्रांसीसियों की ताकत पारा-पारा कर देंगे। फ्रांसीसी भी हैदर अली की मदद का ख़तरा मोल नहीं लेंगे, क्योंकि इस सूरत में अंग्रेज़ मरहटों की मदद की आड़ में फ्रांसीसियों के तिजारती ठिकानों पर हमला करके उनपर कब्जा कर लेंगे और यह बात फ्रांसीसियों की पालीसी और मक़ासिद के ख़िलाफ़ थी।

मरहटे देख चुके थे कि मौजूदा जंग में अंग्रेजों ने हैदर अली को धोका दिया और समझौते की ख़िलाफ़वर्जी करते हुए हैदर अली की जरा भी मदद नहीं की। उन्हें यकीन था कि आगे भी अंग्रेज़ हैदर अली को शिकस्त से दो-चार करने के लिए हर मुआहदे (समझौते) की ख़िलाफ़ वर्जी करेंगे और यह बद अहद कौम अपनी किसी भी अहद शिकनी पर कभी नदामत (शरमिन्दगी) महसूस नहीं करेगी।

मकबूज़ा इलाकों की वापसी के नाम और मरहटों से जंगें


हैदर अली के इरादे : मैसूर के सरहदी इलाकों पर मरहटों का कब्जा हैदर अली के लिए एक ऐसा गहरा ज़म था जिस वह भरने की कोशिश न करता तो नासूर बन कर उसे हमेशा तकलीफ पहुंचाता रहता। वह हर कीमत पर मैसूर के मकबूज़ा इलाकों को मरहटों के कब्जे से आजाद कराना चाहता था और इसके लिए उसे मुनासिब वक्त का बेताबी से इंतिज़ार था।

अंग्रेजों की वादा खिलाफ़ी भी हैदर अली के लिए एक चुनौती बन गई थी। उन्होंने सुलहनामे की खिलाफ वर्जी की थी जिसका हैदर अली को बहुत गुस्सा था। अंग्रेजों के ‘मुआहदा तोड़ने से हैदर अली के दिल में यह बात बैठ गई कि यह कौम किसी भी लिहाज़ से एतिबार
के काबिल नहीं। अंग्रेजों की गद्दारी और वादा ख़िलाफ़ी ने उनके इरादों को हैदर अली पर वाजेह कर दिया था और उसे यकीन हो गया था कि मक्कार अंग्रेज़ हर साज़िश और फरेब से हिन्दुस्तान पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे। वह अंग्रेजों के इन नापाक इरादों को ख़ाक में मिलाने का अज़्म कर चुका था।

माधवराव की मौत

शुरू में बताया जा चुका है कि मरहटा सलतनत का दारुल-हुकुमत पुणे था। उन्होंने एक संघ (विफ़ाक) बना रखा था जिसे मजबूत और मुत्तहिद रखने में उनके हुकुमरान या पेशवा माधवराव का बड़ा हाथ था। हैदर अली ने मरहटों के साथ सुलह की तो मसलहत के तहत माधवराव की यह शर्त भी कबूल कर ली कि वह अपनी एक जागीर मरहटों के सरदार हिलारी के हवाले कर देगा और हैदर अली ने हिलारी को वह जागीर दे दी थी। सीराम वागरी और गर्मकुण्डा के अलावा चिनार यादगार के इलाके भी मरहटों के कब्जे में थे। इन इलाकों को मरहटों से वापस लेना हैदर अली की सब से बड़ी आरजू थी।

1773 ई. में मरहटों का पेशवा माधवराव मर गया तो उनकी ताकत और इत्तिहाद का भरम खुल गया। माधवराव की मौत के बाद मरहटा संघ (विफ़ाक) में इन्तिशार पैदा हो गया और मरहटों की मुत्तहिदा ताकत बिखर गई। हैदर अली ऐसे ही मौके का इन्तिज़ार कर रहा था ताकि मरहटों से अपने इलाके छीन सके।

मुसलसल कामयाबियां हैदर अली अपनी फ़ौजों के साथ अपने इरादों को करने के लिए श्रीरंगापटनम से निकला और मरहटों पर हमला करने लगा। मरहटा

फौजों ने हर जंग पर हैदर अली का मुकाबला करने की कोशिश की, मगर उनमें पहले-सा दम-खम बाकी न रहा था। चुनांचे हैदर अली के तूफ़ानी हमले के सामने वे न ठहर सके और हैदर अली तेज़ी से अपने इलाके उनके कब्जे से आजाद कराता चला गया।

सीराम वागरी और गर्मकुण्डा के इलाके वापस लेने के बाद हैदर अली ने 1775 ई० में चिनार यादगार पर हमला किया और यह इलाका भी मरहटों से वापस लेने में कामयाब हो गया। 1775 ई. में ही उसने हिलारी मरहटा से अपनी वह जागीर.वापस ले ली जो ‘ सुलह के वक़्त मसलहत के तहत उसके हवाले की थी।

हैदर अली ने उनकी कमजोरी और नाइत्तिफ़ाकी से फायदा उठाते हुए मरहटों के कुछ इलाके भी फ़तह करके सलतनते मैसूर में शामिल कर लिए। इतिहासकार इस बात पर हैरान हैं कि 1774 ई० से 1778 ई० तक हैदर अली जहां अपनी रियासत को मज़बूत व मुस्तहकम करने में मसरूफ़ रहा, वहां उसने अपने मकबूज़ा इलाके न सिर्फ मरहटों के कब्जे से आज़ाद करा लिए बल्कि कई मरहटा इलाकों पर भी कब्जा कर लिया था। इस तरह मैसूर की सलतनत दोबारा दरिया-ए-तंग भद्रा तक फैल गई। उससे आगे कृष्णा तक का इलाका मरहटों का था। हैदर अली ने इस पर भी कब्जा कर लिया। अलबत्ता हैदर अली धाड़वाड़ के किले पर कब्जा न कर सका क्योंकि मैसूर के अन्दरूनी हालात के पेशे नज़र उसकी फ़ौज के लिए मुमकिन न था कि वह ज्यादा समय
करने तक धाड़वाड़ के किले का मुहासिरा जारी रखती और उसे फतह
के लिए लम्बे समय इंतिज़ार करती।
नमा कि किसी माँ का काम कर ਸਨ

Unique privileges….

A great prestige for Hazrat Ali AlaihisSalam for having Three unique privileges

It has been given in Sahih Muslim Vol-2 and Sunan-i-Timizi Vol-2 that Muavia Ibn-i-Abu Sufyan while abusing Hazrat Ali, ordered Sa’ad Ibni-Waqas Radiallahu anhoo “Why do you not abuse Abu Turab?”

In reply to this, Hazrat Sa’ad Radiallahu anhoo said, “I am reminded of three things of Rasulallah ﷺ due to which I can never abuse Hazrat Ali AlaihisSalam Had any one of them given to me, I would have considered it to be more valuable than a red camel, i.e. I could have valued it more than any worldly wealth.” Then, he narrated those three things, which were the most precious assets of Hazrat Ali AlaihisSalam



First Gift: Instead of taking Hazrat Ali AlaihisSalam with him in the crusade (Ghazwa-e-Tabuk), Huzur ﷺ left him in Medina, on his own place. Hazrat Ali AlaihisSalam requested, “O’Rasulallahﷺ , you are leaving me among the women and children.” On this, Huzur ﷺ said, “O’ Ali AlaihisSalam, are you not pleased with the fact that from me you get the same position as Haroon AlahisSalam got it from Hazrat Musa AlahisSalam? But after me, there will come no Divine Messenger (Nabi).” Hazrat Sa’ad Radiallahu anhoo says, “Had I been fortunate to get this gift, I would have considered myself to be the richest man of the world.”



Second Gift: In the crusade of Khyber, Huzur ﷺ said, “Now I will give the flag to the one who loves Allah, the Almighty and his Rasul ﷺ and is equally loved by Rasul ﷺ and Allah.” On these words of Huzur ﷺ we were very much expecting this invaluable fortune. But he ordered, “Call Ali AlaihisSalam!” Hazrat Ali AlaihisSalam had some problem with his eyes, but he came even in that position. He (Huzur ﷺ) applied his saliva on Hazrat Ali AlaihisSalam eyes and handed him over the flag. Then, Allah bestowed victory of Khyber through his hands. Hazrat Sa’ad Radiallahu anhoo says“Had this good fortune been given to me; it would have been more than the whole world’s wealth.”



Third Gift: There is a Quranic verse, implications of which are, “O’ Prophet ﷺ (Nabi), call all your sons, daughters and kiths and kins and tell these Christians also to come with their sons, daughters and their kiths and kins and request and pray that the untruth should have perished and there should be curse on it.” The name of this verse is Aayat-i-Mubahil. Its detailed description has already been given above in a previous chapter. Hazrat Sa’ad Radiallahu anhoo narrates that on the advent of this holy verse, Huzur ﷺ asked people to call Hazrat Ali AlaihisSalam, Hazrat Fatima AlahisSalam, Hazrat Hasan AlahisSalam and Hazrat Hussain AlahisSalam and prayed to Allah, “O’Allah, these are my nears and dears.” In the eyes of Hazrat Sa’admit, this gift to Hazrat Alimt was so great that he said, “Had this goodness and good fortune been given to me, I would have considered it to be more precious and valuable than the wealth of the whole world.

In the Holy Quran, the Saha’abas have been warned at many places, but Hazrat Ali AlaihisSalam has always been referred to with his goodness only

Hafiz Imam Tabrani in “Moajam Kabir,” Imam Ibn-i-Abi Hatimin his Commentary (Tafsir), Imam Abu Naeem in his “Hidayat-ul Auliya” and Hazrat Ibn-i-Abbasi Radiallahu anhoo narrate to the people of faith that

wherever Allah has state the Divine Message, He has said,
“Listen their head, and the director is Hazrat Ali AlaihisSalam” At many places, the Sahaabas has become the subject of His wrath, but for Hazrat Ali AlaihisSalam, He has sent His blessings only.

None of the Saha’abas has been fortunate to receive so many Holy Quranic verses as have been descended about Hazrat Ali

While narrating Hazrat Ibn-i-Abbas’single speech, Imam Ibn-i-Asakir narrates, “About none so many Quranic Verses (A’ayaten) have been descended, as have been, about Hazrat Ali AlaihisSalam.”

Hafiz Ibn-i-Asakir has also written while quoting Hazrat Ibn-i-Abbass Radiallahu anhoo”Three hundred Quranic Verses have been descended about Hazrat Ali AlaihisSalam.

खून-ही-खून



हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बद्दुआ से फ़िरऔनियों पर जुओं और मेढकों का अज़ाब नाज़िल हुआ। फिर आपकी दुआ से वह अज़ाब रफ़ा हो गया। मगर फ़िरऔनी फिर भी ईमान न लाये। और कुफ्र पर कायम रहे। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फिर बद्दुआ फ़रमाई तो तमाम कुओं का पानी, नहरों का और चश्मों का पानी, दरियाए नील का पानी गर्ज़ हर पानी उनके लिए ताज़ा खून बन गया। वह इस नई मुसीबत से बहुत परेशान हुए जो । पानी भी उठाते उनके लिए खून बन जाता था। कुदरते खुदा का करिश्मा देखिये कि बनी इस्राईल के लिए पानी पानी ही था मगर फिरऔनियों के लिये हर पानी खून बन गया था। आख़िर तंग आकर फिरौनियों ने बनी इस्राईल के साथ मिलकर एक ही बर्तन से पानी लेने का इरादा किया तो जब बनी इस्राईल निकालते तो पानी निकलता। जब फ़िरऔनी निकालते तो उसी बर्तन से खून निकलता था। यहां तक कि फ़िरऔनी औरतें प्यास से तंग आकर बनी इस्राईल की औरतें के पास आई और उनसे पानी मांगा तो अव्वल वह पानी उनके बर्तन में आते ही खून हो गया। तो फिरऔनी औरतें कहने लगी कि तू पानी अपने मुंह में लेकर मेरे मुंह में कुल्ली कर दे। जब तक वह पानी बनी इस्राईल की औरतों के मुंह में रहा पानी था और जब फ़िरऔनी औरतों के मुंह में पहुंचा खून हो गया।

फ़िरऔन खुद प्यास से लाचार हुआ तो उसने तर दरख्तों की रतूबत चूसी । वह रतूबत मुंह में पहुंचते ही खून बन गई । इस करे इलाही से आजिज़ आकर फिरौनियों ने फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से इल्तिजा की कि एक मर्तबा और दुआ कीजिये और इस अज़ाब को भी टालिये। फिर हम यकीनन ईमान ले आयेंगे। चुनांचे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने दुआ फ़रमाई और उन पर से यह अज़ाब भी रफ़ा हो गया। मगर वह बेईमान फिर भी अपने अहद पर कायम न रहे। (कुरआन करीम पारा ६ रुकू ६, खजाइनुल इरफान सफा २४०, रूहुल–ब्यान जिल्द १, सफा ४६०)

सबक : खुदा तआला अपने नाफरमान बंदों को बार बार मोहलत देता है ताकि वह संभल जायें मगर कुफ्र आशना बंदे इस मोहलत से फायदा नहीं उठाते और बदस्तूर अपने कुफ्र पर कायम रहते हैं और नुक्सान उठाते हैं।