Maula Ali AlaihisSalam ka Zikr e Jameel 7

Hazrat Hanash Radiallahu anhoo bayan karte hain ke maine Hazrat Ali AlaihisSalam ko 2 mendhon qurbani karte hue dekha to maine Unse pucha Ye kya hai? Unhone jawab diya ke Huzoor Nabi Akram ﷺ mujhe wasiyat farmayi thi ke mai Aap ﷺ ki taraf se qurbani kiya karu, lihaza mai Aap ﷺ ki taraf se bhi qurbani karta hun.” Imam Ahmed ne in alfaz ka izafa kiya :’Lihaza mai
hamesha Aap ki taraf se bhi Qurbani karta hun.’

Is Hadees ko Imam Abu Dawood, Ahmed aur Abu Ya’ala ne riwayat kiya
hai. Aur Imam Hakim ne farmaya: Is Hadees ki Sanad Saheeh hai.

“Hazrat Abdullah Jadli Radiallahu anhoo se marvi hai ke mai Hazrat Umme Salma Radiallahu anhoo, ki khidmat me hazir hua to Unhone mujhe farmaya: Kya logon me Huzoor Nabi Akram ﷺ ko gaali di jati hai? Maine kaha: Allah ki panah ya Allah ki Zaat Pak
hai ya usi tarah ka koi aur kalma kaha to Unhone farmaya: Maine Huzoor Nabi Akram ﷺ farmate hue suna hai ke Jo Ali ko gaali deta hai wo Mujhe
gaali deta hai.”

Is Hadees ko Imam Nasai, Ahmed aur Hakim ne riwayat kiya hai. Imam Hakim ne farmaya: Is Hadees ki sanad Saheeh hai. Imam Haisami ne farmaya: Iske
rijaal saheeh Hadees ke rijal hain.

“Hazrat Abu Saeed Khudari Radiallahu anhoo bayan karte hain ke logon ne (Huzoor Nabi Pakﷺ ki Bargah me) Hazrat Ali AlaihisSalam ke bare me shikayat ki Nabi Pakﷺ hamare darmiyan khade hue aur khutba irshad
farmaya. So maine Aap ﷺ ko ye farmate hue suna: Ay logon! Ali ki shikayat na karo, Allah ki qasam wo Allah ki Zaat me ya Allah ke Raaste
me bahot sakht hai.”

Is Hadees ko Imam Ahmed, Abu Nuaim aur Hakim ne riwayat kiya hai. Aur
farmaya: Is Hadees ki sanad Saheeh hai.

Hazrat Umme Salma SalamUllahAlaiha se marvi hai ke beshak Huzoor Nabi Akram ﷺ jab naarazgi ke aalam me hote to hum me se kisiko Aap ﷺ ke
saath humkalam hone ki jurrat na hoti thi siwaye Hazrat Ali AlaihisSalam ke.


Is Hadees ko Imam Hakim, Tabrani, aur Abu Nuaim ne riwayat kiya hai. Aur
Imam Hakim ne farmaya: Ye Hadees Saheeh ul Isnaad hai.

Hazrat Abdullah ibne Abbas Radiallahu anhoo se marvi hai ke Huzoor Nabi Akram ﷺ ne meri (yani Ali ki) taraf dekhkar farmaya: Ay Ali! Tu duniya wa Aakhirat me Sardar (Sayyad) hai. Tera mehboob Mera mehboob hai aur Mera mehboob Allah ka mehboob hai. Aur Tera dushman Mera dushman hai aur Mera dushman Allah ka dushman hai. Aur uske liye barbadi hai jo
Mere baad Tumhare saath bugz rakhe.

Is Hadees ko Imam Hakim ne riwayat kiya aur farmaya: Shaikhain ki sharait
par Saheeh hai. Imam Haisami ne farmaya: Iske rijaal Sikaah hain.

सुलतान टीपू शहीद पार्ट 3

कुडनूर पर हमला

अर्काट और उसके बाद दूसरी जंगों में हैदर अली ने अंग्रेज़ी
फ़ौज के सालार करनल ब्रैथ वैट को बहुत शर्मनाक शिकस्त दी थी और उसे गिरफ्तार कर लिया था। करनल ने गिरफ्तारी के बाद हैदर अली और टीपू से जान बख्शने की दरख्वास्त की। उन्होंने करनल की जान बख़्श दी। फिर अंग्रेज़ों ने हैदर अली से सुलह करने की कोशिश की, मगर हैदर अली ने सुलह से इनकार कर दिया और उनके एक फ़ौजी शहर कुडनूर पर हमला कर दिया। अंग्रेजों को यहां भी हार का सामना करना पड़ा और हैदर अली ने कुडनूर को जीत लिया।

कुडनूर के बाद हैदर अली की फौजों ने अरनी पर हमला किया जहां जनरल आयरकोर्ट अंग्रेज़ी फ़ौज के साथ मौजूद था। वह हैदर अली के आने की खबर सुन कर ख़ौफ़ज़दा हो गया और अपनी फ़ौज को लेकर वहां से निकल भागा। चुनांचे हैदर अली ने अरनी पर कब्जा कर लिया। अरनी से भाग कर अंग्रेज़ फ़ौज मद्रास पहुंची और दूसरी अंग्रेज़ फ़ौज के साथ मिल कर मद्रास की सुरक्षा को मजबूत बनाने लगी। फिर अंग्रेजों ने योजना बनाई कि हैदर अली को दूसरे इलाकों में उलझा दिया जाए ताकि वह मद्रास का रुख न कर सके। इस नई पालीसी के तहत उन्होंने मालाबार के साहिली इलाकों में गड़बड़ फैला दी।

टीपू मालाबार में

अंग्रेजों ने करनल हैमरस्टोन को एक बड़ा लश्कर देकर मालाबार की तरफ़ रवाना कर दिया था जहां उन्होंने अपनी साजिशों से बदअमनी पैदा कर दी थी। मालाबार के लोग मुख्तलिफ़ ग्रुपों में बट गए और वहां खाना जंगी हो रही थी। अंग्रेजों की योजना यही थी कि हैदर अली और टीप इस इलाके में उलझे रहें और उन्हें मद्रास पर हमला

करने का मौका ही न मिले। बम्बई से करनल हैमरस्टोन को फौज देकर इसलिए मालाबार की तरफ़ भेजा गया कि वह हैदर अली की फौज को शिकस्त देकर वहां के तमाम साहिली इलाकों पर कब्जा कर ले। यह इलाका फ़ौजी और तिजारती लिहाज़ से अंग्रेजों और हैदर अली के लिए बहुत अहम था। उन दिनों हैदर अली बीमार थे। उनकी पीठ पर सरतान का फोड़ा निकल आया था। उन्हें जब मालाबार के हालात की खबर मिली तो उन्होंने फ़तेह अली टीपू को फ़ौज के साथ मालाबार भेजा कि वह हालात पर काबू पाकर ख़ाना जंगी का ख़ातिमा कर दे। टीपू के साथ हैदर अली की फ़ौज का एक मशहूर जंग में माहिर और फ्रांसीसी जरनेल भी रवाना किया गया था। टीपू मालाबार पहुंचा और उसने अपनी हिम्मत, बहादुरी और समझदारी से जल्द ही हालात पर काबू पा लिया। इस तरह अंग्रेज़ो की यह चाल भी असफल हो गई।

सोनापति का किला

अंग्रेज़ करनल हैमरस्टोन फ़ौज के साथ मालाबार पहुंचा तो वहां बहादुर टीपू सुलतान हालात पर काबू पा चुका था। टीपू को वहां मौजूद पाकर अंग्रेज़ करनल को उसका सामना करने की हिम्मत न हो सकी और उसने मालाबार के इलाके से निकल जाने में ही अपनी बेहतरी समझी। चुनांचे वह अपनी फ़ौज लेकर सोनापति नदी की तरफ़ रवाना हो गया जहां एक मजबूत किला था।

टीपू को पता चला तो वह भी अपनी फ़ौज के साथ अंग्रेज़ी फौज के पीछे चल दिया। लेकिन अंग्रेज़ी फ़ौज तेज़ी से सफ़र करके सोनापति पहुंच गई। टीपू के वहां पहुंचने से पहले ही करनल हैमरस्टोन से ने अपनी फ़ौज के साथ सोनापति के किले में पनाह ले ली। टीपू ने
वहां पहुंच कर सोनापति के किले का मुहासिरा कर लिया और किला जीतने के लिए उसपर हमले करने लगा। किले का हिफ़ाज़ती निज़ाम काफ़ी मज़बूत था। इसलिए उसे जीतने में परेशानी हुई और मुहासिरा लम्बा हो गया।

टीपू की वापसी

मैसूर की राजधानी श्रीरंगापटनम में सलुतान हैदर अली बीमार पड़े हुए थे और बेहतरीन इलाज के बावजूद उनकी बीमारी जोर पकड़ती जा रही थी। जब हैदर अली को अपने बचने की कोई उम्मीद न रही तो उन्होंने टीपू की तरफ़ कासिद (खबर पहुंचानेवाला) भेजा कि वह तुरन्त वापस आ जाए। लेकिन कासिद के वहां पहुंचने से पहले ही हैदर अली की मृत्यु हो गई। चुनांचे पहले कासिद के टीपू के पास पहुंचने के बाद दूसरा कासिद हैदर अली की मृत्यु की खबर लेकर पहुंचा। हैदर अली की 6 दिसम्बर 1782 ई० को मृत्यु हुई। पिता की मौत की खबर सुन कर टीपू को सोनापति फ़तह किए बगैर ही वहां से वापस आना पड़ा था।

टीपू की तख्त नशीनी

सुलतान हैदर अली के दो बेटे थे। बड़ा शहज़ादा टीपू और छोटा शहज़ादा करीम। जब हैदर अली की मृत्यु हुई तो टीपू मौजूद नहीं था। उसके आने तक मैसूर का तख्त खाली नहीं छोड़ा जा सकता था। चुनांचे सलतनत के लोगों ने बाहमी मश्वरा और इत्तिफ़ाक़ से कुछ दिन के लिए शहज़ादा करीम को तख्त पर बिठा दिया ताकि हुकुमत के इंतिज़ाम चलते रहें। जल्द ही टीपू मालाबार से वापस आ गया। टीपू वापस आया तो शहज़ादा करीम उसके लिए तख़्त से हट गया।

26 दिसम्बर 1782 ई० को टीपू मैसूर के तख्त पर बैठा और सुलतान फ़तेह अली टीपू के नाम से अपनी हुकूमत की शुरूआत की। तख्त नशीनी के मौके पर शानदार जश्न मनाया गया। मैसूर के लोगों ने खुशी मनाई और घर-घर चिराग जलाए गए।

सुलतान टीपू

टीपू ने मैसूर का सुलतान बनने के मौके पर सब सरदारों, सलतनत के हाकिमों, और हुकूमत के खैरख्वाहों को इनाम दिया। ज़रूरतमन्दों की ज़रूरतें पूरी की और गरीबों में खैरात की। बहुत से शायरों ने ताजपोशी के जश्न पर सुलतान टीपू की तारीफ़ में कसीदे (तारीफ़ी नज़्म) पढ़े। सुलतान टीपू ने उन शायरों को भी बहुत इनामात दिए और उन्हें मालामाल कर दिया। मैसूर की जनता सुलतान टीपू के जंगी कारनामों से बहुत खुश थी और उससे मुहब्बत रखती थी।

मैसूर का हुकुमरान बनने के बाद सुलतान टीपू ने फैसला कर लिया कि अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकालने का जो मिशन उसके बाप हैदर अली ने शुरू किया था, वह उस मिशन को पूरा करेगा।

हैदर अली की तरह सुलतान टीपू भी अंग्रेजों के इरादों से बखूबी आगाह था और वह जानता था कि मक्कार अंग्रेज़ हिन्दुस्तान पर कब्जा करके अपनी हुकूमत कायम करना चाहते हैं। उसने पक्का इरादा कर लिया कि वह अपने वालिद हैदर अली की तरह अंग्रेजों के लिए नाकबिले तसखीर चट्टान बन जाएगा।

टीपू के दुश्मन

जब सुलतान टीपू ने मैसूर का तख्त संभाला तो उस वक्त हरतरफ़ अफरा-तफरी फैली हुई थी। शुरू में हैदर अली की मौत की ख़बर को छुपाया गया ताकि मैसूर के दुश्मनों के हौसले न बढ़े लेकिन जब हैदर अली की मृत्यु की ख़बर फैल गई तो कुछ इलाकों के सरदारों ने बगावत कर दी थी। मरहटों की तरफ़ से भी ख़तरा था और अंग्रेज़ भी मैसूर के दुश्मन थे। लेकिन सुलतान टीपू ने हिम्मत न हारी। बाप की तरह उसके हौसले बुलन्द थे। उसने अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया और बागियों को भी एक-एक करके ठिकाने लगा दिया। उनसे निमट कर सुलतान टीपू ने रियासत की खुशहाली और तरक्की के लिए कदम उठाए।

एक अज़ीमुश्शान हुकूमत

एक अज़ीमुश्शान हुकूमत

हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला ने एक अज़ीमुश्शान हुकूमत अता फ़रमाई थी। आपके बस में हवा कर दी थी। आप हवा को जहां हुक्म फ़रमाते थे वह हवा आपके तख़्त को उड़ाकर वहां पहुंचा देती थी। जिन्न इंसान और परिन्दे सब आपके ताबे और लश्करी थे। आप हैवानों की बोलियां भी जानते थे। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम जब बैतुल-मुकद्दस की तामीर से फारिग हुए तो आपने हरम शरीफ पहुंचने का इरादा फ्रमाया। चुनांचे तैयारी शुरू हुई । आपने जिन्नों, इंसानों, परिन्दों और दीगर जानवरों को साथ चलने का हुक्म दिया। हत्ता कि एक बहुत बड़ा लश्कर तैयार हो गया । यह अज़ीम लशकर तकरीबन तीस मील में पूरा आया । हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने हुक्म दिया तो हवा ने तख्ते सुलैमानी को उस लश्करे अज़ीम

रज़वी किताब घर के साथ उठाया और फौरन हरम शरीफ में पहुंचा दिया। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम हरम शरीफ़ में कुछ दिन ठहरे। इस अर्से में आप हर रोज़ मक्का मोअज्जमा में पांच हज़ार ऊंट, पांच हज़ार गाये और बीस हजार बकरियां जबह फ़रमाते थे। अपने लश्कर में हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बशारत सुनाते रहे कि यहीं से एक नबी-ए-अरबी पैदा होंगे। जिनके बाद फिर कोई और नबी पैदा न होगा। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम कुछ अर्से के बाद मक्का मोअज्जमा में हज अदा फ़रमाने के बाद एक सुबह को वहां से चलकर सनआ, मुल्के यमन, में पहुंचे। मक्का मोअज्जमा से सनआ का एक महीने का सफ़र था। आप मक्का मोअज्जमा से सुबह रवाना हुए और वहां दोपहर के वक्त पहुंच गये। आपने यहां भी कुछ अर्से ठहरने का इरादा फ़रमाया। यहां पहुंचकर परिन्दा हुदहुद एक रोज़ ऊपर उड़ा और बहुत ऊपर तक जा पहुंचा । सारी दुनिया के तूल व अर्ज को देखा । उसको एक सब्ज बाग नज़र आया । यह बाग मलिका बिलकीस का था। उसने देखा कि उस बाग में एक हुदहुद बैठा है । हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के हुदहुद में का नाम याफूर था। याफूर और यमनी हुदहुद में हस्बे जैल गुफ़्तगू हुईहो और कहां जाओगे?

यमनी हुदहुद : तुम कहां से आये

याफूर : : मैं मुल्क शाम से अपने बादशाह सुलैमान के साथ आया हूं। यमनी हुदहुद : सुलैमान कौन है? .

याफूरः वह जिन्नों, इंसानों, शयातीन, परिन्दों, जानवरों और हवा का एक अज़ीमुश्शान फ़रमारवा और सुल्तान है उसमें बड़ी ताक़त है। हवा उसकी सवारी है। हर चीज़ उसके ताबे है। अच्छा! तुम बताओ तुम किस मुल्क के हो?

यमनी हुदहुद : मैं इसी मुल्क का रहने वाला हूं हमारे इस मुल्क की बादशाह एक औरत है जिसका नाम बिलकीस है उसके मातेहत बारह हजार सिपहसालार हैं। हर सिपहसालार के मातहत एक लाख सिपाही हैं।

फिर उसने याफूर से कहा : तुम मेरे साथ एक अज़ीम मुल्क और लश्कर देखने चलोगे?

याफूर भाई! मेरे बादशाह सुलैमान अलैहिस्सलाम की नमाज़े अस्र का वक्त हो रहा है। उन्हें वुजू के लिए पानी दरकार होगा और पानी की जगह बताने पर मैं मामूर हूं अगर देर हुई तो वह नाराज़ होंगे।

यमनी हुदहुद: नहीं बल्कि यहां के मुल्क और फारवा बिलकीस की
तफसीली खबर सुनकर खुश होंगे।

याफूरः अच्छा, चलो।

(दोनों उठ गये और याफूर मुल्के यमन को देखने लगा)

उधर हजरत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने नमाजे अस्र के वक्त हुदहुद को तलब फरमाया तो वह गैर हाज़िर निकला । आप बड़े जलाल में आ गये और फरमाया क्या हुआ कि मैं हुदहुद को नहीं देखता या वह वाकई हाजिर नहीं, जरूर मैं उसे सख्त अज़ाब करूंगा या जबह करूंगा या कोई रौशन सनद मेरे पास लाये। (कुरआन करीम पारा १६, रुकू १७)

फिर बाज़ को हुक्म दिया वह उड़कर देखे कि हुदहुद कहां है। चुनांचे बाज़ उड़ा और बहुत ऊंचा उड़ा और बहुत ऊपर पहुंचकर सारी दुनिया को इस तरह देखने लगा जिस तरह आदमी अपने हाथ के प्याले को देखता है। अचानक उसे हुदहुद यमन की तरफ़ से आता हुआ दिखाई दिया। बाज़ फौरन उसके पास पहुंचा और कहाः गज़ब हो गया। अपनी फिक्र कर ले। अल्लाह के नबी सुलैमान अलैहिस्सलाम ने तुम्हारे लिये कसम खा ली है कि मैं हुदहुद को सख़्त अज़ाब दूंगा या ज़बह करूंगा।

हुदहुद ने डरते हुए पूछाः अल्लाह के नबी ने इस हलफ में किसी बात का इस्तिस्ना भी फ़रमाया है या नहीं? बाज़ ने कहाः हां, यह फ़रमाया है कि कोई रौशन सनद मेरे पास लाये।

हुदहुद ने कहा तो फिर मैं बच गया । मैं उनके लिये एक बहुत बड़ी ख़बर लेकर आया हूं। फिर बाज़ और हुदहुद दोनों बारगाहे सुलैमानी में हाज़िर हुए। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने रोब व जलाल में फ़रमायाः हुदहुद को हाजिर करो।

हुदहुद बेचारा दम-ब-दम अपनी दुम नीचे किये हुए और ज़मीन से मलता हुआ और कांपता हुआ हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के करीब आया तो हज़रत सुलैमान ने उसे सिर से पकड़कर अपनी तरफ़ घसीटा। उस वक्त हुद हुद ने कहा हुजूर! अल्लाह के सामने अपनी हाज़िरी को याद कर लीजिये। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने यह बात सुनकर उसे छोड़ दिया और उसे माफ़ फ़रमा दिया। फिर हुदहुद ने अपनी गैर हाज़री की वजह ब्यान की और बताया कि मैं एक बहुत बड़ी मलिका को देखकर आया हूं। खुदा ने उसे हर किस्म का सामाने ऐश व इशरत दे रखा है। वह सूरज की पुजारिन है और उसका बहुत बड़ा तख़्त है।

रिवायत है कि यह तख्त सोने और चांदी का बना हुआ था। बड़े बड़े कीमती जौहर से आरास्ता था। बिलकीस ने एक मजबूत घर बनवाया था। जिस घर में दूसरा घर था। उस घर के अंदर तीसरा घर था। फिर उस तीसरे घर के अंदर चौथा घर था। इसी तरह इसमें पांचवा, पांचवे से छठा और छटा से सातवां घर था। इस सातवें घर में वह तख्त ताले में बंद था और साथ ही गिलाफ़ उस तख़्त को चढ़ा रखे थे। उस तख्त के चार अदद पाये थे एक पाया सुर्ख याकूत का दूसरा ज़र्द याकूत का और तीसरा सब्ज़ थे याकूत का और चौथा सफेद मोती का था । यह तख्त अस्सी गज़ लंबा, चालीस गज़ चौड़ा, तीस गज़ ऊंचा था। बिलकीस सातों घर के अंदर रखे हुए उस तख्ते अज़ीम पर बैठा करती थी। हर घर के बाहर सख्त पहरा था और बिलकीस तक पहुंचना एक दुश्वार काम था।

हुदहुद ने जब सुलैमान अलैहिस्सलाम को बिलकीस की बात सुनाई तो सुलैमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः मेरा एक ख़त ले जाओ और बिलकीस को पहुंचा आओ। चुनांचे आपने एक ख़त लिखा जिस पर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम लिखा और लिखा कि मेरे मामले में बड़ाई जाहिर न करो और मुसलमान बनकर मेरे हुजूर हाज़िर हो।

इस खत पर शाही मोहर लगाकर हुद हुद को दे दिया। हुदहुद गया और सातों किलों के पहरों से बेनियाज़ होकर रौशनदानों में से गुज़रता हुआ बिलकीस तक जा पहुंचा। बिलकीस उस वक़्त सो रही थी । हुदहुद वह खत बिलकीस के सीने पर रखकर बाहर निकल आया।

बिलकीस जब उठी तो यह खत पाकर घबराई और आयाने सलतनत से मश्वरा तलब किया कि क्या किया जाये? वह बोलेः आप डरती क्यों हैं? हम ज़ोर वाले और लड़ने में माहिर हैं। सुलैमान अगर लड़ना चाहता है तो लड़े। हम हार तस्लीम नहीं करते । आईदा जो आपकी मर्जी । बिलकीस ने कहा जंग अच्छी चीज़ नहीं। बादशाह जब किसी शहर में अपने ज़ोर व कुव्वतं से दाख़िल होते हैं तो उसे तबाह कर देते हैं। मेरा ख्याल है कि मैं सुलैमान की तरफ़ एक तोहफा भेजूं। सुलैमान उसे कुबूल करते हैं या नहीं? अगर वह बादशाह हैं तो वह तोहफा ज़रूर कुबूल कर लेंगे, अगर नबी हैं तो मेरा यह तोहफा कुबूल न करेंगे। बस इससे ही उनके दीन कस इत्तेबा किया जाये।

चुनांचे बिलकीस ने पांच सौ गुलाम और पांच सौ बांदियां बेहतरीन रेशमी लिबास और जेवरों के साथ आरास्ता करके उन्हें ऐसे घोड़ों पर बैठाया जिनकी । रजवी किताब घर 105 सच्ची हिकायात हिस्सा-अव्वल काठियां सोने की और लगामें जवाहरात से सजी हुई थीं। एक हजार सोने और चांदी की ईटें और एक ताज जो बड़े-बड़े कीमती मोतियों से सजा हुआ था वगैरह वगैरह। एक खत के साथ अपने कासिद को रवाना किया।

हुदहुद देखकर चल दिया और सुलैमान अलैहिस्सलाम को सारा किस्सा सुनाया। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अपने जिन्नी लशकर को हुक्म दिया कि सोने चांदी की ईटें बनाकर छ: मील तक उन्हीं ईटों की सड़क बना दी जाये और सड़क के इधर उधर सोने चांदी की बुलंद दीवारें खड़ी कर दी जाये। समुद्र के जो खूबसूरत जानवर हैं, इसी तरह खुश्की के भी जो जानवर हैं, वह सब हाज़िर किये जायें। चुनांचे आपके हुक्म की तामील फौरन की गई। छ: मील सोने चांदी की सडक बन गई। इस सड़क के दोनों तरफ़ सोने चांदी की दीवारें भी बन गई। खुश्की तरी के खूबसूरत जानवर के भी हाज़िर कर दिये गये और फिर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अपने तख्त की दायें जानिब चार हज़ार सोने की कुर्सियां और बायें तरफ़ भी चार हज़ार सोने की कुर्सिया रखवाई और उन पर अपने मुबीन व खवास को बैठाया। अपने जिन्नी और इंसानी लश्कर को दूर दूर तक सफ़-ब-सफ़ खड़ा कर दिया । वहशी जानवर और दरिन्दे और चौपायों को भी सफ़-ब-सफ़ खड़ा कर दिया। इस किस्म का शाही दबदबा और जलाल और शान व शौकत की हुकूमत चश्मे फलक ने कभी देखी न थी।

बिलकीस का कासिद अपनी नज़र में बड़े-बड़े कीमती तोहफे ला रहा था मगर जब उसने सोने चांदी की बनी हुई सड़क पर कदम रखा और इर्द गिर्द सोने चांदी की दीवारें देखीं और फिर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की इज्जत और शान व शौकत के नज़ारे देखे तो उसका दिल धक धक करने लगा और शर्म के मारे पानी पानी हो गया । सोचने लगा कि यह बिलकीस का तोहफा किस मुंह से सुलैमान की ख़िदमत में पेश करूंगा। बहरहाल जब वह बारगाहे सुलैमानी में पहुंचा तो हज़रत ने फरमाया क्या तुम लोग माले दुनिया से मेरी मदद करते हो? तुम लोग अहले मफाखरत हो. दुनिया पर फख करते हो। दूसरे के तोहफे हदिए पर खुश होते हो मुझे न दुनिया से खुशी होती है, न उसकी हाजत है। अल्लाह तआला ने मुझे बहुत कुछ दे रखा है। इतना कुछ दिया है कि औरों को न दिया बावजूद इसके दीन व नुबुव्वत से मुझको मुशर्रफ फरमाया है। लिहाज़ा ऐ बिलकीस के कासिद! पलट जा और यह अपना तोहफा ले जा अपने साथ ही। जाकर कह दो रजवी किताब घर 106 सच्ची हिकायात हिस्सा-अव्वल कि अगर वह मुसलमान होकर हमारे हुजूर हाज़िर नहीं होती तो हम उसपर ऐसा लश्कर लायेंगे कि उसके मुकाबले की उसे ताकत न होगी और हम उसे जलील करके शहर से निकाल देंगे।

बिलकीस का कासिद यह पैगाम लेकर वापस लौटा। बिलकीस ने गौर से से सुना और बोलीः बेशक वह नबी हैं। उनसे मुकाबला करना हमारे बस का काम नहीं है फिर उसने अयाने सलतनत से मश्वरा करने के बाद हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में खुद हाज़िर होने का इरादा कर लिया। हुदहुद ने यह सारी रिपोर्ट हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम तक पहुंचा दी। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने भरे दरबार में ऐलान फ़रमायाः

कौन है जो बिलकीस के यहां पहुंचने से पहले पहले उसका तख्त यहां ले आये?

इफ़रीत नाम का जिन्न उठा और बोला

आपका इजलास बरखास्त होने से पहले पहले मैं आऊंगा। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया हम इससे भी ज्यादा जल्दी मंगवाना चाहते हैं।

तो फिर एक आलिमे किताब उठा और बोला: मैं एक पल मारने से भी पहले ले आऊंगा यह कहा और पल-के-पल में वह तख़्त ले भी आया। हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने देखा तो त

ख्त सामने रखा था। फिर बिलकीस भी हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िर हुई । हज़रत की शान व शौकत और सदाक़त व नुबुव्वत का नज़ारा करके मुसलमान हो गई। (ह्यातुल-हैवान जिल्द २, सफा ३०५, रूहुल ब्यान जिल्द २, सफा ८६६)



सबक १ : हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के दरबार और बिलकीस के तख्त के मकाम का दर्मियानी फ़ासला दो माह की राह का था और तूल व अर्ज़ आप पढ़ चुके हैं कि तीस गज़ ऊंचा, चालीस गज चौड़ा और अस्सी गज़ लंबा था। इतनी तवील दूरी और इतने वज़नदार होने और इतने महफूज़ मकाम में होने के बावजूद हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का एक सिपाही उसे पल भर में ले आया। फिर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के भी आका व मौला हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के औलियाए उम्मत हैं वह क्यों दूर दराज़ की दूरी से किसी मज़लूम की मदद को नहीं पहुंच सकते?

२. वह आलिमे किताब उस तख्त को लाने के लिए भरे दरबार में बिलकीस के महल में गये और वहां से तख़्त उठाकर वापस आये। मगर इस अर्से अव्वल में वह हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के दरबार से भी गायब न हुए और मकामे तख्त तक पहुंच गये । मालूम हुआ कि अल्लाह वालों की यह ताक़त है कि वह एक ही वक्त में कई जगह हाज़िर हो सकते हैं । यह ताकत हजरत सुलैमान अलैहिस्सलाम के एक सिपाही की है। फिर तो हज़रत सुलैमान के भी आका मौला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं उनका एक वक्त में कई जगह तशरीफ फरमा होना क्यों मुमकिन नहीं?

३. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के उस सिपाही ने दो माह की राह को पल भर में तय कर लिया। पल भर में चला भी गया और आ भी गया। । फिर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का शबे मेराज में पल भर में अर्श पर तशरीफ ले जाना और वापस तशरीफ ले आना क्यों मुमकिन नहीं?,

४. तख्त सुलैमान अलैहिस्सलाम को एक लशकरे अज़ीम के साथ हवा उठा लेती है। यह नबी का तसर्रुफ़ व इख़्तेयार है। जो नबियों के सरदार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपनी मिस्ल बशर कहते हैं उनमें से कोई साहब ज़रा अपनी बीवी समेत छत से छलांग लागकर दिखायें ताकि दूसरों को इबरत हासिल हो।

५. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम हरम शरीफ़ में पहुंच कर हर रोज़ पांच हजार ऊंट, पांच हज़ार गायें और बीस हज़ार बकरियां ज़बह फरमाते रहे मगर एक फ़िरका आज तक ऐसा भी है जो अय्यामे हज में एक बकरी तक की कुर्बानी को फ़िजूल कहता है और मुसलमानों को इस शरई अम्र से रोकता है।

६. जिन्न व इन्स, जानवर और परिन्दे खुश्की और तरी के हैवानात और दीगर अल्लाह की ज़बरदस्त मखलूक भी हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के मातेहत थी। आज जो लोग अंबिया को अपनी मिस्ल बशर कहते हैं उनके घर की तरफ नजर दौड़ाओ तो उनकी बीवी भी उनके ताबे नहीं। फया लिल-अजब! –

Life of Hazrat Syedah Fatima Zahara AlahisSalam..part 3

The sad demise of Hazrat Saiyeda AlahisSalam and the final bath and burial

Six months after Huzur ﷺ departure, she also left this finite world on 4th of Ramadan ul Mubarak, Hijri 11 and met her holy father. At that time, she was 23. Holy Hasnain AlahisSalam. Hazrat Umm-i-Kulsum Hazrat Rukaiyyah, Hazrat Zainab SalamUllahAlaiha and Hazrat Ali AlaihisSalam were all sunk in an ocean of sorrow.

As Hazrat Saiyeda AlahisSalam was very much modest, some days before her final departure, she told Hazrat Asma-binte-Umais Radiallahu anhoo “While taking male or female’s bier to the burial ground, it is kept open. I do not like that. The open bier exposes woman’s veils.”

On this, Hazrat Asma requested Hazrat Saiyeda AlahisSalam, “O’ part of Holy Rasul ﷺ existence, I have seen a tradition in the land of Negros, where the bier of a woman is covered. If you permit, I may show it to you.”

Then she asked for some branches of date and tied them with cloth, which looked like a veil. Hazrat Saiyeda AlahisSalam liked it very much, and on her bier, the same type of veil was put on. Till today, the female-bier is covered with the sheet of cloth. This tradition has been started by the suggestion of Hazrat Saiyeda AlahisSalam.

It is given in Akmal fi Asmai Rlrijal that Hazrat Saiyeda AlahisSalam. was buried during the night and her funeral prayer was led by Hazrat Abbas Radiallahu anhoo The author of this book agrees with this point. “The tradition in our city of seeking permission from an elderly person from the family to offer funeral-prayer of the deceased is a good practice.” Hazrat Ali AlaihisSalam made Hazrat Abbasiert lead Hazrat Saiyeda’s funeral prayer because he was a respected older adult of the Hashim tribe and uncle of Huzur veti and Hazrat Aliff. That is, the elderly and respected person of the family should be honoured.

Where is the holy grave of Hazrat Fatima AlahisSalam?? There are many reports and rumours about this. Generally, it is believed that she has been buried in the paradise of high grade (Jannat-ul-Baqi). Near her, there is a holy grave of Hazrat Imam Hasan AlahisSalam. Holy graves of Hazrat Abbas Radiallahu anhoo Hazrat Imam Baqir AlahisSalam and Hazrat Imam Jafar AlaihisSalam are also there. Besides this, there are various opinions about this matter. One opinion is that she is buried at “Dar-i-Aqeel.” Another opinion states that her shrine is in the mosque of Fatiman (Masjid-i-Fatima), which is in Jannat-ul-Baqi. Still there are two opinions, one of which says, it is in the holy shrine of Huzur ﷺ (Roza-i-Nabvi), while the another believes it is behind it. Mulla Qari has said on pg#341 of his “Al Maslak-ul-Mutaqassit Sharh Lubab-ulManasik” after paying tribute to Huzur ﷺ, the pilgrims visit its rear portion with great hopes and expectations, because it is said that Hazrat Fatima AlahisSalam holy grave is in that area. He says and believes that this only is the authentic and holy opinion.



Glories of the Children of Saiyeda Fatima AlahisSalam

Hazrat Fatima AlahisSalam had six children . Hazrat Imam Hasan AlahisSalam Hazrat Imam Husain AlaihisSalam Hazrat Kulsum, Hazrat Zainab SalamUllahAlaih and Hazrat Ruqaiyyah SalamUllahAlaiha The sixth onė, i.e. Hazrat Mohsin, died during childhood. Hazrat Imam Hasan AlahisSalam and Hazrat Imam Husain AlaihisSalam are among the most important personalities of the History of Islam. All the Muslims are under their great obligation. Hazrat Zainab SalamUllahAlaiha and Hazrat Kulsum SalamUllahAlaiha were present during the Karbala-episode; hence, they too are equally popular. They have shown to the ladies of the Muslim world, how calm and patient they should be during the calamities that snatch away all their belongings, including kith and kin. In fact, there is no other example of such a great sacrifice and patience in the whole history of Islam. This is a glaring and unique test for the training of self-realization.