इब्ने माजिद ( पंद्रहवीं शताब्दी)



इब्ने माजिद ( पंद्रहवीं शताब्दी)

इब्ने माजिद का पूरा नाम शहाबुद्दीन अहमद बिन माजिद अलबख़दी है। वह एक प्रसिद्ध जलयात्री थे। उनके बाप दादा समुद्र यात्रा के ज्ञानी थे और उन्होंने जहाज़रानी पर पुस्तकें भी लिखी थीं। उन्होंने अपने बाप दादा के पदचिह्नों पर चलते हुए इस विद्या को आगे बढ़ाया। इसके लिए उन्होंने कई समुद्री यात्राएं कीं और नए रास्तों का पता लगाया। उनके पिता लाल सागर से सटे अरब और अफ्रीकी सागर तटों के चप्पे-चप्पे की जानकारी रखते थे और इस क्षेत्र का सम्पूर्ण विवरण उन्होंने लिखा था। बाद में अपनी खोज के आधार पर इब्ने माजिद ने अपने पिता की कृति में संशोधन किये। उन्हें अपने पिता के अनुभव पर बड़ा विश्वास था। एक स्थान पर वह लिखते हैं ‘मैं अपने पिता के निर्देशों पर चलते हुए दूसरे नाविकों के मुक़ाबले ख़तरों से ज्यादा सुरक्षित रहा हूँ। मेरे पिता की पुस्तक बेहतरीन मार्ग दर्शक सिद्ध हुई।

इब्ने माजिद ने अपने युग के दूसरे नाविकों का विवरण भी लिखा है। विशेष कर यूसुफ़ अल-अरीक़ी और दबूकरा नामी नाविकों का जिक्र किया है। जिन्होंने हिन्द महासागर में समुद्री यात्राएं की। उन्होंने अपने सफ़रनामों में ईरान की खाड़ी, अफ्रीका के तटों, पश्चिमी टापुओं और पूर्व के दूर दराज क्षेत्रों की यात्राओं का वर्णन बड़े रोचक अंदाज़ में किया है। यात्रा के दौरान जिस वस्तु के बारे में उन्हें छोटी-मोटी जानकारी भी मिली उसे भी उन्होंने नोट किया। निसंदेह इब्ने माजिद अपने युग के महान समुद्री यात्री गुजरे हैं। >

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औलिया चलपी(25 मार्च 1411 ई. 1484 ई.)

औलिया चलपी
(25 मार्च 1411 ई. 1484 ई.) औलिया चलपी का पूरा नाम औलिया बिन दुरवेश मुहम्मद ज़की है। वह अपने युग के महान यात्री हैं जिन्होंने चालीस वर्ष यात्रा में गुजारे। उन्हें विभिन्न देशों की जानकारी का बहुत शौक़ था जिसके लिए उन्होंने वर्षों सफ़र करके विभिन्न देशों के हालात को लिपिबद्ध किया और दस खण्डों में अपना सफ़मा ‘तारीख़ुस औलिया चलपी सय्याह’ के नाम से लिखा। उन्होंने उस समय संसार के सबसे बड़े उसमानी साम्राज्य (Ottoman Empire) के आस-पड़ोस के देशों के हालात लिखे हैं।

औलिया चलपी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह उस युग की राजनीति, राजनेताओं और शासन प्रणाली का विवरण भी करते हैं। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव भी लिखे हैं। इसलिए यह पुस्तक बड़ी ज्ञानवर्धक है। इसमें पाठकों के लिए हर प्रकार की रोचक सामग्री मौजूद है। औलिया चलपी ने उस दौर के शासकों और राजनीतिज्ञों के साथ अपने संबंधों का विवरण भी लिखा है। विभिन्न देशों की राजनैतिक स्थिति के जिक्र के कारण यह पुस्तक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन गई है।

यूं तो सभी मुस्लिम यात्रियों के सफ़रनामे आज भी इतिहास के विद्यार्थियों के लिए प्रकाश स्तंभ हैं लेकिन कुछ लोगों ने जिस प्रकार आम आदमी के रहन-सहन पर प्रकाश डाला है वह यूरोपीय इतिहासकारों या यात्रियों के यहाँ नज़र नहीं आता। औलिया चलपी का सफ़रनामा आज भी अपार जानकारी का भण्डार समझा जाता है।

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इब्ने बतूता


(24 फ़रवरी 1304 ई० 1378 अगर चौदहवीं शताब्दी में संसार के सबसे बड़े यात्री की खोज की जाए तो इब्ने बतूता का नाम यात्रियों की तालिका में सबसे ऊपर नज़र आता है। उनका जन्म तंजा नामी स्थान पर हुआ। 29 वर्ष की आयु में हज यात्रा पर निकले और यहां से सुदूर देशों के सफ़र पर चले गये।

क्योंकि इब्ने बतूता इस्लाम धर्म के बड़े ज्ञानी भी थे इसलिए जहाँ भी वह गये लोगों ने इब्ने बतूता दिल्ली में उनका आदर सम्मान किया। उनकी भारत यात्रा बड़ी रोचक है वह अलाउद्दीन खिलजी के ज़माने में भारत आये और सात वर्ष दिल्ली के क़ाज़ी (मजिस्ट्रेट) रहे। उन्होंने अपनी भारत यात्रा सिंध से शुरू की थी जिसमें भारत की संस्कृति, भूगोलिक स्थिति, कर वसूल करने के तरीके और दिल्ली की भव्यता का सुन्दर विवरण दर्ज है। अलाउद्दीन ख़िलजी ने उन्हें अपना दूत बनाकर चीन के सम्राट के पास भेजा था जिसके लिए उन्होंने गुजरात से जलपोत में यात्रा शुरू की रास्ते में वह लंका, मलाया और दर्जनों टापुओं से गुजरे, वह जहाँ-कहीं गये वहाँ के हालात बड़े दिलचस्प अंदाज़ में लिखे। उनका सफ़रनामा चौदहवीं शताब्दी के भारत पर विश्वसनीय दस्तावेज़ माना जाता है।

दक्षिणी एशिया के अलावा उन्होंने उत्तरी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। मिस्त्र के नगर इस्कन्द्रिया का हाल वह इस तरह लिखते हैं, ‘यह शहर घनी आबादी वाला है यहाँ आवश्यकता का हर सामान मिलता है। हर प्रकार के लोग रहते हैं। हालांकि यह एक प्राचीन नगर है फिर भी चहल-पहल देखते ही बनती है। नगर के विवरण में वहाँ की मस्जिदों और पिरामिडों का
जिक्र भी है।’ इब्ने बतूता के सफ़रनामों की एक विशेषता यह है कि वह शासक वर्ग के बारे में ही नहीं आम आदमी के हालात भी बड़े विस्तार से लिखते हैं। वह नील नदी पार करके अरब आना चाहते थे लेकिन रास्ते में पता चला कि वहाँ युद्ध छिड़ा हुआ है। उन्हें वापस आना पड़ा और उन्होंने सीरिया का रुख किया।

सीरिया की राजधानी दमिश्क़ की प्रशंसा करते हुए वह कहते हैं कि यह शहर नई और प्राचीन इमारतों से भरा पड़ा है। यहाँ के लोग बड़े दयावान हैं। हर कोई ग़रीबों की सहायता करना चाहता है अगर किसी यात्री का पैसा समाप्त हो जाए या किसी व्यापारी को घाटा हो जाए तो यहां के लोग उसकी पैसे से सहायता करते हैं। लोग ग़रीब लड़कियों की शादियां कराने और कैदियों को कारावास से छुड़ाने में मदद करते हैं।

एक दिन इब्ने बतूता बाज़ार से गुजर रहे थे कि एक दास के हाथ से चीनी मिट्टी का बर्तन गिरकर टूट गया। वह रोने लगा। वहाँ खड़े एक व्यक्ति ने उसे बताया जाओ टूटे हुए बर्तन के टुकड़े सरकारी विभाग में ले
जाओ वहाँ से तुम्हें सहायता मिल जाएगी। दास बर्तन के टुकड़े ले गया और उसे उसकी राशि मिल गई।

इब्ने बतूता दमिश्क की सभ्यता के खास पहलू पर रोशनी डालते हैं कि यहाँ के लोगों में सहकारिता की भावना है। लोग मिल-जुलकर मदरसे, मस्जिदें, सड़कें, मक़बरे और सराय बनवाते हैं।

इब्ने बतूता जिन मशहूर लोगों से मिले उनका जिक्र भी बड़े विस्तार से किया है। उनका सफ़रनामा संसार की सभी बड़ी भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है।

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