हैदर अली पार्ट 4

नाकाबिले तसखीर चट्टान

का अंग्रेज़ हिन्दुस्तान पर कब्जा करके अपनी हुकूमत कायम करना चाहते थे। जब उन्होंने देखा कि मैसूर की इस्लामी रियासत मरहटों को लगातार शिकस्त देकर और उनसे अपने इलाके वापस हासिल करके दोबारा मज़बूत और इलाके की ताकतवर सलतनत बन रही है तो उन्होंने हैदर अली को अपने लिए सबसे बड़ा ख़तरा और अपने मकासिद और इरादों में सबसे बड़ी रुकावट समझा। हकीकत में हैदर अली उनके नापाक इरादों के रास्ते में चट्टान बन कर खड़ा हो चुका था। एक ऐसी चट्टान जिसे हटाना अकेले अंग्रेजों के बस में न था। हैदर अली एक नाकाबिले तसख़ीर चट्टान था और इस चट्टान को रास्ते से हटाए बगैर हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने का अंग्रेजों का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता था। चुनांचे उन्होंने हैदर अली के ख़िलाफ़ नई साज़िशें और जोड़-तोड़ की पालीसी इख़्तियार की।
नया महाज (मोरचा)

अंग्रेजो ने इस बार हैदर अली के ख़िलाफ़ एक नया महाज़ खोलने की कोशिश की। निजाम हैदराबाद और मरहटे तो पहले ही अंग्रेजों के दोस्त बन चुके थे। वे फौजी तौर पर नहीं तो दूसरे ज़राए से हैदर अली के ख़िलाफ़ अंग्रेजों की साज़िशों और कार्यवाइयों में शरीक थे। अब अंग्रेजों ने हैदर अली के ख़िलाफ़ जो नया महाज़ खोला, उसके तहत एक तो उन्होंने अपनी पुरानी पालीसी पर अमल किया यानी फूट डालो और हुकूमत करो। दूसरा मैसूर में जिसकी
है


आबादी की अकसरियत हिन्दू थी, उनके दिलों में मुसलमानों और इस्लाम के ख़िलाफ़ नफरत पैदा करने की कोशिश की गई। क्योंकि मैसूर का हुकुमरान हैदर अली मुसलमान और रियासत इस्लामी थी।

लेकिन अंग्रेजों की यह चाल ज्यादा कामयाब न हो सकी। क्योंकि हैदर अली लगातार जंगों और साजिशों का मुकाबला करने के बावजूद अपने अवाम का हमेशा ख़याल रखता था और हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई फर्क रवा नहीं रखता था। वह इंसाफ़ के तकाज़ों को पूरा करता और हर एक से बराबर का सुलूक करता था। चूंकि मैसूर के हिन्दुओं को हैदर अली से कोई शिकायत न थी, इसलिए वे अंग्रेजों की चाल में नहीं आए। कुछ कट्टर हिन्दू उनकी चाल में आए भी तो उनकी तादाद और हैसियत न होने के बराबर थी। अवाम खुशहाल और हैदर अली के लिए एहतिराम और मुहब्बत का जज्बा रखते थे जिसने हमेशा मैसूर को दुश्मनों से बचाए रखा था और उनकी आज़ादी की हर तरह से हिफ़ाज़त करता रहा था। चुनांचे अंग्रेजों की यह चाल नाकाम हो गई।

दूसरी चाल

मैसूर के पिछले राजा और रानी के वारिसों की तलाश अंग्रेजों की दूसरी चाल थी। वे राजा और रानी के वारिसों को तलाश करके यह ऐलान करना चाहते थे कि मैसूर के तख्त व ताज के वारिस जिन्दा हैं के और हुकूमत असल वारिसों को मिलना चाहिए जिस पर हैदर अली ने जबरदस्ती कब्जा कर रखा है। लेकिन अंग्रेजों की इस चाल में भी ज्यादा वजन नहीं था। मैसूर के अवाम हैदर अली की हुकुमरानी पर मुत्तफ़िक थे। इसलिए अंग्रेजों की यह चाल भी बुरी तरह नाकाम हो गई और रियासत में किसी ने तख़त का वारिस होने का दावा नहीं किया। हैदर अली

बन्दरगाहे माही

सलतनते खुदादाद मैसूर में एक बन्दरगाह थी जिसका नाम माही था। हैदर अली ने यह बन्दरगाह फ्रांसीसियों को दे रखी थी। इस बन्दरगाह पर फ्रांसीसियों की तिजारती कम्पनियां थीं और वे कारोबार करते थे। 1780 ई० में अंग्रेजों ने माही बन्दरगाह पर कब्जा करके वहां से फ्रांसीसियों को निकालने की योजना बनाई, लेकिन माही तक पहुंचने के लिए अंग्रेजों को हैदर अली के इलाके से गुज़रना था। क्योंकि इस के अलावा उधर जाने का कोई और आसान रास्ता न था। उसूली तौर पर हैदर अली की सलतनत से फ़ौज गुज़ारने के लिए पहले हैदर अली से इजाज़त हासिल करना ज़रूरी था। लेकिन अंग्रेजों को हैदर अली से इजाज़त मिलने की कोई उम्मीद न थी। वे जानते थे कि हैदर अली को उनकी सच्चाई और इरादों का पता चल चुका है और फ्रांसीसियों का हलीफ़ है। फिर वे हैदर अली से वादा ख़िलाफ़ी भी कर चुके हैं। इसलिए हैदर अली किसी कीमत पर उन्हें अपने इलाके से गुज़रने की इजाजत नहीं देगा।

लेकिन जारिहाना और गासिबाना अज़ाइम (इरादे) रखने वाले अंग्रेजों ने तमाम रियासती और फ़ौजी उसूलों को नज़रअंदाज़ कर दिया। उन्होंने हैदर अली से इजाज़त हासिल किए बगैर 1780 ई० में अपनी फौजें सलतनत मैसूर की हुदूद से गुज़ारी तो हैदर अली को अंग्रेजों की इस जसारत और हिम्मत पर बेहद गुस्सा आया। क्योंकि अंग्रेजों ने ऐसा करके हैदर अली और इसकी रियासत की खुद मुख़तारी और आजादी को ललकारा था और यह ज़ाहिर करने की कोशिश की थी कि उन्हें हैदर अली की कोई परवाह नहीं, उससे जो हो सकता है कर ले।

मैसूर की दूसरी जंग हैदर अली एक बहादुर मुसलमान और गैरतमन्द इन्सान था। सलतनते

खुदादाद मैसूर इस्लामी रियासत थी और अंग्रेज़ो का यह कदम एक इस्लामी हुकूमत के ख़िलाफ़ था। हैदर अली अंग्रेजों की इस हिम्मत पर गज़बनाक हो गया और उसने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जंग की शुरूआत कर दी। इस तरह मैसूर की दूसरी जंग शुरू हो गई। यह जंग बरे सगीर (उपमहाद्वीप) की तारीख में बहुत अहमियत रखती है, क्योंकि उस वक्त पूरे बरे सगीर में हैदर अली वह अकेला मुसलमान हुकुमरान था जो अंग्रेजों के नापाक इरादों का शुऊर रखता था और उनकी चालों से पूरी तरह वाकिफ़ था।

हैदर अली की सबसे बड़ी ख्वाहिश थी कि हिन्दुस्तान के दूसरे राजा और हुकुमरान आपस के मतभेद ख़त्म करके मुत्तहिद हो जाएं और अपनी सारी ताकत इस्तेमाल करके अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से बाहर निकाल दें। वह फ़िलहाल अंग्रेजों से जंग नहीं चाहता था, लेकिन अंग्रेजों ने उसके इलाके से फ़ौजें गुज़ार कर हैदर अली को जंग शुरू करने का मौका फ़राहम कर दिया।

हैदर अली जानता था कि अगर उसने अंग्रेजों की इस जुरअत और हिम्मत को नज़रअंदाज़ कर दिया और उनके इस इकदाम की अनदेखी करके सिर्फ अपनी रियासत की हिफ़ाज़त को प्राथमिकता दी तो यह हिन्दुस्तान से ही नहीं, इस्लाम से भी गद्दारी होगी। अंग्रेजों को इस मौके पर नकेल न डाली गई तो उनके हौसले बढ़ जाएंगे और वे दूसरे इलाकों पर कब्जा करने के बाद मैसूर पर भी कब्जा कर लेंगे। उस वक्त तक अंग्रेज़ इतने ताकतवर हो चुके होंगे कि मैसूर की फ़ौजें उनका मुकाबला न कर सकेंगी। इस सूरत में एक इस्लामी रियासत की शिकस्त इस्लाम के लिए एक ऐसा धक्का होगा उससे न सिर्फ हिन्दुस्तान के तमाम मुसलमान प्रभावित होंगे बल्कि उनकी आइन्दा नस्लें अंग्रेजों की गुलाम बन कर रह जाएंगी। इन्ही अन्देशों ने हैदर अली को अंग्रेजों से जंग करने पर मजबूर कर दिया।

जंग की शुरूआत

हैदर अली ने अपनी फौजों के साथ इस तेजी से हमला किया कि रास्ते की हर रुकावट खस व खाशाक की तरह हटती चली गई। उसकी तूफ़ानी यलगार के सामने कोई न ठहर सकता था। अंग्रेज़ सोच भी नहीं सकते थे कि हैदर अली इतनी तेजी से तूफ़ान की तरह बढ़ता चला आएगा। उनका ख़याल था कि उन्होंने हैदर अली को कई अन्दरूनी और रूनी मुआमलात में उलझा रखा है, मरहटे अब भी उसके दुश्मन हैं और हैदराबाद के मुसलमान हुकुमरान भी उसके हलीफ़ नहीं हैं। चुनांचे वह अपने-आपको मजीद ताकतवर बनाने के ख़याल से फौरी तौरपर जंग करने का फैसला नहीं करेगा और अपने इलाके से उनकी फ़ौजों के गुज़रने के इकदाम को नज़रअंदाज़ कर देगा।

लेकिन उनकी उम्मीद के ख़िलाफ़ हैदर अली ने तूफ़ानी हमला किया तो अंग्रेज़ बौखला गए। उनके लिए इस तूफ़ान को रोकना बहुत मुश्किल था जो हैदर अली की शक्ल में उनकी तरफ़ बढ़ा चला आ रहा था। अंग्रेज़ हिन्दुस्तान में राज करने का इरादा लेकर आए थे और इस जंग में कामयाबी पर ही उनके भविष्य के इरादों का दारोमदार था।

अंग्रेज़ फ़ौज का सालार जनरल सर हैक्टर बेबस हो गया। वह हैदर अली के मुकाबले में अपनी फ़ौजों की शिकस्त महसूस करने लगा। उसकी बेबसी देख कर अंग्रेजों ने कर्नल बैली के नेतृत्व में और ज़्यादा फ़ौज मुकाबले के लिए रवाना कर दी। जब हैदर अली को पता चला कि जनरल हैक्टर की मदद के लिए बैली को भेजा जा रहा है तो उसने तुरन्त अपने बेटे टीपू सुलतान को फ़ौज दे कर कर्नल बैली की फौज को रास्ते में रोकने के लिए रवाना कर दिया ताकि वह जनरल हैक्टर मुनरू की मदद के लिए जंग के मैदान तक न पहुंच सके। हैदर अली

टीपू का हमला

हैदर अली का हुक्म मिलते ही टीपू सुलतान आंधी और तूफ़ान की तरह आगे बढ़ा और रास्ते में ही कर्नल बैली की फौज को रोक लिया। कर्नल बैली की फ़ौज के दो हिस्से हो गए। एक हिस्सा टीपू सुलतान की फ़ौज के घेरे में आ गया और दूसरा बचाव के लिए जंग करने लगा। लेकिन जल्द ही अंग्रेजी फौज को शिकस्त हो गई। कर्नल बैली बचे-खुचे सिपाहियों के साथ जंग के मैदान से भाग गया। इस लड़ाई में अंग्रेज़ी फ़ौज के पचास अफ़सर और डेढ़ सौ सिपाही गिरफ्तार हुए।

इस ज़बरदस्त जंग में जनरल मुनरू को जबरदस्त और जिल्लतआमेज़ शिकस्त का सामना करना पड़ा। करनल बैली की तरफ़ से मिलने वाली मदद उसके लिए बहुत अहमियत रखती थी, मगर टीपू सुलतान ने इसका रास्ते में ही सफाया कर डाला था।

अरकाट और मद्रास

हैदर अली अरकाट का मुहासिरा कर चुका था लेकिन जनरल मुनरू से निमटने के लिए उसने अरकाट का मुहासिरा छोड़ दिया। वह चाहता तो मद्रास की तरफ़ पेश कदमी करता और जनरल मुनरू की फ़ौज को कत्ल करता हुआ मद्रास पर कब्जा कर लेता जो अंग्रेजों का केन्द्र था। मद्रास के किले पर कब्जा करके वह अंग्रेजों को बेबस कर सकता था, क्योंकि इस तरह अंग्रेजों की ताकत ख़त्म हो जाती। लेकिन जब कर्नल बैली को टीपू सुलतान ने बुरी तरह शिकस्त दे दी और जनरल मुनरू को कर्नल बैली की मदद न पहुंच सकी तो हैदर अली ने दोबारा अरकाट की तरफ़ बढ़ने का फैसला कर लिया। उस ने एक थोड़ी सी फ़ौज टीपू सुलतान को दे कर हिदायत की कि वह अंग्रेज़ फ़ौज के दस्ते पर छापे मारता और उन्हें परेशान करता रहे ताकि अंग्रेज़ ।
फ़ौजी जो छुप कर मद्रास का रुख कर रहे थे, उनको मद्रास पहुंचने से पहले रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए।

टीपू सुलतान ने हैदर अली का आदेश मिलने पर उनको पूरा किया। उस ने जंगल बट के इलाके में भागती और बिखरी हुई अंग्रेज़ी फ़ौज के कई दस्तों पर हमले किए और उन्हें बहुत नुकसान पहुंचाया।

अरकाट की फतह

हैदर अली पहले अरकाट का मुहासिरा छोड़ कर जनरल मुनरू की फ़ौज का मुकाबला करने के लिए वहां से रवाना हुआ था तो अंग्रेजों ने इत्मीनान का सांस लिया और अरकाट की सुरक्षा को मजबूत बनाने में लग गए थे। हैदर अली ने दोबारा अरकाट का रुख किया तो वह पहले जैसा कमज़ोर न था। हैदर अली का ख़याल था कि वह एक ही हमले में अरकाट फतह कर लेगा लेकिन अब यह काम मुश्किल नज़र आ रहा था। हैदर अली ने टीपू सुलतान और उसकी फ़ौज को अरकाट पहुंचने का हुक्म भेजा। वह हर कीमत पर अंग्रेजों के इस अहम शहर को फ़तह करने का फैसला कर चुका था जो उनकी बहुत बड़ी छावनी थी और यहां उनकी तादाद भी बहुत ज्यादा थी जिससे अंग्रेज़ इस खुशफ़हमी में मुबतला थे कि हैदर अली अरकाट को फ़तह न कर सकेगा।

लेकिन हैदर अली का अज्म एक हुकुमरान का नही, एक अज़ीम मुसलमान जरनेल का अज़्म था जो सिर्फ अल्लाह की ताईद पर भरोसा करता है और उसकी कुव्वते ईमानी बड़े से बड़े लश्कर को भी ख़ातिर में नहीं लाती। अंग्रेजों से हैदर अली की जंग मुल्क व सलतनत की सलामती के लिए नहीं बल्कि इस्लाम की सुरक्षा और सर बुलन्दी के लिए थी। टीपू सुलतान अपने लश्कर के साथ अरकाट पहुंचा तो हैदर अली ने अरकाट का मुहासिरा कर लिया। अंग्रेज़ी फ़ौज की पोज़िशन मज़बूत थी। हैदर अली को अरकाट फतह करने के लिए बार-बार हमले करना पड़े।

शुरू में अंग्रेज़ फ़ौज ने सख्त मुकाबला किया, लेकिन हैदर अली के ताबड़-तोड़ हमलों ने उनके हौसले कमजोर कर दिए। हैदर अली का दिल जज़्बा-ए-जिहाद और कुव्वत-ए-ईमानी से भरा हुआ था, कुदरत उसकी मदद कर रही थी। अंग्रेजों की हिम्मत जवाब दे गई और हैदर अली ने उन्हें शिकस्त देकर अरकाट पर कब्जा कर लिया।

Hadith: RasoolAllah ﷺ Aapki Muhabbat ki Alamat kya hai?

Sahaba ne arz kiya: *”Ya RasoolAllah! Aapki Muhabbat ki Alamat kya hai?” To Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Apna Dast-e-Aqdas Hazrat Ali ke Kandhe par maara!*
(Yaani YE Meri Muhabbat ki Alamat hai. Isse Muhabbat hai to samjhlo ke Mujhse bhi Muhabbat hai warna bus jhoota dawa hai!)

SallAllahu Alaihi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim

*Tabrani, Mujam al* *Awsat, 2/348,* *Hadees 2191*
*Haysami, Majma uz Zawaid, 10/346*

*Ghayat-ul-Ijabah fee Manaqibil Qarabah,/68, 69, Hadees 61*

Huzoor ki Wasiyat

Huzoor ki Wasiyat!

Hazrat Ammar bin Yasir RadiAllahu Anhuma se riwayat hai ki RasoolAllah SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya:
“Jo Mujhpar Imaan laaya aur Meri Tasdeeq ki, usey Mai Wilayat-e-Ali ki Wasiyat karta hun! Jisne Usey Wali jaana usne Mujhe Wali jaana aur jisne Mujhe Wali jaana usne Allah ko Wali jaana. Aur jisne Ali (Alaihissalam) se Mohabbat ki usne Mujhse Mohabbat ki aur jisne Mujhse Mohabbat ki usne Allah se Mohabbat ki. Aur jisne Ali se bugz rakha usne Mujhse bugz rakha aur jisne Mujhse bugz rakha usne Allah se bugz rakha.”

SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam

Haysami ne is Hadees ko Tabrani se riwayat kiya hai aur Iske Ruwaat ko Siqah (sachhe) karar diya hai!

Haysami, Majma uz Zawaid, 9/108,109
Ibne Asakir, Tarikh-e-Damishq al Kabir, 45/181,182
Hisamuddin Hindi, Kanzul Ummal, 11/611, #32958
Dr. Tahir-ul-Qadri, As Saif ul Jali ala munkir-e-Wilayat e Ali Alaihissalam, #25

Adam عليه السلام Ne Panjtan Pak عليه السلام Ke Jism—e—Nurani Ka Deedar Kab Kiya ??

Adam عليه السلام Ne Panjtan Pak عليه السلام Ke Jism—e—Nurani Ka Deedar Kab Kiya ??

Hazrat Abu Huraira رضی اللہ تعالیٰ عنہ Farmate Hain Ki Maine
Nabi—e—Kareem ﷺ Ki Jab Allah Ta.ala Ne Abul Bashar Adam عليه السلام Ko Paida Paida Farmaya Aur Unke Jisme Mein Rooh Funki Hazrat Adam عليه السلام Ne Arsh Ke Dahine Baazu Ki Taraf Nigaah Utha Kar Dekha To Paanch Jism—e—Noorani Ruku Wa Suzood Mein Nazar Aaye !
Hazrat Adam عليه السلام Ne Arz Kiya Aye Khudawand Kya Tune Mujhse Pehle Kisi Ko Paida Farma Diya Hain : Irshad e Khudawandi Hua Nahi ! Arz Kiya Ki Ye Kon Log Hain ? Jinko Main Apni Surat Aur Hayyat Par Dekh Raha Hoon !
Allah Ta’ala Ne Farmaya Ye Teri Aulaad Mein Se Paanch Shaks Hain Jinke Liye Maine Maine Apne Naam’o Mein Se Paanch Naam Mushtaq Kiye Agar Ye Na Hote To Main Jannat Dojakh Arsh Wa Kurshi Asmaan’o Zameen Farishte Jin Wa Insan Wagaira Paida Na Karta !

Main Mehmood Hoon Aur Ye Muhammad
Main Aala Hoon Aur Ye Ali
Main Faatir Hoon Aur Ye Fatima
Main Aehsaan Hoon Aur Ye Hasan
Main Mohseen Hoon Aur Ye Hussain

Mujhe Apni Izzat Ki Kasam Agar Koi Ek Raai Ke Barabar Bhi Inka Bugz Le Kar Mere Paas Aayega To Main Usey Dojakh Mein Daal Dunga !

Aye Adam Ye Mere Burguzida
(Khas Chune Hue) Hain Inki Wajah Se Bahut’o Ko Nizaat Dunga Aur Bahut’o Ko Halaak Karunga Jab Koi Haazat Pesh Aaye Inko Waseela Bana !

Huzoor Nabi—e—Kareem ﷺ Ne Farmaya Ki Ham Nizaat Ki Kasti Hai Jisne is Kasti Ke Saath Apna Talluk Ikhtiyar Kiya Wo Nazaat Pa Gaya Aur Jisne Ayraaz (Dur) Kiya Halaak Ho Gaya !

Jis Kisi Ko Allah Se Apni Haazat Rawai Manzoor Ho Usko Chahiye Ki Ham Ahlebait Ko Khuda Ki Jaanib Mein Waseela Banaye !

Abul Rawi Sulaiman Bin Musa Bin Saleem Kilayi Maruf Ba Ibne Sabu Andulusi Ne Kitaab!

📚 Ash Shifa Mein Rakam Taraz Hain !
( Ar Janul Matalib Safa 458 )

Muhammad Bin Yusuf Muhammad Kanji Shafai Ne
“Kifayat Ut Talib Baab 87 Safa 53 Wa 113 Mein’ Likha Hain Inki Riwayat Hazrat Ibne Abbas رضی اللہ تعالیٰ عنہ Se Marwi Hain !

Reference 📚 Ar Janul Matalib Safa 461 Mein Bhi !

Abul Abbas Muhibuddin Ahmad Bin Abdullah At Tabri
📚 Riyaaz Un Nazara Jild 2 Safa 164

Ibrahim Bin Muhammad Bin Muhammad Bin Abi Bakr Bin Abil Hasan Bin Muhammad Syed Muhammad Bin Yusuf Hussaini Maroof Bah GesuDaraz ( Kitabul Lasmar Kalmi Samar Chahal Wa Haftum )

Syed Muhammad Bin Jaffar Makki Bahrul Ansaab ( Manakibe Murtazvi Lil Shaikh Muhammad Saleh Kashfi Safa 40

Syed Jalaluddin Bukhari Maroof Bah Makhdoom Jahaniya ( Khazane Jalali ,Manaqibe Murtazvi Safa 40

Syed Ali Bin Sahabuddin Hamdani
Muwaddat Uk Kubra Safa 354