हक़ और बातिल के बीच लकीर – जंग-ए-सिफ्फीन

हदीस-ए-रसूल के आईने में इस्लामी इतिहास का वह मोड़ जहाँ हक़ और बातिल के बीच लकीर खिंच गई, वह जंग-ए-सिफ्फीन थी।

इस जंग के बारे में अल्लाह के रसूल ﷺ की एक पेशीनगोई (भविष्यवाणी) ने कयामत तक के लिए फैसला कर दिया था।

सहीह बुखारी में साफ अल्फाज मैं दर्ज हैं कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने हजरत अम्मार बिन यासिर  के बारे में फरमाया:
“अफ़सोस! अम्मार को एक बागी गिरोह (फ़िआ-ए-बाग़िया) कत्ल करेगा। अम्मार उन्हें जन्नत की तरफ बुला रहा होगा और वह गिरोह अम्मार को जहन्नुम की तरफ बुला रहा होगा।”

यह 👆हदीस ‘मुतवातिर’ है, यानी इसे इतने सहाबा ने रिवायत किया है कि इसकी सच्चाई पर शक की कोई गुंजाइश ही नहीं।

1) बागी कौन? फैसला रसूलल्लाह का है.👇

जब जंग-ए-सिफ्फीन में हजरत अम्मार बिन यासिर  शहीद हुए, तो यह साबित हो गया कि जिस लश्कर की तलवार से उनकी शहादत हुई, वही लश्कर ‘बागी गिरोह’ है।
●हजरत अम्मार  हजरत अली के साथ थे।
●उन्हें शहीद करने वाला लश्कर मुआविया का था।

लिहाजा, खुद रसूलल्लाह ﷺ के फैसले के मुताबिक, उस वक्त का बागी गिरोह वही था जिसने हजरत अली  (जो वक्त के जायज खलीफा थे) के खिलाफ खरुज (बगावत) किया था।

जब अल्लाह के नबी ﷺ ने हक और बातिल के दरमियान लकीर खींच दी और साफ लफ्जों में “बागी” गिरोह की निशानदेही फरमा दी, तो फिर किसी भी शख्स या मौलवी की क्या हैसियत कि वह अपनी तरफ से तावीलें (explanations) पेश करके उस गिरोह के सरदार को “साफ-सुथरा” साबित करने की कोशिश करे?

2) मौलवियों की ‘सफेदी’ और असलियत.👇

आज के दौर में कुछ लोग ‘सियासी मफाद या अपनी खास विचारधारा को बचाने के लिए उस बागी गिरोह के सरदारों मुआविया को “साफ-सुथरा” दिखाने की कोशिश करते हैं। उनके लिए कुछ कड़वे सवाल और हकियाक:

●अदालत-ए-सहाबा का गलत इस्तेमाल:
सहाबा का एहतराम अपनी जगह, लेकिन जब रसूलल्लाह ﷺ खुद किसी को ‘बागी’ और ‘जहन्नुम की तरफ बुलाने वाला’ कह दें, तो फिर किसी मौलवी की क्या मजाल कि वह उन्हें ‘मुजतहिद’ कहकर उनकी खताओं को ढके?
●इल्मी दयानतदारी:
अगर हम बागी को बागी नहीं कहेंगे, तो हम रसूलल्लाह ﷺ के फरमान की तकजीब (झुठलाना) करेंगे। क्या किसी शख्स की मोहब्बत रसूलल्लाह के फरमान से बड़ी हो सकती है?

3) बागियों का अंजाम: कुरान की रोशनी में.👇

कुरान करीम (सूरतुल हुजुरात, आयत 9) में साफ हुक्म है:
“अगर मुसलमानों के दो गिरोह आपस में लड़ें… तो उस गिरोह से लड़ो जो बगावत (बगी) करे, यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ लौट आए।”

हजरत अली  उस वक्त हक पर थे, और उनके खिलाफ तलवार उठाना सरासर बगावत थी। हजरत अम्मार की शहादत ने उस बगावत पर मोहर लगा दी।

हासिल-ए-कलाम (निष्कर्ष)

किसी भी शख्सियत को बचाने के लिए हदीस के मायनों को तोड़ना-मरोड़ना दीन के साथ खिलवाड़ है। हजरत अम्मार बिन यासिर  की शहादत कोई मामूली वाकया नहीं था, यह हक और बातिल का पैमाना था।
जो गिरोह अम्मार को शहीद करे, वो बागी है। यह मेरा फैसला नहीं, यह मौलवियों का फैसला नहीं, बल्कि यह तजदार-ए-मदीना ﷺ का फैसला है। और जिसके खिलाफ अल्लाह के रसूल गवाही दे दें, उसे दुनिया का कोई मुफ्ती या मौलवी “साफ-सुथरा” नहीं कर सकता।

इस्लाम हमें सच बोलने और हक का साथ देने का हुक्म देता है। चापलूसी और गलत तावीलों से तारीख नहीं बदली जा सकती। जो नबी ﷺ की नजर में बागी है, उसे दुनिया का कोई भी मौलवी “पाक-साफ” नहीं कर सकता।

“हक अली के साथ है, और अली हक के साथ हैं।”

“तारीख के पन्नों को ज़रा गौर से पढ़ो,
हक और बातिल का फर्क साफ नज़र आएगा।
अम्मार की शहादत ने वो लकीर खींच दी,
जिसे कयामत तक कोई मिटा न पाएगा।”

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