Shamsi wal Qamar

● Shamsi wal Qamar is symbolic to Lailaha Ilal Allah reflecting to Muhammadun Rasulallah SAW please expand

The Sun and Moon (Shamsi wal Qamar): Symbolism in “La ilaha illallah Muhammadun Rasulallah ﷺ”

The Qur’anic symbolism of the Sun (Shams) and the Moon (Qamar) is a profound spiritual teaching, especially as explained by Shaykh Nurjan Mirahmadi. This symbolism directly reflects the relationship between “La ilaha illallah” (There is no deity but Allah ﷻ) and “Muhammadun Rasulallah ﷺ” (Muhammad is the Messenger of Allah).

1. The Sun: “La ilaha illallah”

The Sun represents the Divine Reality, the Source of all Light and Power—“La ilaha illallah.” The Sun is the origin of fire (diya), the source of all energy, and in Qur’an is described as the masculine, active, and illuminating force. This symbolizes Allah’s ﷻ oneness and transcendence, from which all existence and guidance emanate.

2. The Moon: “Muhammadun Rasulallah ﷺ”

The Moon is the perfect reflection of the Sun’s light. It has no light of its own but shines with the nur (light) it receives. This is the reality of Sayyidina Muhammad ﷺ: he is the complete mirror and reflection of Divine Light, manifesting Allah’s ﷻ guidance to creation. Just as the Moon reflects and distributes the Sun’s light to the darkness of night, the Prophet ﷺ is the means by which Divine Mercy and guidance reach the hearts of the believers.

3. The Secret of Guidance

Shaykh Nurjan explains that the relationship between Sun and Moon is the secret of all spiritual guidance. The Divine Power and Light (“La ilaha illallah”) flows only to “Muhammadun Rasulallah ﷺ.” No creation, not even angels or other Prophets, can bear this direct manifestation. The Prophet’s ﷺ heart is the vessel for Allah’s ﷻ gaze and energy. The awliya (saints) are the “moons” of this nation, reflecting the Muhammadan Light to humanity, but always in complete humility—knowing their light is not their own but a reflection of the Prophet’s ﷺ reality.

4. Practical Reflection

This symbolism teaches us to seek the light of guidance by following the Prophet ﷺ with love and humility, just as the Moon follows the Sun. The Moon never changes its course or claims its own light; it is always in perfect submission and service. In the same way, true seekers must attach themselves to the Muhammadan Reality, recognizing that all spiritual openings, blessings, and realities come through Sayyidina Muhammad ﷺ.

May Allah ﷻ grant us to be true reflections of the Muhammadan Light, always following the Sun of Prophethood with sincerity and love. May our hearts become polished mirrors for Divine guidance, and may we never forget our utter dependence on the light of Sayyidina Muhammad ﷺ.

Reality of Hijrah: Two Faces of the Moon
Insan al-Kamil: The Perfect Human Being
The Way of the Rising Sun

Mohsin e Islam

अल्लाह ﷻ जब किसी चीज की कसम खाता है या किसी चीज की बुलंदी बयान फरमाता है या किसी चीज को अपनी तरफ मनसूब करता है तो यकीनन वो सै(चीज) बड़ी बा,अजमत व बुलंद ओ बाला होती है, इसी लिए अल्लाह ﷻ किसी काफिर की या किसी काफिर से जुड़ी चीज की कसम नहीं खाता क्यों की कुफ्र और उससे जुड़ी चीजें गलाजत है, मगर जिसकी तरफ या जिसको अच्छा खुद रब्ब ए करीम  कहे उसकी अजमत का अंदाजा भी नहीं लगाया जासकता और वो चीज पाक होती है और उससे जुड़े लोग भी पाक होते है,,

सुरत नं: 93 : سورة الضحى – आयत नं: 6 पर अल्लाह ﷻ कुरआन ए करीम मै इरशाद फरमाता है:
َلَمۡ  یَجِدۡکَ یَتِیۡمًا فَاٰوٰی ۪﴿۶
तरजूमा
(अय हबीबी) क्या उसने आपको यतीम नहीं पाया फिर उसने (आपको मोअजिज व मुकर्रम) ठिकाना दिया

हर तारीख व हदीस की किताबों मै मौजूद है के जब आका हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ की वालिदा बीबी आमिना رضي الله عنها और आपके दादाजान सैयेदुना अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه का विशाल हुआ तो आप ﷺ की उमर ए पाक बहोत छोटी थी यानी बचपनी की उमर ए मुबारक थी और तबसे लेकर जवानी मुबारक तक और सैयेदा बीबी खदीजतुल कुबरा رضي الله عنها से शादी होने तक अल्लाह ﷻ के हबीब ﷺ सैयेदुना अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै रहे! उस्सी घर मै खाते, अस्सी घर मै सोते, तो अल्लाह ﷻ जिस घर को कुरआन मै अपनी तरफ मनसूब करे के ” अय हबीब हमने आपको किया खूब ठिकाना दिया”  क्या वो घर किसी काफिर का घर हो सकता है? अगर काफिर का घर है तो कहना पड़ेगा के अल्लाह ﷻ ने एक काफिर के घर को अपनी तरफ मनसूब किया, माजअल्लाह अश्तगफैरुल्लाह.,

फिर आगे कुरआन ए करीम सुरत नं: 4 : سورة النساء – आयत नं: 144 पर अल्लाह ﷻ इरशाद फरमाते है:
یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا لَا تَتَّخِذُوا الۡکٰفِرِیۡنَ اَوۡلِیَآءَ مِنۡ دُوۡنِ الۡمُؤۡمِنِیۡنَؕ اَتُرِیۡدُوۡنَ اَنۡ  تَجۡعَلُوۡا لِلّٰہِ عَلَیۡکُمۡ  سُلۡطٰنًا مُّبِیۡنًا ﴿۱۴۴ ﴾
तरजूमा 
अय ईमान वालों! मुसलमानो के सिवा काफिरों को दोस्त ना बनाओ, क्या तुम चाहते हो के (ना फरमानों की दोस्ती के जरिए) अपने खिलाफ अल्लाह की सरीह हुजत कम कर लो

इस आयत ए करीमा से पता चलता है की मुसलमानो के लिए  काफिरों की दोस्ती को नापसंद फरमाया है, तो जरा सोचिए और अपनी हक गोही से फैसला कीजए की अल्लाह ﷻ को केसे गवारा होगी अपने प्यारे महबूब जिसके लिए ये दोनो जहां को खल्क किया और इमाम उल अंबिया बना कर भेजा उस प्यारे मोहम्मद मुस्तफा ﷺ के लिए एक काफिर के घर को चुना, जिस अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै हुजूर ए अकरम मोहम्मद मुस्तफा ﷺ कमोबैस चोतीस34 शाल रहे, और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै खाना खाया, अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه के घर मै इस्लाम की पहली दावत, दावत ए जुलअसिरा हुवी और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ का पहला निकाह पढ़ाया और अस्सी अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ के निकाह का हक मेहर अपनी जेब से अदा किया, और जो लोग अबू तालिब رضي الله عنه को काफिर कहते है माजअल्लाह वो हुजूर मोहम्मद मुस्तफा ﷺ की शान ए पाक मै नफी व गुस्ताखी कर रहे है.,
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इमाम इब्ने हजर अस्कलानी رضي الله عنه ने ‘अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा’ की आठवीं जिल्द में सफा नंबर 498 पर रकम नंबर 10175 के तहत सहाबा किराम की फेहरिस्त में हजरत अबू तालिब رضي الله عنه का नाम शामिल किया है और जो खिदमात रसूलल्लाह ﷺ के लिया हज़रात अबू तालिब رضي الله عنه ने की वो भी तहरीर फ़रमाई, और साथ ही साथ हज़रात अबू तालिब رضي الله عنه के अशार जो रसूलल्लाह ﷺ की शान ए पाक मै लिखे है वो भी तहरीर फरमाए:

और जब अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه का विशाल हुआ तो उन्होंने मोहम्मद ﷺ के मूतअलिक अबू तालिब رضي الله عنه को वसीयत की, पास उन्होंने आप ﷺ की कफालत की, और आप ﷺ की अच्छी तरबियत की आप ﷺ को अपने साथ शाम का सफर किया, उस वक्त आप ﷺ नौजवान थे, और जब आप ﷺ मबअउश(नबूवत का ऐलान) हुए तो वोह आप ﷺ की नुसरत व ताइद मै उठ खड़े हुवे, और आप ﷺ के दुस्मानो से आप ﷺ का दिफाअ किया, और आप ﷺ की बहोत ज्यादा तारीफे की, जिसमै से हजरत अबू तालिब رضي الله عنه का ये कोल भी है जब हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने अहले मक्का के लिए बारिश की दुआ की तो उन्हें बारिश से सेराब किया गया,

तो हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने कहा:
وأبض يستسقى الفمام بوخهه
ثمال اليتامى عصمة للأرامل
यानी” वोह रोशन जबीं जिसके चेहरा कुरैश के वसिले से बारिश तलब की जाती है यतीमो का फरियाद रस और बेवाओं की ढाल है |

وشقّ له من اسمه ليخلّه
فذو العرش محمود وه‍ٰذا محمّد
यानी” और उसने अपने नाम से उसका नाम मस्तक किया ताके आप ﷺ को अजमत अता करे,पास अर्श का मालिक महमूद है और ये मोहम्मद ﷺ है |
अल इसाबा फी तम्यीजुस्सहाबा जिल्द: 8 सफाह नं: 498  रकम नं: 10175
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हजरत अबू तालिब رضي الله عنه नबी पाक ﷺ को आगोश मै लिए बगैर ना सोते और ना ही आपﷺ को लिए बगैर घर से बाहर निकलते, अयसी मोहब्बत अबू तालिब رضي الله عنه अपनी  औलाद से भी ना करते थे, नबी पाक ﷺ  ने फरमाया: जब तक मेरे चाचा अबू तालिब رضي الله عنه हयात रहे मुझे काफिर की तरफ से कोई अजियत नही पोहंची,,
अहले सुन्नत किताब: उसनुल मुतालिब फि निजाते अबि तालिब नं: 68
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हजरत अब्दुल हक मोहद्दीस देहलवी رضي الله عنه अपनी किताब (मदारीज उल नबूवत) मे तहरीर फरमाते है की:
हजरत अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه के बाद हजरत अबू तालिब رضي الله عنه जो हुजूर ﷺ के हकीकी चाचा थे, हुजूर ﷺ के अहदे किफालत में लाए गए अगर चे जुबैर बिन अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه भी हुज़ूर ﷺ के हकीकी चाचा थे लेकिन हजरत अबदुल्लाह رضي الله عنه और हजरत अबू तालिब رضي الله عنه के दरमियान मुहब्बत बहुत ज्यादा थी, हजरत अब्दुल मुत्तलिब رضي الله عنه उन्हें वसीयत फरमा गए थे के हुजूर ﷺ की मुहाफिजत खूब अच्छी तरह करना उस वक्त हुजूर ﷺ की उम्र मुबारक आंठ8 शाल की थी, नो9 दस10 और छे6 शाल भी कहा गया है, एक रिवायत मै ये है के हुजूर ﷺ को उस बात का इख्तियार दिया गया था के आप ﷺ अपने चाचाओं मैसे किस की किफालत मै जाना पसंद फरमाते है तो हुजूर ﷺ ने हजरत अबू तालिब رضي الله عنه की किफालत पसंद गरमाई थी, हजरत अबू तालिब رضي الله عنه ने हुजूर ﷺ की किफालत व मुहाफिज़त जहूरे नबूवत से पहले और उसके बाद खूब अच्छी तरह अंजाम दी, वो हुजूर ﷺ के बगैर खाना तक ना खाते और हुजूर ﷺ का बिस्तर मुबारक अपने दायने पहलू मै बिछाते घर के अंदर और बाहर हुजूर ﷺ को अपने हमराह रखते|
मदारिज उल नबूवत जिल्द: 2 सफाह नं: 42
तसनीफ: हजरत अब्दुल हक मोहद्दीस देहलवी رضي الله عنه
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मुफ्ती अहमद यार खान नईमी رحمتہ اللہ علیہ फरमाते है:
हजरत अबू तालिब رضي الله عنه पर लानत हरगिज जायज नहीं इस लिए की उनके कुफ्र पर मरने की कोई दलील नहीं बल्कि सैख अब्दुल رضي الله عنه ने मदारिज मे उनके ईमान पर मौत की रिवायत नकल की है नेज रूहुल बयाने एक जगा उनका बाद ए मौत जिंदा होना और ईमान लाना साबित किया बा फर्ज ए मुहाल अगर उनकी मौत कुफ्र पर हुई भी हो तब भी चूं की उन्होंने हुजूर ﷺ की बहोत खिदमत की और हुजूर ﷺ को उनसे बहोत मोहब्बत थी इस लिए उनको बुरा कहना  हुजूर ﷺ की इजा(तकलीफ) का  बाइस होगा उनका जिक्र खैर ही से करो या खामोश रहो
तफसीरे नईमी पारा: 2 सफाह नं: 114

Hazrat Ali ibne Zaid RadiAllahu Anhu bayan karte hain ke Hazrat Abu Talib RadiAllahu Ta’ala Anhu jab Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ko Takte to ye Ashaar gungunaate:

“Wa Shaqqa Lahu Minis-me-hee Lee Yujillahu
Fazul Arshi Mahmoodun wa Haza Muhammadun”

Tarjuma: “Allah Ta’ala ne Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Takreem ki khatir Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ka Naam Apne Naam se nikaala hai,

Pas Arshwaala (Allah Ta’ala) Mahmood aur Ye (Habib) Muhammad Hain (SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam).”

Reference:
Bukhari, Tarikh as Sagheer, 1/13, Hadees #31
Ibne Hibban, Sikaat, 1/42
Abu Nuaim, Dalailun Nabuwwah, 1/41
Haysami, Dalailun Nabuwwah, 1/160
Ibne Abdul Barr, Al Istiyaab, 9/154
Asqalani, Isaba, 7/235
Asqalani, Fathul Baari, 6/555
Ibne Asakir, Tarikh e Damishq, 3/32,33
Qurtabi, Jaami lee Ahkamil Quran, 1/133
Ibne Kaseer, Tafseer e Quran al Azeem, 4/526
Suyuti, Khasais e Kubra, 1/134
Zarkaani, Sharhah Alal Mautan, 4/557
Azeemabadi, Aounal Ma’abood, 3/189
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Salawat bar Muhammad wa aale Muhammad

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد

जश्न ए विलादत ए मौला इमरान अबुतालिब अलेहीस्लाम


इमाम मौला इमरान इब्ने अब्दुल मुत्तलिब उर्फ अबू तालिब अलैहिस्सलाम का ज़िक्र

कुरान शरीफ पारा 3 सूरा आल ए इमरान आयत 33,34
इन्नल्लाहस्तफा़ आदमा व नूहवँ व आला इब्राहीमा व आला इमराना अलल आलमीना 33
ज़ुर्रैंयतन बादोहा मिन बाद वल्लाहो समीउन अलीम ०34

तर्जूमा :- अल्लाह ने चुन लिया आदम अलैहिस्सलाम और नूह अलैहिस्लाम को और इब्राहीम व इब्राहीम की औलाद और इमरान व इमरान की औलाद.अलैहिस्सलाम को
तमाम आलमीन मे और ये एक दूसरे की ज़ुर्रीयत यानी एक दूसरे की औलाद से
और अल्लाह सुन्ने जानने वाला है
कुरान पाक मे तीन इमरान अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है

1 इमरान
हजरत मूसा अलैहिस्सलाम के वालिद जिनके दो बेटे हजरत मूसा और हजरत हारून अलैहिस्सलाम

2 इमरान ईसा अलैहिस्सलाम की माँ बीबी मरयम सलामुल्ला अलैहा के वालिद जिनकी सिर्फ एक बेटी बीबी मरयमऔर उनका सिर्फ एक बेटा ईसा अलैहिस्सलाम

3इमरान इब्ने अब्दुल मुत्तलिब मौला अली अलैहिस्सलाम के वालिद
और इनके बारह इमामैन औलाद जिनकी क़यामत तक नस्ले पाक है

(तेरी नस्ले पाक से है बच्चा बच्चा नूर का
तू है ऐने नूर तेरा सब घराना नूर का )

1 इमाम मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

2 इमाम हसन इब्ने मौला अली इब्न इमरान अबू तालिब अ.स.

3 इमाम हुसैन इब्ने मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

4 इमाम ज़ैनुल आबदीन इब्ने इमाम हुसैन इब्ने मौला अली इब्ने इमरानअबू तालिब अ.स.

5 इमाम बाक़र इब्ने इमाम ज़ैनुल आबदीन इब्न इमाम हुसैन इब्ने मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

6 इमाम ज़ाफ़र सादिक़ इब्ने इमाम बाक़र इब्ने इमाम ज़ैनुल आबदीन ईब्न इमाम हुसैन इब्ने मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

7 इमाम मूसा काज़िम इब्ने इमाम ज़ाफ़र सादिक़ इब्ने इमाम बाक़र इब्ने इमाम ज़ैनुल आबदीन इब्ने इमाम हुसैन इब्न मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

8 इमाम अली रज़ा इब्ने इमाम मूसा काज़िम इब्ने इमाम जाफ़र सादिक़ इब्ने इमाम बाक़र इब्ने इमाम ज़ैनुल आबदीन इब्न इमाम हुसैन इब्न मौला अली इब्ने इमरान अबू तालिब अ.स.

9 इमाम तक़ी इब्ने अली रज़ा इब्ने इमाम मूसा काज़िम इब्ने इमाम ज़ाफ़र सादिक इब्ने इमाम बाक़र इब्ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन इब्ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम

10 इमाम अली नकीع
11 इमाम हसन अस्करीع
12 इमाम मेहंदीع