हिजरत का नवाँ साल part 1

सन्न ९ हिजरी बहुत से वाकिआते अजीबिया से लबरेज़ है। लेकिन चन्द वाकिआत बहुत ही अहम हैं। जिनको मुअरिंखीन ने बहुत ही बिस्त व तफ़सील के साथ जिक्र किया है। हम इन वाकिआत को अपनी मुख़्तसर किताब में निहायत ही इख़्तिसार के साथ अलग अलग उनवानों के साथ कलमबंद करते हैं।

आयते तख़ईर व ईला और “ईला”

ये शरीअत के दो इस्तिलाही अल्फाज़ हैं शौहर अपनी बीवी को अपनी तरफ से ये इख्तियार दे दे कि वो चाहे तो तलाक़ ले ले। और चाहे तो अपने शौहर के निकाह में रह जाए। इस को “तख़ईर’ कहते हैं। और “ईला ये है कि शौहर ये कसम खा ले कि मैं अपनी बीवी से सोहबत नहीं करूँगा। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा अज़वाज़े मुतहहरात से नाराज़ होकर एक महीने का ईला फरमाया। यानी आपने ये कसम खा ली कि मैं एक माह तह अपनी अज़वाजे

मुकद्दसा

से सोहबत नहीं करूँगा। फिर इसके बाद आपने अपनी तमाम मुक़द्दस बीवीयों को तलाक हासिल करने का इख्तियार भी सौंप दिया। मगर किसी ने भी तलाक लेना पसन्द नहीं किया।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नाराज़गी और इताब का सबब क्या था? और आपने ‘तख़ईर’ व ‘ईला क्यों फरमाया? इस का वाकिआ ये है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला

अलैहि वसल्लम की मुकद्दस बीवियाँ तकरीबन सब मालदार और बड़े घरानों की लड़कियाँ थीं। “हज़रते उम्मे हबीबा” रदियल्लाहु अन्हा रईसे मक्का जर अबू सुफ़यान दियल्लाहु अन्हु की साहिबजादी थीं। “हज़रते जुवैरिया” रदियल्लाहु अन्हा कबीलए बनिल मुसतलक के सरदारे अअज़म हारिस बिन जर्रार की बेटी थीं। हज़रते सफीय्या’ रदियल्लाहु अन्हा बनू नुजैर और खैबर के रईसे अअज़म हुय्य बिन अख्तब की नूरे नज़र थीं। “हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हु हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु की प्यारी बेटी थीं। हज़रते हफ्सा रदियल्लाहु अन्हा हज़रते उमरे फारूक रदियल्लाह अन्हु की चहतिी साहिबज़ादी थीं। ‘हजरते जैनब बिन्ते हजश” और “हज़तरे उम्मे सल्मा” रदियल्लाहु अन्हा भी ख़ानदाने कुरैश के ऊँचे ऊँचे घरों की नाज़- नेअमत में पली हुई लड़कीयाँ थीं। ज़ाहिर है कि ये अमीर ज़ादियाँ बचपन से अमीराना जिन्दगी और रईसाना माहौल की आदी थीं। और उनका रहन सहन, खुर्द-ने नोश, लिबास- पोशाक सब कुछ अमीर ज़ादियों की रईसाना ज़िन्दगी का आईनादार था और ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुकद्दस ज़िन्दगी बिल्कुल जाहिदाना, और दुनियावी तकल्लुफात से यकसर बेगाना थी। दो दो महीने काशानए नुबूब्वत में चुल्हा नहीं जलता था।

और पानी पर पूरे घराने की ज़िन्दगी बसर होती थी। लिबास- पोशाक में भी पैगम्बराना ज़िन्दगी की झलक थी मकान और घर के साज़- सामान में भी नुबूव्वत की सादगी नुमायाँ थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने सरमाया का अकसर व बेश्तर हिस्सा अपनी उम्मत के गुरबा व फुकरा पर सर्फ फरमा देते थे। और अपनी अज़वाजे मुतहहरात को बक़दरे ज़रूरत ही ख़र्च अता फरमाते थे, जो उन रईस ज़ादियों के हस्बे ख़्वाह जेब- जीनत और आराइश व जेबाइश के लिए काफी नहीं होता था। इस लिए कभी इन उम्मत की माओं का पैमानए सबकनाअत लबरेज़ हो कर छलक जाता था और वो हुजूर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि वसल्लम से मजीद रकमों का मुतालबा और तकाज़ा करने लगती थीं। चुनान्चे एक मर्तबा तमाम अज़वाजे मुतहहरात ने मुतफ़िका तौर पर आप से मुतालबा किया कि आप हमारे अख़राजात में इजाफा फरमाएँ। अजवाजे मुतहहरात की ये अदाए नुबूव्वत के कल्वे नाजुक पर बार गुजरी। और आपके सुकूने ख़ातिर में इस कदर खलल अन्दाज़ हुई कि आप ने बरहम होकर ये कसम खा ली कि एक महीने तक अजवाजे मुतहहरात से न मिलेंगे इस तरह एक माह का आप ने ‘ईला फरमा लिया!

अजीब इत्तिफाक कि इन्ही अय्याम में आप घोड़े से गिर पड़े जिस से आप की मुबारक पिंडली में मोच आ गई। इस तकलीफ की वजह से आपने बाला खाने पर गोशा नशीनी इख्तियार फरमा ली। और सब से मिलना जुलना छोड़ दिया।

सहाबए किराम ने वाकिआत के करीनों से ये कयास आराई कर ली कि आपने अपनी तमाम मुकदस बीवियों को तलाक दे दी। और ये खबर जो बिल्कुल ही गलत थी बिजली की तरह फैल गई। और तमाम सहाबए रिकाम रज- गम से परेशान हाल, और सदमए जानकाह से निढाल होने लगे।

इसके बाद जो वाकिआत पेश आए वो बुखारी शरीफ की मुतअदद रिवायात में मुफस्सल तौर पर मजकूर है। इन वाकिआत का बयान हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु की जबान से सुनिए।

हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं और मेरा एक पड़ौसी जो अन्सारी था। हम दोनों ने आपस में ये तय कर लिया था कि हम दोनों एक एक दिन बारी बारी से बारगाहे रिसालत में हाजिरी दिया करेंगे। और दिन भर के वाकिआत से एक दूसरे को मुत्तला करते रहेंगे। एक दिन कुछ रात गुजरने के बाद मेरा पड़ौसी अन्सारी आया और जोर जोर से मेरा दरवाजा पीटने और चिल्ला चिल्लाकर मुझे पुकारने लगा। मैंने घबराकर दरवाजा खोला तो उसने कहा कि आज गज़ब हो गया। मैं ने उस पूछा

कि क्या गुस्सानियों ने मदीना पर हमला कर दिया? (उन

दिनों शाम के गस्सानी मदीने पर हमले की तय्यारियाँ कर रहे थे) अन्सारी ने जवाब दिया कि अजी इस से भी बढ़कर हादिसा रूनुमा हो गया। वो ये कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी तमाम बीवियों को तलाक दे दी। हज़रते उमर रदियल्लाहु अनहु कहते हैं कि मैं इस ख़बर से बेहद मुतवह्हश हो गया। और अलस सुबह मैं ने मदीने में पहुँचकर मस्जिदे नबवी में नमाजे फ़ज अदा की। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम नमाज़ से फारिग होते ही बाला खाने पर जाकर तन्हा तशरीफ फरमा हो गए। और किसी से कोई गुफ्तगू नहीं फ़रमाई। मैं मस्जिद से निकलकर अपनी बेटी हफ़सा के घर गया। तो देखा कि वो बैठी रो रही है। मैंने उस से पूछा कहा कि मैं ने पहले ही तुम को समझा दिया था कि तुम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तंग मत किया करो। और तुम्हारे अख़राजात में जो कमी हुआ करे वो मुझ से माँग लिया करो। मगर तुम ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। फिर मैं ने पूछा कि क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तुम सभों को तलाक दे दी है? हफ़सा ने कहा मैं कुछ नहीं जानती। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बाला ख़ाने पर हैं। आप उनसे दर्याफ्त करें। मैं वहाँ से उठकर मस्जिद में आया तो सहाबए किराम को भी देखा कि वो मिंबर के पास बैठे रो रहे हैं। मैं उनके पास थोड़ी देर बैठा। लेकिन मेरी तबीअत में सुकून व करार नहीं था। इस लिए मैं उठकर बाला ख़ाने के पास आया। और पहरादार गुलाम रबाह’ से कहा कि तुम मेरे लिए अन्दर आने की इजाज़त तलब करो। रबाह ने लौटकर जवाब दिया कि मैंने अर्ज कर दिया। लेकिन आपने कोई जवाब नहीं दिया। मेरी उलझन और बेताबी और ज़्यादा बढ़ गई। और मैं ने दरबान से दोबारा इजाज़त तलब करने की दरख्वास्त की फिर भी कोई जवाब नहीं मिला। तो मैंने बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ रबाह! तुम मेरा नाम लेकर इजाज़त तलब करो। शायद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को

ये ख़याल हो कि मैं अपनी बेटी हफ़सा के लिए कोई सिफारिश ले कर आया हूँ। तुम अर्ज कर दो कि खुदा की कसम् अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुझको हुक्म फ़रमाएँ तो मैं अभी अभी अपनी तलवार से अपनी बेटी हफ़सा की गर्दन उड़ा दूं। इसके बाद मुझ को इजाज़त मिल गई। जब मैं बारगाहे रिसालत में बारयाब हुआ तो मेरी आँखों ने ये मंज़र देखा कि आप एक खुरौं बान की चारपाई पर लेटे हुए हैं। और आपके जिस्मे नाजुक पर बान के निशान पड़े हुए हैं। फिर मैं ने नज़र उठाकर इधर उधर देखा। तो एक तरफ थोड़े से जौ रखे हुए थे। और एक तरफ़ एक खाल खुटी पर लटक रही थी। ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खजाने की ये काएनात देखकर मेरा दिल भर आया। और मेरी आँखों में आँसू आ गए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मेरे रोने का सबब पूछा, तो मैने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस से बढ़कर रोने का और कौन सा मौका होगा कि कैसर- किसरा खुदा के दुश्मन तो नेअमतों में डूबे हुए जैश- इशरत की जिन्दगी बसर कर रहे हैं और आप खुदा के रसूले मुअज्जम होते हुए इस हालत में हैं। आपने इर्शाद फ्रमाया कि ऐ उमर क्या तुम इस पर राजी हो कि कैसरकिसरा दुनिया लें और हम आखिरता

इसके बाद मैं ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मानूस करने के लिए कुछ और भी गुफ्तगू की। यहाँ तक कि मेरी बात सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लबे अनवर पर तबस्सुम के आसार नुमायाँ हो गए। उस वक्त मैं ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क्या आपने अपनी अज़वाजे मुतहहरात को तलाक दे दी है? आपने फ़रमाया कि नहीं मुझे इस कदर खुशी हुई कि फर्ते मुसर्रत से से मैं ने तकबीर का ना मारा। फिर मैं ने ये गुजारिश की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) सहाबए

किराम मस्जिद में गम के मारे बैठे रो रहे हैं। अगर इजाजत हो तो मैं जाकर उन लोगों को मुत्तलअ कर दूँ कि तलाक की ख़बर सरासर गलत है। चुनान्चे मुझे इस की इजाज़त मिल गई। और मैंने सहाबए किराम को इस की ख़बर दी। तो सब लोग खुश होकर हश्शाश बश्शाश हो गए। और सब को सुकून व इत्मिनान हो गया।

जब एक महीना गुज़र गया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कसम पूरी हो गई। तो आप बाला खाने से उतर आए और इसके बाद ही आयते “तख़ईर नाज़िल हुई। जो ये हुई।

याँ अय्युहन्नबीय्यु कुल लिं अजवाजिका इन कुन-तुन्ना तुरिदनल हयातद-दुन्या 4.जी-न-तहा फ-त-आ लैना उमत्ति कुन्ना व उ-सर्रिहकुन्ना सराहन जमीला व इन कुनतुन्ना तुरिद-नल्लाहा व tarai रसूलहू वद-दाल आख़ि-रता फ इन्नल्लाहा अ अद्दा लिल मुहसिनाति मिनकुन्ना अजरन अज़ीमा। (सूरए अहज़ाब)

(तर्जमा :- ऐ नबी! अपनी बीवियों से फ़रमा दीजिए कि अगर तुम दुनिया की ज़िन्दगी और इसकी आराइश चाहती हो, तो आओ मैं तुम्हें कुछ माल दूं और अच्छी तरह छोड़ दूँ। और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत का घर चाहती हो तो बे शक अल्लाह ने तुम्हारी नेकी वालियों के लिए बहुत बड़ा अज तय्यार कर रखा है।)

इन आयाते बय्येनात का मा हसल, और खुलासा मतलब ये है कि रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खुदावंदे कुड्स ने ये हुक्म दिया कि आप अपनी मुकद्दस बीवियों को मत्तल फ़मा दें कि दो चीजें तुम्हारे सामने हैं। एक दुनिया की जीनत व आराइश। दूसरी आख़िरत की नेअमत। अगर तुम दुनिया की ज़ेब- जीनत चाहती हो। तो पैगम्बर की ज़िन्दगी चूँकि बिल्कुल ही जाहिदाना ज़िन्दगी है। इस लिए पैग़म्बर के घर में तुम्हें ये दुनियावी जीनत व आराइश तुम्हारी मर्जी के मुताबिक नहीं मिल सकती। लिहाज़ा तुम सब मुझ से जुदाई हासिल कर लो। मैं तुम्हें रुख्सती का जोड़ा पहनाकर और कुछ माल देकर रुख्सत कर दूंगा। और अगर तुम खुदा व रसूल और आख़िरत की नेअमतों की तलबगार हो तो फिर रसूले खुदा के दामने रहमत से चिमटी रहो। खुदा ने तुम नेको कारियों के लिए बहुत ही बड़ा अज- सवाब तय्यार कर रखा है जो तुम को आख़िरत में मिलेगा। (बुख़ारी किताबुत तलाक । किताबुल इल्म। किताबुल लिबास । बाब मौइजतुर रुजुल अन्बतुल हाल ज़ौजहा)

इस आयत के नुजूल के बाद सब से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ़ ले गए। और फ़रमाया कि ऐ आएशा! मैं तुम्हारे सामने एक बात रखता हूँ। मगर तुम इसके जवाब में जल्दी मत करना। और अपने वालिदैन से मशवरा करके मुझे जवाब देना। इसके बाद आपने मजकूरा बाला “तख़ईर* की आयत तिलावत फ़रमाकर उनको सुनाई तो उन्होंने बरजस्ता अर्ज किया कि या रसूलल्लाह!

(तर्जमा :- इस मामले में भला मैं क्या अपने वालिदैन से मशवरा करूँ? मैं अल्लाह और उसके रसूल और आखिरत के घर को चाहती हूँ। (बुखारी जि.२ स. ७९२ बाब मिन खय्यर निसा) फिर आप ने यके बाद दीगरे तमाम अजवाजे मुतहहरात

से अलग अलग आयते “तख़ईर” को सुना सुना कर सब को इख्तियार दिया और सब ने वही जवाब दिया जो हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने जवाब दिया था।

अल्लाहु अकबर! ये वाकिआ इस बात की आफताब से ज़्यादा रौशन दलील है कि अज़वाजे मुतहहरात का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की जात से किस कदर आशिकाना शेफ़तगी औरर वालिहाना महब्बत थी। कि कई कई सौकनों की मौजूदगी और ख़ानए नुबूव्वत की सादा और ज़ाहिदाना तर्जे मआशिरत और तंगी तुरशी की ज़िन्दगी के बा वुजूद ये रईस ज़ादियाँ एक लम्हे के लिए भी रसूल के दामने रहमत से जुदाई गवारा नहीं कर सकती थीं!

एक गलत फहमी का इज़ाला

अहादीस की रिवायतों और तफसीरों में “ईला आयत “तख़ईर और हज़रते आइशा व हफ्सा रदियल्लाहु अन्हुमा का “मुजाहरा” इन वाकिआत को आम तौर पर अलग अलग इस तरह बयान किया गया है कि गोया ये मुख्तलिफ़ ज़मानों के मुख्तलिफ वाकिआत हैं। इस से एक कम इल्म व कम फहम और जाहिर बी इन्सान को ये धोका हो सकता है कि शायद रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आपकी अज़वाजे मुतहहरात के तअल्लुकात खुशगवार न थे। और कभी ‘ईला कभी “तखईर’ कभी “मुजाहरा” हमेशा एक न एक झगड़ा ही रहता था लेकिन अहले इल्म पर मख़्फ़ी नहीं कि ये तीनों वाकिआत एक ही सिलसिले की कड़ियाँ हैं। चुनान्चे बुख़ारी शरीफ की चन्द रिवायात खुसूसन बुख़ारी किताबुन निकाह (बाब मौइजतुर रुजुल अनबता

लिहालि ज़ौजहा) में हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा की जो मुफ़स्सल रिवायत है इस में साफ तौर पर ये तसरीह है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ईला करना और अज़वाजे मुतहहरात से अलग होकर बाला ख़ाने पर तन्हा नशीनी कर लेना, हजरते आइशा व हज़रते हफ्सा रदियल्लाहु अन्हुमा का मुजाहरा करना आयते “तख़ईर’ का नाज़िल होना, ये सब वाकिआत एक दूसरे से मुन्सलिक और जुड़े हुए हैं और एक ही वक्त में ये सब वाकेअ हुए हैं! वर्ना

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आपकी अज़वाजे मुतहहरात के खुशगवार तअल्लुकात जिस कदर आशिकानां उल्फत व महब्बत के आईना दार रहे हैं कियामत तक उसकी मिसाल नहीं मिल सकती। और नुबूव्वत की मुकद्दस ज़िन्दगी के बे शुमार वाकिआत उस उलफत व महब्बत के तअल्लुकात पर गवाह हैं। जो अहादीस व सीरत की किताबों में आस्मान के सितारों की तरह चमकते और दास्ताने इश्क- महब्बत के चमनिस्तानों में मौसमे बहार के फूलों की तरह महकते हैं।

الهم صل على سيدنا محمد على اله واصحابه دان واجد الطاهرات امهات المؤمنين أبد الآبدين برحمتک یا اسم الناجمين

अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यिदिना मुहम्मदिवँ व अला आलिही व असहाबिही व अजवाजिहित-तहाति उम्म-हातिल मुमिनीन अब्दल आबिदीन बिरह-मतिका या अर-हमर-राहिमीन।

आमिलों का तक़र्रुर

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लस ने सन्न ६ हिजरी मुहर्रम के महीने में ज़कात व सदक़ात की वसूली के लिए आमिलों और मुहस्सिलों को मुख़्तलिफ़ कबाइल में रवाना फ़रमाया। उन

उमरा व आमिलीन की फेहरिस्त में मुन्दर्जा जैल हज़रांत खुसूसियत के साथ काबिले ज़िक्र है जो इने सअद ने जिक्र फरमाया है।

की तरफ

(१) हज़रते उययना बिन हिसन रदियल्लाहु अन्हु को

बनी तमीम (२) हज़रते यज़ीद बिन हुसैन रदियल्लाहु अन्हु को

असलम व गिफार की तरफ (३) हज़रते अब्बाद बिन बिशर रदियल्लाहु अन्हु को

सुलैम व मुज़ैना की तरफ़ (४) हज़रते राफेअ बिन मकीस रदियल्लाहु अन्हु को

जुहैना

की तरफ़ (५) हज़रते अमर बिनुल आस रदियल्लाहु अन्हु को

बनी फज़ारह

की तरफ (६) हज़रते ज़हूहाक बिन सुफ़यान रदियल्लाहु अन्हु को

बनी कल्लाब

की तरफ (७) हज़रते बिश्र बिन सुफ़यान रदियल्लाहु अन्हु को

बनी कब

की तरफ (८) हज़रते इनुल लुनबिया रदियल्लाहु अन्हु को

बनी जुबयान

की तरफ

. (९) हज़रते मुहाजिर बिन अबी उमय्या रदियल्लाहु अन्हु को

सना

की तरफ (१०) हज़रते ज़ियाद बिन लबैद अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु को

हज़र मूत (११) हज़रते अदी बिन हातिम रदियल्लाहु अन्हु को

कबीलए तइ व बनी असअद की तरफ (१२) हज़रते मालिक बिन नुवैरा रदियल्लाहु अन्हु को

बनी हन्ज़ला

की तरफ

की तरफ

की तरफ

की तरफ

की तरफ

(१३) हज़रते जबरकान रदियल्लाहु अन्हु को

बनी सअद के निस्फ हिस्से (१४) हज़रते कैस बिन आसिम रदिसल्लाहु अन्हु को

बनी सअद के निस्फ हिस्से (१५) हज़रते अला बिनुल हजरमी अन्हु को

बहरैन (१६) हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु को

नजरान ये

हुजूर शहंशाहे रिसालत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के उमरा और आमिलीन हैं। जिनको आपने ज़कात व सदक़ात और जज़िया वसूल करने के लिए मुकर्रर फ़रमाया था।

(असहस सियर स 33५)

की तरफ

बनी तमीम का वफ्द

मुहर्रम सन्न ९ हिजरी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बिशर बिन सुफ़यान रदियल्लाहु अन्हु को बनी खुजाआ के सदक़ात वसूल करने के लिए भेजा। उन्होंने सदकात वसूल करके जमअ किया कि नागहाँ उन पर बनी तमीम ने हमला कर दिया। वो अपनी जान बचाकर किसी तरह मदीना आ गए। और सारा माजरा बयान किया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बनी तमीम की सरकूबी के लिए हज़रते उययना बिन हिसन फ़ज़ारी रदियल्लाहु अन्हु को पचास सवारों के साथ भेजा। उन्होंने बनी तमीम पर उनके सहरा में हमला करके उनके ग्यारह मर्दो, इक्कीस औरतों और तीस लड़कों को गिरफ्तार कर लिया। और उन सब कैदियों को मदीना लाए। (जरकानी जि. ३ स ४३)

इसके बाद बनी तमीम का एक वपद मदीना आया जिसमें उस कबीले के बड़े बड़े सरदार थे। और उनका रईसे अअज़म अकरअ बिन हाबिस और उनका खतीब “उतारद और शाओर

“जबरकान बिन बदर भी इस वपद में साथ आए थे। ये लोग दनदनाते हुए काशानए नुबूव्वत के पास पहुंच गए। और चिल्लाने लगे कि आपने हमारी औरतों और बच्चों को किस जुर्म में गिरफ्तार कर रखा है। उस वक्त हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा के हुजरए मुबारका में कैलूला फरमा रहे थे। हर चन्द हज़रते बिलाल और दूसरे सहाबा रदियल्लाहु अन्हुम ने उन लोगों को मना किया कि तम लोग काशानए नबवी के पास शोर न मचाओ। नमाजे जुहर के लिए खुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मस्जिद में तशरीफ लाने वाले हैं। मगर ये लोग एक न माने शोर मचाते ही रहे जब आप बाहर तशरीफ़ लाकर मस्जिदे नबवी में रौनक अफ़ोज़ हुए। तो बनी तमीम का रईसे अअज़म अक़रअ बिन हाबिस बोला कि

ऐ मुहम्मद! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हमें इजाजत दीजिए कि हम गुफ्तगू करें क्योंकि हम वो लोग हैं जिस की मिदह कर दें तो वो मुज़य्यन हो जाता है। और हम लोग जिस की मज़म्मत कर दें वो अब से दागदार हो जाता है।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि तुम लोग गलत कहते हो। ये खुदावंद तआला ही की शान है कि उसकी मिदह जीनत और उसकी मज़म्मत दाग है। तुम लोग ये कहो कि तुम्हारा मकसद क्या है? ये सुनकर बनी तमीम कहने लगे कि हम अपने खतीब और अपने शाओर को लेकर यहाँ आए हैं। ताकि हम अपने काबिले फख कारनामों को बयान करें। और आप अपने मफ़ख़िर को पेश करें। आपने फ़रमाया कि न मैं शेअरने शाओरी के लिए भेजा गया हूँ। न इस तरह की मफ़खिरत का मुझे खुदा की तरफ़ से हुक्म मिला है। मैं तो खुदा का रसूल हूँ। इसके बा वुजूद अगर तुम यही करना चाहते हो तो मैं तय्यार हूँ। ये सुनते ही अकरअ बिन हाबिस ने अपने खतीब ओतारद की तरफ इशारा किया। उसने खड़े होकर अपने मफ़ख़िर और अपने आबा व अजदाद के मनाकिब पर बड़ी फ़साहत व बलाग़त के साथ एक

धुवाँधार खुत्बा पढ़ा। आपने अन्सार के खतीब हज़रते साबित बिन कैस बिन शम्मास रदियल्लाहु अन्हु को जवाब देने का हुक्म फ़रमाया। अन्होंने उठकर बरजस्ता ऐसा फसीह व बलीग और मुअस्सर खुत्बा दिया कि बनी तमीम और उनके जोरे कलाम और मफ़ख़िर की अज़मत को सुनकर दंग रह गए। और उनका ख़तीब ओतारद भी हक्का बक्का हो कर शर्मिन्दा हो गया। फिर बनी तमीम का शाओर “ज़बरकान बिन बदर उठा। और उसने एक क़सीदा पढ़ा। आपने हज़रते हस्सान बिन साबित रदियल्लाहु अन्हु को इशारा फ़रमाया तो उन्होंने फ़िल बदीह एक ऐसा मुरस्संभ और फ़साहत व बलागत से मअमूर कसीदा पढ़ दिया कि बनी तमीम का शाओर उल्लू बन गया। बिल आखिर अकरा बिन हाबिस कहने लगा कि खुदा की कसम! मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को गैब से ऐसी ताइद व नुसरत हासिल हो गई है कि हर फज्ल- कमाल उन पर खत्म है। बिला

शुब्ह उनका खतीब हमारे खतीब से ज़्यादा फसीह व बलीग है। और उनका शाओर हमारे शाओर से बहुत बढ़ चढ़कर है। इस लिए इन्साफ़ का तकाज़ा ये है कि हम उनके सामने सरे तस्लीम खम करते हैं। चुनान्चे ये लोग हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मुतीअ व फमां बरदार हो गए। और कलिमा पढ़कर मुसलमान हो गए। फिर उन लोगों की दरख्वास्त पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनके कैदियों को रिहा फरमा दिया। और ये लोग अपने कबीले में वापस चले गए। इन्ही लोगों के बारे में कुरआन मजीद की ये आयत नाज़िल हुई कि

इन्नल्लजीना युनादू-नका मि

यकिलून। वलौ अन-नहुम सक्रू हत्ता तहलजा इलैहिम लकाना

(मदारिजुन्नुबूव्वत जि.२ स. ३३२ व ज़रकानी जि. ३ स. ४४)

हातिम ताई की बेटी और बेटा मुसलमान

खैरल लहुम। वल्लाहु गफूरुर रहीम। (हजरात) तर्जमा बेशक वो जो आप को हुजरों के बाहर से पुकारते हैं उनमें अकसर बे अक्ल हैं। और अगर वो सब्र करते। यहाँ तक कि आप उनके पास तशरीफ लाते तो ये उनके लिए बेहतर था। और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है।

रबीउल आख़िर सन्न ९ हिजरी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु की मा तहती में एक सौ पचास सवारें को इस लिए भेजा कि वो कबीलए तय्य के बुतख़ाने को गिरादें। उन लोगों ने शहर कुलस में पहुंचकर बुदखाने को मुन्हदम कर डाला। और कुछ ऊँटों और बकरियों को पकड़ कर और चन्द औरतों को गिरफ्तार करके ये लोग मदीना लाए। उन कैदियों में मशहूर सखी हातिम ताई की बेटी भी थी। हातिम ताई का बेटा अदी. बिन हातिम भाग कर मुल्के शाम चला गया। हातिम ताई की लड़की जब बारगाहे रिसालत में पेश की गई। तो उसने कहा कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं “हातिम ताई की लड़की हूँ। मेरे माँ बाप का इन्तिकाल हो गया। और मेरा भाई अदी बिन हातिम मुझे छोड़कर भाग गया। मैं ज़ईफ़ा हूँ। आप मुझ पर एहसान कीजिए। खुदा आप पर एहसान करेगा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनको छोड़ दिया। और सफर के लिए एक ऊँट भी इनायत फ़रमाया। ये मुसलमान होकर अपने भाई अदी बिन हातिम के पास पहुँची और उसको हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अख़्लाके नुबूव्वत से आगाह किया। और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बहुत ज्यादा तीफ की। अदी बिन

हातिम अपनी बहन की ज़बानी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खुल्के अज़ीम, और आदाते करीमा के हालात सुनकर बेहद मुतास्सिर हुए। और बिगैर कोई अमान तलब किए हुए मदीने हाज़िर होगए। लोगों ने बारगाहे नुबूव्वत में ये ख़बर दी कि अदी बिन हातिम आ गया है। हुजूर रहमतुल लिल आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन्तिहाई करीमाना अन्दाज़ से अदी बिन हातिम के हाथ को अपने दस्ते रहमत में ले लिया और फरमाया कि ऐ अदी! तुम किस चीज़ से भागे? क्या – ला इलाहा इल्लल्लाह कहने से तुम भागे? क्या खुदा के सिवा कोई और मअबूद भी है? अदी बिन हातिम ने कहा कि नहीं फिर कलिमा पढ़ लिया और मुसलमान हो गए। उनके इस्लाम कुबूल करने से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस कदर खुशी हुई कि फ़र्ते मुसर्रत से आपका चेहरए अनवर चमकने लगा। और आप ने उनको खुसूसी इनायात से नवाज़ा।

हज़रते अदी बिन हातिम रदियल्लाहु अन्हु भी अपने बाप हातिम की तरह बहुत ही सखी थे। हज़रते इमाम अहमद नाकिल (नक्ल करते) हैं कि किसी ने उन से एक सौ दिरहम का सवाल किया तो ये ख़फ़ा हो गए और कहा कि तुम ने फ़क़त एक सौ दिरहम ही मुझ से माँगा तुम नहीं जानते कि मैं हातिम का बेटा हूँ खुदा की कसम मैं तुम को इतनी हकीर रकम नहीं दूंगा। ये बहुतही शानदार सहाबी हैं। ख़िलाफ़ते सिद्दीके अकबर में जब बहुत

से कबाएल ने अपनी ज़कात रोक दी और बहुत से मुरतद हो गए। ये उस दौर में भी पहाड़ की तरह इस्लाम पर साबित क़दम रहे। और अपनी कौम की ज़कात लाकर बारगाहे खिलाफत में पेश की। और इराक की फुतूहात और दूसरे इस्लामी जिहादों में मुजाहिद की हैसियत से शरीक हुए। और सन्न ६८ में एक सौ बीस बरस की उम्र पाकर विसाल फ़रमाया और सिहाह सत्ता की हर किताब में आपकी रिवायत कर्दा हदीसें मजकूर हैं।

(जरकानी जि. ३ स. ५३ व मदारिज जि.२ स. ३३७)

गजवए तबूक

“तबूक मदीने और शाम के दर्मियान एक मकाम का नाम है जो मदीना से चौदह मंज़िल दूर है बअज मुअरिंखीन का कौल है कि “तबूक’ एक किलो का नाम। और बअज का कौल है कि “तबूक एक चष्मे का नाम है। मुमकिन है ये सब बातें मौजूद हों!

ये गजवा सख्त कहत के दिनों में हुआ। तवील सफर, हवा गरम, सवारी कम, खाने पीने की तकलीफ, लश्कर की तअदाद बहुत ज्यादा, इस लिए इस गज़वे में मुसलमानों कोबड़ी तंगी और तंगदस्ती का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि इस गजवे को ‘जैशुल असरा (तंगदस्ती का लश्कर) भी कहते हैं। और चूंकि मुनाफिकों को इस गजवे में शर्मिन्दगी और शर्मसारी उठानी पड़ी थी। इस वजह से उसका एक नाम “गजवए फाजिहा’ (रुसवा करने वाला गजवा) भी है। इस पर तमाम मुआरिंखीन का इत्तिफाक है कि इस गजवे के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम माहे रजब सन्न ९ हिजरी जुमेरात के दिन रवाना हुए। (जरकानी जि.३ स. ६३)

गज़वए तबूक का सबब

अरब का गुस्सानी खानदान जो कैसरे रूम के जेरे असर मुल्के शाम पर हुकूमत करता था। चूंकि वो ईसाई था। इस लिए कैसरे रूम ने उसको अपना आलए कार बनाकर मदीना पर फौज कशी का अज्म कर लिया। चुनान्चे मुलके शाम के जो सौदागर रोगने जैतून बेचने मदीना आया करते थे उन्होंने खबर दी कि कैसरे रूम की हुकूमत ने मुल्के शाम में बहुत बड़ी फौज जमा कर दी है। और उस फौज में रूमियों के अलावा कबाएले लखम व जुजाम और गस्सान के तमाम अरब भी शामिल हैं। उन खबरों का तमाम अरब में हर तरफ चर्चा था। और रूमियों की इस्लामी दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी। इस लिए उन खबरों को

गलत समझ कर नज़र अन्दाज़ कर देने की भी कोई वजह नहीं थी इस लिए हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने भी फौज की तय्यारी का हुक्म दे दिया।

लेकिन जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं कि उस वक्त हिजाज़े मुकद्दस में शदीद कहत था। और बेपनाह शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी। इन वुजूहात से लोगों के घर से निकलना शाक गुज़र रहा था। मदीना के मुनाफ़िकीन जिनके निफाक का भान्डा फूट चुका था। वो खुद भी फ़ौज में शामिल होने से जी चुराते थे। और दूसरों को भी मना करते थे। लेकिन इसके बा वुजूद तीस हज़ार का लश्कर जमअ हो गया।

मगर इन तमाम मुजाहिदीन के लिए सवारियों और सामाने जंग का इन्तिज़ाम करना एक बड़ा ही कठिन मरहला था। क्योंकि लोग कहत की वजह से इन्तिहाई मफलूकुल हाल और परेशान थे। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तमाम कबाएले अरब से फौजें और माली इमदाद तलब फरमाई। इस तरह इस्लाम में किसी कारे खैर के लिए चन्दा करने की सुन्नत काएम हुई।

Hazrat Abu Talib RadiAllahu Ta’ala Anhu ke Ashaar

Hazrat Ali ibne Zaid RadiAllahu Anhu bayan karte hain ke Hazrat Abu Talib RadiAllahu Ta’ala Anhu jab Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ko Takte to ye Ashaar gungunaate:

“Wa Shaqqa Lahu Minis-me-hee Lee Yujillahu
Fazul Arshi Mahmoodun wa Haza Muhammadun”

Tarjuma: “Allah Ta’ala ne Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Takreem ki khatir Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ka Naam Apne Naam se nikaala hai,
Pas Arshwaala (Allah Ta’ala) Mahmood aur Ye (Habib) Muhammad Hain (SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam).”

[SUBHANALLAH! To kya khayal hai aapka, koi kafir aise Kalimat keh sakta hai? Jiska Allah pe Imaan he nahi, usko Arsh aur Mahmood ka kaise pata? Isliye to Peer Naseeruddin Nasir Rehmatullah Alaih ne farmaya:
“Baad Tehqeeq e Quran o Hadees, Mera Dil Qaayal-e-Imaan e Abu Talib Hai!” (Alaihissalam)]

SallAllahu Alaihi wa Ala Ammihi wa Aalihi wa Barik wa Sallim

Reference:
Bukhari, Tarikh as Sagheer, 1/13, Hadees #31
Ibne Hibban, Sikaat, 1/42
Abu Nuaim, Dalailun Nabuwwah

Hadith Bukhari 5353

हज़रत अबु हुरैरा: रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि

हुज़ूर स्वल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने फ़रमाया:

बेवाओं और मिस्कीनों के काम आने वाला अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने वाले के बराबर है या रात भर इबादत और दिन को रोज़े रखने वाले के बराबर है।
📚 सही बुख़ारी/5353
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