Hadith:ishq e Ali ishq e Nabi ishq e Allah

*ishq e Ali ishq e Nabi ishq e Allah
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Jo Koi Allah Aur Mera Qurb Chahta Hai , Usey Chahiye Ke Ali Ke Karib Hojaye. .
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—Beloved Holy Prophet Muhammad (صلى الله عليه وآله وسلم)‎
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Reference : Dhakhair ul Uqba, Tabari, pg.92

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اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ

हुकूमत के लिए हज़रत अली के दिशा निर्देश

*हुकूमत के लिए हज़रत अली के दिशा निर्देश….* (शौकत भारती)
*तारीखे इस्लाम में पहला एक इंसान है जो काबे में पैदा हुआ और जिसे सबसे पहले मस्जिद के अंदर नमाज़ की हालत में आतंकवादी हमले का शिकार बनाया गया* जिसका नाम *हज़रत अली है।*
*13 रजब को खानए काबा में पैदा होने वाले अली अ.स* को आज से 1400 साल पहले एक *खतरनाक आतंकवादी इब्ने मुल्जिम* ने जो रातों दिन नमाज़ और कुरान पढ़ता रहता था *19 रमजान की सुबह जिस वक्त हजरत अली सुबह की नमाज़ अदा कर रहे थे ज़हर से बुझी हुई तलवार* से हमला कर के उन्हे बुरी तरह ज़ख्मी कर दिया गया जिसकी वजह *21 रमजान को हजरत अली की शहादत हो गई…* *काबे में पैदा और मस्जिद में शहीद होने वाले अली* ने अपनी खिलाफत में *सबका साथ और सब का विकास* के साथ न्याय और शांति का राज स्थापित करने के लिए अपने गवर्नर को ऐसे दिशा निर्देश दिए जिन पर चल कर ग्लोबल पीस, जस्टिस और सिक्योरिटी के सपने को कल भी साकार किया जा सकता था और कयामत तक साकार किया जा सकता है.. मगर अफसोस अमन और शांति का राज स्थापित करने की कोशिश करने वाले अली को सत्ता के लालचियों ने एक *आतंकवादी हमला करवा के रमजान के पवित्र महीने में शहीद करवा दिया।*
*आइए आप को बताते हैं हज़रत अली के वोह गोल्डेन दिशा निर्देश जो उन्होंने अपने गवर्नर्स को दिए थे।*
(1) याद रखो तुम जिन लोगों के हाकिम बनाए गए हो उनमें दो तरह के लोग हैं एक वो जिनका और तुम्हारा धर्म एक है, दूसरे वो लोग हैं जिनका और तुम्हारा धर्म तो एक नहीं है मगर उनका और तुम्हारा बनाने वाला एक ही है।क्यों की तुम दोनों के हाकिम चुने गए हो इस लिए याद रखो तुम्हे सब के साथ न्याय करना है।
(2) ये भी हमेशा याद रखना कि जिस तरह पिछली हुकूमतों की गलत बातों के खिलाफ तुमने आवाज़ उठाई थी अगर तुम भी गलत करोगे तो तुम्हारे विरुद्ध भी आवाम की आवाज़ें उठेंगी इस लिए कभी कोई गलत काम न करना और न ही किसी को करने देना।
(3) याद रखो *अपनी कैबिनेट* में कभी किसी गलत आदमी को कोई जगह न देना और न उन लोगों को कोई जगह देना जो पिछली हुकूमतों में गलत काम में लिप्त रह चुके हैं।
साफ और स्वच्छ लोगों को ही अपनी कैबिनेट में रखना उसके बाद भी उन पर अपने भरोसे मंद जासूस मुकर्रर कर देना और जैसे ही तुम्हे खबर मिले की कोई गलत कर रहा है तो उसे सख्त सज़ा देना और गलत तरह से उसका कमाया हुआ सारा माल भी जब्त कर लेना।
(4) *अपने सलाहकारो* में कभी किसी चापलूस को मत रख लेना बल्कि ऐसे लोगों को सलाहकार बनाना जो साफ,सच्ची और सख्त बात तुम्हारे सामने कहने की हिम्मत रखते हों और ऐसे सलाहकारों का खास ख्याल रखना और उनसे मशवरे करना।
(5) *जज की कुर्सी* पर उसे ही बिठाना जो फैसले करने में किसी से न डरता हो और फैसले करने में देर न करता हो।
ये भी ख्याल रखना की वो ज्यादा लोगों से मेल जोल न रखता हो,लोगों से गिफ्ट और तोहफे वागिरह न लेता हो।
जज की तनख्वाह ऐसी रखना की उसे अपनी जरूरत के लिए किसी की तरफ देखने की जरूरत न हो।
उसके किए गए फैसलों पर भी पूरी निगाह रखना।
(6) *पुलिस फोर्स* का मुखिया उसे ही बनाना जो किसी से न डरता हो और बड़े से बड़े दौलत मंद और जाबिर लोगों से भी गरीब से गरीब इंसान का हक दिलाने की हिम्मत रखता हो।
इस तरह के अफसर का ख्याल इस तरह रखना जिस तरह एक बाप अपने बेटे का ख्याल रखता हो।
क्यों की ऐसा शख्स बुरे से बुरे हालात में भी तुम्हारे साथ खड़ा रहे गा।
(7) *तहसील..* ये वो खास जगह है जहां लोगों की समत्तियों के कागज़ात रखे जाते हैं जो लोगों की अमानतें हैं और हुकूमत उसकी जिम्मेदार है इस लिए इस डिपार्टमेंट में ऐसे किसी शख्स को न रखना जो लेन देन कर के कागजातों में हेरा फेरी करने वालें हो।
(8) *टैक्स वसूली..*
याद रखो तुम्हारे अफसर अगर टैक्स वसूलने जाएं तो सब से पहले जनता पर और हालत पर निगाह डाले अगर आवाम के पास साल भर खाने का अनाज और जाड़े या गर्मी में पहेन्ने के कपड़े नहीं है तो आवाम को
ये सब खुद दे कर आए अगर सूखा पड़ गया है या सैलाब आ गया है और फसलें बर्बाद हो गईं है तो टैक्स बिकुल न लिया जाए बल्कि किसानों के लिए खाद और बीज का इंतजाम कर के आना ताकि किसान सुकून से खेती कर के अगले साल टैक्स देने के काबिल बन जाए और सरकार को टैक्स अदा करे ।
याद रखो सरकारी ख़ज़ाने पर चाहे कितना ही बोझ क्यों न पड़े ये सब कर के ही टैक्स लेना इससे तुम्हारी हुकूमत पर आवाम का भरोसा बढ़ेगा और आवाम को परेशानियों का सामना भी नहीं करना होगा।
(9) *कारोबारियों का ख्याल:*
याद रखो कारोबारी किसी भी हुकूमत की रीढ़ की हड्डी होते हैं इस लिए उनका हर तरह से ख्याल रखना,लेकिन अगर वो उसके बाद भी जमा खोरी करें या दाम बढ़ाने लगें या मिलावट करने लगें और आवाम परेशान होने लगे तो ऐसे कारोबारियों के साथ सख्ती से निपटना और उन्हें सख्त सज़ा भी देना।
(10) *दबे कुचलों का ख्याल..*
समाज में ऐसे अपंग और लावारिस भी होते हैं जिनका कोई ख्याल करने और देख भाल करने वाला ही नहीं होता इस लिए ये तुम्हारी पर्सनल जिम्मेदारी है की इनका खयाल तुम खुद रखना क्यो की तुम खुद मुखिया हो।
(11) *जनता दरबार:* आवाम से मिलने का एक दिन जरूर मुकर्रर करना और आवाम की शिकायत को उस दिन खुद सुनना याद रखो शिकायत सुनते वक्त अपने अधिकारियों को वहां से हटा देना ताकि जनता खुल कर गलत अफसरों की शिकायत तुमसे कर सके।
(12) *कल्चरल प्रोग्राम्स:* वो सारे कल्चरल प्रोग्राम जिससे लोग एक दूसरे से करीब आते हैं मेल मिलाप बढ़ता है खबरदार उन पर कभी रोक न लगाना। क्यों की इस बहाने से जनता एक दूसरे के करीब आती है और मेल मिलाप बढ़ता है।
(13) *एनिमल राइट्स:* याद रखो जानवरों के लिए खाने पीने की चरागाहे भी कायम करवाना और अगर टैक्स में तुम्हे जानवर दिए जाएं तो तुम्हारे करींदे कमजोर और मजबूत दोनों जानवरों को एक ही रफ्तार से मत हांकते हुए ले जाएं, क्यों की ऐसा करने से कमज़ोर जानवरों को तकलीफ होती है अगर किसी जानवर के नाखून बड़े हुए हों तो उसे जरूर काट दिया जाए ताकि जानवर को चलने में किसी तरह की तकलीफ नही हो रास्ता कितना ही लंबा क्यों न हो जानवरों को उसी रास्ते से ले कर आया जाए जिधर चारे और पानी का मुकम्मल इंतजाम हो।
जिन जानवरों के साथ दूध पीते बच्चे हों उनका दूध इतना न दुह किया जाए की उनका बच्चा भूखा रह जाए….
(14) याद रखो जनता के लिए काट खाने वाला दरिंदा मत बन जाना और अपने दिल से नफरत की हर गांठ को खोल देना सब का ख्याल रखना सबके साथ इंसाफ करना और हमेशा इस बात को याद रखना की तुम्हारे हर कार्य को ऊपर वाला देख रहा है।
*ये थी जानता को न्याय और अमन का राज्य देने वाले हजरत अली के गाइड लाइन के कुछ अंश किसी हमने नहजुल बलागा से पढ़ कर पेश किया है।*
*जौ की सूखी रोटी खा कर और पेवंद लगे कपड़े और और फटी हुई चप्पल पहने कर हुकूमत करने वाले हज़रत अली ने कभी दुनिया से कुछ नहीं लिया* और हर हाल में न्याय और शांति का राज स्थापित करने की कोशिश की यही वजह थी की उन्हों ने एक बड़ी रैली कर के *जनता से सवाल किया की जबसे मैंने हुकूमत संभाली है क्या कोई ये कह सकता है की उसके सर पर छत, तन पर कपड़ा न हो या वो भूखा सोया हो,*
किसी ने भी उनकी इस बात को नहीं झुठलाया अफसोस है *सबको रोटी कपड़ा और मकान देने वाले अली को नमाज़ कि हालत में आतंकी हमले से जख्मी कर के शहीद कर दिया गया,* जैसे ही अली के सर पर तलवार चली वो पुकार उठे *काबे के रब की कसम मैं कमियाब हुआ।*
दुनिया के सभी हुक्मूरान अगर वाकई पीस जस्टिस और सिक्योरिटी का राज स्थापित करना चाहते हैं तो हज़रत अली के बताए हुए दिशा निर्देशों पर अपनी हुकूमत को चलाएं और एक कमियब हुक्मरान बन सकते हैं।

Shahadat_e_Maula_Ali

Shahadat_e_Maula_Ali

Maula Ali ne Imam Hasan se farmaya ki apni behen umme kulsum se kaho ke aaj 18 roza me apni beti ke Ghar iftar krungaa,Maula e Qayenat Pohche apni beti ke Ghar janabe umme kulsum ne dastar khwan sajaya ek zarf me doodh ek zarf me namak aur ek zarf me maula ki pasandida roti (jaw ki roti) rakhi
Maula ne farmaya Beti Ummul kulsum tumne apne baba ko bhula diya kya kabhi mere dastar khwan ne ek chiz se jyda chiz rahi hai. Phir umme kulsum ne chaha ke namak utha le lekin maula ne mana kr diya aur kaha ki doodh utha lo yaha kufe me yateem bohot hai unke paas peene ke liye doodh nhi hai, Phir maula ne namak aur jaw ki roti ke sath iftar kiya, Phir maula jab Bibi Umme kulsum ke ghar se bahar nikle toh Ghar ke bahar batakh(Duck) rasta rokne lage maula ke samne zor zor se awaaz nikalne lage Bibi Umme kulsum ne pucha baba yeh kya kr rhe hai toh Maula ne kaha ki yeh Noha kr rhe hai , Phir maula masjid e kufa me pohche aur soye hue logo ko uthaya aur waha pr Ibn Muljim bhi tha maula ne use bhi awaaz di Aur uthaya phir maula ne imamat ki namaz ki aur jab maula ne sajda kiya phir us lanati Ibn e Muljim ne talwar nikala aur maula ke sar par zarb laga di jo usne 1000 dirham me kharidi thi aur zeher me duba kr rakha hua tha ,Phir maula ne Sukr Adaa krte hue kaha “Fuztu Bi Rabbil Kaaba” (Rab e Kaaba ki Kasam me Kamyab ho gaya) Phir huqum Diya imam Hasan ko namaz muqammal krne ki Imam Hasan ne Namaz muqammal krwayi Phir Imam Hasan,Imam Hussain aur Hazrat Muhammad e hanafiya ne sambhala aur phir Ghar le gaye, logo ne Ibn Muljim ko pakad liya tha aur Maula ke pass pesh kiya use phir Maula Ali ne Hazrat e Abbas ko kaha Bete Abbas ise Sharbat pilao yeh khabraya hua hai aur phir farmaya jo tum khate ho ise khilao aur Jo tum peete ho ise pilao….

Allahu Akbar

Aur Phir 21 Ramzan ko Gulshan e Zahra Yateem ho gye Maula Shaheed ho gye

Allahumma Lan Qata Latul Ameer Ul Momineen

ACCOUNT OF THE SECOND HIJRAH TO ABYSSINIA

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Volume 1, Parts 1.52.1
Muhammad Ibn `Umar Ibn Waqid al-Aslami informed us; he said: Sayf
Ibn Sulaymàn related to me on the authority of Abu Nujayh; (second
chain) he (Ibn Sa’d) said: `Utbah Ibn Jabirah al-Ashhali related to me on
the authority of Ya`qub Ibn `Umar Ibn Qatadah he said: I heard an old
man of Banu Makhzum relating that he heard Umm Salamah saying;
(third chain) he (Ibn Said) said: `Abd Allah Ibn Muhammad al-Jumahi
related to us on the authority of his father, he on the authority of `Abd al-
Rahman Ibn Sabit; they said:
When the Companions of the Prophet, may Allah bless him, returned to
Makkah after the first hijrah, their people treated them harshly and their
relatives were cruel to them; they suffered much torture and the Apostle
of Allah, may Allah bless him, permitted them to go to Abyssinia a
second time. Their second migration was very irksome and they suffered
at the hands of the Quraysh much hardship; they tortured them because
they were treated well by the Negus. `Uthmàn Ibn `Affan said: 0 Apostle
of Allah ! our first hijrah as well as this second one to Negus has been
without your being with us. The Apostle of Allah, may Allah bless him,
said: You are migrating for Allah and for me; and you will have these
two migrations at your credit. `Uthman said: 0 Apostle of Allahe ! this is
sufficient for us. The number of persons who migrated this time were
eighty-three men and eleven women of the Quraysh and seven others. [P.
139] The emigrants lived with the Negus in Abyssinia in congenial
neighbourhood. When they heard of the hijrah of the Apostle of Allah,
may Allah bless him, to al-Madinah, thirty-three men and eight women
returned. Two men out of them died at Makkah, and seven were
imprisoned at Makkah. Twenty-four of them participated in (the battle
of) Badr. When it was the seventh year of the hijrah of the Apostle of
Allah, may Allah bless him, to al-Madinah, the Apostle of Allah, may
Allah bless him, wrote a letter to the Negus asking him to embrace Islam.
The letter was dispatched by `Amr Ibn `Umayyah al-Damri. When the
letter was read to him, he embraced Islam and said: I would have come
to him if I could. The Apostle of Allah, may Allah bless him, wrote to him
to wed him (the Prophet) to Umm Habibah Bint Abu Sufyan Ibn Harb;
she had migrated to Abyssinia with her husband `Ubayd Allah Ibn
Jahsh, who had turned Christian and had died. So the Negus wedded him
to her and paid a dower of four hundred dinars to her. The person who
acted her wakil was Khálid Ibn Sa’id Ibn al-`As. The Apostle of Allah,
may Allah bless him, wrote to him to send those (of his Companions) who
had remained there. He did accordingly and boarded them in two boats
with `Amr Ibn Umayyah al-Damri. They landed at Bawla which is also
known as al-Jar. Then they hired beasts and reached al-Madinah. There
they learnt that the Apostle of Allah, may Allah bless him, was at
Khaybar. They went to him and found that Khaybar was conquered. The
Apostle of Allah, may Allah bless him, said to the Muslims to include
them in (dividing) their shares (of booty). They did accordingly.

शार्गिद या उस्ताद

शार्गिद या उस्ताद

हजरत ईसा अलैहिस्सलाम जब चलने फिरने लगे तो मरयम आपको उस्ताद के पास ले गई। कहा कि इस च्चे को पढ़ायें । उस्ताद ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से कहा: ऐ ईसा ! पढ़ बिस्मिल्लाह ! ईसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम । उस्ताद ने कहा अलिफ़, बे, जीम, दाल ! ईसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः क्या तुम जानते हो कि इन हुरूफों के मायने क्या हैं? उस्ताद ने कहाः इन हुरूफों के मायने तो मैं नहीं जानता। फ्रमायाः तो मुझसे सुनो अलिफ़ से मुराद है अल्लाह, बे से मुराद है अल्लाह की बहजत, जीम से मुराद है अल्लाह का जलाल और दाल से मुराद है अल्लाह का दीन। उस्ताद ने हज़रत मरयम रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से कहा कि आप इस बच्चे को वापस ले जायें। यह किसी उस्ताद का मोहताज नहीं । भला मैं इसे क्या पढ़ा सकता हूं जबकि यह खुद मुझे पढ़ा रहा है ।

( नुज़हतुल मजालिस जिल्द २, सफा ४३२) सबक़ : नबी किसी दुनियावी उस्ताद के मोहताज नहीं होते। उसका उस्ताद व मुअल्लिम ख़ुदा होता है। नबी ऐसे उलूम का चश्मा होता है जिनसे दूसरे लोग बेख़बर होते हैं ।