Ramzan dars day 15.

मस्जिद और अली अलैहिस्सलाम

मस्जिद और अली अलैहिस्सलाम

– पहली हदीस – सिवाय अली के मस्जिद में खुलने वाले सबके दरवाजे बंद कर दिए जाएँ।

रावीयान ए हदीस, मुहम्मद बिन बश्शार, मुहम्मद बिन जाफ़र, औफ़, मैमून अबु अब्दुल्लाह।

हज़रत ज़ैद बिन अरक़म रजिअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के बाज़ सहाबा रज़िअल्लाहु अन्हुमा के घरों के दरवाज़े मस्जिद में खुलते थे, तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि, सिवाय अली अलैहिस्सलाम के दरवाज़े के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए जाएँ।

इस पर लोगों ने तनकीद की, तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने खड़े होकर, अल्लाह रब उल इज्जत की हम्द ओ सना बयान करने के बाद फरमाया, “मैंने तुम्हें हुक्म दिया है कि, सिवाय हज़रत अली अलैहिस्सलाम के, इन दरवाजों को बंद कर दो और तुम में से इस पर किसी ने कुछ कहा है। खुदा की कसम, मैं ना दरवाज़ा खोलता हूँ और ना बंद करता हूँ, मगर उसकी इत्तेबा करता हूँ, जो हुक्म मुझे दिया जाता है। मैंने ना उसे दाखिल किया है और ना तुम्हें निकाला है।” खसाइस ए अली

दूसरी हदीस – फरमान ए मुस्तफा, दर शान ए मुर्तजा

रावीयान ए हदीस, मुहम्मद बिन सुलेमान, इब्न ए उऐना, अम बिन दीनार, अबु जाफ़र मुहम्मद बिन अली

हजरत इब्राहीम बिन साद बिन अबी वक्कास रज़िअल्लाहु अन्हो, अपने वालिद गिरामी, हज़रत साद बिन अबी वक्कास रजिअल्लाहु अन्हो से बगैर इनका नाम लिए रिवायत करते हैं कि इन्होंने फरमाया कि, “मैं और कुछ दूसरे लोग, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की ख़िदमत में बैठे हुए थे कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाए, तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने वहाँ पहले से मौजूद सहाबा और लोगों से बाहर जाने के लिए कहा।, वो लोग बाहर आ गए और आपस में एक दूसरे को मलामत करने लगे, “रसूलुल्लाह ने हमें बाहर क्यों किया है और अली को अंदर आने क्यों आने दिया है?”,चुनाँचे वो लोग लौटकर अंदर आ गए तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने इरशाद फरमाया, “खुदा की कसम! ना मैंने अली को दाखिल किया है और ना ही तुम्हें निकाला है।”

अबु अब्दुर रहमान नसाई फरमाते हैं, ये हदीस ज्यादा दुरुस्त है।

तीसरी हदीस – इसका हुक्म अल्लाह ने दिया है

रावीयान ए हदीस, अहमद बिन यहया, अली बिन कादिम, इस्राईल बिन यूनुस, अब्दुल्लाह बिन शरीका

हज़रत अल-हारिस बिन मालिक से रिवायत है कि मैं, मक्का मुअज़’ज़मा में आया और हज़रत सा बिन अबु वक्कास रजिअल्लाहु अन्हो से मुलाकात की और आपकी ख़िदमत में

अर्ज किया कि, आपने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की मनकबत सुनी है तो हज़रत साद बिन अबी वक्कास रजिअल्लाहु अन्हो ने फरमाया कि, हम सहाबा, रसूलुल्लाह के साथ मस्जिद में थे और हमें दरवाजे बंद करने के लिए कहा गया और कहा के सिवाय रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की आल और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की आल के अलावा सब लोग, मस्जिद से निकल जाओ यानी अपने दरवाज़े मस्जिद से बाहर बनाओ, पस हम लोग बाहर आ गए।

और जब सुबह हुई तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम के यचा ने आपकी खिदमत में अर्ज किया, “या रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लमा आपर्ने अपने साथियों और चचाओं को मस्जिद से बाहर निकाल दिया और इस लड़के को यहाँ रहने दिया है?”

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने फरमाया कि, “ना तो मैंने तुम्हारे इख़रज का हुक्म दिया है और ना इस लड़के को यहाँ रहने का फरमान दिया है, बेशक इसका हुक्म अल्लाह ने दिया है।” 1″

चौथी हदीस – ना मैंने खोला, ना बंद किया

रावीयान ए हदीस, फित्र बिन अब्दुल्लाह बिन शरीक, अब्दुल्लाह बिन अर-कीम, सादा

हज़रत अब्बास रजिअल्लाहु अन्हो ने, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की खिदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया, “आपने, हमारे दरवाजे बंद कर दिए हैं मगर अली का दरवाजा बंद नहीं किया। आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने फरमाया कि, “ना मैंने उसे खोला है और ना मैंने उसे बंद किया है।”

ज़करिया बिन यहया, अब्दुल्लाह बिन उमर, अस्’बात बिन मुहम्मद फित्र बिन खलीफा, अब्दुल्लाह इब्न ए शरीक, अब्दुल्लाह बिन अर्-रकीम, साद की रिवायत से भी एक हदीस मिलती है जिसके अल्फाज़ वो ही हैं जो ऊपर की हदीस में मौजूद हैं।

पाँचवीं हदीस

सब दरवाजे बंद कर दिए हैं

रावीयान ए हदीस, मुहम्मद बिन वहाब, मिस्कीन बिन बुकैर, शुअ’बा, अबु अब’लज, इब्न ए अब्बास।

हज़रत इब्न ए अब्बास रजिअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम ने हुक्म दिया, “मस्जिद में खुलने वाले दरवाजे बंद कर दिए जाएँ, सिवाय हज़रत अली अलैहिस्सलाम के दरवाज़े के।”

छटवी हदीस

अली जिनबी हालत में भी मस्जिद में आ सकते हैं

रावीयान ए हदीस, मुहम्मद बिन मुसन्ना, यहया बिन हम्माद, अल्-वज़’जाह, यहया, अम बिन मैमून।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़िअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि, “सिवाय अली अलैहिस्सलाम के दरवाज़े के, मस्जिद में खुलने वाले तमाम दरवाज़े बंद कर दिए गए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम, जिनबी हालत में भी मस्जिद में तशरीफ़ ले आते और आपके घर को सिवाय मस्जिद के कोई दूसरा रास्ता नहीं था।”


बे-मौसम का फल

बे-मौसम का फल

हज़रत मरयम अलैहिमस्सलाम की वालिदा ने हालते हमल में यह नज़र मानी थी ऐ रब! मैं तेरे लिए मन्नत मानती हूं कि जो पेट में है वह ख़ालिस हूं तेरी खिदमत के लिये रहेगा। चुनांचे आपके यहां एक बच्ची पैदा हुई जिसका नाम मरयम रखा गया। मरयम की वालिदा अपनी इस बच्ची को बैतुल मुकद्दस में ले गयीं। मस्जिद की खिदमत के लिए वहां दाखिल कर दिया। बैतुल मुकद्दस के मुतवल्लियों में हज़रत जकरिया अलैहिस्सलाम भी थे। आप मरयम के अज़ीज़ भी थे। आपकी बीवी मरयम की खाला थीं। इसलिये मरयम को आपने अपनी निगहबानी में रखा । जकरिया अलैहिस्सलाम ने मरयम के लिये मस्जिद में एक बनवाया। मरयम को अपनी निगरानी के लिए उसमें रखा। आपके सिवा उस कमरे में कोई न जा सकता था। आप जब बाहर जाते कमरे का दरवाजा बंद करके जाते और तशरीफ लाते तो खुद ही खोलते । हजरत मरयम की करामत देखिये कि जकरिया अलैहिस्सलाम जब भी कमरे में दाखिल होते तो उस बंद कमरे में मरयम के पास तरह तरह के ताजे फल मौजूद पाते। गर्मियों के फल सर्दियों में और सर्दियों के फल गर्मियों में वहां रखे होते। हज़रत जकरिया अलैहिस्सलाम ने यह सूरत देखी तो फरमायाः ऐ मरयम! यह फल इस कमरे में कौन दे जाता है और यह फल कहां से आते हैं? मरयम अलैहिमस्सलाम ने फरमायाः यह अल्लाह के पास से आते हैं वह जिसे चाहे बेहिसाब दे।

हज़रत जकरिया अलैहिस्सलाम की उम्र शरीफ ७५ साल से भी ज्यादा थी। सिर तो सफेद हो चुका था और आवाज़ मुबारक में भी कमज़ोरी आ चुकी थी। आपके यहां औलाद न थी। आपने ख्याल फ़रमाया कि खुदा तआला मरयम को बेमौसम फल अता फ़रमाता है तो मुझे भी इस बुढ़ापे में जबकि मेरी बीवी भी बांझ है, यकीनन औलाद देने पर कादिर है। इस ख्याल से आपने उसी जगह जहां आप मरयम के पास बैठे थे दुआ की, “ऐ अल्लाह! मुझे अपने पास से साफ़ सुथरी औलाद दे। बेशक तू दुआ सुनने वाला है।” आपकी इस दुआ के बाद जिब्रईल हाज़िर हुए और अर्ज किया कि अल्लाह

तआला ने आपको बशारत दी है कि आपके यहां लड़का पैदा होगा जिसका नाम यया होगा।

(कुरआन करीम पारा ३, रुकू १२, रूहुल-ब्यान जिल्द १. सफा ३२४)

सबक : औलिया की करामत बरहक हैं। हज़रत मरयम अलैहिस्सलाम के पास बे-मौसम के फल मौजूद होना यह उनकी करामत थी। यह भी मालूम हुआ कि जिस जगह अल्लाह वालों के कदम आ जायें उस जगह को एक ख़ास खुसूसियत हासिल हो जाती है। उस जगह जो दुआ मांगी जाए वह खुदा जल्दी सुनता है। इसलिए हज़रत जकरिया अलैहिस्सलाम ने उस जगह जहां हजरत मरयम थीं दुआ मांगी और वह कुबूल हो गई। यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह के बताने से अंबियाए किराम को गैब का भी इल्म हो जाता है। क्योंकि जब अल्लाह तआला ने आपको बशारत दी कि तुम्हारे यहां यह्या पैदा होगा तो जकरिया अलैहिस्सलाम को इल्म हो गया कि मेरी अहलिया के पेट में लड़का है। —

Yaum e Jung e Badr 17 Ramzan

Sayyeduna Maula Ali (عليه السلام) Se Marvi Hai Ke Huzoor (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Ashab-e-Badr Ke Liye Farmaya:
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Allah Ta’ala Ne Ahle Badr Ki Taraf Tawajjoh Farmayi Aur Farmaya : Tum Jo Amal Karna Chahte Ho Karo Beshaq Tumhare Liye Jannat Lazim Hogayiee! (Maine Tumhe Maaf Kardiya.)
.
Reference :
– Bukhari, 4/1463, #3762
– Muslim, 4/1941, #2494
– An Najabat Fee Manaqibis Sahabati wal Qarabat RadiAllahu Anhum
.
اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ

#ज़ग_ए_बदर ओर #मौला_अली ع

जंग ए बदर में जिस वक्त मुशरिकों के
लश्कर से अतबा शेबा ओर वलिद जेसे
पेहलवान मेदान में आकर इस्लाम के सिपाहियों को ललकारा तों उस वक्त हुजूर मुहम्मद ﷺ के हुक्म से उबेदा
बीन हारिस ر , हमजा बीन अब्दुल मुतालिब ع ओर हज़रत अली इब्ने अबी तालिबع उनसे जंग करने
के लिए मेदान में आये …
_
हज़रत उबेदा ر , अतबा के मुक़ाबिल..,
हज़रत हम्ज़ा ۴, शेबा के मुक़ाबिल ..,
ओर हज़रत अली ۴ , वलिद से लडने के लिए तेयार हुए .. मोरीख ने बयान किया है के हजरत अली ۴ ने अपने
दुश्मन वलिद को पेहले ही वार में कत्ल कर दिया था ..
उनके बाद वो हज़रत हम्ज़ा ۴ की मदद के लिए आये ओर शेबा को भी तलवार से दो तुकडे कर दिया … उसके बाद हज़रत अली۴ ओर हज़रत हम्ज़ा ۴ ,
हजरत उबेदा ر की मदद के लिए गये
ओर अतबा को भी कत्ल कर दिया …
_
इस तरह हज़रत अली ۴ , मुशरीकों के
लश्कर के तीनों पेहलवानों के कत्ल में
शरीक थे.., इस लिए जब हज़रत अली ۴ ने
मुवावीया को ख़त लिखा तो उसमें
आक ۴ ने ये लिखा :: 👇👇👇👇👇
“वो तलवार जिससे मेने एक ही दिन में तुम्हारे दादा (अतबा), तुम्हारे मामा
(वलीद) ओर तुम्हारे भाई (हनजला) ओर
तुम्हारे चाचा (शेबा) को कत्ल किया वो आज भी मेरे पास है.”
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मोरीखींन ने लिखा के जंग ए बदर
में दुश्मनों के70सिपाही मारे गए जिसमें अबू जहल उमेया बीन खल्फ नजर
बीन हारिस ओर दुसरे काफी काफीरों के सरदार सामिल थे जिसमें 35को हज़रत अली ۴
की तलवार से वासिल जहन्नुम हूए ..
उसके इलावा दुसरो के कत्ल में भी
आप ۴ की तलवार ने जौह़र दिखाये …
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इमाम जाफर मुहम्मद बाकिर۴ से
मरवी है कि आप फरमाते थे कि ,
बदर के रोज़ एक फरीस्ते ने जिसका नाम
‘रिजवान’ था आसमान से पूकार कर कहा :

ला फता इल्लाअली ला शैफ इल्ला जुल्फिकार !
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नहीं है अल ۴ के सिवा कोई बहादुर और नहीं जुल्फिकार के सिवा कोई तलवार !
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Reference :
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[Arjah-ul-Matalib Fi Sirat
Amir-ul-Mominin ۴ , Saf’h-780.]
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Hadith:Ahle Badr

Sayyeduna Maula Ali (عليه السلام) Se Marvi Hai Ke Huzoor (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Ashab-e-Badr Ke Liye Farmaya:
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Allah Ta’ala Ne Ahle Badr Ki Taraf Tawajjoh Farmayi Aur Farmaya : Tum Jo Amal Karna Chahte Ho Karo Beshaq Tumhare Liye Jannat Lazim Hogayiee! (Maine Tumhe Maaf Kardiya.)
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Reference :
– Bukhari, 4/1463, #3762
– Muslim, 4/1941, #2494
– An Najabat Fee Manaqibis Sahabati wal Qarabat RadiAllahu Anhum
.
اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ