मौला अली का इल्म शाख़ में पत्तियाँ

मेरे मौला अली अलैहिस्सलाम ने अपने खुत्बे में अल्लाह रब उल इज्जत की तारीफ़ बयान करते हुए फरमाया कि “वह शाखों में पत्तियों के फूटने की जगहों से भी बाख़बर है।”

इ अगर सोचकर देखो तो एक आम-सी बात है, लेकिन समझने की कोशिश करो तो ये बात भी अपने आप में बहुत गहराई समेटे हुए है।

पौधे में उसकी पत्तियाँ, ना सिर्फ़ पौधे के लिए ज़रूरी हैं बल्कि तमाम जानदारों को भी आक्सीजन देती हैं। यानी चाहे पौधे, फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया से अपना खाना बनाएँ या कार्बन डाई आक्साईड लेकर, आक्सीजन दें, सब पत्तियों से ही होता है।

पौधे की हर शाखा की बनावट और साईज़ अलग होता है और उसमें से पत्तियाँ भी कहीं से भी फूटती हैं यानी कोई एक जगह तय नहीं होती, किसी भी शाखा में कहीं से भी पत्तियाँ निकल सकती हैं। अलग-अलग पौधों की अलग-अलग शाखाएँ होती हैं, कुछ की शाखाएँ एक-सी होती हैं

मगर फिर भी पत्तियों के रंग या बनावट में फर्क होता

है।

सिर्फ मेरा रब ही जानता है कि किस शाख़ में किस जगह से पतियाँ निकलेंगी और फिर उन पतियों से अपनी कुदरत के ज़रिए पौधों का रिजूक भी बनवाता है और अपनी मख्लूक के लिए साफ़ हवा भी दिलवाता है।

मक्सदे करबला और इमाम हुसैन का आखिरी पैगाम

दुनिया में इस्लाम की तहफ्फुज़ व बका के लिए जितनी भी कुरबानियां दी गई हैं, उनमें सबसे अहम सैय्यदुशोहदा सरकार इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की कुरबानी है। शहादते इमाम हुसैन न बेमक्सद था न कोई इत्तिफ़ाकी हादसा था, न ही दो शहज़ादों की जंग थी।

इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का मक्सद तख्त व ताज का हुसूल न था। बल्कि इन उसूलों की सच्चाई का एक बार फिर दुनिया को मुशाहिदा कराना था जो इस्लामी मुआशरे के लिए इस ऐलान के साथ मुकर्रर किए गये थे कि उनमें कोई तब्दीली नहीं होगी। इस्लाम के सच्चे होने का मुशाहिदा कराना लाज़मी था कि कोई भी हो किसी को यह हक हासिल नहीं है कि वह इस्लाम के उसूलों में तब्दीली करे और कुरआन व सुन्नत का मजाक उड़ाए और इस्लामी इक्तिदार को पामाल करे। यजीद उसका मुर्तकिब हो रहा था। अगर यज़ीद का किरदार उसकी जात तक महदूद होता और उससे इज्तिमाई ज़िन्दगी और इस्लाम मुतअस्सिर न होता तो शायद उसका अमल इतना काबिले गिरफ़्त न होता। लेकिन मसनदे खिलाफत पर बैठना, उसकी तक्ज़ीब करना और जो दीन अल्लाह के प्यारे हबीब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फैलाया था उसकी बुनियाद यज़ीद ढा देने के दरपे था। इसी

लिए वारिसे रिसालत उठ खड़ा हुआ और फरमाया : वारिसे रिसालत के होते हुए इस्लाम का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता। आज दुनिया को कौन शख्स है जो नामे हुसैन से वाकिफ नहीं। हज़रत इमाम हुसैन रजि अल्लाहु अन्हु की जंग किसी ओहदे की खातिर न थी, उन्होंने यह जिहाद सिर्फ इस्लाम को बचाने के लिए किया था। इमाम हुसैन रजि अल्लाहु अन्हु ने अपने अमल और किरदार से खुदा परस्ती के उसूलों की सच्चाई का मुशाहिदा कराया ताकि इंसानी मुआशरे में कोई शख्स न जालिम बन सके, न ही जुल्म के आगे सर झुकाने के लिए तैयार हो सके। उनका मक्सद इस्लाम का तहफ्फुज था। वाकए करबला हमारे लिए एक ऐसे नूर की हैसियत रखता है जिससे हम रहनुमाई हासिल करके अपने किरदार व अमल को रुश्द व हिदायत की तरफ ले जा सकते हैं और बुराईयों को छोड़ कर अच्छाइयां को अपना सकते हैं। बदे करबला जितनी भी शहादतें हक व बातिल की हुईं या हो रही हैं या होती रहेंगी, यह सब जुज़्वे करबला हैं। इसलिए कि हुसैनी और यज़ीदी दोनों नज़ियात क्यामत तक चलते रहेंगे। और दोनों नज़ियात की लड़ाई हमेशा जारी रहेगी। दोनों लश्कर हमेशा थे, हैं और रहेंगे। एक का काम निज़ामे हक़ को दरहम बरहम करना है, एक का काम उसकी हिफाज़त करना है। ऐसा नहीं है कि करबला 60 हिज. में खत्म हो गया। बल्कि हुसैनी और यज़ीदी दोनों नज़ियात की लड़ाई सुबहे क्यामत तक जारी रहेगी। जिसने भी इमाम हुसैन के नज़ियात की मदद की समझो कि वह लश्करे हुसैनी में से है और जिसने यज़ीद के नज्यिात की मदद की, वह लश्करे यज़ीद में से है। आप किस जमाअत से हैं, आप खुद यज़ीद के नज़ियात की मदद की, वह लश्करे यज़ीद में से है। आप किस जमाअत से हैं, आप खुद फैसला कर सकते हैं।

आज भी दोनों जमाअत मौजूद हैं। सरकारे इमाम हुसैन की जमाअत अमन व शान्ति का पैगाम देती है और यज़ीद की जमाअत फिना व

शर, फसाद व दहशतगर्दी को हवा दे रही है। जिससे इंसानियत के अमन व शान्ति का शीराजा बिखर जाए।

करबला सुनते ही हर शख्स के दिल में यह तमन्ना होती है कि काश मैं भी करबला में मौजूद होता, अगर होता तो हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की मदद करता और उनके मिशन को आगे बढ़ाता

मुसलमानो! अगरचे आप करबला में न थे मगर यह लड़ाई क्यामत तक चलती रहेगी। अभी करबला की लड़ाई खत्म ही कहां हुई, लड़ाइयां तो इसी तरह जारी हैं और जारी रहेंगी।

Aalame Bedaari Me Shahadate Husayn RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Kee Khabar 2

3. Huzoor SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Kee Chashmaane Muqaddas Me Aansoo

Isi Tarah Umm-il-Mu’minin Hazrat Ummi Salamah RadiyAllahu Ta’ala ‘Anha Se Marwi Hai Ki Aaqa ‘Alayh-is-Salam Ke Chashmane Muqaddas Se Aansoo Rawa’n They Mein Ne Puchha Ya RasoolAllah SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Aaj Kya Baat Hai Chashmane Muqddas Se Aansoo Rawa’n Hain? Farmaya Ki Mujhe Abhi Abhi Jibra’il Khabar De Gaya Hai Ki :

ان امتک ستقتل هذا بأرض يقال لها کربلاء

“Aap Kee Ummat Aap SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Ke Bete Husayn Ko Us Sar Zameen Par Qatl Kar Degi Jis Ko Karbala Kaha Jaata Hai.”

[Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Kabir, 03/109, Hadith-2819,

Dhib’he ‘Azeem(Dhib’he Isma’il ‘Alayh-is-Salam Se Dhib’he Husayn RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Tak)/93.]
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4. 60 Hijri Ke Ikhtetaam Kee Nishaan Dehi

عن ام سلمة قالت قال رسول اﷲ صلی الله عليه وآله وسلم يقتل حسين بن علي علي رأس سيتن من المهاجري

“Umm-il-Mu’minin Hazrat Ummi Salamah RadiyAllahu Ta’ala ‘Anha Se Marwi Hai Ki RasoolAllah SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Ne Farmaya Husayn Bin Ali Ko Saath Hijri Ke Ikhtetaam Par Shaheed Kar Diya Jaaega.”

[Haythami Fi Majma’-uz-Zawa’id Wa Manba’-ul-Fawa’id, 09/190 Ba-Hawala Tabarani Fi Al-Awsat.]

Ghaib Kee Khabrein Bataane Waale Aaqa SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa Aalihi Wa Sallam Ne Na Sirf Hazrat Imam Husayn RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Ke Maqtal Kee Nishaan Dehi Kar Dee Ki Yeh Iraq Ka Maidaan Karbala Hoga Balki Yeh Bhi Bata Diya Ki Yeh Azeem Saaneha 60 Hijri Ikhtetaam Par Roonuma Hoga.

[Dhib’he ‘Azeem(Dhib’he Isma’il ‘Alayh-is-Salam Se Dhib’he Husayn RadiyAllahu Ta’ala ‘Anhu Tak)/93.]
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In India, Islam came with preachers and Sufis and not with invaders

In India, Islam came with preachers and Sufis and not with invaders.

Prof. Saeed Khan


RSS Chief Mohan Bhagwat, while addressing a gathering in Pune recently, made a blatant mistake, saying that Islam came to India with the invaders and should be described as such. While the factual history is something else. Thus Mohan Bhagwat should leave narrow-mindedness and bigoted mentality and once again read the real Indian History based on facts. The History says that Islam came to our beloved homeland in the sixth century itself. When somewhere between 626 to 628 AD the Brahmin Raja of Kerala Cheraman Perumal embraced Islam at the invitation of Hazrat Malik bin Dinar ( May Allah be pleased with him ) a Companion of Holy Prophet Mohammed Mustafa (peace be upon him) & an Islamic Scholar and Preacher.
The Brahmin King of Kerala, Cheraman Perumal not only reverted to Islam but also went to Mecca & Madeenah to perform Hajj with Hazrat Malik bin Dinar. On their way back from Mecca Raja Perumal died in Oman and was buried in the City of Salalah, Oman. It was Raja Perumal who built India’s first mosque in Thrissur district of Kerala in 629 AD under the patronage of Malik bin Dinar. Known as the Cheraman Juma Mosque this mosque is visited by people of all faiths due to its beauty and historical significance. Hazrat Malik bin Dinar died in 748 AD in Kasaragod district of Kerala and was burried there only. After the death of these two gentlemen, the Indians who reverted to Islam continued to preach Islamic Teachings. Then began the arrival of merchant ships from Arab countries on the coasts of Kerala and Lakshadweep. Many of these Arab merchants married local women and settled here. Among them was Hazrat Sheikh Obaidullah (May Allah be pleased with him), a Companion of Holy Prophet pbuh. These Arab Merchants too started preaching Islamic teachings which was never objected to by the peace loving Hindus of Kerala and Lakshadweep.
Then with the arrival of Khwaja Ghareeb Nawaz viz. Hazrat Moinuddin Chishti Ajmeri (May Allah rest his soul in peace ) in 1192 AD came the great change as millions of non-Muslims embraced Islam before his death in 1236 AD. At the same time known sufis like Hazrat Nizamuddin Auliya, Hazrat Amir Khusru, Hazrat Bakhtiar Kaki, Baba Farid Shakar Ganj and countless other sufis and saints invited people to Islam and millions of non-Muslims converted to Islam.
Then in the year 1526 AD near about 350 years later, the Mughal emperor Muhammad Zahiruddin Babar came to Delhi to establish his rule in India and defeated the Muslim ruler Ibrahim Lodhi in the Battle of Panipat and captured the capital Delhi, which proves that even before Babar’s arrival Delhi was ruled by Muslim rulers whose rule stretched from Pakhtunistan ( now in Pakistan) to northern India and also proves that Islam came to India about 800 years before the arrival of Babar and there were millions of Muslim Indians even before his arrival, who had voluntarily converted to Islam without any coercion. Therefore, to say that Islam came to India because of foreign invaders is completely wrong and a heinous attempt to distort history.
Muslims ruled India for more than 600 years and left a deep impression on Indian culture and society. Their contributions to literature, art, culture and architecture are part of India’s glorious history. During the Muslim rule, the economy was so rich that India was known as the Golden Sparrow ( Sone ki Chidiya). And history has shown that these Muslim rulers never forced their subjects to convert to Islam or damaged their places of worship. On the contrary, non-Muslims held important positions in the Courts and in the armies of these kings.
That is why Mohan Bhagwat and his followers should study the true history of India. Yes, we agree with one of his point that the majority of our ancestors might have been Hindus before the arrival of Islam in India and that they embraced this true Religion inspired by the teachings of Islam. But one thing is for sure, Islam did not spread by the power of sword but on the basis of its righteous, pacifist, just and egalitarian teachings.