पादरी और यहूदी हाकिम का मुसलमान होना

पादरी का मुसलमान होना

यज़ीदी कुत्ते दस हज़ार दिरहम हम को ठुकरा न सके और ठुकराते भी कैसे जबकि इसी दुनियावी माल व ज़र की लालच में अपने दीन और आकिबत को तबाह कर चुके थे फौरन राजी हो गये। और रात भर के लिए इमाम आली मकाम रज़ि अल्लाहु अन्हु का सरे अक्दस उस पादरी के हवाले कर दिया। पाद्री ने इमाम पाक के सरे मुबारक को लेकर गुलाब व केवड़े से धोया और एक सन्दल की चौकी मुश्क व अंबर से मुअत्तर कर के मखमली गिलाफ़ चढ़ा कर सरे मुबारक को रख दिया। और रात भर मुअद्दबाना हाथ बांधे खड़ा रहा। और यह पुरकैफ मन्ज़र देख रहा था कि सरे अक्दस से एक नूर निकल कर आसमान की

जानिब बुलन्द हुआ।

जिस से ज़मीन व आसमान और सारी फ़िज़ा मुनव्वर हो गई। सुबह तक अनवार व तजल्लियात का मुशाहिदा करता रहा। इस मन्ज़र को देख कर बेसाख्ता पुकार उठा कि ऐ इने रसूल आप मरे नहीं बल्कि ज़िन्दा हैं। और पुकार उठा :

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्ना मुहम्मदर्रसूलुल्लाह।

शहरे मअमूरा

असीराने हरम का यह नूरानी काफिला आगे की तरफ रवाना हुआ। चलते-चलते जब यह काफिला शहर मअमूरा के करीब पहुंचा तो एक अजीब व गरीब वाकया रूनुमा हुआ।

शहरे मअमूरा का हाकिम एक यहूदी अज़ीज़ बिन हारून था वह रात में जब सोया तो उसे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की ज्यारत नसीब हुई। अजीज ने देखा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मगमूम हैं। अज़ीज़ ने अर्ज किया कि हुजूर की तबीअत मगमूम क्यों है।

आपने फरमाया अज़ीज़! महबूब खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नवासे शहीद कर दिए गये हैं। उनका सरे मुबारक सुबह तेरे शहरे मअमूरा के करीब से गुज़रेगा।

इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की आज़ाद करदह ख़ादिमा शीरीन तेरे दरवाजे पर आएगी तुझे चाहिए कि उनकी ख़िदमत करे और सरे हुसैन को मेरा सलाम पहुंचाए। अज़ीज़ ने अर्ज़ किया कि क्या मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं? हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि वह तो अंबिया के भी रसूल हैं। उन पर ईमान लाने का अल्लाह ने हम से वादा लिया है। वह जो उनको तस्लीम नहीं करता वह जहन्नम में जाएगा। इधर वह मुकद्दस काफिला जब करीब मअमूरा पहुंचा तो एक पहाड़ी के दामन में रुका। तो शीरी ने हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा से अर्ज़ किया कि हुजूर हमारे पास कुछ ज़ेवर है। अगर आप इजाज़त दें तो फरोख्त करके आपके लिए कुछ कपड़े ले आऊं।

अहले हरम ने उसके काफी असरार पर इजाज़त दे दी जब शीरी शहर के दरवाजे पर पहुंची तो दरवाज़ा बन्द था। शीरी ने दस्तक दी तो उस वक्त अज़ीज़ दरवाजे पर पहुंच चुका था। उसने कहा शीरी ठहरो दरवाज़ा खोलता हूं यह सुन कर शीरी हैरान रह गई कि । आदमी मेरा नाम कैसे जानता है। पूछने पर ख्वाब का सारा वाकया बयान किया और काफी सामान और कपड़े लेकर हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु की खिदमत में हाज़िर हुआ और र इमाम को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का सलाम पहुंचाया। सरे मुबारक से फौरन सलाम का जवाब आया यह देख कर अज़ीज़ फौरन मुसलमान हो गया। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन ने चाहा कि शीरी का निकाह अज़ीज़ से कर दिया जाए। मगर शीरी ने अर्ज किया कि मौला मैं अहले हरम की जुदाई पसन्द नहीं करती। मुझे इन मसाइब व मुश्किलात में भी आराम है। शीरीं हज़रत शहर बानो की लौंडी थी। हज़रत शहर बानो के कहने से शीरी ने तस्लीम कर लिया और शीरी का निकाह अज़ीज़ के साथ हो गया।

असीराने हरम का काफिला आगे रवाना हुआ। इख्तिलाफी रिवायात से कत नज़र यज़ीदी लश्कर ने कूफा से दमिश्क तक उन्नीस मंजिलें तय की। तवालत होगी अगर हम हर-हर मंज़िल लिखने की कोशिश करेंगे इसलिए कि हर मंज़िल की खुसूसियात तकरीबन यक्सां थी। आठ सौ मील का सफर तय किया अस्सी शहरों में फिराया गया। अट्ठाइस दिन के सफर के बाद असीराने हरम का यह काफिला कूफा से दमिश्क पहुंचा। दर बदरी, बरहना सरी, असीरी, हुजूमे आम और इज़्देहाम हर मंज़िल पर, हर शहर में बस यही माहौल था। जालिम जमाअत हजरत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा को एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक कुशां-कुशां लिए फिरती थी। करबला से दमिश्क तक कोई करीब या आसान सफर न था। खराब व ख़स्ता ऊंट जिस पर मुहमल न था। अरब की रेत और धूप व गिज़ा की किल्लत और दिक़्क़त और बच्चों का भी साथ-साथ रहना।

सैय्यद सज्जाद की खतरनाक अलालत और कमज़ोरी, दिल चाहे तो इमाम हुसैन के मदीना से लेकर करबला तक के सफर का सैय्यदा जैनब

के करबला से दमिश्क तक के सफर का मुकाबला करो। उस सफर में हज़रत जैनब के साथ सब थे और इस सफर में कोई भी न था। उस सफर में जैनब की अम्मारी पर पर्दा था और इस सफर में उनके सर पर चादर भी न थी। उस सफर में हज़रत इमाम हुसैन थे और इस सफर में उनका सर नोके नेजा पर था। उस सफर में हज़रत जैनब आजाद थीं और इस सफर में असीर मगर हज़रत सैय्यदा जैनब के क़दम ऐसे सख्त सफर में किसी मंज़िल पे न कांपे और न थर्राए। सफर की इल्लत पर गौर करो तो और हैरत होगी। इस तवील सफर को हजरत सैय्यदा जैनब ने किन जज़्बात से तय किया कदम-कदम पर खिल्कत का हुजूम और तमाशाइयों का इज़्देहाम। एक शरीफ और साहबे इस्मत व इफ्फ़त के हालात में कैसा हीजान और तमूज पैदा करता होगा।

भाईयों, बेटियों और भतीजों के सरों को नोके नेज़ह पर देख कर हजरत सैय्यदा जैनब को कितना तड़पाया होगा। चलते-चलते यह

मज़्लूमों का काफिला जब दमिश्क के करीब पहुंचा दमिश्क के बाहर ला कर उन मज़्लूमों को रोक दिया गया। यह लोग छत्तीस घन्टा दमिश्क के बाहर खड़े रहे। तमाम शहर दमिश्क को आरास्ता व पैरास्ता किया गया, तमाम गली व कूचे सजाए गये। खुसूसन यजीद का महल ऐसा सजा दिया गया कि देखने वालों की निगाहें खैरह किए देती थीं। और शाहराहे आम जो दरबारे यजीद तक आता था उस पर सात सौ कुर्सियां लगा दी गई थीं। जिस पर हुकूमत के बड़े-बड़े तमाशाई बैठे हुए थे। यज़ीद अपने तख्त पर बैठा हुए शराब पी रहा था। ऐसा मालूम होता था जैसे शामियों की ईद है। अब अहले हरम को यज़ीद के दरबार की तरफ लाया जा रहा था। आगे-आगे शुहदाए किराम के सर नोके नेज़ह पर हैं। और उनके पीछे सैय्यद सज्जाद एक कैदी के मानिन्द चल रहे हैं और उनके पीछे शहज़ादियां ऊंटों की नंगी पीठ पर बैठी हुई हैं। यह काफिला उसी रास्ते से लाया जा रहा था जिस पर तमाशाई बैठे हुए थे। एक मुनादी आगे-आगे निदा दे रहा था कि यही अली व फातिमा की बेटियां हैं जिनको तमाशा देखना हो वह आकर देख ले। बेटियां तेरे पयम्बर की हैं इस्लाम बता बेरिदा शाम के बाज़ार में जाएं कैसे

हाए अफ़सोस मुश्किल कुशा शेरे खुदा की बहू बेटियां इस्मत व इफ्फ़त की जीती जागती तस्वीरें, शर्म व हया की चादरों में लिपटी हुई बरहना सर करके फिराई जा रही थीं।

असीराने हरम को बाज़ारे दमिश्क में गश्त कराया गया। बेशुमार तमाशाई तमाशा देख रहे थे। एक ख़ातून जिसका नाम हमीदा था वह और उसका बेटा सद और उसकी खादिमा रमीसा तमाशा देखने घर से बाहर आए और जब उन्हें करबला के असल वाकया का पता चला तो रोते हुए घर वापस गये। तो लोगों ने उन से पूछा कि तुम लोग क्यों रो रहे हो तो उन लोगों ने कहा कि मैं क्यों न रोऊ मैंने अपनी आंखों से सैय्यदा खातूने जन्नत की शहज़ादियों की ऊंटों की नंगी पीठ पर बंधा हुआ देखा है। इतना कह कर वह लोग बेहोश हो गये, उनकी

मजार हजरत सैय्यदा नब पर पड़ी तो हमीदा जमीन पर गिर पड़ी और रो-रो कर कहने लगी ऐ मेरी शहजादी काश में अन्धी होती और आपको इस हालत में न देखती आपके भाई कहाँ चले गये।

आपके इस बेबसी के आलम में शाम में लाया गया है। हजरत सैय्यदा जैनब रणि अल्लाहु अन्हा ने फरमाया उस नेजे की तरफ देख उस नेजे पर सरे हुसैन है। जब हमीदा ने सरे इमाम देखा तो एक दम चीख मार कर गिर पड़ी और बेहोश हो गई। फिर उस का बेटा समुद और खादिमा भी चीख मार कर गिर पड़े और तीनों इमाम पाक की मुहब्बत में जो बहक हो गये।

बनी उमैया ने अपने मक्र व फ्रेब के हथकन्डों से काम लेकर इस बात का प्रोपेगन्डा कर रखा था कि हुकूमत के कुछ बागियों ने हुकूमत के खिलाफ शुरूज किया, रास्तों में मुसाफिरों को लूटा मारा जिनकी सरकूबी के लिए यज़ीद ने फौज भेजी और उन्हें गिरिफ्त करने में यजीद कामयाब रहा, बागियों को हलाक कर दिया गया और उनके अयाल को कैदी बना लिया गया वह लोग अनकरीब शाम पहुंचने वाले हैं। उन कैदियों का तमाशा देखने के लिए तमाम शामी औरतें, बच्चे

और बूढ़े निकल पड़े। आख़िर कार गम का मारा यह काफिला दमिश्क के करीब पहुंच गया।

उन्हें बाबुस्साआत पर रोक कर सबसे पहले एक खण्डर में ठहराया गया। तमाशाइखें की भीड़ लगी हुई थी, उनको रस्सियों में जकड़ा गया था और जानवरों के गौल की तरह यक्जा कर दिया गया था। अगर कोई ठोकर लगने से ठहरता तो उसे ताज़ियाने मारे जाते। लोगों के अहले बैत के मुतअल्लिक कुछ पता न था सिवाए उसके कि यह बागी हैं। इसी लिए लोगों ने अहले बैत का इस्तिकबाल बहुत ही एहानत आमेज और अजीयतनाक पैराए में किया। उस वक्त का एक मंज़र हजरत इमाम जैनुल आबेदीन और एक बूढ़े शामी की गुफ्तगू से अन्दाजा कीजिए।

सैय्यदा फातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के घराने का अहले बैत और अहले कसा होने का बयान

तरजमा : हज़रत अबू बरज़ह रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : आदमी के दोनों कदम (रोज़े क्यामत) उस वक्त तक इस्तिकामत नहीं पा सकते जब तक उस से चार चीजों के बारे में सवाल न कर लिया जाए उसके जिस्म के बारे में कि किस चीज़ में उसने उसको इम्तिहान में डाला और उसके उम्र के बारे में कि किस चीज में उसने उसको फना किया और उसके माल के बारे में कि कहां से उसने उसे कमाया? और किस चीज़ में उसने उसको खर्च किया? और अहले बैत की मुहब्बत के बारे में। पस अर्ज किया गया : या रसूलुल्लाह! सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आपकी मुहब्बत की क्या अलामत है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना दस्ते अपदस हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु के कन्धे पर मारा। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।

तरजमा : ‘हज़रत अब्दुल्लाह बिन हनब रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि एक दफा हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जहफ़ा के मकाम पर हम से मुखातब हुए और फरमाया : क्या मैं तुम्हारी जानों से बढ़ कर तुम्हें अज़ीज़ नहीं हूँ? सहाबा ने अर्ज़ किया : क्यों नहीं या रसूलुल्लाह! आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : पस मैं तुम से दो चीजों के बारे में सवाल करने वाला हूं। कुरआन के बारे में और अपनी इतरत अहले बैत के बारे में। आगाह हो जाओ कि कुरैश पर पेश कदमी न करो कि तुम गुमराह हो जाओ और न उन्हें सिखाओ कि वह तुम से ज़्यादा जानने वाले हैं और अगर कुरैश फख न करते तो मैं ज़रूर उनको अल्लाह के हां उनके मकाम के बारे बताता कुरैश में बेहतरीन लोग तमाम लोगों से बेहतरीन हैं। उसे इमाम अबू नईम ने रिवायत किया है।

तरजमा : हज़रत अली रजि अल्लाहु अन्हु ब्यान करते हैं कि वह हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुए। दरआं हालेकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चादर बिछाई हुई थी। पस उस पर हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (बनपसे नफीस) हज़रत अली, हज़रत फातिमा, हजरत हसन और हज़रत हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हुम बैठ गये फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उस चादर के किनारे पकड़े और उन पर डाल कर उसमें गिरह लगा दी। फिर फरमायाः ऐ अल्लाह! तू भी उन से राज़ी हो जा, जिस तरह मैं उन से राज़ी हूं। उसे इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।

तरजमा : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि आख़िरी चीज़ जो हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाई वह यह थी कि मुझे मेरे अहले बैत में तलाश करो। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।

तरजमा : हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं कि हुजूर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अपनी उम्मत में से सबसे पहले जिसके लिए मैं शफाअत करूंगा वह मेरे अहले बैत हैं, फिर जो कुरैश में से मेरे करीबी रिश्तेदार हैं. फिर अन्सार की फिर उनकी जो यमन में से मुझ पर ईमान लाए और मेरी इत्तिबा की, फिर तमाम अरब की, फिर अजम की और सबसे पहले मैं जिनकी शफाअत करूंगा वह अहले फज़ल होंगे। इस हदीस को इमाम तबरानी ने रिवायत किया है।