आशूरा का पैग़ाम, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़बानी

इमाम हुसैन अ.स. का करबला में आ कर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का कारण इस्लामी समाज में पैदा की गई वह गुमराहियां और बिदअतें थीं जिसकी बुनियाद सक़ीफ़ा में रखी गई थी, जिसके बाद से इस्लामी हुकूमत अपनी जगह से भटक कर बहुत से ग़लत रास्तों पर चली गई और विशेष कर इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद हुकूमत का पूरा सिलसिला बनी उमय्या के घराने में चला गया, कुछ इतिहास विशेषज्ञों के अनुसार बनी उमय्या का इस्लामी अक़ाएद और उसूल से कोई लेना देना नहीं था।(अल-दरजातुर-रफ़ीआ, पेज 243, शरहे नहजुल बलाग़ा, इब्ने अबिल-हदीद, जिल्द 5, पेज 257 / मुरव्वजुज़-ज़हब, मसऊदी, जिल्द 3, पेज 454)

सन 40 हिजरी के बाद से हुकूमत जब बनी उमय्या के पास आई उस समय से ले कर 20 साल तक बनी उमय्या ने दीन का ऐसा मज़ाक़ बनाया कि उसकी तस्वीर ही बदल कर रख दी, हद तो तब हुई जब बनी उमय्या ने यज़ीद को हुकूमत के लिए चुन लिया, जिसके बाद गुमराही, बिदअतें और इस्लामी क़ानून का मज़ाक़ खुले आम उड़ाया जाने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे जेहालत का दौर इस्लाम का रूप धारण कर वापस आ गया हो। (इस बारे में अधिक जानकारी के लिए इमाम हुसैन अ.स. व जाहिलिय्यते नौ नामी किताब पढ़ी जा सकती है)

इमाम हुसैन अ.स. के अलावा भी अगर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के घराने की कोई और शख़्सियत होती वह भी उम्मत की इस गुमराही, दीन से दूरी, बिदअत और खुले आम लोगों के हराम कामों पर चुप न बैठती, यही वजह है कि इमाम हुसैन अ.स. ने ख़त और अपनी तक़रीरों से यज़ीद के घटिया और हराम कामों पर विरोध जताया, इमाम हुसैन अ.स. का विरोध जताना ख़ुद इस बात की दलील है कि यज़ीद एक बेदीन, गुमराह और बिदअतों को फैलाने वाला इंसान था जो खुले आम हराम कामों को अंजाम देता था। इमाम हुसैन अ.स. द्वारा विरोध जताने से यह बात साबित हो जाती है कि मुसलमान हाकिम और ख़लीफ़ा के लिए कुछ शर्ते हैं जिस के बिना कोई भी ख़लीफ़ा नहीं बन सकता और बनी उमय्या के पूरे घराने में किसी में भी वह शर्तें नहीं पाई जाती थीं। इतिहास गवाह है कि बनी उमय्या के हाकिमों की केवल यही कोशिश रही है कि इस्लाम की पूरी तस्वीर ही को बदल दिया जाए, जिसका नमूना आज उन्ही की नस्लों द्वारा पूरी दुनिया में देखा जा सकता है।

इमाम हुसैन अ.स. ने मक्का पहुंचने के बाद बसरा के हाकिम को इस प्रकार ख़त लिखा कि: मैं अपना ख़त अपने क़ासिद के साथ भेज रहा हूं, मैं तुम लोगों को अल्लाह की किताब और पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत पर अमल करने की दावत देता हूं, क्योंकि अब कुछ ऐसी परिस्थिति बन गई है जिसमें पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत पर अमल बिल्कुल छोड़ दिया गया है और बिदअतों को बढ़ावा दिया जा रहा है, अगर तुम लोगों ने मेरी बात मान ली तो मैं तुम लोगों को सीधे रास्ते की हिदायत करूंगा। (तारीख़ुल-उमम वल मुलूक, तबरी, जिल्द 6, पेज 200)

फ़िर आप ने उस ख़त में यह भी फ़रमाया कि अब हक़ पर बिल्कुल अमल नहीं हो रहा है। इमाम हुसैन अ.स. ने इराक़ के रास्ते में “ज़ी हसम” नामी जगह पर एक ख़ुतबे में इरशाद फ़रमाया कि: जो हो रहा है सामने है, हक़ीक़त में समाज बहुत बदल गया है, बुराइयां खुले आम हो रही हैं और नेक कामों को कोई पूछने वाला नहीं रह गया, नेकियों का हाल तो बिल्कुल किसी बर्तन के पानी को पूरा गिरा देने के बाद कुछ बूंदें रह जाने के जैसा है, लोग अपमान जनक ज़िंदगी जी रहे हैं, ज़िंदगी एक बंजर और पथरीली चरागाह की तरह हो गई है जिसमें न घास है न ही कुछ और खाने की चीज़। क्या तुम लोग देख नहीं रहे कि हक़ पर अमल करने वाला कोई नहीं है और बातिल को हर तरफ़ से बढ़ावा दिया जा रहा है, ऐसी अपमानजनक ज़िंदगी जीने से बेहतर सम्मानजनक मौत है, मैं इन ज़ालिमों और अत्याचारियों के साथ ज़िंदगी जीने को अपने लिए अपमान समझता हूं। (तोहफ़तुल उक़ूल, हसन इब्ने अली इब्ने शोबा, पेज 245 / तारीख़ुल-उमम वल मुलूक, तबरी, जिल्द 6, पेज 239)

बनी उमय्या के हाकिमों ने अपनी घटिया सियासत के चलते लोगों की दीनदारी की ऐसी कायापलट की कि नैतिकता नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं बची थी, रूहानियत दम तोड़ रही थी, इमाम अ.स. ने “ज़ी हसम” में दिये गये ख़ुत्बे में फ़रमाया: लोग दुनिया के ग़ुलाम हैं, दीन केवल उनकी ज़बानों पर है, जब उनके पेट भरे रहते हैं तो दीन याद रहता है जैसे ही थोड़ी मुश्किल आती है दीनदार ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता।

आशूरा और करबला का पैग़ाम केवल उसी दौर के लिए नहीं था, बल्कि हर आने वाली नस्ल के लिए था, जब भी जहां भी हक़ पर अमल न हो, बातिल से लोग दूरी न बनाएं, बिदअतों को बढ़ावा दिया जा रहा हो, अल्लाह के हुक्म को रौंदा जा रहा हो, पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत को मिटाने की कोशिश हो, उस दौर का हाकिम लोगों पर ज़ुल्म और अत्याचार कर रहा हो, समाज में जेहालत फैल रही हो और फ़ितना और फ़साद तेज़ी से अपनी जगह बना रहा हो वहां करबला और आशूरा के पैग़ाम को ज़िंदा करना ही हुसैनियत है।

लब्बैक या हुसैन अ.स

अबुल फ़ज़लिल अब्बास बिन अली की शहादत

कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की छोटी सी सेना का नेतृत्व करने वाले थे, हालाकी इसे सेना कहना मुनासिब नहीं होगा मगर कर्बला मे हुसैन वालों पर हमले हुवे, इस एतबार से इसे जंग कहा गया । अब्बास अलमदार जिनके हाथो में हुसैनी अलम यानि झण्डा था । अब्बास उस शेर का नाम है, जिससे दुश्मन थर थर कांपते थे, जो हुसैन इब्ने अली के चहेते भाई थे I हज़रत अब्बास बेइंतिहा खूबसूरत थे, इसलिए उनको कमर-ए-बनी हाशिम (हाशिमी कबीले का चाँद) भी कहा जाता है I इमाम हुसैन की माँ हज़रत फ़ातिमा रदीअल्लाहू अन्हुम के बाद हज़रत अली से जब लोगो ने निकाह करने कहा तब आपने अपने भाई हज़रत अक़ील से कहा की में किसी ऐसे खानदान की लड़की से ही शादी कर सकता हूँ जिसका नाम अरब के बड़े बहादुरों में शुमार होता हो, ताकि बहादुर और जंग-आज़मा(युद्ध में निपुण) औलाद पैदा हो I हज़रत अक़ील ने कहा की उम-उल-बनीन-ए-कलाबिया से शादी कीजिए. उनके बाप दादा से ज़्यादा बहादुर सारे अरब में नहीं है । हज़रत अली ने तब जनाबे उम-उल-बनीन से शादी की और उनसे चार बेटे पैदा हुए । हज़रत अब्बास उनमें सबसे बड़े थे. वह इमाम हुसैन को बेहद चाहते थे । हज़रत अब्बास के हाथों में ही इस्लामी सेना का अलम(ध्वज) था. इसीलिए उन्हें अलमदार-ए-हुसैनी कहा जाता है । उनकी बहादुरी सारे अरब में मशहूर थी. कर्बला मे जब उन्होने मासूम अली असगर के सूखे होठो को देखा और सकीना को प्यास से तड़पते देखा, तो वो बेचैन हो उठे, और तब उन्होंने भाई हुसैन से कहा ‘मौला हुसैन मुझे मश्कीज़ा दो जंग करने से पहले मै बच्चो के लिए पानी लेकर आता हूँ और फिर इस यज़ीदी लश्कर की जम कर खबर लेता हूँ I हुसैन ने कहा ‘ भाई अब्बास तुम्हें मै कैसे इजाज़त दे सकता हूँ तुम तो हुसैन की ताकत हो अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हुसैन की कमर टूट जाएगी । अब्बास ने कहा मौला सकीना की प्यास मुझसे देखे नहीं जाती । अगर उन्होने हमला किया भी तो ये अब्बास उन्हे खत्म करने के लिए अकेला ही काफी है, और फिर इस तरह भाई हुसैन से इजाज़त लेकर अब्बास नहरे फुरात की तरफ बढ़ने लगे उनके एक हाथ में अलम था तो दूसरे हाथ में मश्क़ वे इस तरह आगे बढे जैसे की नदी की तरफ जाने के लिए रास्ता बना रहे हों । हज़रत अब्बास को यूं आगे बढ़ता देख यजीद की सेना इस तरह डर कर भागीं जैसे की शेर को देख कर भेड़ बकरियां और हिरण भागते हैं I हज़रत अब्बास अपने घोड़े पर नहरे फुरात तक पहुँच गए, यहाँ तक की उनके घोड़े के अगले दो पैर पानी के अंदर थे । अब्बास ने मश्क़ में पानी भरा और चुल्लू में पानी लिया और सोचा चलो अपनी प्यास बुझा ले मगर फिर ख्याल आया 4 साल की बच्ची सकीना प्यासी है, अली असगर प्यासा है, भाई हुसैन के गले से नीचे पानी नहीं गया है तो फिर भला वो किस तरह पानी पी ले और आपने चुल्लू का पानी वापस दरिया में डाल दिया और पानी नहीं पिया । उन्होने घोड़े से कहा तू भी तो प्यासा है, पानी पी ले, मगर घोड़े ने भी पानी नहीं पिया । ये थी मोहब्बत इंसान तो इंसान जानवर तक को भी पानी पीना गवारा न था । सुभान अल्लाह । हज़रत अब्बास ने पानी का मश्क अपने बाये कंधे पर रखा I जब वापस लौटने लगे तो इब्ने ज़ियाद चिल्लाया अगर अब्बास ने और हुसैनी सेना ने पानी पी लिया तो फिर तुम सबको मरने से कोई नहीं बचा सकता वो लोग तुम सभी को किसी गाजर मुली की तरह से कट देंगे I सब मिल कर एक साथ अब्बास पर हमला कर दो जिसे सुनकर भागी हुई फ़ौजें फिर से जमा हों गईं और हज़रत अब्बास पर चारो तरफ से तीरों की बारिश कर दी जिसके बावजूद अब्बास पानी लेकर बढ़ते रहे और यज़ीदियो को गाजर मूली की तरह काटते रहे । फ़ौजों को खदेड़ते हुए वे आगे बढ़ते रहे तभी पीछे से एक ज़ालिम ने हमला करके उनका बांया बाज़ू काट दिया । आपने मश्क अपने दाहिने कंधे में रखा और एक हाथ से लड़ते हुवा आगे बढ़ने लगे अभी वह कुछ क़दम आगे बढे ही थे कि पीछे से वार करके उनका दूसरा बाज़ू भी काट दिया गया । हज़रत अब्बास ने मश्क़ अपने दांतों में दबा लिया. और आगे बढ़ते गए, इसी बीच एक ज़ालिम ने मश्क़ पर तीर मार कर सारा पानी ज़मीन पर बहा दिया और इस तरह जालिमो ने प्यासे बच्चों तक पानी पहुँचने नहीं दिया और तभी बहोत से ज़ालिम यज़ीदी सिपाहियों ने हज़रत अब्बास को चारो तरफ से घेर लिया और उनके सर पर गुर्ज़ (गदा) मारकर उन्हें शहीद कर दिया । (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैही राजेउन)

हज़रत अब्बास को इसी वजह से सक्का-ए-सकीना(सकीना के लिए पानी का इंतज़ाम करने करने वाले) के नाम से भी याद किया जाता है I जहाँ कही भी आज मुहर्रम के दौरान जुलूस निकलता हैं, उसमे जो अलम होता है वह हज़रत अब्बास की ही निशानी हैं.

क़ातिलीन हुसैन का अंजाम

कर्बला में जिसका खून बहाकर यज़ीद पलीद ने हुक़ूमत हासिल की थी वो हुक़ूमत भी ज़्यादा दिन तक ना रही और 3 साल 7 महीने बाद ही वो जहन्नम को रवाना हुआ,उसके बाद उसका बेटा मुआविया बिन यज़ीद, यानि यज़ीद का बेटा मुआविया तख़्त पर बैठा जो कि नेक शख्स था और बाप के बुरे कामों से नफरत करता था,जब वो तख़्त पर बैठा तो बीमार था और सिर्फ 2,3 महीने ही खिलाफत कर सका और 21 साल की उम्र में उसका इंतेकाल हो गया,अब मिस्र व शाम के लोगों ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बैयत कर ली मगर मरवान ने खूफ़िया साजिशों से मिस्र व शाम पर कब्ज़ा कर लिया,जब वो मरने लगा तो अपने बेटे अब्दुल मलिक को गद्दी सौंप दी,अब्दुल मलिक बिन मरवान के बारे में अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि लोग बेटा पैदा करते हैं मगर मरवान ने बाप पैदा किया है,ये पहले तो नेक आदमी था मगर बाद में फासिको फ़ाजिर हो गया,इसके ज़मानये खिलाफत में कूफ़ा पर मुख़्तार बिन उबैद सक़फ़ी का तसल्लुत हुआ,मुख़्तार ने इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत का खूब इन्तेक़ाम लिया मगर आखिर ज़माने में मुख्तार भी नुबूवत का दावा करके काफिरो मुर्तद हो गया

! सबसे पहले अम्र बिन सअद व उसके बेटे हफ्स बिन अम्र की गरदन कटवाई

! खूली बिन यज़ीद जिसने इमाम का सरे मुबारक तन से जुदा किया था उसको सरे राह क़त्ल करवाकर उसकी लाश को जलवाया

! शिमर ज़िल जौशन खबीस का सर काटकर लाश को कुत्तों के सामने डाला गया

! अब्दुल्लाह बिन उसैद जुहनी,मालिक बिन नुसैर बद्दी,हमल बिन मालिक महारबी इन तीनों के हाथ पैर काटकर ज़िंदा छोड़ दिया गया,ये तीनों इसी तरह तड़पते बिलखते मर गए

! हकीम बिन तुफ़ैल ताई वो खबीस है जिसने हज़रत अब्बास अलमदार के कपड़े उतार लिए थे,सो इसको जिंदा ही नंगा करके तीरों से छलनी कर दिया गया

! अम्र बिन सुबैह ने शोहदाए करबला में से कई को ज़ख़्मी किया था,उसे नेज़ों से छेद छेद कर मारा गया

! ज़ैद इब्ने रक़ाद वो खबीस था जिसने अब्दुल्लाह बिन मुसलिम बिन अक़ील की पेशानी पर तीर मारा था,इसको तीरों से छलनी किया गया मगर जान बाकी थी तो उसको ज़िंदा जलवाया गया

! अब्दुल्लाह इब्ने ज़ियाद वो हरामखोर खबीस था जिसने अहले बैत पर काफी ज़ुल्म किये,शहादते कर्बला के ठीक 6 साल बाद 10 मुहर्रम 67 हिजरी को इस कुत्ते का सर काटकर वहीं रखा गया,जहां इसने इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का सरे मुबारक रखा था,उस ज़लील के सर पर एक सांप नमूदार हुआ जो उसके नथुनों से घुसकर मुंह से निकलता रहा और फिर गायब हो गया

! 6000 कूफ़ी यानि राफजी मुख़्तार के हाथों मारे गए,कितने अंधे और कोढ़ी हो गए,कुछ की आंखों में जलती हुई सलाई फेरी गयी,कुछ को जिंदा जलाया गया,और कुछ के मुंह सुअर की तरह हो गए,और कुछ तो ऐसे थे कि पानी पीते मगर प्यास न बुझती और युंही तड़प तड़प कर मरे,और जैसा कि रब ने फ़रमाया था कि मैं 140000 को मारूंगा सो उसने अपना वादा पूरा किया और 140000 को हलाक़ किया,यहां पर एक सवाल उठता है कि हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से जंग को तो 22000 का लश्कर ही गया था तो 140000 क्यों मारे गए,तो इसका जवाब ये है जैसा कि हदीस पाक में है कि जो शख्स गुनाह में शामिल ना हो मगर उसे अच्छा समझता हो तो वो भी उसी के मिस्ल है,तो अगर जंग में 22000 का लश्कर ही मौजूद था मगर हज़ारों मक्कार दोगले कूफ़ी यानि राफजी यानि शिया उसमे शामिल थे तो अल्लाह ने उन सबको तरह तरह की मुसीबतों में डालकर हलाक किया

📕 ख़ुतबाते मुहर्रम,सफह 495—510
📕 खसाइसे कुबरा,सफह 126

Hadith Jo Ahele Bayt se Bugz

Ameerul Momineen Sayyeduna Maula Ali (عليه السلام) Bayan Karte Hain ke Aaqa-e-Do Jahan Huzoor Nabi-e-Akram (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ ne Farmaya:
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“Ay Allah! jo Mujhse aur Mere Ahle Bayt se BUGZ Rakhta Hai Usey Kasrat-e-Maal Aur Kasrat-e-Aulad se Nawaz!
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Ye Unki Gumrahi Keliye Kaafi Hai ke Unka Maal Kaseer Hojaye Pas (is Kasrat e Maal ki Wajah se) Unka Hisab Taweel Hojaye!
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Aur Ye ke Unki Wijdaniyat (Jazbati Chizen) Kasrat se Hojaye Taake Unke Shayateen Kasrat se Hojaye!”

Reference : Daylami, Musnad al Firdaus, 1/492, Hadees no. 2007
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اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ