Hadith Tirmizi 2485

Hazrat Abdullah bin Salaam رضی اللہ عنہ se Marwi hai ki Nabi e Akram ﷺ ka Sabse Pahla Kalaam Jo Maine suna yeh tha, Aap ﷺ ne Farmaya : Aye Logo! Salaam phailao (Ya’ani Kasrat se Ek Dusre ko Salaam kiya karo) Khana Khilaya karo, Khooni Rishto’n ke Sath bhalayi kiya karo aur Raato’n ko (Uth kar) Namaz padha karo jabki Log soye hue ho’n, Tum Salaamati ke Sath Jannat me dakhil ho jaaoge.

(Tirmizi, As-Sunan : 2485, Ibne Maaja, As-Sunan : 1334, Ahmad bin Hanbal, Al-Musnad : 23835)

हिजरत का पाँचवाँ साल part 2

आयते तयम्मुम का नुजूल

इब्ने अब्दुल बर व इब्ने सद व इने हब्बान वगैरा मुहद्दीसीन व ओलमाए सीरत का कौल हे कि तयम्मुम की आयत इसी गजवए मुरैसीअ में नाज़िल हुई। मगर रौज़तुल अहबाब में लिखा हुआ है कि आयते तयम्मुम किसी दूसरे ग़ज़वे में उतरी है। (मदारिजुन्नुबूव्वत जि.२ स. १५७) वल्लाहु तआला अअलम।

बुख़ारी शरीफ में आयते तयम्मुम की शाने है वो ये है कि हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि हम लोग हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ एक सफर में थे जब हम लोग मकामे “बैदा’ या मकामे ज़ातुल जैश में पहुंचे तो मेरा हार टूटकर कहीं गिर गया। हुजूर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि वसल्लम आर कुछ लोग उस हार की तलाश में अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु के पास आकर शिकायत की सल्लल्लाहु तआला सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम वहाँ ठहर गए। और वहाँ पानी नहीं था। तो कुछ लोगों ने हजरते खुदा कि क्या आप देखते नहीं कि हज़रते आइशा ने क्या किया? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और सहाबा को यहाँ ठहरा लिया है। हालाँकि यहाँ पानी मौजूद नहीं है। ये सुनकर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु मेरे पास आए और जो कुछ ने चाहा उन्होंने मुझको (सख्त व सुस्त) कहा। और फिर (गुस्से में) अपने हाथ से मेरी कोख में कोंचा मारने लगे। उस वक्त रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरी रान पर अपना सरे मुबारक रखकर आराम फरमा रहे थे। इस वजह से (मार खाने के बा वुजूद) मैं हिल नहीं सकती थी। सुबह को जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बेदार हुए। तो वहाँ कहीं पानी मौजूद ही नहीं था। नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर तयम्मुम की आयत नाज़िल हो गई। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम असहाब ने तयम्मुम किया और नमाजे फज अदा की। इस मौकी पर हज़रते उसीद बिन हुजैर रदियल्लाहु अन्हु ने (खुश होकर) कहा कि ऐ अबू बकर की आल! ये तुम्हारी पहली ही बरकत नहीं है। फिर हम लोगों ने ऊँट को उठाया तो उसके नीचे हमने हार को पा लिया। (बुखारी जि. १ स. ४८ किताबुल तयम्मुम) इस हदीस में किसी गज़वे का नाम नहीं है। मगर शारेह बुख़ारी हजरते अल्लामा इब्ने हजर अलैहिर्रहमा ने फरमाया कि ये वाकिअए गज़वए बनिल मुसतलक का है जिसका दूसरा नाम गजवए मुरैसीअ भी है। जिस में किस्सए इफ़क हुआ। (फतहुल बारी जि. १ स. ३६५ किताबुल तयम्मुम) इस गजवे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अट्ठाईस दिन मदीने से बाहर रहे। (ज़रकानी जि. २ स. १०२)

जंगे ख़न्दक
सन्न ५ हिजरी की तमाम लड़ाईयों में ये जंग सब से ज्यादा मशहूर और फैसला कुन जंग है। चूंकि दुश्मनों से हिफाजत के लिए शहरे मदीना के गिर्द खन्दक खोदी गई थी। इस लिए ये लड़ाई ‘जंगे खन्दक’ कहलाती है और चूँकि तमाम कुफ्फारे अरब ने मुत्तहिद होकर इस्लाम के खिलाफ ये जंग की थी। इस लिए इस लड़ाई का दूसरा नाम “जंगे अहजाब (तमाम जमाअतों की मुत्तहिदा जंग) है। कुरआन मजीद में इस लड़ाई का तज्किरा इसी नाम के साथ आया है। जंगे ख़न्दक का सबब गुज़श्ता औराक में हम ये लिख चुके हैं कि कबीलए बनू नुज़ैर के यहूदी जब मदीने से निकाल दिए गए। तो उनमें से यहूदियों के चन्द रऊसा “खैबर में जाकर आबाद हो गए। और खैबर के यहूदियों ने उन लोगों का इतना एअजाज़ व इकराम किया कि सल्लामः बिनुल हुकैक बिन अख्तब व किनाना बिनुर रबीअ को अपना सरदार मान लिया। ये लोग चूँकि मुसलमानों के खिलाफ गैज- गज़ब में भरे हुए थे। और इन्तिकाम की आग उनके सीनों में दहक रही थी। इस लिए उन लोगों ने मदीने पर एक ज़बरदस्त हमला की स्कीम बनाई। चुनान्चे ये तीनों इस मकसद के पेशे नज़र मक्का गए। और कुफ्फारे कुरैश से मिलकर ये कहा गया कि अगर तुम लोग हमारा साथ दो तो हम लोग मुसलमानों को सफ़हए हस्ती से नेस्त- नाबूद कर सकते हैं। कुफ्फारे कुरैश तो इसके भूके ही थे। फौरन ही उन लोगों ने यहूदियों की हाँ में हाँ मिला दी। कुफ्फारे कुरैश से साज़ बाज़ कर लेने के बाद उन तीनों यहूदियों ने कबीलए ‘बनू गतफान’ का रुख किया। और खैबर की आधी आमदनी देने का लालच देकर उन लोगों को भी मुसलमानों के खिलाफ जंग करने के लिए आमादा
कर लिया। फिर बनू गतफ़ान ने अपने हलीफ “कबीलए बनू असद” को भी जंग के लिए तय्यार कर लिया। इधर यहूदियों ने अपने हलीफ “कबीलए बनू सद” को भी अपना हमनवा बना लिया। और कुफ्फारे कुरैश ने अपनी रिश्तेदारियों की बिना पर “कबीलए बनू सुलैम” को भी अपने साथ मिला लिया गरज़ इस तरह तमाम कबाएले अरब के कुफ्फार ने मिल जुलकर एक लश्करे जर्रार तय्यार कर लिया। जिसकी तअदाद दस हजार थी। और अबू सुफयान इस पूरे लश्कर का सिपह सालार बन गया। (जरकानी जि.२ स. १०४ ता १०५)

मुसलमानों की तय्यारी
जब कबाएले अरब के तमाम काफिरों के इस गठ जोड़ और खौफनाक हमले की ख़बरें मदीना पहुँचीं। तो हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने असहाब को जमझ फरमाकर मशवरा फ़रमाया कि इस हमले का मुकाबला किस तरह किया जाए? हज़रते सलमान फ़ारसी रदियल्लाहु अन्हु ने ये राय दी कि जंगे उहुद की तरह शहर से बाहर निकलकर इतनी बड़ी फौज के हमले को मैदानी लड़ाई में रोकना मसलिहत के खिलाफ है। लिहाजा मुनासिब ये है कि शहर के अन्दर रह कर इस हमले का दिफाअ किया जाए और शहर के गिर्द जिस तरफ से कुफ्फार की चढ़ाई का ख़तरा है एक खन्दक खोद ली जाए। ताकि कुफ्फार की पूरी फौज ब यक वक्त हमला आवर न हो सके। मदीने के तीन तरफ चूँकि मकानात की तंग गलियाँ और खजूरों के झुन्ड थे। इस लिए ये तय किया गया कि इसी तरफ़ पाँच गज़ गहरी खन्दक खोदी जाए चुनान्चे ८ जु कदा सन ५ हिजरी को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तीन हजार सहाबए किराम को साथ ले कर खन्दक खोदने में मसरूफ हो गए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद अपने दस्ते
मुबारक से खन्दक की हदबंदी फरमाई। और दस दस गज़ जमीन दस दस आदमियों पर तकसीम फरमा दी। और तकरीबन बीस दिन में ये ख़न्दक तय्यार हो गई। (मदारिजुन्नुबूव्वत जि. २.स. १६८ता १७०) हज़रते अनस रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ख़न्दक के पास तशरीफ लाए और जब ये देखा कि अन्सार व मुहाजिरीन कड़कड़ाते हुए जाड़े के मौसम में सुबह के वक्त कई कई फ़ाकों के बा वुजूद जोश व खरोश के सथ खन्दक खोदने में मशगूल हैं तो इन्तिहाई मुतास्सिर होकर आपने ये रजज़ पढ़ना शुरू कर दिया कि لو ان العنف عين لأحدة ما في الأفكار والشكاجة अल्लाहुम्मा इन्नल अशा अशुल आखि-रति फ़ग़-फ़िरिल अन्सार वल मुहाजिरति ऐ अल्लाह!. बिला शुबह ज़िन्दगी तो बस आख़िरत की ज़िन्दगी है। लिहाज़ा तू अन्सार व माहाजिरीन को बख़्श दे। इसके जवाब में अन्सार व मुहाजिरीन ने आवाज़ मिलाकर ये पढ़ना शुरू कर दिया कि – نحن اوین بایز کند على الجار ما با آبداد नहनुल लज़ीना बा यऊ मुहम्मदन अलल जिहादि मा बकीना अ-बदन हम वो लोग हैं जिन्होंने जिहाद पर हज़रते मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बैअत कर ली है। जब तक हम ज़िन्दा रहें हमेशा हमेशा के लिए। (बुख़ारी गजवए खन्दक जि.२ स. ५८८) हज़रते बरा बिन आज़िब रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद भी ख़न्दक खोदते और मिट्टी उठा उठाकर फेंकते थे। यहाँ तक कि आपके शिकम
सहाबा को जोश दिलाने के लिए रजज के ये अशआर पढ़ते थे कि मुबारक पर गुबार की तह जम गई थी। और मिट्टी उठाते हुए सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम 313 والله ما اشتدا : صدا و ملیکا वल्लाहि लौलल्लाहु माह-तदैना वला तसद्दकना वला सल्लैना खुदा की कसम! अगर अल्लाह का फज्ल न होता तो हम हिदायत न पाते और न सदके देते, न ازل سيئة علي وتقدام إن لاقيت फ-अनज़िल सकीनतन अलेना व सब्बितिल अकदामि इन ला कैना लिहाज़ा ऐ अल्लाह! तू हम पर कल्बी इत्मिनान उतार दे। और जंग के वक्त हम को साबित कदम रख। إن كه بوا علينا إذا كازا فئة أبنا इन्नल ऊला कद बगव अलैना इजा अरादू फितनतन अबैना यकीनन उन काफिरों ने हम पर जुल्म किया है। और जब भी उन लोगों ने फितने का इरादा किया। तो हम लोगों ने इन्कार कर दिया। लफ्ज़ “अबैना” को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बार बार ब तकरार बुलन्द आवाज़ से दुहराते थे।

एक अजीब चट्टान
हजरते जाबिर रदियल्लाहु अन्हु ने बयान फरमाया कि
खन्दक खोदते वक्त नागहाँ एक ऐसी चट्टान नुमूदार हो गई जो किसी से भी नहीं टूटी। जब हम ने बारगाहे रिसालत में ये माजरा अर्ज किया। तो आप उठे। तीन दिन का फाका था और शिकमे मुबारक पर पत्थर बंधा हुआ था। आपने दस्ते मुबारक से फावडा मारा। तो वो चट्टान रेत के भुरभुरे टीले की तरह बिखर गई। (बुखारी जि.२ स. ५८८ खन्दक) और एक रिवायत ये है कि आपने उस चट्टान पर तीन मर्तबा फावड़ा मारा। हर जर्ब पर उसमें से एक रौशनी निकलती थी। और उस रौशनी में आपने शाम व ईरान और यमन के शहरों को देख लिया और उन तीनों मुलकों के फ़तेह होने की सहाबए किराम को बिशारत दी। (जरकानी जि.२ स. १०६ व मदारिज जि.२ स. १६९) और निसाई की रिवायत में है कि आपने मदाएन व किसरा व मदाएन कैसर व मदाएन हब्शा की फ़तूहात क एअलान फ़रमाया। (निसाई जि.२ स. १६९)

हज़रते जाबिर की दअवत
हज़रते जाबिर रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि फ़ाकों से शिकमे अकदस पर पत्थर बंधा हुआ देखकर मेरा दिल भर आया चुनान्चे मैं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से इजाज़त लेकर अपने घर आया। और बीवी से कहा कि मैं ने नबीए अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस क़दर शदीद भूक की हालत में देखा है कि मुझको सब्र की ताब नहीं रही। क्या घर में कुछ खाना है? बीवी ने कहा कि घर में ऐक साअ जौ के सिवा कुछ भी नहीं है। मैंने कहा कि तुम जल्दी से इस जौ को. पीस कर गूंध लो। और अपने घर का पला हुआ एक बकरी का बच्चा मैंने जिबह करके उसकी बोटीयाँ बना दीं। और बीवी से कहा कि जल्दी से तुम गोश्त रोटी तय्यार कर लो। मैं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बुलाकर लाता हूँ। चलते वक्त बीवी
ने कहा कि देखना सिर्फ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और चन्द ही असहाब को साथ में लाना। खाना कम ही है कहीं मुझे रुसवा मत कर देना। हज़रते जाबिर रदियल्लाहु अन्हु ने  बन्दक पर आका चुपके से अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! एक म आटे की रोटीयाँ और एक बकरी के बच्चे का गोश्त मैंने घर तयार कराया है। लिहाजा आप सिर्फ चन्द अश्वास के साथ चलकर तनावुल फ़रमा लें। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ खन्दक वालो! जाबिर ने दअवते तआम दी है। लिहाज़ा सब लोग उन के घर पर चलकर खाना खा लें। फिर मुझ से फ़रमाया कि जब तक मैं न आ जाऊँ रोटी मत पकवाना। चुनान्चे जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए तो गूंधे हुए आटे में अपना लुआबे दहन डालकर बरकत की दुआ फ़रमाई। और गोश्त की हाँडी में भी अपना लुआबे दहन डाल दिया। फिर रोटी पकाने का हुक्म दिया। और ये फ़रमाया कि हाँडी चूल्हे से न उतारी जाए। फिर रोटी पकनी शुरू हुई। और हाँडी में से हज़रते जाबिर रदियल्लाहु अन्हु की बीवी ने गोश्त निकाल निकालकर देना शुरू किया। एक हज़ार आदमियों ने आसूदा होकर खाना खा लिया मगर गूंधा हुआ आटा जितना पहले था उतना ही रह गया और हाँडी चूल्हे पर बदस्तूर जोश मारती रही। (बुख़ारी जि.२ स. ५८९ गजवए खन्दक)

बा बरकत खजूरें
इसी तरह एक लड़की अपने हाथ में कुछ खजूरें लेकर आई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पूछा कि क्या है? लड़की ने जवाब दिया कि कुछ खजूरें हैं। जो मेरी माँ ने मेरे बाप के नाश्ते के लिए भेजी हैं। आप उन खजूरों को अपने दस्ते मुबारक में लेकर एक कपड़े पर बिखेर दिया। और तमाम अहले ख़न्दक को बुलाकर फरमाया कि खूब सैर होकर खाओ। चुनान्चे
सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम सल्लल्लाहु तआला 316 तमाम खन्दक वालों ने शिकम सेर होकर उन खजूरों को खाया। (मदारिज जि.२ स.१६६) ये दोनों वाकिआत हुजूर सरवरे काएनात सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मुअजिज़ात में से हैं।

इस्लामी अफवाज की मोर्चाबंदी
हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खन्दक तय्यार हो जाने के बाद औरतों और बच्चों को मदीने के महफूज़ किलओं में जमअ फरमा दिया और मदीने पर हज़रते उम्मे मकतूम रदियल्लाहु अन्हु को अपना ख़लीफ़ा बनाकर तीन हज़ार अन्सार व मुहाजिरीन की फ़ौज के साथ मदीना से निकलकर सलअ पहाड़ के दामन में ठहरे । सलअ आपकी पुश्त पर था। और आपके सामने ख़न्दक थी। मुहाजिरीन का झन्डा हज़रते जैद बिन हारिसा के हाथ में दिया। और अन्सार का अलमबरदार हज़रते सअद बिन बादा रदियल्लाहु अन्हु को बनाया। (जरकानी जि.२ स. १११)

कुफ़्फ़ार का हमला
कुफ्फारे कुरैश और उनके इत्तिहादियों ने दस हज़ार के लश्कर के साथ मुसलमानों पर हल्ला बोल दिया और तीन तरफ से काफिरों का लश्कर इस जोर शोर के साथ मदीने पर उमंड पड़ा कि शहर की फ़ज़ाओं में गर्द- गुबार का तूफ़ान उठ गया। इस ख़ौफ़नाक चढ़ाई और लश्करे कुफ्फार के दल बादल की मअरिका आराई का नक्शा कुरआन की ज़बान से सुनिए इज़ जॉ-ऊकुम मिन फौकिकुम वमिन अस-फला मिन्कुम व-इज़ ज़ा-गतिल अब-सारु व ब-लगतिल कुलूबुल हनाजिरा व-त جا گذين تز تا و من اسئل من و إلا امت اوباش و انت الحب
जुनूना। जुनूना बिल्लाहिज जुनूना। हुना लिकब तुलियल मुअमिनूना व-जुल-जिलू जिल-जालन शदीदा। (अहजाब) اما و تلون بالله الا کا وكان النايلون و الا من الله شديداه (तर्जमा : जब काफ़िर तुम पर आ गए तुम्हारे ऊपर से और तुम्हारे नीचे से और जबकि ठिठक कर रह गईं निगाहें। और दिल गलों के पास (खौफ) से आ गए। और तुम अल्लाह पर (उम्मीद- यास से) तरह तरह के गुमान करने लगे। उस जगह मुसलमान आजमाइश और इम्तिहान में डाल दिए गए और वो बड़े जोर के जलजले में झिन्झोड़कर रख दिए गए।) मुनाफ़िकीन जो मुसलमानों के ब-दोश बदोश खड़े थे। वो कुफ्फार के इस लश्कर को देखते ही बुज़दिल होकर फिसल गए और उस वक्त उनके निफाक का पर्दा चाक हो गया। चुनान्चे उन लोगों ने अपने घर जाने की इजाज़त माँगनी शुरू कर दी जैसा कि कुरआन में अल्लाह तआला का फरमान है कि व यस-तअजिनू फरीकुम मिन्हुमुन  नबीय्या यकूलूना इन्ना बुयूतना  औरतुन। वमा हिया बिऔरतिन। ।  इंय्युरीदूना इल्ला फिरारा। (अहजाब) (तर्जमा :- और एक गिरोह (मुनाफिकीन) उनमें से नबी की इजाज़त तलब करता था। मुनाफिक कहते हैं कि हमारे घर खुले पड़े हैं हालाँकि वो खुले हुए नहीं थे। उनका मकसद भागने के सिवा कुछ भी न था।) लेकिन इस्लाम के जाँ निसार मुहाजिरीन व अन्सार ने जब लश्करे कुफ्फार की तूफानी यलगार को देखा। तो इस तरह सीना د فراه رازاب)
وكلام العمود الكتابة قالوافده ما عدنا الله و सिपर होकर डट गए कि “सलअ” और “उहुद” की पहाड़ियाँ सर उठाकर उन मुजाहिदीन की ऊलुल अज़्मी. को हैरत से देखने लगीं। उन जाँ निसारों की ईमानी शुजाअत की तस्वीर सफहाते कुरआन पर ब-सूरते तहरीर देखिए। इर्शाद रब्बानी है कि:व लम्मा र-अल मुअमिनूनल अहज़ाबा। कालू हाज़ा मा व अ. दनल्लाहु व रसूलुहू व स-कल्लाहु  रसूलुहू. वमा जादहुम इल्ला.  ईमानंव व तस्लीमा। . तर्जमा :- और जब मुसलमानों ने कबाइले कुफ्फार के लश्करों को देखा तो बोल उठे कि ये तो वही मंज़र है जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हम से वअदा किया था और खुदा और उसका रसूल दोनों सच्चे हैं और उसने
उनके ईमान व ताअत को और ज्यादा बढ़ा दिया। رانا)

बनू कुरैज़ा की गद्दारी

कबीलए बनू कुरैज़ा के यहूदी अब तक
गैर जानिबदार थे। लेकिन बनू नुर्जर के यहूदियों ने उनको भी अपने साथ मिलाकर लरे कुफ्फार में शामिल कर लेने की कोशिश शुरू कर दी। चुनान्चे हुाय्यी बिन अख्तब अबू सुफ़यान के मशवरे से.
बनू कुरैज़ा के सरदार कब बिन असद के पास गया। पहले तो उसने अपना दरवाज़ा नहीं खोला। और कहा कि हम मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के हलीफ़ हैं। और हम ने उनको हमेशा अपने अहद का पाबन्द पाया है। इस लिए हम उनसे अहद शिकनी करना ख़िलाफ़े मुरव्वत समझते हैं। मगर बनू नुज़ैर के यहूदियों ने इस क़दर शदीद इसरार किया। और तरह तरह से वरगलाया कि
बिल आखिर कब बिन असद मुआहद तोड़ने के लिए राजी हो गया। बनू कुरैजा ने जब मुआहदा तोड़ दिया। और कुफ्फार से मिल गए। तो कुफ्फारे मक्का और अबू सुफयान खुशी से बाग बाग हो गए। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को जब इसकी खबर मिली। तो आपने हज़रते सअद बिन मुआज़ और हज़रते सअद बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हुमा को तहकीके हाल के लिए बनू कुरैज़ा के पास भेजा । वहाँ जाकर मालूम हुआ कि वाकई बनू कुरैज़ा ने मुआहदा तोड़ दिया है। जब उन दोनों मुअज्ज़ज़ सहाबियों ने बनू कुरैज़ा को उनका मुआहदा याद दिलाया। तो उन बद जात यहूदियों ने इन्तिहाई बे हयाई के साथ यहाँ तक कह दिया कि हम कुछ नहीं जानते कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) कौन हैं । और मुआहदा किस को कहते हैं, हमारा कोई मुआहदा हुआ ही नहीं था। ये सुनकर दोनों हज़रात वापस आ गए। और सूरते हाल से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मत्तलअ किया। तो आपने बुलन्द आवाज़ से “अल्लाहु अकबर” कहा और फ़रमाया कि मुसलमानो! तुम इससे न घबराओ। न इसका गम करो। इसमें तुम्हारे लिए बिशारत है। (जरकानी जि.२ स. ११३) कुफ्फार का लश्कर जब आगे बढ़ा तो सामने ख़न्दक देखकर ठहर गया। और शहरे मदीना का मुहासरा कर लिया और तकरीबन एक महीने तक कुफ्फार शहरे मदीना के गिर्द घेरा डाले हुए पड़े रहे। और ये मुहासरा इस सख्ती के साथ काएम रहा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और सहाबा पर कई कई फाके गुज़र गए। कुफ्फार ने एक तरफ तो खन्दक का मुहासरा कर रखा था। और दूसरी तरफ इस लिए हमला करना चाहते थे कि मुसलमानों की औरतें और बच्चे किलओं में पनाह गजी थे। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जहाँ ख़न्दक के मुख्तलिफ
हिस्सों पर सहाबए किराम को मुकर्रर फ़रमा दिया था कि वो कुफ्फार के हमलों को मुकाबला करते रहें। इसी तरह औरतों और बच्चों की हिफाजत के लिए भी कुछ सहाबए किराम को मुतअय्यन कर दिया था।

अन्सार की ईमानी शूजाअत
मुहासरा की वजह से मुसलमानों की परेशानी देखकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ये ख़याल लिया कि कहीं मुहाजिरीन व अन्सार हिम्मत न हार जाएँ इस लिए आपने इरादा फरमाया कि कबीलए गतफान के सरदार उय्येना बिन हिसन से इस शर्त पर मुआहदा कर लें कि वो मदीने की एक तिहाई पैदावार ले लिया करे और कुफ्फ़ारे मक्का का साथ छोड़ दे। मगर जब आपने हज़रते सअद बिन मुआज़ हज़रते सद बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हुमा से अपना ये ख़याल ज़ाहिर फ़रमाया। तो उन दोनों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अगर इस बारे में अल्लाह तआला की तरफ़ से वही उतर चुकी है जब तो हमें इससे इन्कार की मजाल ही नहीं हो सकती। और अगर ये एक राय है तो या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जब हम कुफ्र की हालत में थे उस वक़्त तो कबीलए गतफान के सरकश कभी हमारी एक खजूर न ले सके। और जबकि अल्लाह तआला ने हम लोगों को इस्लाम और आपकी गुलामी की इज्जत से सरफ़राज़ फ़रमा दिया है तो भला क्योंकर मुमकिन है कि हम अपना माल उन काफिरों को दे देंगे? हम उन कुफ्फार को खजूरों का अंबार नहीं बल्कि नेजों और तलवारों की मार का तोहफा देते रहेंगे। यहाँ तक कि अल्लाह तआला हमारे और उनके दर्मियान फैसला फरमा देगा। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुश हो गए। और आपको पूरा पूरा इत्मिनान हो गया। (ज़रकानी जि. स.११३)
खन्दक की वजह से दस्त ब-दस्त लडाई नहीं हो सकती थी और कुफ्फार हैरान थे कि इस खन्दक को क्योंकर पार करें। मगर दोनों तरफ से रोजाना बराबर तीर और पत्थर चला करते थे। आखिर एक रोज़ अमर बिन अब्दूद, व इकरमा बिन अबू जहल व हुबैरा दिन वहब व ज़र्रार बिनुल ख़त्ताब वगैरा कुफ्फार के चन्द बहादुरों ने बनू किनाना से कहा कि उठो । आज मुसलमानों से जंग करके बता दो कि शहसवार कौन है? चुनान्चे ये सब खन्दक के पास आ गए। और एक ऐसी जगह से जहाँ खन्दक की चौड़ाई कुछ कम थी घोड़ा कुदाकर खन्दक को पार कर लिया।

Taleemat e Ameer r.a 37

** تعلیمات امیر (Taleemat e Ameer r.a)
** سینتیسواں حصہ (part-37)

۹۔ حضرت سرکار امام ذوالنفس زکیہ شہید علیہ السلام (جدِّ امجد سادات حسنی قطبی)
آپکی ولادت ۱۰۰ ہجری مدینہ منورہ، شہادت ۱۴ رمضان، ۱۴۵ھ بمطابق ۷۶۳ء مقام احجار الزیت مضافاتِ مدینہ منورہ، میں ہوئی، اور آپ اپنی والدہ کے شکم میں چار سال تک رہیں۔ (بحوالہ امام بخاریؒ و تاریخ طبری، مکتبة الخیاط، ج۷، ص۵۸۹ و ۵۹۰)

فرمانیان و موسوی نژاد زیدیہ تاریخ و عقاید، ۱۳۸۹ش، ص۳۶ پر آپ کی نسب کی طہارت میں اس طرح سے بیان ہوتا ہے کہ ابو عبد الله محمدؑ بن عبدالله محضؑ بن حسن مثنیؑ بن حسن مجتبیؑ، جنہیں بعض افراد کی طرف سے نفس زکیہ کا لقب دیا گیا۔ سن ۱۰۰ ھ میں پیدا ہوئے۔ ان کے والد عبد اللہ محضؑ حسن مثنیؑ کے بیٹے اور امام حسن مجتبیؑ کے پوتے ہیں۔ ان کی والدہ ھند بنت ابی عبیدہ بن عبد الله بن زمعہ تھیں۔ چونکہ ان کے والدین کے تمام سلسلہ نسب میں کنیز کا وجود نہیں تھا اور ان کی والدہ کے سلسلہ مادری میں سب قریش سے تھیں اس لئے انہیں صریح قریش کا لقب دیا گیا تھا۔

مولوی احمد رضا خان بریلوی صاحب اپنی بالا مشہور تصنیف فتاوی رضویہ جلد ۲۸ ص ۴۸۳ تا ۴۸۴ پر رقم طراز ہیں کہ “یہ امام اجل (یعنی امام محمدؑ) حضرت امام حسن ال مجتبی علیہ السلام کے پوتے اور حضرت امام حسین شہید کربلا علیہ السلام کے نواسے ہیں۔ ان کا لقب مبارک نفس زکیہ ہے، ان کے والد ماجد حضرت عبداللہ ال محضؑ، کے سب میں پہلے حسنی حسینی دونوں شرف کے جامع ہوۓ لہذا “محض” کہلواۓ، اپنے زمانے میں سردارِ بنی ہاشم تھیں، ان کے والدِ ماجد امام حسن مثنیؑ اور والدۂ ماجدہ فاطمہ صغریؑ بنت حسین علیہ السلام ہیں۔

📚 ماخذ از کتاب چراغ خضر۔