इब्ने होक़ल इस्लामी जगत के महान भूगोल शास्त्री गुजरे हैं। उनका जन्म 943 ई. में बग़दाद में हुआ। उन्होंने अपना ज़्यादातर समय संसार की यात्रा में गुजारा। इससे उनके ज्ञान में वृद्धि हुई। इब्ने होक़ल को बचपन से ही भूगोल में रुचि थी।
331 हिजरी में उन्होंने इस्लामी देशों की यात्रा शुरू की। इस यात्रा के दौरान सिंधु घाटी में उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध भूगोल शास्त्री अस्तख़री से हुई। अस्तख़री ने एक पुस्तक किताबुल अक़ालीम लिखी जिसमें हर देश के लिए अलग अध्याय था जिसमें उस देश की जानकारी के साथ-साथ मानचित्र भी दिया गया था।
इस पुस्तक का 1839 ई० में जे०एच० मिलर ने ड्यूक ऑफ़ सैक्सी गोथा के पुस्तकालय से हस्तलेख लेकर अनुवाद किया।
अस्तख़री ने अपनी पुस्तक इब्ने होक़ल को दी। इब्ने होक़ल ने इस पुस्तक में कुछ संशोधन किया। इब्ने होक़ल ने भी उसी जैसी एक पुस्तक ‘अलमुभालिक-वल मुमालिक’ लिखी। इस पुस्तक में भी हर देश का मानचित्र है। निसंदेह इब्ने होक़ल अपने युग के महान भूगोल शास्त्री गुजरे हैं। क्योंकि उनके बनाए हुए मानचित्र अनुपम हैं। उन्होंने विभिन्न देशों के नागरिकों से मिलकर जो जानकारी इकट्ठी की उसकी बिना पर उनकी पुस्तकें शताब्दियों तक प्रामाणिक रहीं और बाद में आने वाले भूगोलशास्त्री और इस विषय के विद्यार्थी उन पुस्तकों से फ़ायदा उठाते रहे।
इसके अलावा उन्होंने एक और मशहूर पुस्तक ‘सूरतुल अर्ज’ 977 ई. में पूरी की।
याकूबी का पूरा नाम अहमद बिन अबी याकूबी था। उन्हें याकूबी के नाम से ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने भूगोलशास्त्री की नींव रखी। इसलिए उन्हें भूगोलशास्त्री का अन्वेषक कहा जाता है। उनके बाद आने वाले मुस्लिम भूगोलशास्त्री इदरीसी और अबुल फ़िदा उनकी पुस्तकों से लाभान्वित हुए।
याकूबी ने वर्षों पर्यटकों से मिलकर विभिन्न क्षेत्रों और नगरों की जानकारी प्राप्त की और अपनी विश्व विख्यात पुस्तक किताबुल बलदान 891 ई० में लिखी। इस पुस्तक में उस समय के शहरों और क्षेत्रों के फ़ासले, वहाँ के हालात और रहन-सहन का बड़ा दिलचस्प विवरण किया। अपनी पुस्तक में उन्होंने विभिन्न नगरों में लगने वाले टैक्स के बारे में भी लिखा।
किताबुल बलदान में वह लिखते हैं, “युवावस्था के प्रारम्भ से ही मुझे विभिन्न नगरों और वहाँ के रहन-सहन के बारे में जानने की इच्छा हुई। मुझे देशों का इतिहास जानने का बड़ा शौक़ था। मैंने बचपन में दूर-दूर देशों की यात्रा की थी। वह लिखते हैं, “किसी क्षेत्र के लोगों से मिलने का अवसर मिलता तो मैं उनके देश के हालात और संस्कृति के बारे में जाने बगैर न रहता। मैं उनके देश की राजनैतिक और भोगोलिक स्थिति के अलावा उनके पड़ोसी राज्यों और वहाँ के लोगों के बारे में पूछता अगर बताने वाला विश्वसनीय होता तो मैं सारी बातें नोट कर लेता। याकूबी की एक विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी पुस्तक में कल्पित कथाओं और अपूर्ण कहानियों को कोई स्थान नहीं दिया। वह हज के दिनों में मक्का जाते और वहाँ विभिन्न देशों से आने वाले यात्रियों से उनके देश का हाल पूछते और सारी जानकारी नोट कर लेते। इस प्रकार आपके पास जानकारी का इतना खजाना जमा हो गया कि उसे पुस्तक के रूप में लिख दिया। उस जमाने में हज एक ऐसा अवसर होता था जब पूरी दुनिया से मुसलमान एक स्थान पर एकत्रित अल मसऊदी एक अनुभवी यात्री भी थे। दुर्भाग्यवश उनका सफ़रनामा नष्ट हो गया फिर भी उनकी पुस्तकों में यात्राओं का संक्षिप्त वर्णन मिलता है। मसऊदी भूगोल को इतिहास का एक भाग मानते हैं। अत: उनके लेखों में भूगोल के साथ-साथ इतिहास का समावेश भी मिलता है उन्होंने अपनी पुस्तकों में विदेश यात्राओं और जहाजरानी से भी लाभ उठाया।
मसऊदी ने अपने युग के कई भूगोल शास्त्रियों के सिद्धांतों और अवधारणाओं की आलोचना करते हुए भूगोलशास्त्र के विकास में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने मानव व प्राकृतिक भूगोल के क्षेत्र में अपने अनुभव के आधार पर इस तथ्य पर जोर दिया कि जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों और मनुष्य की शरीर रचना और कार्यशैली पर भूगोलिक परिस्थितियों का असर पड़ता है। यह तथ्य उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेज़ वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक Evolution of Species में प्रकट किये।
ख़लीफ़ा मामून रशीद के ज़माने में अस्सौतुल मामूनिया के नाम से संसार का मानचित्र तैयार हुआ जो अल मसऊदी के कथन के अनुसार यूनानी खोजकर्ता मारीनूस के मानचित्र से बेहतर था।
हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मर्तबा जिब्रईल से पूछाः ऐ जिब्रईल! कभी तुझे आसमान से मशक्कत के साथ बड़ी जल्दी और फौरन ज़मीन पर उतरना पड़ा है । जिब्रईल ने जवाब दियाः हां या रसूलल्लाह! चार मर्तबा ऐसा हुआ है कि मुझे फ़ौरन बड़ी तेजी के साथ ज़मीन पर उतरना पड़ा।
हुजूर ने फ़रमाया : वह चार मर्तबा किस किस मौके पर?
जिब्रईल ने अर्ज़ किया :
१. एक तो जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में डाला गया तो मैं उस वक्त अर्शे इलाही के नीचे था। मुझे हुक्मे इलाही हुआ कि जिब्रईल खलील के आग में पहुंचने से पहले पहले फ़ौरन (मेरे ख़लील के पास) पहुंचो । चुनांचे मैं बड़ी तेजी के साथ फ़ौरन हज़रत ख़लील के पास पहुंचा।
२. दूसरी बार जब हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की गर्दने अतहर पर छुरी रख दी गई तो मुझे हुक्म हुआ कि छुरी चलने से पहले ज़मीन पर पहुंचूं और छुरी को उल्टा कर दूं । चुनांचे मैं छुरी के चलने से पहले ही ज़मीन पर पहुंच गया और छुरी को चलने न दिया।
३. तीसरी मर्तबा जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को भाईयों ने कुंए में गिराया तो मुझे हुक्म हुआ कि यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के कुंए की तह तक पहुंचने से पहले पहले ज़मीन पर पहुंचूं और कुंए से एक पत्थर निकालकर हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को उस पत्थर पर आराम से बैठा दूं। चुनांचे मैंने ऐसा ही किया।
४. और चौथी मर्तबा या रसूलल्लाह! जबकि काफिरों ने हुजूर का दनदाने मुबारक शहीद किया तो मुझे हुक्मे इलाही हुआ कि मैं फौरन ज़मीन पर पहुंचू और हुजूर के दनदाने मुबारक का खून मुबारक ज़मीन पर गिरने न दूं । जमीन पर गिरने से पहले ही मैं वह खून मुबारक अपने हाथों में ले लूं । या रसूलल्लाह! खुदा ने मुझसे फरमाया थाः जिब्रईल! अगर मेरे महबूब का यह खून जमीन पर गिर गया तो क्यामत तक जमीन में से न कोई सब्जी उगेगी और न कोई दरख्त । चुनाचे मैं बड़ी तेजी के साथ ज़मीन पर पहुंचा और खून मुबारक को अपने हाथ पर ले लिया । (रूहुल ब्यान जिल्द ३, सफा ४११) सबक : अंबियाए किराम अलैहिमुस्सलाम की बहुत बड़ी बुलंद शान है कि जिब्रईल अमीन भी उनके खादिम हैं। यह भी मालूम हुआ कि करोड़ों मील का तवील सफर अल्लाह वाले पल भर में तय कर लेते हैं।
1 Rajab Sayyeduna Imam Muhammad al Baqir Alaihissalam ke Milad ka Din hai! Aap Sayyeduna Imam Hussain Alaihissalam ke Pote, Sayyeduna Imam Zainul Aabideen Alaihissalam ke Shehzade, Sayyeduna Imam Jafar as-Sadiq Alaihissalam ke Walid, Imam Abu Hanifa ke Ustad hain, Ilm ki Puri ek Kainat hain!
Aapka Martaba Itna Buland ke Khud Tajdar-e-Kainat SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam Apne Jalil ul Qadr Sahabi ko Apne Is Shehzade ki Aamad ki Khabar di!!
“Abu Zubair se riwayat hai ke hum Hazrat Jabir bin Abdullah RadiAllahu Anhuma ke paas haazir they jabke (budhape ke baais) Aapki nazar aur daant kamzor hochuke they. Is dauran Imam Ali Ibne Hussain “Zainul Aabideen” Alaihi-mussalam Apne chote Bete Muhammad al-Baaqir (Alaihissalam) ke humrah tashreef laaye. Unhone aakar Aapko Salam kiya aur tashreef farma hokar Apne Bete Muhammad al Baaqir se kaha ke Apne Chacha ke paas jaao aur jhuk kar Unke Sar ka Bosa lo, Bachhe (Imam Muhammad al Baaqir Alaihissalam) ne aisa he kiya. Ispar Hazrat Jabir RadiAllahu Anhu ne pucha: Ye kaun hai? Imam Zain al Aabideen ne farmaya: Mera Beta Muhammad hai. Ye sun na tha ke Hazrat Jabir RadiAllahu Anhu ne Bachhe ko Seene se lagaya aur ro diye fir Unse mukhatib hokar farmaya:‘Ay Muhammad! Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Aapke liye Salam bheja hua hai.’
Unke kisi saathi ne pucha ke maajra kya hai? To Aap RadiAllahu Anhu ne farmaya:
‘Mai Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Khidmat-e-Aqdas me haazir tha ke us dauran Aap ke paas Hussain Ibne Ali (Alaihi-mussalam) tashreef laaye to Aap ne Unhe Apne Seena-e-Mubaraka se laga liya aur Unka Bosa lekar Unhe Apne Pehlu Mubarak me bitha liya. Fir Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya: Mere is Bete ke haan ek Ladka paida hoga jiska naam ALI hoga. Jab Qayamat ka Din hoga to ek nida dene wala Arsh ki pehnaayiyo se nida dega ke SAYYEDUL AABIDEEN (Saare Aabidon ke Sardar) khada hojaye, to wo Ladka (Zainul Aabideen Ali Ibne Hussain Alaihi-mussalam) khada hojayega. Uske (Imam Zainul Aabideen Alaihissalam) haan ek Ladka Muhammad paida hoga. Ay Jabir! Jab Tum Usey dekho to Usey Meri taraf se Salam kehna aur jaan lena ke us din ke baad tumhari zindagi kum reh jayegi.”
Chunanche Hazrat Jabir RadiAllahu Anhu us din ke baad 10 se kuch din upar hayat rehkar Wisaal farma gaye.”
– Ibne Asakir, Taarikh Madina ad-Damishq, 54:276 Ibne Jauzi, Tazkiratul Khawaas, 303, Ibne Taimiya, Minhaj us Sunna al-Nabawiyyah, 4:11 Ibne Hajar Makki, As sawa aqal mahraqah, 2:586 Shablanji, Noor al Absar fee Manaqib Aale Baytin Nabi al-Mukhtar: 288
from Book of Dr. Tahir-ul-Qadri: ‘Sahaba-e-Kiram RadiAllahu Anhum aur Aaimma-e-Ahle Bayt Alaihimussalam se Imam-e-Aazam RadiAllahu Anhu ka Akhze Faiz’ Page, 82,83
Salawatullahi Ta’ala wa Malaikatihi wa Anbiyaihi wa Rasoolihi wa Jamiyi Khalqihi Ala Sayyedina Muhammadiw wa Ala Aali Sayyedina Muhammadin Alaihi wa Alaihi-Mussalamu wa Rehmatullahi wa Barakatuhu.