सैयद किफ़ायत अली काफ़ी रहमतुल्लाह अलैह

मौलाना सैयद किफ़ायत अली काफ़ी, एक प्रमुख इस्लामी विद्वान, कवि और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें 6 मई, 1858 को मुरादाबाद के चौराहे पर अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था। उनकी फांसी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला अध्याय है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
बिजनौर जिले में जन्मे मौलाना काफ़ी एक सम्मानित सादात परिवार से थे। उन्होंने अपनी शिक्षा मुरादाबाद, बरेली और बदायूं में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने धार्मिक अध्ययन, पारंपरिक चिकित्सा ( हिकमत ) और कविता में विशेषज्ञता हासिल की। उनके शिक्षकों में धार्मिक ज्ञान में शेख अबू सईद रामपुरी, चिकित्सा में शेर अली और कविता में मौलवी मेहदी अली खान और ज़की मुरादाबादी शामिल थे। मौलाना काफ़ी न केवल एक विद्वान थे, बल्कि एक कुशल कवि भी थे, जिन्होंने दीवान-ए-काफ़ी, दीवान-ए-तन्हा, कमालत-ए-अज़ीज़ी और नसीम-ए-जन्नत जैसी रचनाएँ कीं।

एक देशभक्त का हथियार उठाने का आह्वान

जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन भारत पर अत्याचार करता रहा, मौलाना काफ़ी का स्वतंत्र भारत देखने का दृढ़ संकल्प और भी मजबूत होता गया। जब 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा, मौलाना काफ़ी ने सक्रिय रूप से संघर्ष में भाग लिया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ जिहाद का उनका फतवा , जो मुरादाबाद की जामा मस्जिद की दीवारों पर लगा था, मुसलमानों को अत्याचारियों के खिलाफ़ उठ खड़े होने के लिए एक नारा था।

जनरल बख्त खान रोहिल्ला की सेना में शामिल होकर मौलाना काफ़ी ने दिल्ली से लेकर बरेली और इलाहाबाद तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी। मुरादाबाद को आज़ाद कराने के बाद, उन्होंने नवाब मजीदुद्दीन खान, जिन्हें नवाब मज्जू खान के नाम से भी जाना जाता है, के अधीन एक स्थानीय सरकार स्थापित करने में मदद की। मौलाना काफ़ी को सदर-ए-शरीयत नियुक्त किया गया, जहाँ वे शरिया कानून के अनुसार न्यायिक मामलों की देखरेख करते थे।

विश्वासघात और कब्जा
शुरुआती सफलताओं के बावजूद, स्थानीय गद्दारों और रामपुर के नवाब द्वारा अंग्रेजों से गठबंधन करने के कारण मुरादाबाद में स्वतंत्रता आंदोलन को महत्वपूर्ण असफलताओं का सामना करना पड़ा। नतीजतन, अंग्रेजों ने मुरादाबाद पर फिर से कब्ज़ा कर लिया और 30 अप्रैल, 1858 को फखरुद्दीन कलाल नामक एक स्थानीय मुखबिर की सूचना पर मौलाना काफी को गिरफ्तार कर लिया गया।

शहादत
मौलाना काफ़ी का मुकदमा बहुत ही तेज़ और क्रूर था। 6 मई, 1858 को, भयंकर यातनाएँ सहने और अपनी मातृभूमि के लिए अपने विश्वास और प्रतिबद्धता को त्यागने से इनकार करने के बाद, उन्हें अंग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया। उनके अंतिम क्षण असाधारण शांति और धैर्य से भरे हुए थे।


मौलाना सैयद किफ़ायत अली काफ़ी का बलिदान उन अनगिनत गुमनाम नायकों की मार्मिक याद दिलाता है जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और अपनी जान दे दी। उनकी विरासत, हालांकि कई लोगों द्वारा भुला दी गई है, उन लोगों को प्रेरित करती है जो देश के महान शहीदों में से एक के साहस और दृढ़ विश्वास को याद करते हैं।

जंग-ए-आज़ादी के अज़ीम रहनुमा और 1857 की क्रांति के नायक मौलाना सैयद किफ़ायत अली काफ़ी रहमतुल्लाह अलैह को फांसी से पहले उनके जिस्म पर गरम इस्त्री फिराई गई, फिर ज़ख़्म को नमक से भर दिया गया और 22 रमज़ान को मुरादाबाद के एक चौराहे पर जनसभा के सामने फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी ज़ुबान पर ये अशआर थे:

कोई गुल बाक़ी रहेगा न चमन रह जाएगा
पर रसूलुल्लाह ﷺ का दीन-ए-हसन रह जाएगा
नाम-ए-शाहान-ए-जहन मिट जाएंगे लेकिन यहाँ
हश्र तक नाम-ओ-निशान-ए-पंजतन रह जाएगा

उन्होंने इंकलाब की ऐसी लौ जलाई जिसने गुलामी के अंधेरे को मिटाने का काम किया। इतिहासकार लिखते हैं कि मौलाना किफायत साहब कलम के सिपाही भी थे। उन्होंने तारजुमा-ए-शैमिल-ए-त्रिमीज़ी, मजूमूआ-ए-चहल हदीस, व्याख्यात्मक नोट्स के साथ, खय़बान-ए-फ़िरदौस, बहार-ए-खुल्ड, नसीम-ए-जन्नत, मौलुद-ए-बहार, जज्बा-ए-इश्क, दीवान-ए-इश्क आदि किताबें लिखीं। जंगे आजादी के आंदोलन को चलाने में जिन उल्मा-ऐ-किराम का नाम आता है उनमें सबसे पहला नाम हजरते अल्लामा फजले हक खैराबादी का है। उनके बाद हजरत सैयद किफायत अली काफी का नाम आता है।


उन्होंने 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ फतवा जारी करके मुसलमानों को जेहाद के लिए खड़ा किया। इसकी मंजिल सिर्फ आजाद भारत थी। वह जनरल बख्त खान रोहिल्ला की फौज में शामिल होकर दिल्ली आये। बाद में बरेली और इलाहाबाद तक गुलामी से लड़ते रहे। मुरादाबाद को अंग्रेजों से आजाद कराने के बाद मौलाना किफायत ने नवाब मजूद्दीन खान के नेतृत्व में अपनी सरकार बनाई। इसमें उन्हें सदरे-शरीयत बनाया गया व नवाब साहब को हाकिम मुकर्रर किया गया। इनके साथ अब्बास अली खान को तोपखाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ की थी आवाज बुलंद
डिस्ट्रिक गजेटियर (मुरादाबाद) में लिखा है कि मुसलमानों ने जिले भर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुलकर आवाज बुलंद की। उधर, अंग्रेज हार चुके मुरादाबाद को जीतने के लिए रणनीति बनाने में जुटे थे। इस बात से बाखबर हो अंग्रेज अफसर जनरल मोरिस ने फौज के साथ 21 अप्रैल 1858 को मुरादाबाद पर हमला किया। हमले में नवाब मजुद्दीन शहीद हो गए और जो अंग्रेजी हुकूमत के हत्थे चढ़ गए उनमें से अधिकांश को फांसी पर चढ़ा दिया गया। 30 अप्रैल को मौलाना किफायत अली काफी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जंगे आजादी की मशाल जलाने वाले इस इंकलाबी को छह मई 1858 को जेल के गेट पर फांसी पर लटका दिया गया। जेल के गेट पर लगा पत्थर आज भी उनकी शहादत की गवाही दे रहा है। जेलर मृत्युंजय पांडेय ने बताया कि जेल में इस घटना का कोई प्रमाण फिलहाल मौजूद नहीं है। केवल जेल के गेट पर लगा पत्थर ही उनकी शहादत का गवाह है।

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