अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 4 पार्ट 77

अबू जन्दल की वापसी

अभी समझौते की दस्तावेज तैयार ही हो रही थी कि सुहलै के बेटे अबू जन्दल अपनी बेड़ियां घसीटे आ पहुंचे। वह निचले मक्का से निकलकर आए थे। उन्होंने यहां पहुंचकर अपने आपको मुसलमानों के दर्मियान डाल दिया। सुहैल ने कहा, यह पहला आदमी है जिसके बारे में मैं आपसे मामला करता हूं कि आप इसे वापस कर दें।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, अभी तो हमने लेख पूरा भी नहीं किया है।

उसने कहा, तब मैं आपसे किसी बात पर समझौते का कोई मामला ही न करूंगा।

नबी सल्ल० ने फ़रमाया, अच्छा तो तुम उसको मेरे लिए छोड़ दो।

उसने कहा, मैं आपके लिए भी नहीं छोड़ सकता।

आपने फ़रमाया, नहीं, नहीं, इतना तो कर ही दो ।

उसने कहा, नहीं, मैं नहीं कर सकता। फिर सुहैल ने अबू जन्दल के चेहरे पर चांटा रसीद किया और मुश्किों की ओर वापस करने के लिए उनके कुरते का गला पकड़ कर घसीटा।

अबू जन्दल ज़ोर-ज़ोर से चीखकर कहने लगे, मुसलमानो ! क्या मैं मुश्रिकों की ओर वापस किया जाऊंगा कि वे मुझे मेरे दीन के बारे में फ़िले में डालें ?

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, अबू जन्दल ! सब्र करो और इसे सवाब की वजह समझो। अल्लाह तुम्हारे लिए और तुम्हारे साथ जो दूसरे कमज़ोर मुसलमान हैं, उन सबके लिए फैलने और पनाह पाने की जगह बनाएगा । हमने कुरैश से समझौता कर लिया है और हमने उनको और उन्होंने हमको इस पर अल्लाह का अहद दे रखा है, इसलिए हम बद-अहदी नहीं कर सकते ।

उनके इसके बाद हज़रत उमर रज़ि० उछल कर अबू जन्दल के पास पहुंचे। वह पहलू में चलते जा रहे थे और कहते जा रहे थे, अबू जन्दल ! सब्र करो। ये लोग मुश्कि हैं, इनका खून तो बस कुत्ते का खून है ! और साथ ही साथ अपनी तलवार का दस्ता भी उनके क़रीब करते जा रहे थे। हज़रत उमर रज़ि० का बयान है कि मुझे उम्मीद थी कि वह तलवार लेकर अपने बाप (सुहैल) को उड़ा देंगे, लेकिन उन्होंने अपने बाप के बारे में कोताही से काम लिया और समझौता लागू हो गया ।

उमरा से हलाल होने के लिए कुरबानी और बालों की कटाई

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम समझौता लिखा कर फ़ारिग़ हुए तो फ़रमाया, उठो और अपने-अपने जानवर कुरबान कर दो, लेकिन अल्लाह की क़सम ! कोई भी न उठा, यहां तक कि आपने यह बात तीन बार दोहराई, मगर फिर भी कोई न उठा, तो आप उम्मे सलमा रजि० के पास गए और लोगों के इस पेश आने वाले तरीक़े का ज़िक्र किया। उम्मुल मोमिनीन ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! क्या आप ऐसा चाहते हैं ? तो फिर आप तशरीफ़ ले जाइए और किसी से कुछ कहे बिना चुपचाप अपना जानवर ज़िब्ह कर दीजिए और अपने नाई को बुलाकर सर मुंडा लीजिए।

इसके बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बाहर तशरीफ़ लाए और किसी से कुछ कहे बिना यही किया, यानी अपना क़ुरबानी का जानवर ज़िब्ह कर दिया और नाई को बुलाकर सर मुंडा लिया। जब लोगों ने देखा तो खुद भी अपने-अपने जानवर ज़िब्ह कर दिए और इसके बाद आपस में एक दूसरे का सर मूंडने लगे। हाल यह था कि मालूम होता था कि दुख की वजह से एक दूसरे का क़त्ल कर देंगे। इस मौक़े पर गाय और ऊंट सात-सात आदमियों की ओर से ज़िब्ह किए गए।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अबू जहल का एक ऊंट ज़िब्ह किया, जिसकी नाक में चांदी का एक हलक़ा था। इसका मक़सद यह था कि मुश्कि जल-भुनकर रह जाएं। फिर रसूलुल्लाह सल्ल० ने सर मुंडाने वालों के लिए तीन बार मग़्फ़िरत की दुआ की और कैंची से कटाने वालों के लिए एक बार ।

इसी सफ़र में अल्लाह ने हज़रत काब बिन उजरा के सिलसिले में यह हुक्म भी उतारा कि जो आदमी पीड़ा की वजह से अपना सर (एहराम की हालत में) मुंडा ले, वह रोज़े या सदक़े या ज़बीहे (कुरबानी के जानवर) की शक्ल में फ़िदया दे।

हिजरत करने वाली औरतों की वापसी से इंकार

इसके बाद कुछ मुसलमान औरतें आ गईं। उनके अभिभावकों ने मांग की कि हुदैबिया में जो समझौता पूरा हो चुका है, उसकी रोशनी में उन्हें वापस किया जाए, लेकिन आपने यह मांग इस दलील की बुनियाद पर रद्द कर दी कि इस धारा के बारे में समझौते में जो शब्द लिखा गया था, वह यह था—

‘और (यह समझौता इस शर्त पर किया जा रहा है कि) हमारा जो आदमी आपके पास जाएगा आप उसे ज़रूर ही वापस कर देंगे, भले ही वह आप ही के
दीन पर क्यों न हो। “

अर-रहीकुल मख़्तूम

इसलिए औरतें इस समझौते में सिरे से दाखिल ही न थीं। फिर अल्लाह ने इसी सिलसिले में यह आयत भी उतारी—

‘ऐ ईमान वालो ! जब तुम्हारे पास ईमान वाली औरतें हिजरत करके आएं, तो उनका इम्तिहान लो। अल्लाह उनके ईमान को बेहतर जानता है, पस अगर इन्हें ईमान वाली जान लो तो दुश्मनों को न पलटाओ। न वे दुश्मनों के लिए हलाल हैं और न दुश्मन उनके लिए हलाल हैं। अलबत्ता उनके काफ़िर शौहरों ने जो मह उनको दिए थे, उसे वापस दे दो और (फिर) तुम पर कोई हरज नहीं कि उनसे निकाह कर लो, जबकि उन्हें उनके मह अदा कर दो और काफ़िर औरतों को अपने निकाह में न रखो।’ (60/10)

इस आयत के आने के बाद जब कोई ईमान वाली हिजरत करके आती तो रसूलुल्लाह सल्ल० अल्लाह के इस इर्शाद की रोशनी में उसका इम्तिहान लेते कि

‘(ऐ नबी !) जब तुम्हारे पास ईमान वाली औरतें आएं और इस बात पर बैअत करें कि वह अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक न करेंगी, चोरी न करेंगी, जिना न करेंगी, अपनी औलाद को क़त्ल न करेंगी, अपने हाथ-पांव के बीच में कोई बोहतान गढ़ कर न लाएंगी, और किसी भली बात में तुम्हारी नाफ़रमानी न करेंगी, तो उनसे बैअत ले लो और उनके लिए अल्लाह से मफ़िरत की दुआ करो । यक़ीनन अल्लाह माफ़ करने वाला, रहम करने वाला है।’ (60/12)

चुनांचे जो औरतें इस आयत में ज़िक्र की हुई शर्तों की पाबन्दी का वचन देतीं, आप उनसे फ़रमाते कि मैंने तुमसे बैअत कर ली, फिर उन्हें वापस न पलटाते ।

इस हुक्म के मुताबिक़ मुसलमानों ने अपनी काफ़िर बीवियों को तलाक़ दें दी, उस वक़्त हज़रत उमर की दो बीवियां थीं जो शिर्क पर क़ायम थीं, आपने उन दोनों को तलाक़ दे दी, फिर एक से मुआविया ने शादी कर ली और दूसरी से सफ़वान बिन उमैया ने ।

1. सहीह बुखारी 1/380


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