अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट  3 पार्ट 77

हज़रत उस्मान रजि० अपना काम पूरा कर चुके थे, लेकिन कुरैश ने उन्हें अपने पास रोक लिया। शायद वे चाहते थे कि स्थिति से निमटने के लिए कोई फाइनल फ़ैसला कर लें और हज़रत उस्मान रज़ि० को उनके लाए हुए पैग़ाम का जवाब देकर वापस करें, मगर हज़रत उस्मान रज़ि० के देर तक रुके रहने की वजह से मुसलमानों में यह अफवाह फैल गई कि उन्हें क़त्ल कर दिया गया है।

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० को इसकी खबर हुई तो आपने फ़रमाया कि हम इस जगह से टल नहीं सकते, यहां तक कि लोगों से लड़ लें। फिर आपने सहाबा किराम को बैअत की दावत दी। सहाबा किराम रज़ि० टूट पड़े और इस बात पर बैअत की कि लड़ाई का मैदान छोड़कर भाग नहीं सकते। एक जमाअ तने मौत पर बैअत की, यानी मर जाएंगे, पर लड़ाई का मैदान न छोड़ेंगे।

सबसे पहले अबू सनान असदी ने बैअत की। हज़रत सलमा बिन अकवअ ने तीन बार बैअत की, शुरू में, बीच में और आखिर में। रसूलुल्लाह सल्ल० ने खुद अपना हाथ पकड़ कर फ़रमाया, यह उस्मान का हाथ है । है

फिर जब बैअत पूरी हो चुकी, तो हज़रत उस्मान रजि० भी आ गए और उन्होंने भी बैअत की। इस बैअत में सिर्फ़ एक आदमी ने जो मुनाफ़िक़ था, शिर्कत नहीं की। उसका नाम जद बिन क़ैस था ।

अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यह बैअत एक पेड़ के नीचे ली। हज़रत उमर रज़ि० मुबारक हाथ थामे हुए थे और हज़रत माक़ल बिन यसार रजि० ने पेड़ की कुछ टहनियां पकड़ कर रसूलुल्लाह सल्ल० के ऊपर से हटा रखी थीं। इसी बैअत का नाम बैअते रिज़वान है और इसी के बारे में अल्लाह ने यह आयत उतारी है-

‘अल्लाह ईमान वालों से राज़ी हुआ, जबकि वे पेड़ के नीचे बैअत कर रहे थे।’ (4818)

समझौता और समझौते की धाराएं

बहरहाल कुरैश ने स्थिति की विकटता महसूस कर ली, इसलिए झट सुहैल बिन अम्र को समझौते के मामलों को तै करने के लिए रवाना किया और यह ताकीद कर दी कि समझौते में ज़रूर ही यह बात तै की जाए कि आप इस साल वापस चले जाएं। ऐसा न हो कि अरब यह कहें कि आप हमारे शहर में ज़बरदस्ती दाखिल हो गए।

इन हिदायतों को लेकर सुहैल बिन अम्र आपके पास हाज़िर हुआ। नबी सल्ल० ने उसे आता देखकर सहाबा किराम से फ़रमाया, तुम्हारा काम तुम्हारे लिए आसान कर दिया। इस आदमी को भेजने का मतलब ही यह है कि कुरैश समझौता चाहते हैं।

सुहैल ने आपके पास पहुंचकर देर तक बातें की और आखिरकार दोनों तरफ़ से समझौते की धाराएं तै हो गईं, जो ये थीं-

1. अल्लाह के रसूल सल्ल० इस साल मक्का में दाखिल हुए बिना वापस जाएंगे, अगले साल मुसलमान मक्का आएंगे और तीन दिन ठहरेंगे। उनके साथ सवार का हथियार होगा, म्यानों में तलवारें होंगी और उनसे किसी क़िस्म की छेड़खानी न की जाएगी।

2. दस साल तक दोनों फ़रीक़ लड़ाई बन्द रखेंगे। इस मुद्दत में लोग अम्न

से रहेंगे, कोई किसी पर हाथ नहीं उठाएगा।

3. जो मुहम्मद के अहद व पैमान में दाखिल होना चाहे, दाखिल हो सकेगा और जो कुरैश के अह्द व पैमान में दाखिल होना चाहे, दाखिल हो सकेगा, जो क़बीला जिस फ़रीक़ में शामिल होगा, उस फ़रीक़ का एक हिस्सा समझा जाएगा, इसलिए ऐसे किसी क़बीले पर ज़्यादती हुई, तो खुद उस फ़रीक़ पर ज़्यादती समझी जाएगी।

4. कुरैश का जो आदमी अपने सरपरस्त की इजाजत के बिना, यानी भागकर – मुहम्मद के पास जाएगा, मुहम्मद उसे वापस कर देंगे, लेकिन मुहम्मद के साथियों में से जो आदमी शरण लेने के लिए भाग कर कुरैश के पास आएगा, कुरैश उसे वापस न करेंगे।

इसके बाद आपने हज़रत अली रजि० को बुलाया कि लेख लिख दें और यह इमला कराया ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’

इस पर सुहैल ने कहा, हम नहीं जानते रहमान क्या है? आप यों लिखिए, ‘बिस्मिल्लाहुम-म’ (ऐ अल्लाह ! तेरे नाम से)

नबी सल्ल० ने हज़रत अली रज़ि० को हुक्म दिया कि यही लिखो। इसके बाद आपने यह इमला कराया, ‘यह वह बात है जिस पर मुहम्मद रसूलुल्लाह ने समझौता किया।

इस पर सुहैल ने कहा, अगर हम यह जानते कि आप अल्लाह के रसूल हैं, तो फिर न तो हम आपको बैतुल्लाह से रोकते और न लड़ते, लेकिन आप मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह लिखवाइए ।

आपने फ़रमाया, मैं अल्लाह का रसूल हूं चाहे तुम झुठलाते रहो। फिर हज़रत अली रज़ि० को हुक्म दिया कि मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह लिखें और शब्द ‘अल्लाह के रसूल’ मिटा दें, लेकिन हज़रत अली ने गवारा न किया कि शब्द को मिटाएं। इसलिए नबी सल्ल० ने खुद अपने हाथ से मिटा दिया। इसके बाद पूरी दस्तावेज़ लिखी गई ।

फिर जब समझौता पूरा हो गया, तो बनू खुज़ाआ रसूलुल्लाह सल्ल० के अद व पैमान में दाखिल हो गए। ये लोग असल में अब्दुल मुत्तलिब के ज़माने ही से बनू हाशिम के मित्र थे, जैसा कि किताब के शुरू में ही गुज़र चुका है। इसलिए इस अद व पैमान में दाखिला असल में उसी पुरानी मिताई की ताकीद थी और उसको पक्का करना था। दूसरी ओर बनू बक्र कुरैश के अद व पैमान में दाखिल हो गए।