Mauwiyah Achanak Hasne Laga

Ek Din Muawiya Aur Amr Bin Ass Baite Howey The, Mauwiyah Achanak Hasne Laga.

Amr Bin Ass Ne Kaha, Allah Paak Tujhe Hamesha Haste Howey Rakhe. Kis Baat par Has Rahe Ho.


Muawiyah Ne Kaha Mujhe Jung E Siffin Ka Din Yaad Aagaya Jab Tum (Maula) Ali ( علیه السلام)  Se Moqabile Ke Liye Gaye Aur  Apni Jaan Bacha Ne Ke Liye Nagga Hogaye Aur Apni Sharamgah Ki Wajha Se Ek Kareem Shaks Se Bach Gaye. Warna Tumahari Gardan (Zulfeqar Se) Alag Hojati.


Isper Amr Bin Ass Ko Gussa Aya Aur Kaha

*” Khuda Ki Qasam Jab ( Maula) Ali (علیہ السلام) Ne Tumhe Siffin Mein Jung Ke Liye  Bolaya Tha Maine Dekha Tumahari Ankhain Phir Gayi Thi Aur Tumahare Jism Se Kuch Aaysi Cheez Nikal Rahi Thi Jiska Zikr Sharam Ke Marey Main Nahi Karna Chahta*


Ibn ʿAbd Rabbih( 328 ھ), Book Al Aqd Al Farid. Page 88.

Imam Buseri ( RH) Jinhone Qaseeda Burdah Sharif Likha Hai.

*( Maula ya Salli Wasalim da-Iman Abadan Ala Habi Bika Khairil Khalqi Kulli hi mi)*

आशुरा का रोज़ा जायज़ नहीं है

*आशुरा का रोज़ा जायज़ नहीं है और बल्कि ये बनी उमैय्या जो क़ातिलाने ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम थे उन्होंने इस दिन को खुशी वा बरकत का दिन मशहूर किया !*


ये देखिये अहलेसुन्नत की सबसे बड़ी किताब बुखारी शरीफ़ में ख़ुद ये रिवायत मौजूद है कि अब्दुल्ला इब्ने मसूद रज़ियल्लाह अन्हु जैसे जलीलुल क़द्र सहाबा भी यौमे आशुरा को रोज़ा नहीं रखते थे, मुलाहिज़ा फरमाइए –

حَدَّثَنِي مَحْمُودٌ , أَخْبَرَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ , عَنْ إِسْرَائِيلَ , عَنْ مَنْصُورٍ , عَنْ إِبْرَاهِيمَ , عَنْ عَلْقَمَةَ , عَنْ عَبْدِ اللَّهِ , قَالَ : دَخَلَ عَلَيْهِ الْأَشْعَثُ وَهْوَ يَطْعَمُ , فَقَالَ : الْيَوْمُ عَاشُورَاءُ , فَقَالَ :    كَانَ يُصَامُ قَبْلَ أَنْ يَنْزِلَ رَمَضَانُ ، فَلَمَّا نَزَلَ رَمَضَانُ تُرِكَ فَادْنُ فَكُلْ    .



*अशअस उन के यहाँ आए  वो उस वक़्त खाना खा रहे थे।  अशअस ने कहा कि आज तो आशूरा का दिन है। इब्ने-मसऊद (रज़ि०) ने कहा कि उन दिनों में आशूरा का रोज़ा रमज़ान के रोज़ों के नाज़िल होने से पहले रखा जाता था लेकिन जब रमज़ान के रोज़े का हुक्म नाज़िल हुआ तो ये रोज़ा छोड़ दिया गया। आओ तुम भी खाने में शरीक हो जाओ।*

*Sahih Bukhari#4503*
क़ुरआन पाक की तफ़सीर के बयान में

Status: صحیح

इससे ये बात साबित होती है कि जब तक इस्लाम में रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ नहीं किए गए थे तब तक ठीक लेकिन उसके फ़र्ज़ होने के बाद आशुरा का रोज़ा ख़त्म हो गया था।लेकिन बनी उमैय्या ने ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की खुशी में बतौर फ़र्ज़ बरकत वा मसर्रत का दिन बना कर इसको फिर से शुरू कर दिया ताकि मुसलमान रसूल अल्लाह saws के बेटे ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की शहादत का ग़म न मनायें।

*आशुरे के दिन ख़ुशी बनाना शाम (सीरिया) के नासीबियो की सुन्नत है।*

इब्ने कसिर अल दमिश्की ( मुतावफ्फा 774 हिजरी) ने अपनी तारीख़ में कुछ ऐसा कहा है :-

अरबी :- 👇🏻
وقد عاكس الرافضة والشيعة يوم عاشوراء النواصب من أهل الشام، فكانوا إلى يوم عاشوراء يطبخون الحبوب ويغتسلون ويتطيبون ويلبسون أفخر ثيابهم ويتخذون ذلك اليوم عيدا
हिन्दी तर्जुमा :- 👇🏼

*और आशुरे के दिन के बारे में रवाफिज़ व शिया की मुख़ालेफत शाम (सीरिया) के नवासिब (नासिबी) करते, पस वह आशूरे के दिन रोटियां तैयार करते, नहाते, खुशबू लगाते, और बेहतरीन कपड़े पहनते थे और वह इस दिन को खुशी का दिन मानते थे।*

अल बिदाया वलनेहाया, इब्ने कसिर // जिल्द 2 // सफा//54,

*ये देखिये अहलेबैत अलैहिस्सलाम ने इस दिन के बारे में क्या फ़रमाया है -*

*अहलेबैत (अलैहिमुस्सलाम) की रिवायतों में 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन रोज़ा रखने के बारे में अलग अंदाज़ पाया जाता है। ख़ास तौर से हदीसों में इस दिन को ग़म, मातम और भूख-प्यास के साथ इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में गुज़ारने पर ज़ोर दिया गया है, और ईद या फ़ज़ीलत के तौर पर रोज़ा रखने से मना किया गया है।*


*कुछ मशहूर रिवायतें:*

*ईमाम जाफ़र सादिक as से रिवायत है:*

*”आशूरा के दिन रोज़ा मत रखो। अगर कोई इस दिन भूखा-प्यासा रहना चाहे तो दिन के आख़िर में (अस्र के बाद) थोड़ा पानी पीकर अपना इम्साक/फाक़ा ख़त्म करे, लेकिन इसे शरई रोज़ा न समझे।”*

*ईमाम मुहम्मद बाक़िर as से रिवायत है:*

*”बनी उमय्या ने आशूरा के दिन को बरकत और रोज़े का दिन बना लिया, जबकि यह दिन हुसैन (अ.स.) की शहादत और मुसीबत का दिन है।”*


*ईमाम अली रिज़ा as से रिवायत है:*

*”जो शख़्स आशूरा के दिन अपनी दुनियावी ज़रूरतों के लिए कोशिश करेगा, अल्लाह उसकी ज़रूरतें उसी दुनिया तक सीमित कर देगा। और जो इस दिन को मुसीबत और ग़म का दिन बनाएगा, अल्लाह क़यामत के दिन उसके लिए खुशी का सबब बनाएगा।”*


नोट – और सबसे बड़ी बात के अगर आशुरा को रोज़ा रखना रसूल अल्लाह saws की सुन्नत होती या ये रोज़ा फ़र्ज़ या बहुत फ़ज़ीलत वाला होता तो इस रोज़े को ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके घर वाले कर्बला में ज़रूर रखते,लेकिन वो सब तो बार बार पानी माँग रहे थे, हज़रत ईमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज़रत अब्बास अलमदार अलैहिस्सलाम को पानी लेने दरिया पर भी भेजा था के वो पानी ले आयें और सबको पानी पिलायें,लेकिन अफ़सोस यज़ीदियो ने ऐसा नहीं होने दिया।।



*अब जो यज़ीदी है वो रोज़ा रखे और जो हुसैनी है वो फ़ाक़ा रखे और ग़म में इस दिन को गुज़ारे।*

9 और 10 मुहर्रम को रोज़ा रखने वालों!!
अगर 9 और 10 मुहर्रम का रोज़ा इस्लाम में होता तो आले मोहम्मद कभी पानी ना माँगते!!
भला नबी के घराने वालों से ज़्यादा दीन एं मुहम्मदी कौन जनता है?
क्या मौला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से ज़्यादा कोई दीन एं मुहम्मदी को जनता है? 9 10 मुहर्रम में रोज रखना हराम है