कर्बला के 34वें शहीद हज़रते वहब इब्ने अब्दुल्लाह-अल-क़लबी
आप का नाम वहब इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने हवाब कलबी था। आप बनी क़ल्ब के एक फर्द थे। हुस्नो जमाल में नज़ीर न रखते थे। आप खुश किरदार और खुश अतवार भी थे और आप ने करबला के मैदान में दिलेरी के साथ दरजऐ शहादत हासिल किया है। हम आप के वाक्याते शहादत को किताब के ज़रिये ज़िक्र-अल-अब्बास से नक़्ल करते हैं।
करबला की हौलनाक जंग में हुसैनी बहादुर निहायत दिलेरी से जान दे दे कर शरफे शहादत हासिल कर रहे थे। यहाँ तक कि जनाबे वहब बिन अब्दुल्लाह अल-कलबी की बारी आई। यह हुसैनी बहादुर पहले नसरानी था और अपनी बीवी और वालिद समैत इमाम हुसैन अलै० के हाथों पर मुसलमान हुआ था। आज जब कि यह इमाम हुसैन अ० पर फिदा होने के लिये आमादा हो रहे हैं उनकी वालेदा हमराह हैं। माँ ने दिल बढ़ाने के लिये वहब से कहा, बेटा आज फर्ज़न्दाने रसूल पर कुरबान हो कर रूहे रसूल मक़बूल स० को खुश कर दो। बहादुर बेटे ने कहा, मादरे गिरामी आप घबरायें नहीं इन्शाअल्लाह पैसा ही होगा।
अल-गरज़ आप इमाम हुसैन अलै० से रूख़सत होके रवाना हुऐ और रजज़ पढ़ते हुऐ दुश्मनों पर हमालावर हुऐ आप ने कमाले जोश व शुजाअत में जमाअत की जमाअत को कत्ल कर डाला इस के बाद अपनी माँ “क़मरी” और बीवी की तरफ वापिस आये। माँ से पूछा मादरे गिरामी आप खुश हो गईं माँ ने जवाब दिया मैं उस वक़्त तक खुश न होऊगीं जब तक फर्ज़न्दाने रसूल के सामने तुम्हें ख़ाको खून में गल्ताँ न देखूँ। ये सुन कर बीवी ने कहा, ऐ वहब मुझे अपने बारे में क्यों सताते हो और अब क्या करना चाहते हो ? माँ पुंकारी “या बनी ल तकबिल कौलहा” बेटा बीवी की मोहब्बत में न आ जाना खुदारा जल्द यहाँ से रूख़्सत होकर फर्ज़न्दे रसूल पर अपनी जान कुर्बान कर दो वहब ने जवाब दिया मादरे गिरामी ऐसा ही होगा। मैं मौके की नज़ाकत को जानता और पहचानता हूँ। मुझे इमाम हुसैन का इज़्तेराब और हज़रते अब्बास जैसे बहादुर की परेशानी दिखाई दे रही है भला क्योंकर मुम्किन है कि मैं ऐसी हालत में में ज़रा भी कोताही करूँ। इस के बाद जनाबे वहब मैदाने जंग की तरफ वापिस चले गये और कुछ अशआर पढते हुऐ हमलावर हरे यहाँ तक कि आपने अनीस 19 ब-कौले 12 सवार और 12 प्यादे क़त्ल किये इसी दौरान में आप के दो हाथ कट गये। उनकी ये हालत देखकर उनकी बीवी को जोश आ गया और वह एक चोबे खेमा लेकर मैदान की तरफ दौड़ीं और अपने शौहर को पुकार कर कहा खुदा तेरी मदद करे। हाँ फर्ज़न्दे रसूल के लिऐ जाँ दे दे और सुन इसके लिये मैं अब भी आमादा हूँ। यह देख कर वहब अपनी बीवी की तरफ इसलिये फौरन आये कि उन्हें खेमे तक पहुँचा दें उस मुखद्दरः ने उन – का दामन थाम लिया और कहा मैं तेरे साथ मौत की – आगोश में सोऊँगी। फिर इमाम हुसैन अलै० ने उसे हुक्म दिया कि वह खेमों में वापिस चली जाए। चुनांचे वह – वापिस चली गई उसके बाद वहब मशगूले कारज़ार हो गये। और काफी देर तक नबर्दआज़माई के बाद दरजा-ऐ-शहादत पर फाऐज़ हुऐ वहब के ज़मीन पर गिरते ही उनकी बीवी ने दौड़ कर उन का सर अपनी आगोश में उठा लिया उन के चेहरे से गर्दा गुबार और सर व आँख से खून साफ करने लगीं इतने में शिर्मे लई के हुक्म से उसके गुलाम रूस्तम लई ने उस मोमिना के सर पर गुर्जे आहनी मारा और यह बेचारी भी शहीद हो गई। मोअर्ररखीन का कहना है कि “वही अब्बल अमरात कत्लतः फी असकर-अल-हुसैन” यह पहली औरत है जो लश्करे हुसैन में कत्ल की गई। एक रिवायत में है जब वहब ज़मीन प्र गिरे तो उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया। यानि उनकी लाश पर कब्ज़ा करके सर काट लिया गया। उसके बाद उस सर को खेमा-ऐ-हुसैनी की तरफ फेंक दिया और माँ ने उस सर को उठा लिया बोसे दिये और दुश्मन ने की तरफ फेंक कर कहा, हम जो चीज़ राहे मौला मे देते हैं उसे वापिस नहीं लेते। कहते हैं कि वहब का फेंका हुआ सर एक दुश्मन के लगा और वह हलाक हो गया।
फिर माँ चोबे खेमा लेकर निकली और दुश्मनों को कत्ल कर के ब-हुक्मे इमाम हुसैन खेमे में वापिस चली गई। दमा सकेबा सफा 331 तारिखे कामिल तुफाने बुका शोला 13 तबा ईरान 1314 हिजरी।
📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम


