
What Islam Says About Magic & Jinn? | Truth, Myth, or Reality Exposed



5. मुंज़िर बिन सावी के नाम पत्र
नबी सल्ल० ने एक पत्र मंज़िर बिन सावी, बहरैन के हाकिम के पास लिखकर उसे भी इस्लाम की दावत दी और इस पत्र को हज़रत अला बिन हज़रमी रज़ि० के हाथों रवाना फ़रमाया। जवाब में मुंज़िर ने रसूलुल्लाह सल्ल० को लिखा-
‘ऐ अल्लाह के रसूल ! मैंने आपका पत्र बहरैन वालों को पढ़कर सुना दिया । कुछ लोगों ने इस्लाम को मुहब्बत और पाकीज़गी की नज़र से देखा और उसे स्वीकार कर लिया और कुछ ने पसन्द नहीं किया और मेरी ज़मीन में यहूदी और मजूसी भी हैं, इसलिए आप इस बारे में अपना फ़रमान जारी कीजिए। इसके जवाब में रसूलुल्लाह सल्ल० ने यह पत्र लिखा-
‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मुहम्मद रसूलुल्लाह की ओर से मुंज़िर बिन तुम पर सलाम हो। मैं तुम्हारी ओर अल्लाह की प्रशंसा करता हूं जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद उसके बन्दे और रसूल हैं।
सावी की तरफ़
इसके बाद मैं तुम्हें अल्लाह की याद दिलाता हूं। याद रहे कि जो व्यक्ति भलाई करेगा और भला चाहेगा, वह अपने ही लिए भलाई करेगा और जो व्यक्ति मेरे दूतों की इताअत और उनके हुक्म की पैरवी करे, उसने मेरी इताअत की और जो उनके साथ भला चाहे, उसने मेरा भला चाहा और मेरे दूतों ने तुम्हारी अच्छी तारीफ़ की है और मैंने तुम्हारी क़ौम के बारे में तुम्हारी सिफ़ारिश मान ली है, इसलिए मुसलमान जिस हाल पर ईमान लाए हैं उन्हें उस पर छोड़ दो और मैंने ख़ताकारों को माफ़ कर दिया है, इसलिए उनसे कुबूल कर लो और जब तक तुम सुधार का रास्ता अपनाए रहोगे, हम तुम्हें तुम्हारे काम से अलग न करेंगे और जो
1. देखिए ज़ादुल मआद 2/122, टिप्पणी तलफ़ीहुल फ़हूम पृ० 29
यहूदी या मजूसी मत पर कायम रहे, उस पर जिज़या है।
6. हौज़ा बिन अली, साहिबे यमामा के नाम पत्र
नबी सल्ल० ने हौज़ा बिन अली यमामा के हाकिम के नाम नीचे लिखा पत्र लिखा-
‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
मुहम्मद रसूलुल्लाह की ओर से हौज़ा बिन अली की तरफ़
उस आदमी पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मेरा दीन ऊंटों और घोड़ों की पहुंच की आखिरी हद तक ग़ालिब आकर रहेगा, इसलिए इस्लाम लाओ, सालिम (सुरक्षित) रहोगे और तुम्हारे मातहत जो कुछ है, उसे तुम्हारे लिए बरक़रार रखूंगा।’
इस पत्र को पहुंचाने के लिए क़ासिद की हैसियत से सुलैत बिन अम्र आमिरी का चुनाव किया गया, हज़रत सुलैत इस मुहर लगे हुए पत्र को लेकर हौज़ा के पास तशरीफ़ ले गए, तो उसने आपको मेहमान बनाया और मुबारकबाद दी। हज़रत सुलैत ने उसे पत्र पढ़कर सुनाया तो उसने दर्मियानी क़िस्म का जवाब दिया और नबी सल्ल० की सेवा में यह लिखा-
आप जिस चीज़ की दावत देते हैं, उसके बेहतर और अच्छा होने का क्या पूछना और अरब पर मेरा रौब बैठा हुआ है, इसलिए कुछ कारपरदाज़ी मेरे ज़िम्मे करें। मैं आपकी पैरवी करूंगा। उसने हज़रत सुलैत को उपहार भी दिए। उन्हें हिज्र का बना हुआ कपड़ा दिया ।
हज़रत सुलैत ये उपहार लेकर नबी सल्ल० की खिदमत में वापस आए और सारी बातें सुनाई। नबी सल्ल० ने उसका पत्र लेकर फ़रमाया, अगर वह ज़मीन का एक टुकड़ा भी मुझसे तलब करेगा, तो मैं उसे न दूंगा। वह खुद भी तबाह होगा और जो कुछ उसके हाथ में है, वह भी तबाह होगा ।
फिर जब अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का जीतने के बाद वापस तशरीफ़ लाए, तो हज़रत जिब्रील अलै० ने यह ख़बर दी कि हौज़ा का देहान्त हो चुका है। नबी सल्ल० ने फ़रमाया, सुनो, यमामा में एक झूठा आदमी ज़ाहिर होने वाला
1. ज़ादुल मआद 3/61, 62 यह पत्र निकट अतीत में मिला है और डाक्टर हमीदुल्लाह साहब ने इसका फोटा छापा है। ज़ादुल मआद का लिखा और इस फोटो के लिखे में सिर्फ़ एक शब्द का अन्तर है, (यानी फोटो में) ला इला-ह इल्ला हु-व के बजाए ला इला-ह ग़ैरुह है।
है, जो मेरे बाद क़त्ल किया जाएगा। एक कहने वाले ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल ! उसे कौन क़त्ल करेगा ? आपने फ़रमाया, तुम और तुम्हारे साथी, और सचमुच ऐसा ही हुआ। ‘
7. हारिस बिन अबी शिम्र ग़स्सानी, दमिश्क़ के हाकिम के नाम पत्र नबी सल्ल० ने उसके पास नीचे लिखा पत्र भेजा। बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम मुहम्मद रसूलुल्लाह की ओर से हारिस बिन अबी शिम्र की ओर उस आदमी पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे और ईमान लाए और तस्दीक़ करे और मैं तुम्हें दावत देता हूं कि अल्लाह पर ईमान लाओ जो तंहा है और जिसका कोई शरीक नहीं और तुम्हारे लिए तुम्हारी बादशाही बाक़ी रहेगी।
यह पत्र क़बीला असद बिन खुज़ैमा से ताल्लुक रखने वाले एक सहाबी हज़रत शुजाअ बिन वब के हाथों रवाना किया गया। जब उन्होंने यह पत्र हारिस के हवाले किया, तो उसने कहा, ‘मुझसे मेरी बादशाही कौन छीन सकता है ? मैं उस पर धावा बोलने ही वाला हूं।’ और वह इस्लाम न लाया,2 बल्कि क़ैसर से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के खिलाफ लड़ाई की इजाज़त चाही, मगर उसने उसको उसके इरादे से बाज़ रखा, फिर हारिस ने शुजाअ बिन वहब को उपहार और खर्चा देकर अच्छाई के साथ वापस कर दिया।

🔥 हदीस ए सुलह इमाम हसन से माविया की कोई फजीलत साबित नहीं होता..
✍️ माविया की भांजे जो दिन रात अपने मामू माविया का दिफा करने और अहले बैत की शान ओ मंजिलत का रद्द करने में नाकाम कोशिश करते रहते हैं- जो हकीकत में नासबी हैं।
जब फरमान ए मुस्तफा ﷺ के मुताबिक माविया को बागी और जहन्नमी कहा जाता है तो नासबी लोग सही बुखारी से यह दिखाते हैं कि नबी करीम ﷺ ने माविया और माविया के गिरोह को मोमिन और अजीम गिरोह कहा है.. फिर सवाल करते हैं कि जब माविया मोमिन और अजीम शख्स ठहरा तो इसे बागी, जहन्नमी या मुनाफिक कहना दुरुस्त नहीं है..😅
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आज हम सही बुखारी में माविया के गिरोह के लिए इस्तेमाल ‘अजीम’ और ‘मुसलमान’ लफ्ज का तहकीकी जायजा लेते हैं कि क्या वाकाई में इन दोनों लफ़्ज़ों से माविया की फजीलत या माविया के बागी और मुनाफिक ना होने की दलील बनता है .???
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सही बुखारी शरीफ में इंटरनेशनल हदीस नंबर 2704 में है कि-
… فَقَالَ الحَسَنُ: وَلَقَدْ سَمِعْتُ أَبَا بَكْرَةَ يَقُولُ: رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَى المِنْبَرِ وَالحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ إِلَى جَنْبِهِ، وَهُوَ يُقْبِلُ عَلَى النَّاسِ مَرَّةً، وَعَلَيْهِ أُخْرَى وَيَقُولُ: «إِنَّ ابْنِي هَذَا سَيِّدٌ وَلَعَلَّ اللَّهَ أَنْ يُصْلِحَ بِهِ بَيْنَ فِئَتَيْنِ عَظِيمَتَيْنِ مِنَ المُسْلِمِينَ».
हजरत हसन (बसरी) फरमाते हैं- मैंने हज़रत अबू बकरा से सुना कि वो फरमाते हैं कि – मैंने रसूल-अल्लाह ﷺ को मेंबर पर देखा जबकि हजरत हसन बिन अली अलैहिस्सलाम आपके बगल में बैठे थे।
आप ﷺ कभी लोगों की तरफ देखते और कभी इन [हजरत हसन बिन अली अलैहिस्सलाम.] की तरफ देखते और फरमाते कि – ‘ मेरा यह बेटा सय्यद [सरदार] है, और उम्मीद है कि अल्लाह इसके जरिए मुसलमान की दो अजीम जमाआतों के दरमियान सुलह कराएगा।’
👆 हर अहले इल्म को यह पता है कि हजरत हसन अलैहिस्सलाम ने जब अपने दौरे खिलाफत में एक बहुत बड़ा लश्कर लेकर माविया के खिलाफ जंग के लिए निकले तो अम्र बिन आस ने माविया से कहा कि ‘मैं अपनी तरफ एक ऐसा बड़ा लश्कर आते देख रहा हूं कि वो जब तक हम लोगों को मैदान से खदेड़ ना देगा तब तक वापस नहीं होगा’ फिर जब माविया को अपने हारने का एहसास हुआ तो माविया ने जंग से पहले ही अब्दुल्ला बिन आमिर और अब्दुर्रहमान बिन समरह को यह पैगाम देकर इमाम हसन की तरफ भेजा कि ‘हम सुलह करना चाहते है और आप जो शर्त कहेंगे उसे हम मानने के लिए तैयार हैं.. आखिरकार कुछ शर्तों के साथ इन दोनों बड़े गिरोहों में सुलह हो गया।
इस हदीस का इशारा इसी सुलह की तरफ है।
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अब बुखारी की इस हदीस में लफ्ज ‘अजीम’ और लफ्ज ‘मुसलमान’ पर जवाब देता हूं जो दो जमाआतों में से एक माविया के गिरोह के लिए भी इस्तेमाल हुआ है…
1) लफ्ज “अजीम” का जवाब-
इस हदीस में इस लफ्ज अजीम का होना इख्तिलाफी है, जरुरी नहीं है नबी करीम ﷺ
ने इस हदीस को सुनाते हुए माविया जैसे मुनाफिक के गिरोह के लिए लफ्ज ‘अजीम’ कहा हो, क्योंकि यही हदीस इसी बुखारी शरीफ में दूसरी जगह रकम नंबर 7109 के तहत भी आया है जिसमें है कि-
قَالَ الْحَسَنُ وَلَقَدْ سَمِعْتُ أَبَا بَكْرَةَ قَالَ بَيْنَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَخْطُبُ جَاءَ الْحَسَنُ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ابْنِي هَذَا سَيِّدٌ وَلَعَلَّ اللَّهَ أَنْ يُصْلِحَ بِهِ بَيْنَ فِئَتَيْنِ مِنْ الْمُسْلِمِينَ.
यानि ‘हजरत हसन बसरी ने कहा कि मैंने अबू बकरा को यह कहते हुए सुना कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि – बेशक मेरा यह बेटा सय्यद [सरदार] है और यकीनन अल्लाह इसके जरिए मुसलमानों के दो लश्करों के दरमियान सुलह करा देगा’।
👆 इसमें कहीं भी लफ्ज़ अजीम का जिक्र नहीं है और यह रिवायत भी अबू बकरा से ही है, पता चला कि यह लफ्ज ‘अजीम’ इख्तिलाफी है।
दूसरी बात ये कि सुलह हुदैबिया के बाद नबी करीम ﷺ ने मिस्र और काई देशों के काफिर बादशाहों के नाम खत लिखकर उन्हें इस्लाम की दावत दी.. उन खतों में नबी करीम ﷺ ने काफिर बादशाह को ‘अजीम’ कहा है।
इमाम इब्ने हजर अस्कलानी के शागिर्द और सही बुखारी की सरह ‘इरशाद उस् सारी सरह सही बुखारी’ के मुसन्निफ “इमाम क़ुस्तलानी” ने नबी करीम ﷺ की सीरत “अल मवाहिबुद् दुनिया” में लिखा है कि जब मिस्र के काफिर हुकमरान मक़ोकस के नाम खत लिखकर उन्हें इस्लाम की दावत दी तो उस खत के इब्तिदाई अल्फाज इस तरह थे-
من محمد عبد الله ورسوله، إلى المقوقس عظيم القبط..
यानि ‘मुहम्मद ﷺ अल्लाह के बंदे और अल्लाह के रसूल का खत, मक़ोकस जो क़िब्तियों की अजीम शख्सियत है- के नाम..।’
देखें अल मवाहिबुद् दुनिया की दूसरी जिल्द में सफा नंबर 143 पर 👇
https://archive.org/details/mlmmmlmm/mlmm2/page/n142/mode/1up?view=theater
इसी तरह आप ﷺ ने ईरान के मौजूदा काफिर हुक्मरान क़िसरा के नाम खत लिखा कि-
من محمد رسول الله إلى كسرى عظيم فارس.
यानि ‘ अल्लाह के रसूल मुहम्मद ﷺ का खत क़िसरा जो ईरान की अजीम शख्सियत है- के नाम..।’
देखें अल मवाहिबुद् दुनिया की दूसरी जिल्द में सफा नंबर 139 पर 👇
https://archive.org/details/mlmmmlmm/mlmm2/page/n138/mode/1up?view=theater
अगर लफ्ज अजीम से माविया जैसे की फजीलत साबित होता है तो फिर इसी अजीम लफ्ज से इन काफिर हुक्मरानों की कौन सी फजीलत साबित होता है ? क्योंकि नबी करीम ﷺ ने इन काफिर हुक्मरानों के लिए भी लफ्ज़ अजीम का इस्तेमाल किया था।
याद रहे कि यह लफ्ज़ किसी चीज की कैफियत , अजमत या कभी बहुत ज्यादा तादाद के लिए भी इस्तेमाल होता है।
हदीस ए सुलह इमाम हसन में लफ्ज अजीम का इशारा इस तरफ है कि जो लश्कर होगा वो तादाद में बहुत बड़ा होगा..
अब आते हैं दूसरे लफ्ज़ की तरफ कि हदीस ए सुलह इमाम हसन में जो लफ्ज ‘मुसलमान’ आया है- उससे माविया की कोई फजीलत साबित होता है या नहीं ?
2) लफ्ज ‘मुसलमान’ का जवाब-
जिस तरह बुखारी की हदीस नंबर 2704 में माविया के गिरोह के लिए भी लफ्ज़ मुसलमान का इस्तेमाल हुआ है वैसे इसी बुखारी शरीफ में मुनाफिकों के सरदार के लिए भी इस्तेमाल हुआ है, अंतर सिर्फ इतना है कि एक को नबी करीम ﷺ ने मोमिन या मुसलमान कहा है तो दूसरी तरफ अल्लाह ने मुनाफिक के सरदार को मोमिन कहा है, देखें-
बुखारी शरीफ में इंटरनेशनल हदीस नंबर 2691 में है कि-
حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ، حَدَّثَنَا مُعْتَمِرٌ، قَالَ: سَمِعْتُ أَبِي، أَنَّ أَنَسًا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، قَالَ: قِيلَ لِلنَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: لَوْ أَتَيْتَ عَبْدَ اللَّهِ بْنَ أُبَيٍّ، «فَانْطَلَقَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَرَكِبَ حِمَارًا، فَانْطَلَقَ المُسْلِمُونَ يَمْشُونَ مَعَهُ وَهِيَ أَرْضٌ سَبِخَةٌ»، فَلَمَّا أَتَاهُ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: إِلَيْكَ عَنِّي، وَاللَّهِ لَقَدْ آذَانِي نَتْنُ حِمَارِكَ، فَقَالَ رَجُلٌ مِنَ الأَنْصَارِ مِنْهُمْ: وَاللَّهِ لَحِمَارُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَطْيَبُ رِيحًا مِنْكَ، فَغَضِبَ لِعَبْدِ اللَّهِ رَجُلٌ مِنْ قَوْمِهِ، فَشَتَمَهُ، فَغَضِبَ لِكُلِّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا أَصْحَابُهُ، فَكَانَ بَيْنَهُمَا ضَرْبٌ بِالْجَرِيدِ وَالأَيْدِي وَالنِّعَالِ، فَبَلَغَنَا أَنَّهَا أُنْزِلَتْ: {وَإِنْ طَائِفَتَانِ مِنَ المُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا} [الحجرات: 9].
यानि ‘हजरत अनस रजिअल्लाह अन्हु से रिवायत है, उन्होंने कहा- नबी करीम ﷺ से अर्ज किया गया : अगर आप अब्दुल्लाह बिन अबी [रईस उल मुनाफिकीन] के पास तशरीफ़ ले जाएं तो बेहतर होगा चुनांचे आप ﷺ गधे पर सवार होकर उसके पास तशरीफ़ ले गयें। कुछ मुसलमान भी आप ﷺ के साथ गयें। जिस रास्ते से आप जा रहे थे वो बहुत खराब था। जब नबी करीम ﷺ उसके पास गयें तो अब्दुल्लाह बिन अबी कहने लगा : आप ﷺ मुझसे दूर रहें ! अल्लाह की कसम, आप के गधे की बू ने मुझे बहुत अजीयत पहुंचायी है।
उनमें से एक अन्सारी [सहाबी] रजिअल्लाह अन्हु ने कहा : अल्लाह की कसम, रसूल अल्लाह ﷺ का गधा तुझसे खुशबूदार है।
अब्दुल्लाह [मुनाफिक] की तरफ से उसकी कौम का एक शख्स इन सहाबी की इस बात पर गुस्सा हो गया और दोनों ने एक दूसरे को बुरा भला कहा और इस तरह हर एक की तरफ से उनके साथी झगड़ने लगे और इनके दरमियान डंडों, हाथों और जूतों से मारपीट शुरू हो गयी।
हमें मालूम हुआ है कि यह आयत उसी मौके पर नाजिल हुआ था कि-
وَ اِنۡ طَآئِفَتٰنِ مِنَ الۡمُؤۡمِنِیۡنَ اقۡتَتَلُوۡا فَاَصۡلِحُوۡا بَیۡنَہُمَا..
‘अगर मोमिनीन के दो गिरोह आपस में लड़ें तो उनके दरमियान सुलह करा दो’।.
बुखारी में सफा 131 पर रकम 2691 देखें 👇
https://archive.org/details/SahihBukhariUrduAllVolumes1-6-HafizAbdusSattarAlHammad-DAR-US-SALAMPUBLICATIONS/Sahih_Bukhari-Urdu-Hafiz_Abdus_Sattar_al-Hammad-pdf_Jild_3/page/n134/mode/1up?view=theater
👆 बुखारी शरीफ की इस हदीस के मुताबिक सूरह हुजरात की आयत नंबर 9 में ‘मोमिनीन के दो गिरोह ‘ से मुराद मुहम्मद मुस्तफा ﷺ का एक गिरोह और दूसरा अब्दुल्लाह बिन अबी मुनाफिक का गिरोह है।
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पता चला कि हदीस ए सुलह इमाम हसन से माविया की कोई फजीलत साबित नहीं होता और ना ही माविया के मुनाफिक ना होने पर यह बुखारी की हदीस नंबर 2704 दलील बन सकता है।
नबी करीम ﷺ की जिंदगी में जिसने भी कलमा पढ़ लिया और नबी करीम सल्ल० को देख लिया उसे सहाबी और मुसलमान कहा जाता है और बुखारी के रकम 2704 में माविया के लिए और रकम 2691 में अब्दुल्लाह बिन अबी के लिए लफ्ज़ मुसलमान इसलिए इस्तेमाल हुआ है कि वो लोग जाहिरी तौर पर कलमा पढ़ते थे.. लेकिन इनके कारनामें हकीकी मुसलमान से बिल्कुल उल्टा और मुनाफिकों की तरह था।
मिशाल के तौर पर हमारे तीन औलादें हैं लेकिन जब तक यह ना बताऊं कि कितने बेटें हैं और कितनी बेटियां- तब तक किसी को नहीं मालूम- क्योंकि लफ्ज़ औलाद में लड़का और लड़की दोनों शामिल हैं, सिर्फ लड़के के लिए भी औलाद और सिर्फ लड़कियों के लिए भी औलाद कह सकते हैं इसी तरह लफ्ज़ सहाबा या मुसलमान में मुनाफिक और मोमिन- दोनों शामिल हैं।
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सुलह इमाम हसन क्यों और कैसे हुआ 👇🏻👇🏻👇🏻
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अहकामुल कु़ुरान
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सुलह इमाम हसन अलैहिस्सलाम से मुतल्लिक़ पिछली पोस्ट
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गुनियातुत तालिबीन में आई मुआविया कि फजीलत का जवाब 👇🏻👇🏻👇🏻
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