कर्बला के 40वें हिलाल इब्ने नाफेअ-अल-जबली

कर्बला के 40वें हिलाल इब्ने नाफेअ-अल-जबली

आप बड़े दीनदार शरीफ और बहादुर थे। आप की परवरिश हज़रत अली अलै० ने की थी। आप तीरअंदाज़ी में अपना नज़ीर न रखते थे, आप की आदत थी तीरों पर अपना नाम लिखवा लिया करते थे।

आपको आले मोहम्मद (स०) की खिदमत का बड़ा शौक था। शबे आशूर का मशहूर वाआ है कि इमाम हुसैन अलै० माका-ए-जंग देखने के लिये निकले थे, तो हिलाल ने आप को हमराही इख्तयार की थी। इमाम हुसैन अलै० ने मौकऐ जग के सिलासले में आप से मशविरा भी लिया था। आप के बारे में ओलमा ने लिखा है। “काना हाज़मन बसीरन विल सियासतः”। कि आप बहुत ही समझदार और सियासतदाँ थे। सुबह आशूर जव आप मैदाने जंग में जाने के लिये निकले तो आप की ज़ोज़ा ने मुज़ाहेमत की। आप ने कहा फर्ज़न्दे रसूल की खिदमत दुनिया व मा फोहा स बेहतर है।

मैदाने जग में पहुँचने के वाद आपने एसे हमले किये कि जिन्होंने बड़े-बड़े बहादुरो को फना के घाट उतार दिया। आप के तरकश में अस्सी तीर थे जिस से सत्तर दुश्मनों को कत्ल किया तीरों के ख़त्म हो जाने के बाद आप ने तलवार निकाली और ज़बरदस्त हमला करके तेंरह दुश्मनों को कत्ल कर दिया।

जब शिम्र ने देखा कि हिलाल काबू में नही आते तो चारो तरफ से हमला कर दिया यहाँ तक कि आपके बाजू शिकस्ता हो गये और आप गिरफ्तार करके शहीद कर दिये गये।

कर्बला के 41वें शहीद हज़रते सईद इब्ने अब्दुल्लाह अल-हनफी

कर्बला के 41वें शहीद हज़रते सईद इब्ने अब्दुल्लाह अल-हनफी

आप कूफ़े के नामी गिरामी शियों में से थे। इबादत गुज़ारी में मुमताज़ और बहादुरों में नामवर थे। माविया के मरने के बाद अहले कूफा ने जो मोतमदीन के हमराह खुतूत इरसाल किये थे उन मोतमिद लोगो में जनाबे सईद भी थे इमाम हुसैन अलै० ने आख़री ख़त का जवाब जो इरसाल फरमाया था जिस में जनाबे मुस्लिम की रवानगी का हवाला था वो इन्हीं सईद के ज़रिये से था।

मुस्लिम इब्ने अकील के पहुँचने के बाद जिन लोगो ने हिमायती खुतबे पढ़े उनमें तीसरा नम्बर सईद का था। मुस्लिम इब्ने अकील की तरफ से इमाम हुसैन अ० की ख़िदमत में यही सईद ख़त लेकर गये थे और वहा पहुँच कर फिर इस ख़्याल से वापिस नही आये कि इमाम हुसैन अलै० के हमराह कूफ़े पहुँचेगे।

सुवह आशूर आपने जंग की और ज़ोहर के वक़्त की अज़ीम जंग में आपने कारे नुमाया किये ऐन जंग में नमाज़े ज़ोहर जमात के साथ पढ़ने में आपने बड़ी दिलेरी का सबूत दिया।

हालते नमाज़ में जब दुश्मनों ने इमाम हुसैन अ० पर जब तीर बरसाने शुरू किये तो जनाबे सईद इमामे हुसैन अलै० के सामने आकर खड़े हो गये और तीरो को अपने चेहरे, अपनी गरदन, अपने सीने और अपने पहलुओ पर रोकने लगे और इमाम हुसैन अलै० तक तीर पहुँचने नही दिया और इसी तरह तीर रोकते-रोकते शहीद हो गए इमाम हुसैन अलै० आप की शहादत से बहुत मुतास्सिर हुये।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 42वें शहीद हज़रते अब्दुर्र रहमान इब्ने अब्दुलमजनी

कर्बला के 42वें शहीद हज़रते अब्दुर्र रहमान इब्ने अब्दुलमजनी

आप निहायत शरीफ और आले मोहम्मद के चाहने वाले थे यौंमे आशूरा इमाम हुसैन अलै० से इज़्ने जंग हासिल करके मैदाने जंग में बरामद हुए। आप ने रजज़ पढ़ा और दुश्मनों पर जबरदस्त हमला किया वहुत से दुश्मनों को कत्ल करके खुद भी शहीद हो गये।

कर्बला के 43वें शहीद हज़रते नाफेअ इने हिलाल-अल-जमली

कर्बला के 43वें शहीद हज़रते नाफेअ इने हिलाल-अल-जमली

आप का पूरा नाम नाऊ इब्ने हिलाल इले नाअ इब्ने हमल इब्ने सअद अल-अशीरा इब्ने मदहज अल-जमली था। आप बुजुर्गे कौम और शरीफुफ्स थे। मिल्लत की सरदारी और रियासत आप की खानदानी विरासत थी। आप बहादुर, कारी-ऐ-कुरआन, रावी-ऐ-हदीस और मुंशी-ए-कामिल थे आप को हज़रत अली अलै० के असहाब में भी होने का शरफ हासिल था आप ने जंगे जमल, सिफ़्फ़ीन और नहरवान में शिरकत की थी। कूड़े में जनाबे मुस्लिम इब्ने अकील की शहादत से ब्ल ही आप इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में पहुँच गये थे। लश्करे हुर्र से मुलाकात के बाद सय्यदुश शोहदा ने जिस खुतबे में ये फमाया था कि तुम लोग चले जाओ यह लोग सिर्फ मेरा खून बहाना चाहते है। इस का जवाब असहाब में जुहैर ने सबसे पहले दिया था उन के बाद नाफेअ इब्ने हिलाल ने ही एक तवील तक़रीर में जॉनिसारी का यकीन दिलाया था।

करबला में पानी बन्द हो जाने के बाद हुसूले आब में आपने भी काफी जद्दो-जेहद की थी। एक दो बार हज़रते अब्बास अलै० के साथ भी सई-ए-आब में गये थे। आपने अपने तमाम तीर ज़हर में बुझाऐ हुये थे बारहाँ दुश्मनों को तीर से मार कर तलवार से हमला करने लगे और बेशुमार दुश्मनों को ज़ख़्मी कर दिया बिल आख़िर शिम्र ने आप को शहीद कर दिया।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 44वें शहीद हज़रते उमर इब्ने क़रज़ा अल-अन्सारी

कर्बला के 44वें शहीद हज़रते उमर इब्ने क़रज़ा अल-अन्सारी

आप का पूरा नाम और नसब ये है :- ‘उमर इब्ने करज़ा इब्ने कअब इब्ने उमर इब्ने आएज़ ज़ैद इब्ने मनात इब्ने सलबा इब्ने कअब इब्ने अल-ख़ज़रज अल अनसारी अल कूफी अल ख़जरजी कूफ़ी था।

आप के वालिदे माजिद जनाब करज़ा अनसारी रसूल स० के सहाबी थे आप से ऑ हज़रत की बहुत सी हदीसे हैं। ऑ हज़रत के बाद आपको हज़रत अली अ० के सहाबी होने का शरफ हासिल हुआ। आप मदीने मुनव्वर से कूफ़े आकर मुकीम हुऐ और जंगे जमल-ओ-सिफ्फीन और नहरवान में आप ने हज़रत की बैअत में जंग की आपको अमीरूल मोमिनीन ने फारस का हाकिम बना दिया था। सन 51 हिजरी में आपकी वफात हुई कूफ़े में सबसे पहले हज़रत अली अ० के बाद आप का नौहा पढा गया। करज़ा ने कई औलादे छोड़ीं जिस में सब से ज़्यादा मशहूर उमर इब्ने करज़ा थे।

जनाबे उमर इब्ने करज़ा ने रास्तों की बन्दिश से पहले इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में ब-मकाम करबला अपने को पहुँचा दिया था। आप करबला में उमरे सअद के पास पैग़ामात पहुँचाया करते थे।

आप इमाम हुसैन अलै० से इजाज़त लेकर यौमे आशूरा मैदाने जंग में आये और आप ने रजज़ पढ़ कर ज़बरदस्त हमला किया और काफी ज़ख़्मी होकर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ जब इमाम हुसैन अलै० पर दुश्मनों ने हमला कर दिया तो आप तीरो को सीने पर लेने लगे यहाँ तक कि शहीद हो गये। (ज़िक्र-अल-अब्बास सफहा न०२२३)

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम