
ग़ज़वा ख़ैबर और ग़ज़वा वादिल कुरा मुहर्रम सन् 07 हि०
ख़ैबर, मदीना के उत्तर में एक सौ सत्तर किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ा शहर था, यहां क़िले भी थे और खेतियां भी। अब यह एक बस्ती रह गई है। इसकी जलवायु कुछ अस्वास्थ्यकर है।
लड़ाई की वजह
जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हुदैबिया समझौते के नतीजे में अहज़ाब की लड़ाई के तीन बाजुओं में से सबसे मज़बूत बाज़ू (कुरैश) की ओर से पूरी तरह सन्तुष्ट और सुरक्षित हो गए, तो आपने चाहा कि बाक़ी दो बाज़ुओं-यहूदी और नज्द के क़बीलों-से भी हिसाब-किताब चुका लें, ताकि हर ओर से पूरी तरह अम्न और सलामती हासिल हो जाए और पूरे इलाक़े में सुकून का दौर दौरा हो और मुसलमान एक लगातार खूनी संघर्ष से निजात पाकर अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाने और उसकी दावत देने से फ़ारिग़ हो जाएं।
चूंकि खैबर षड्यंत्रों का गढ़, फ़ौजी भड़काव का केन्द्र और लड़ाने भिड़ाने और लड़ाई की आग लगाने की खान था, इसलिए सबसे पहले यही स्थान मुसलमानों की तवज्जोह का हक़दार था।
रहा यह सवाल कि ख़ैबर सच में ऐसा था या नहीं, तो इस सिलसिले में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे ख़ैबर वाले ही थे जो खंदक़ की लड़ाई में मुश्रिकों के तमाम गिरोहों को मुसलमानों पर चढ़ा लाए थे। फिर यही थे जिन्होंने बनू कुरैज़ा को विद्रोह करने पर तैयार किया था, साथ ही यही थे जिन्होंने इस्लामी समाज के पांचवें कालम मुनाफ़िक़ों से और अहज़ाब की लड़ाई के तीसरे बाज़ू — बनू ग़त्फ़ान और बहुओं से बराबर सम्पर्क बनाए रखा था और खुद भी लड़ाई की तैयारियां कर रहे थे और अपनी इन कार्रवाइयों के ज़रिए मुसलमानों को आज़माइशों में डाल रखा था, यहां तक कि नबी सल्ल० को भी शहीद करने का प्रोग्राम बना लिया था और इन हालात से मजबूर होकर मुसलमानों को बार-बार फ़ौजी मुहिमें भेजनी पड़ी थीं, और इन चालों और षड्यंत्रों के कर्ता-धर्ता जैसे सलाम बिन अबिल हुक्रैक़ और असीर बिन ज़ारिम का सफाया करना पड़ा था, लेकिन इन यहूदियों के ताल्लुक़ से मुसलमानों का दायित्व सच में इससे भी कहीं बड़ा था, अलबत्ता मुसलमानों ने इस दायित्व के निभाने में कुछ देर इसलिए
की थी कि अभी एक ताक़त यानी कुरैश— जो इन यहूदियों से ज़्यादा बड़े ताकतवर, योद्धा और सरकश थे, मुसलमानों के मुक़ाबले में थे, इसलिए मुसलमान उसे नज़रअंदाज़ करके यहूदियों का रुख नहीं कर सकते थे, लेकिन ज्यों ही कुरैश के साथ इस मोर्चाबन्दी का अन्त हुआ, इन अपराधी यहूदियों से निबटने के लिए फ्रिज़ा साफ़ हो गई और उनके हिसाब का दिन क़रीब आ गया।
ख़ैबर को रवानगी
इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने हुदैबिया से वापस आकर जुलहिज्जा का पूरा महीना और मुहर्रम के कुछ दिन मदीने में क्रियाम फ़रमाया। फिर मुहर्रम के बाक़ी दिनों में ख़ैबर के लिए रवाना हो गए।
टीकाकारों का कहना है कि ख़ैबर अल्लाह का वायदा था, जो उसने अपने इर्शाद के ज़रिए फ़रमाया था-
‘अल्लाह ने तुमसे बहुत से माले ग़नीमत का वायदा किया है, जिसे तुम करोगे, तो उसको तुम्हारे लिए फ़ौरी तौर पर अता कर दिया।’ हासिल (48, 20)
इससे तात्पर्य हुदैबिया समझौता है और बहुत से माले ग़नीमत से मुराद ख़ैबर है।
इस्लामी फ़ौज की तायदाद
चूंकि मुनाफ़िक़ और कमज़ोर ईमान के लोग हुदैबिया के सफ़र में अल्लाह के रसूल सल्ल० का साथ अपनाने के बजाए अपने घरों में बैठे रहे थे, इसलिए अल्लाह ने अपने नबी सल्ल० को इनके बारे में हुक्म देते हुए फ़रमाया-
‘जब तुम ग़नीमत के माल हासिल करने के लिए जाने लगोगे, तो ये पीछे छोड़े गए लोग कहेंगे कि हमें भी अपने साथ चलने दो। ये चाहते हैं कि अल्लाह की बात बदल दें। इनसे कह देना कि तुम हरगिज़ हमारे साथ नहीं चल सकते । अल्लाह ने पहले ही से यह बात कह दी है, (इस पर) ये लोग कहेंगे कि (नहीं), लोग हमसे जलन करते हो। (हालांकि सच तो यह है) कि ये लोग कम ही समझते हैं।’ बल्कि तुम (48-15)
चुनांचे जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर जाने का इरादा फ़रमाया, तो एलान फ़रमा दिया कि आपके साथ सिर्फ़ वही आदमी रवाना हो सकता है, जिसे अल्लाह की क़सम, जिहाद का चाव और ख्वाहिश है। इस एलान के नतीजे में आपके साथ सिर्फ़ वही लोग जा सके, जिन्होंने हुदैबिया में पेड़ के नीचे बैअते रिज़वान की थी और उनकी तायदाद सिर्फ़ चौदह सौ थी।
इस ग़ज़वे के दौरान मदीना का इन्तिज़ाम हज़रत सबाअ बिन अरफ्रता ग़िफ़ारी को और इब्ने इस्हाक़ के मुताबिक़ नुमैता बिन अब्दुल्लाह लैसी को सौंपा गया था। शोधकर्ताओं के नज़दीक पहली बात ज़्यादा सही है।’
इसी मौक़े पर हज़रत अबू हुरैरह रजि० भी मुसलमान होकर मदीना तशरीफ़ लाए थे। उस वक़्त हज़रत सबाअ बिन अरफ़ता फज्र की नमाज़ पढ़ा रहे थे। नमाज़ से फ़ारिग़ हुए तो हज़रत अबू हुरैरह उनकी खिदमत में पहुंचे। उन्होंने रास्ते का खाना दे दिया और हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िरी के लिए ख़ैबर की ओर चल पड़े। जब नबी सल्ल० की खिदमत में पहुंचे (तो ख़ैबर जीता जा चुका था) अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मुसलमानों से बातें करके हज़रत अबू हुरैरह और उनके साथियों को भी ग़नीमत के माल में शरीक कर लिया।
यहूदियों के लिए मुनाफ़िक़ों की सरगर्मियां
इस मौक़े पर यहूदियों की हिमायत में मुनाफ़िक़ों ने भी अच्छी-भली कोशिशें की, चुनांचे मुनाफ़िक़ों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई ने ख़ैबर के यहूदियों को यह पैग़ाम भेजा कि अब मुहम्मद ने तुम्हारा रुख किया है, इसलिए चौकन्ना हो जाओ, तैयारी कर लो और देखो, डरना नहीं, क्योंकि तुम्हारी तायदाद और तुम्हारा सामान ज़्यादा है और मुहम्मद के साथी बहुत थोड़े और बे-समान हैं और उनके पास हथियार भी बस थोड़े ही से हैं।
जब ख़ैबर वालों को इसका पता चला तो उन्होंने कनाना बिन अबी हुक़ैक़ और होज़ा बिन क़ैस को मदद हासिल करने के लिए बनू ग़तफ़ान के पास रवाना किया, क्योंकि वे ख़ैबर के यहूदियों के मित्र और मुसलमानों के खिलाफ़ उनके मददगार थे। यहूदियों ने इतना बढ़कर कहा कि अगर उन्हें मुसलमानों पर ग़लबा हासिल हो गया तो ख़बर की आधी पैदावार उन्हें दे दी जाएगी।
ख़ैबर का रास्ता
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर जाते हुए इस्र पहाड़ को पार किया। फिर सबा की घाटी से गुज़रे। इसके बाद एक और घाटी में पहुंचे, जिसका नाम रजीअ है (मगर वह यह रजीअ नहीं है, जहां अज़्ल व क़ारा की ग़द्दारी से बनू लह्यान के हाथों आठ सहाबा किराम की शहादत और हज़रत ज़ैद व खुबैब रज़ि० की गिरफ़्तारी और फिर मक्का में शहादत की घटना घटी ।)
रजीअ से बनू ग़तफ़ान की आबादी सिर्फ़ एक दिन और एक रात की दूरी पर
1. देखिए फ्रत्हुल बारी 7/465, ज़ादुल मआद 2/133
स्थित थी और बनू ग़तफ़ान ने तैयार होकर यहूदियों की मदद के लिए ख़ैबर का रास्ता ले लिया था, लेकिन रास्ते ही में उन्हें अपने पीछे एक शोर-शराबा सुनाई दिया, तो उन्होंने समझा कि मुसलमानों ने उनके बाल-बच्चों और मवेशियों पर हमला कर दिया है, इसलिए वे वापस पलट गए और ख़ैबर को मुसलमानों के लिए आज़ाद छोड़ दिया।
इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रास्ते के उन दोनों माहिरों को बुलाया जो फ़ौज को रास्ता बताने पर लगे थे, उनमें से एक का नाम हुसैल था। इन दोनों से आपने ऐसा उचित रास्ता मालूम करना चाहा जिसे अपना करके ख़ैबर में उत्तर की ओर से यानी मदीना के बजाए शाम की ओर से दाखिल हो सकें, ताकि इस रणनीति के ज़रिए एक ओर तो यहूदियों को शाम भागने का रास्ता बन्द कर दें और दूसरी ओर बनू ग़तफ़ान और यहूदियों के बीच रोक बनकर उनकी ओर से किसी मदद के पहुंचने की संभावना ख़त्म कर दें।
एक रहनुमा ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैं आपको ऐसे ही रास्ते ले चलूंगा। चुनांचे वह आगे-आगे चला। एक जगह पर पहुंचकर जहां कई रास्ते फूटते थे, अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल ! इन सब रास्तों से आप मंज़िल तक पहुंच सकते हैं।
आपने फ़रमाया कि वह हर एक का नाम बताए।
उसने बताया कि एक का नाम हज़न (सख्त और खुरदरा) है, आपने उस पर चलना मंजूर न किया ।
उसने बताया, दूसरे का नाम शाश (बेचैनी वाला) है। आपने उसे भी मंजूर न किया।
उसने बताया, तीसरे का नाम हातिब (लकड़हारा है। आपने उस पर भी चलने से इंकार कर दिया।
हुसैल ने कहा, अब एक ही रास्ता बाक़ी रह गया है।
हज़रत उमर ने फ़रमाया, उसका नाम क्या है ?
हुसैल ने कहा, मरहब ! नबी सल्ल० ने उसी पर चलना पसन्द फ़रमाया ।
रास्ते की कुछ घटनाएं
1. हज़रत सलमा बिन अकवअ रजि० का बयान है कि हम लोग नबी सल्ल० के साथ ख़ैबर रवाना हुए। रात में सफ़र तै हो रहा था। एक आदमी ने आमिर से कहा था, ऐ आमिर ! क्यों न हमें अपनी अनोखी बातें सुनाओ ।
आमिर कवि थे, सवारी से उतरे और क़ौम की खूबियां गा-गाकर बयान
ऐ अल्लाह ! अगर तू न होता, तो हम हिदायत न पाते, न सदक़ा करते, न नमाज़ पढ़ते, हम तुझ पर कुरबान! तू हमें बख्श दे, जब तक हम तक़्वा (ईशभय, संयम) अपनाएं। और अगर हम टकराएं तो हमारे क़दमों को जमाए रख और हम पर शान्ति उतार। जब हमें ललकारा जाता है, तो हम अकड़ जाते हैं और ललकार में हम पर लोगों ने भरोसा किया है।’
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, यह कौन गीतकार है ?
लोगों ने कहा, आमिर बिन अकवअ ।
आपने फ़रमाया, अल्लाह उस पर दया करे ।
क़ौम के एक आदमी ने कहा, अब तो (उनकी शहादत) वाजिब हो गई। आपने उनके वजूद का हमें पता क्यों न दिया ?1
सहाबा किराम को मालूम था कि (लड़ाई के मौक़े पर) अल्लाह के रसूल सल्ल० किसी इंसान के लिए खास तौर से मरिफ़रत की दुआ करें, तो वह शहीद हो जाता है। और यही घटना ख़ैबर की लड़ाई में (हज़रत आमिर के साथ) घटी, इसीलिए उन्होंने अर्ज़ किया था कि क्यों न उनके लिए उम्र लम्बी होने की दुआ की गई उनके वजूद से हम कुछ और फ़ायदा उठाते ।
2. खैबर के बिल्कुल क़रीब सबा घाटी में आपने अस्र की नमाज़ पढ़ी, फिर रास्ते में खाने के सामान मंगवाए, तो सिर्फ़ सत्तू लाया गया और उसे आपके हुक्म से साना गया, फिर आपने खाया और सहाबा रज़ि० ने भी खाया। इसके बाद आप मरिब के लिए उठे, तो सिर्फ़ कुल्ली की। सहाबा ने भी कुल्ली की, फिर आपने नमाज़ पढ़ी और वुज़ू नहीं फ़रमाया। (पिछले वुज़ू को ही काफ़ी समझा) फिर आपने इशा की नमाज़ अदा फ़रमाई 14

