अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 87 मक्का की विजय पार्ट 04

काबा की छत पर बिलाल रज़ि० की अज़ान

अब नमाज़ का वक़्त हो चुका था। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत बिलाल रजि० को हुक्म दिया कि काबे पर चढ़कर अज्ञान कहें। उस वक़्त अबू सुफ़ियान बिन हर्ब, अत्ताब बिन असीद और हारिस बिन हिशाम काबा के सेहन में बैठे थे। अत्ताब ने कहा, अल्लाह ने असीद को यह शरफ़ दिया कि उन्होंने यह (अज्ञान) न सुनी, वरना उन्हें एक नागवार चीज़ सुननी पड़ती।

इस पर हारिस ने कहा, सुनो, अल्लाह की क़सम ! अगर मुझे मालूम हो जाए कि वह हक़ पर हैं, तो मैं उनका पैरोकार बन जाऊंगा।

इस पर अबू सुफ़ियान ने कहा, देखो, अल्लाह की क़सम ! मैं कुछ नहीं कहूंगा, क्योंकि अगर मैं बोलूंगा तो ये कंकरियां भी मेरे बारे में ख़बर दे देंगी।

इसके बाद नबी सल्ल० भी उनके पास तशरीफ़ ले गए और फ़रमाया, अभी तुम लोगों ने जो बातें की हैं, वे मुझे मालूम हो चुकी हैं। फिर आपने उनकी बातें दोहरा दीं। इस पर हारिस और अत्ताब बोल उठे, हम गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं । खुदा की क़सम ! कोई व्यक्ति हमारे साथ था ही नहीं कि हमारी इस बातचीत को वह जानता और हम कहते कि उसने आपको ख़बर दी होगी।

विजय या शुक्राने की नमाज़

उसी दिन अल्लाह के रसूल सल्ल० उम्मे हानी बिन्त अबी तालिब के घर तशरीफ़ ले गए। वहां स्नान किया और उनके घर ही में आठ रक्अत नमाज़ पढ़ी। यह चाश्त का वक़्त था, इसलिए किसी ने इसे चाश्त की नमाज़ समझा और किसी ने विजय की नमाज़ ।

उम्मे हानी ने अपने दो देवरों को पनाह दे रखी थी। आपने फ़रमाया, ऐ उम्मे हानी ! जिसे तुमने पनाह दी, उसे हमने भी पनाह दी। इस इर्शाद की वजह यह थी कि उम्मे हानी के भाई हज़रत अली बिन अबी तालिब उन दोनों को क़त्ल करना चाहते थे। इसलिए उम्मे हानी ने उन दोनों को छिपाकर घर का दरवाज़ा बन्द कर रखा था। जब नबी सल्ल० तशरीफ़ ले गए तो उनके बारे में पूछा और ऊपर के जवाब से खुश हुईं।

महान अपराधियों को माफ़ी नहीं

मक्का-विजय के दिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने महान अपराधियों में से नौ आदमियों को माफ़ न करते हुए हुक्म दिया कि अगर
वे काबे के परदे के नीचे भी पाए जाएं, तो उन्हें क़त्ल कर दिया जाए। उनके नाम ये हैं-

1. अब्दुल उज़्ज़ा बिन खतल, 2. अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी सर्ह, 3. इक्रिमा बिन अबी जहल 4. हारिस बिन नुफ़ैल बिन वहब, 5. मुक़ीस बिन सबाबा, 6. हब्बार बिन अस्वद, 7-8. इब्ने खतल की दो लौडियां, जो नबी सल्ल० की बुराई के गीत गाती और गालियां देती थीं, 9. सारा, जो अब्दुल मुत्तलिब की औलाद में से किसी की लौंडी थी। उसी के पास हातिब का ख़त पाया गया था।

इब्ने अबी सर्ह का मामला यह हुआ कि उसे हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ि० ने नबी सल्ल० की खिदमत में ले जाकर जान बख्शी की सिफ़ारिश कर दी और आपने उसकी जान बख्शी फ़रमाते हुए उसका इस्लाम कुबूल कर लिया, लेकिन इससे पहले आप कुछ देर तक इस उम्मीद में खामोश रहे कि कोई सहाबी उसे उठाकर क़त्ल कर देंगे, क्योंकि यह व्यक्ति इससे पहले भी एक बार इस्लाम कुबूल कर चुका था और हिजरत करके मदीना आया था, लेकिन इस्लाम से विमुख होकर भाग गया था, (फिर भी उसके बाद का चरित्र उनके बेहतर इस्लाम को पेश करता है। रज़ियल्लाहु अन्हु)

इक्रिमा बिन अबी जहल ने भागकर यमन की राह ली, लेकिन उनकी बीवी ने नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर उसके लिए अमान तलब कर ली और आपने अमान दे दी। इसके बाद वह इक्रिमा के पीछे गईं और उसे साथ ले आईं। उसने वापस आकर इस्लाम कुबूल किया और उनके इस्लाम की स्थिति बहुत अच्छी रही।

इब्ने खतल खाना काबा को पकड़कर लटका हुआ था। एक सहाबी ने नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर इसकी ख़बर दी। आपने फ़रमाया, उसे क़त्ल कर दो। उन्होंने उसे क़त्ल कर दिया।

मुक़ीस बिन सबाबा को हज़रत नुमैला बिन अब्दुल्लाह ने क़त्ल किया। मुक़ीस भी पहले मुसलमान हो चुका था, लेकिन फिर एक अंसारी को क़त्ल करके इस्लाम से फिर गया और भागकर मुश्किों के पास चला गया था।

हारिस, मक्का में रसूलुल्लाह सल्ल० को बड़ा कष्ट दिया करता था। उसे हज़रत अली रज़ि० ने क़त्ल किया।

हब्बार बिन अस्वद वही व्यक्ति है जिसने अल्लाह के रसूल सल्ल० की सुपुत्री हज़रत ज़ैनब को उनकी हिजरत के मौक़े पर ऐसा कचूका मारा था कि वह हौदज से एक चट्टान पर जा गिरी थीं और इसकी वजह से उनका हमल (गर्भ)

गिर गया था। यह व्यक्ति मक्का- विजय के दिन निकल भागा, फिर मुसलमान हो गया और उसके इस्लाम की हालत अच्छी रही।

इब्ने खतल की दोनों लौडियों में से एक क़त्ल की गई। दूसरी के लिए अमान तलब की गई और वह भी मुसलमान हो गई। (सार यह कि नौ में से चार क़त्ल किए गए, पांच की जान बख्शी हुई और उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया ।)

हाफ़िज़ इब्ने हजर लिखते हैं, जिन लोगों को माफ़ नहीं किया गया, उनमें से अबू माशर ने हारिस बिन तलाल खुज़ाई का भी जिक्र किया है। उसे हज़रत अली रज़ि० ने क़त्ल किया।

इमाम हाकिम ने इसी सूची में काब बिन जुहैर का उल्लेख किया है। काब की घटना मशहूर है। उसने बाद में आकर इस्लाम अपनाया और नबी सल्ल० की प्रशंसा की। (इसी सूची में) वहशी बिन हर्ब और अबू सुफ़ियान की बीवी हिन्द बिन्त उत्बा हैं, जिन्होंने इस्लाम कुबूल किया और इब्ने ख़तब की लौंडी अरनब है, जो क़त्ल की गई और उम्मे साद है, यह भी क़त्ल की गई, जैसा कि इब्ने इस्हाक़ ने उल्लेख किया है। इस तरह मर्दों की तादाद आठ और औरतों की तायदाद छः हो जाती है। हो सकता है कि दोनों लौंडियां अरनब और उम्मे साद एक ही हों और मतभेद केवल नाम का हो या उपाधि और उपनाम की दृष्टि से मतभेद हो गया हो ।

सफ़वान बिन उमैया और फ़ज़ाला

बिन उमैर का इस्लाम कुबूल करना

सफ़वान के बारे में यद्यपि कोई बात नहीं की गई थी, लेकिन कुरैश का एक बड़ा लीडर होने की हैसियत से उसे अपनी जान का खतरा था, इसीलिए वह भी भाग गया। उमैर बिन अम्र जुमही ने रसूलुल्लाह सल्ल० की खिदमत में हाज़िर होकर उसके लिए अमान तलब की। आपने अमान दे दी और निशानी के तौर पर उमैर को अपनी वह पगड़ी दे दी जो मक्का में दाखिले के वक़्त आपने सर पर बांध रखी थी।

उमैर सफ़वान के पास पहुंचे तो वह जद्दा से यमन जाने के लिए समुद्र पर सवार होने की तैयारी कर रहा था। उमैर उसे वापस ले आए। उसने रसूलुल्लाह सल्ल० से कहा, मुझे दो महीने की मोहलत दीजिए ।

  1. फत्हुल बारी 8/11, 12

आपने फ़रमाया, तुम्हें चार महीने का अधिकार है। इसके बाद सफ़वान ने इस्लाम अपना लिया। उसकी बीवी पहले ही मुसलमान हो चुकी थी। आपने दोनों को पहले ही निकाह पर बाक़ी रखा।

फुजाला एक बहादुर आदमी था। जिस वक़्त रसूलुल्लाह सल्ल० तवाफ़ कर रहे थे, वह क़त्ल की नीयत से आपके पास आया, लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० ने बता दिया कि उसके दिल में क्या है। इस पर वह मुसलमान हो गया।

विजय के दूसरे दिन अल्लाह के रसूल सल्ल० का ख़ुत्बा

विजय के दूसरे दिन खुत्बा देने के लिए रसूलुल्लाह सल्ल० लोगों के बीच फिर खड़े हुए। आपने अल्लाह का गुणगान किया, फिर फ़रमाया, लोगो ! अल्लाह ने जिस दिन आसमान व ज़मीन को पैदा किया, उसी दिन मक्का को हराम (हुर्मत वाला) शहर ठहराया। इसलिए वह अल्लाह की हुर्मत की वजह से क़ियामत तक के लिए हराम है। कोई आदमी जो अल्लाह और आखिरत पर ईमान रखता हो, उसके लिए हलाल नहीं कि उसमें खून बहाए या यहां का कोई पेड़ काटे । अगर कोई व्यक्ति इस बुनियाद पर छूट ले कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने यहां क़िताल किया, तो उससे कह दो कि अल्लाह ने अपने रसूल को इजाज़त दी थी, लेकिन तुम्हें इजाज़त नहीं दी है और मेरे लिए भी उसे सिर्फ दिन की एक घड़ी में हलाल किया गया। फिर आज उसकी हुरमत उसी तरह पलट आई, जिस तरह कल उसकी हुर्मत थी। अब चाहिए कि जो हाज़िर है वह ग़ायब को यह बात पहुंचा दे ।

एक रिवायत में इतना और है कि यहां का कांटा न काटा जाए, शिकार न भगाया जाए और गिरी-पड़ी चीज़ न उठाई जाए, अलबत्ता वह आदमी उठा सकता है जो उसका परिचय कराए और यहां की घास न उखाड़ी जाए।

हज़रत अब्बास रज़ि०ने कहा, ऐ अल्लाह के सूल सल्ल० ! मगर इज़खर, (अरब की मशहूर घास, जो मूज जैसी होती है और चाय और दवा के तौर पर इस्तेमाल होती है) क्योंकि यह लोहार और घर की (ज़रूरतों की) चीज़ है ।

आपने फ़रमाया, मगर इज़खर ।

बनू खुज़ाआ ने उस दिन बनू लैस के एक आदमी को क़त्ल कर दिया, .क्योंकि बनू लैस के हाथों उनका एक आदमी जाहिलियत में मारा गया था। रसूलुल्लाह सल्ल० ने इस बारे में फ़रमाया, खुज़ाआ के लोगो ! अपना हाथ क़त्ल से रोक लो, क्योंकि क़त्ल अगर फ़ायदेमंद होता, तो बहुत क़त्ल हो चुका। तुमने एक ऐसा आदमी क़त्ल किया है कि मैं उसकी दियत ज़रूर ही अदा करूंगा।
फिर मेरे इस स्थान के बाद अगर किसी ने किसी को क़त्ल किया तो क़त्ल किए गए व्यक्ति के वलियों (अभिभावकों) को दो बातों का अख्तियार होगा, चाहें तो क़ातिल का खून बहाएं और चाहें तो उससे दियत लें।

एक रिवायत में है कि इसके बाद यमन के एक आदमी ने, जिसका नाम अबू शाह था, उठकर अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल ! (इसे) मेरे लिए लिखवा दीजिए।

आपने फ़रमाया, अबू शाह के लिए लिख दो ।’

अंसार के अंदेशे

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० मक्का विजय पूरी कर चुके—और मालूम है कि यही आपका शहर, आपका जन्म स्थान और वतन था—तो अंसार ने आपस में कहा, क्या ख्याल है अब अल्लाह ने रसूल सल्ल० को आपकी अपनी धरती और आपका अपना शहर जिता दिया है, तो आप यही ठहरेंगे ? उस वक़्त आप सफ़ा पर हाथ उठाए दुआ फ़रमा रहे थे।

दुआ से फ़ारिग़ हुए तो मालूम किया, तुम लोगों ने क्या बात की है ?

उन्होंने कहा, कुछ नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मगर आपने आग्रह किया तो अन्त में उन लोगों ने बतला दिया ।

आपने फ़रमाया, ख़ुदा की पनाह, अब ज़िंदगी और मौत तुम्हारे साथ है।


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