
शैख़ कपूर मज़ज़ूब : ग्वालियर के यूनुस एमरे
सूफ़ी परंपरा में ख़िदमत को केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि आत्मिक साधना का एक महत्वपूर्ण रूप माना गया है। किसी प्यासे को पानी पिलाना इस्लामी और सूफ़ियाना संस्कृति में विशेष पुण्य का कार्य माना गया है। इसी संदर्भ में शैख़ कपूर मज़ज़ूब ग्वालियरी और यूनुस एमरे की जीवन-कथाओं के बीच एक अत्यंत रोचक समानता दिखाई देती है। दोनों की कथाओं में एक साधारण-सी सेवा-लोगों तक पानी पहुँचाना और उनकी प्यास बुझाना-आगे चलकर एक गहरी रूहानी यात्रा से जुड़ जाती है।
यूनुस एमरे के विषय में भी ऐसी ही कुछ मिलती जुलती कहानी मिलती है। वह शहर के क़ाज़ी नियुक्त हुए थे लेकिन जब अपने मुर्शिद के संपर्क में आए तो उन्हें शहर के लोगों को पानी पिलाने का काम सौंपा गया।
शैख़ कपूर मज़ज़ूब एक हुसैनी सैयद थे। युवावस्था में उन्होंने सैनिक सेवा को अपना पेशा बनाया, लेकिन अचानक उस पेशे को छोड़ दिया और सक़्क़ा, अर्थात् पानी पहुँचाने वाले का काम अपना लिया।
उनका यह नया जीवन अत्यंत साधारण, लेकिन गहरी मानवीय संवेदना से भरा हुआ था। वह रात के समय पवित्र और एकांत जीवन बिताने वाली विधवाओं के घरों तक पानी पहुँचाते थे और लोगों को बिना किसी मेहनताने के पानी पिलाते थे।
इस सेवा में न कोई प्रतिष्ठा थी, न आर्थिक लाभ और न ही किसी पद की आकांक्षा। वह बस लोगों की आवश्यकता पूरी करते थे।
फिर उनके जीवन में एक गहरा रूहानी परिवर्तन आया। ईश्वर की ओर से ऐसी जज़्ब की कैफ़ियत उन पर तारी हुई कि उन्होंने रोज़गार और सांसारिक काम-काज पूरी तरह छोड़ दिया। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत इच्छा को मानो त्याग दिया और सामान्य बातचीत से भी विरत हो गए। उनका जीवन धीरे-धीरे पूरी तरह ईश्वर की याद और उसके प्रति गहरी तड़प में बदल गया।
बाबा कपूर ने ग्वालियर के निचले बाज़ार में एक मकान को अपना निवास बनाया और अधिकांश समय ध्यान तथा रूहानी कैफ़ियत में बिताने लगे। उनके बारे में रिवायत है कि वह रात का अधिकांश समय खड़े होकर बिताते—कभी रोते, कभी हँसते और कभी ऐसी अवस्था में चले जाते मानो ईश्वर से सीधी बात कर रहे हों।
उनकी इस अवस्था को सूफ़ी परंपरा में जज़्ब और मज़्ज़ूबियत से जोड़कर देखा गया है। इस कैफ़ियत को व्यक्त करने के लिए उनके संबंध में एक शेर भी मिलता है जिस का भावार्थ है –
तेरी गली से गुज़रा तो कमज़ोरी में हाथ दीवार पर रखता हुआ चला,
तू अपने जल्वे के साथ आया और मैं दीवार की तस्वीर की तरह ठहर गया।
ग्वालियर के निचले बाज़ार में उन्होंने एक मकान को अपना निवास बना लिया था और अपना अधिकांश समय वहीं बिताते थे। वह अक्सर सिर झुकाए हुए गहरी ध्यानावस्था में बैठे रहते। उनके पास उपस्थित लोगों के मन में यदि कोई प्रश्न या उलझन पैदा होती तो वह उसका उत्तर देते। उनके उत्तर सामान्य बातचीत के ढंग से नहीं होते थे, बल्कि ऐसी विचित्र और भाव-विभोर अवस्था में होते जैसे वह किसी गहरी रूहानी कैफ़ियत में हों। फिर भी उनके उत्तर प्रश्न की जटिलता को दूर कर देते थे।
उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि वह दूर स्थानों पर घट रही घटनाओं का उल्लेख कर देते थे। उनके निकट रहने वाले लोगों के अनुसार, रात का अधिकांश समय वह खड़े होकर बिताते। कभी उनकी आँखों से आँसू बहते और कभी वह मुस्कुराने या हँसने लगते।
शैख़ कपूर मज़ज़ूब का विसाल 979 हिजरी (1571–72 ई.) में हुआ। वर्णन के अनुसार, एक रात वह अचानक “मारो, मारो!” कहते हुए अपने घर से बाहर निकले और दरवाज़े के ऊपर से गिर पड़े। इसी घटना के दौरान उन्होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा।
उनकी मृत्यु की तारीख़ के संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार शैख़ फ़ैज़ी ने “कपूर-ए-मज़ज़ूब” के शब्दों से तारीख़ निकाली थी।
सन्दर्भ –मुन्तख़ब-उत-तवारीख़


