अहले बैत से बुग्ज़ रखने वाले जहन्नुमी हैं



-: अहले बैत से बुग्ज़ रखने वाले जहन्नुमी हैं :-


हज़रत अब्दुल्ला (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया जो शख़्स आले मुहम्मद की मुहब्बत पर मरा वो शहीद मरा जो शख़्स आले मुहम्मद की मुहब्बत पर मरा वो मग़फूर मरा (यानी उसकी मग़फिरत हो गई) और जो शख़्स आले मुहम्मद की मुहब्बत पर मरा वो जन्नत में इस तरह जायेगा जिस तरह दुल्हन अपने दूल्हा के घर जाती है और जो शख़्स आले मुहम्मद की मुहब्बत पर मरा तो उसकी कब्र पर अल्लाह तआला रहमत के फरिश्तों को मुर्कार फ़रमायेगा और जो शख़्स आले मुहम्मद की मुहब्बत पर मरा वो रोज़े महशर इस तरह आयेगा कि उसकी पेशानी पर आयते रहमत लिखी होगी और जो शख़्स आले मुहम्मद के बुग्ज़ पर मरा वो जन्नत की खुश्बू भी नहीं सूंघेगा। (हुब्बे अहले बैत और ताज़ियादारी-14,15)

हज़रत अबू सईद खुदरी (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- उस शख़्स पर अल्लाह तआला का सख़्त अज़ाब होगा जो मेरे अहले बैत के बारे में मुझे तकलीफ पहुँचायेगा। (कंजुल उम्माल-12/93)

हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- अगर कोई शख़्स काबातुल्लाह के पास रूक्ने यमानी और मकामे इब्राहीम के दरमयान खड़ा होकर नमाज़ पढ़े और रोज़ा (भी) रखे फिर वो इस हाल पर मरे कि मेरे अहले बैत से बुग्ज़ रखता था तो बेशक वो जहन्नुम में जायेगा। (मुस्तदरक हाकिम-3/161) (मुअजम कबीर तबरानी-11/176) (मजमउज़्ज़वाइद-9/171)

अहले बैत से बुग्ज़ रखने के सबब इन्सान के तमाम नेक आमाल अकारत (बर्बाद) हो जाते हैं और दुनियाँ व आखिरत में उसके आमाल उसे कोई नफा न देंगे जिसने अहले बैत से बुग्ज़ रखा गोया उसने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से बुग्ज़ रखा और जिसने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से बुग्ज़ रखा गोया उसने अल्लाह तआला से बुग्ज़ रखा और ऐसा शख़्स जहन्नुम में निहायत सख़्त अज़ाब में मुब्तिला होगा और न उसकी नमाज़े उसके काम आयेंगी और न रोज़ा और न दीगर नेक आमाल बल्कि वो दाख़िले जहन्नुम होगा और जहन्नुम की दहकती हुई आग उसका दायमी ठिकाना होगी ।


हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- खुदा की कसम जिसके कब्ज़े कुदरत में मेरी जान है हम अहले बैत से बुग्ज़ रखने वाला कोई एक शख़्स भी ऐसा नहीं कि जिसे अल्लाह तआला जहन्नुम में न डाले (मुस्तदरक हाकिम-3/162)

हज़रत अबू सईद खुदरी (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- जिसने अहले बैत से बुग्ज़ रखा वो मुनाफिक है। (दुर्रे मन्सूर-7/349) (इमाम अहमद बिन हम्बल- फ़ज़ाइले सहाबा-2/661)

उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा) फरमाती हैं- नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने अली, फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) को अपनी कमली में ले लिया और दुआ की ऐ अल्लाह जो इनसे अदावत (दुश्मनी) रखे तू उससे अदावत रख और जो इनको दोस्त रखे तू उसे दोस्त रख । (मजमउज़्ज़वाइद-9/166)

जैसा कि अहले ईमान का अकीदा है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की दुआ कभी रद्द नहीं होती बल्कि शरफे मकबूलियत पाती है यानी जो अहले बैत अतहार का दोस्त है वो अल्लाह तआला का दोस्त है और जो अहले बैत का दुश्मन है वो अल्लाह तआला का दुश्मन है और अल्लाह तआला का दुश्मन दोज़ख़ी और अज़ाबे इलाही का मुस्तहिक व सज़ावार है और अल्लाह तआला जिसे अपना दोस्त बना ले वो रहमते इलाही और जन्नत का मुस्तहिक व सज़ावार है



हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्ला से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया- जो मेरे अहले बैत से बुग्ज़ रखता है अल्लाह तआला उसे रोज़े कयामत यहूदियों के साथ जमा करेगा चाहे वो रोज़े नमाज़ का पाबन्द क्यों न हो और खुद को मुसलमान गुमान करता हो।
(मुअजम औसत-तबरानी-4/212)
(मजमउज़्ज़वाइद-9/172)

हज़रत ज़ैद बिन अरकम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- अली, फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) तुम जिससे लड़ोगे मैं भी उससे लडूंगा और जिससे तुम सुलह करोगे मैं भी उससे सुलह करूँगा। (तिर्मिज़ी-2/762) (इब्ने माजा-1/82)
(मुअजम कबीर-तबरानी-5/184)
(मुस्तदरक हाकिम-3/161)

हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम से रिवायत है रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया- ऐ अल्लाह जो मुझसे और मेरे अहले बैत से बुग्ज़ व अदावत रखता हो उसे कसरते माल और कसरते औलाद से नवाज़ ये उनकी गुमराही के लिये काफी है कि उनका माल कसीर हो जाये पस (उस कसीर माल के बाइस) उनका हिसाब तवील (लम्बा) हो जाये और उनकी विजदानियत (जज़वाती चीज़ें) कसीर हो जाये ताकि उनके शयातीन कसरत से हो जायें। (अल फिरदौस-1/492)