
Nahjul Balagha Khutbah 63 | Shetan Ka Dhoka | Mufti Fazal Hamdard





ग़नीमत के माल का बंटवारा
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यहूदियों को ख़ैबर से देश निकाला देने का इरादा फ़रमाया था और समझौता में यही तै भी हुआ था, मगर यहूदियों ने कहा, ऐ मुहम्मद ! हमें इसी धरती पर रहने दीजिए, हम इसकी देख-रेख करेंगे, क्योंकि हमें आप लोगों से ज़्यादा इसकी जानकारी है। इधर अल्लाह के रसूल सल्ल० और सहाबा किराम के पास इतने गुलाम न थे जो इस धरती की देख-रेख करते और जोतने-बोने का काम कर सकते और न खुद सहाबा किराम को इतनी फुर्सत थी कि यह काम पूरा कर सकते। इसलिए आपने ख़ैबर की ज़मीन इस शर्त पर यहूदियों के हवाले कर दी कि सारी खेती और तमाम फलों की पैदावार का आधा यहूदियों को दिया जाएगा। और जब तक अल्लाह के रसूल सल्ल० की मर्जी होगी, उस पर बरक़रार रखेंगे (और जब चाहेंगे देश-निकाला दे देंगे) इसके बाद हज़रत अब्दुल्लाह बिन रुवाहा रज़ि० ख़ैबर की पैदावार का अन्दाज़ा लगाया करते थे।
ख़ैबर का बंटवारा इस तरह किया गया कि उसे 36 हिस्सों में बांट दिया गया। हर हिस्सा एक सौ हिस्सों का योग था । इस तरह कुल तीन हज़ार छः सौ हिस्से हुए। इसमें से आधा यानी अठारह सौ हिस्से अल्लाह के रसूल सल्ल० और मुसलमानों के थे । आम मुसलमानों की तरह अल्लाह के रसूल सल्ल० का भी सिर्फ़ एक हिस्सा था, बाक़ी यानी अठारह सौ हिस्सों पर आधारित दूसरा आधा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुसलमानों की सामूहिक ज़रूरतों के लिए अलग कर लिया था। कि यह
अठारह सौ हिस्सों पर ख़ैबर का बंटवारा इसलिए किया गया अल्लाह की ओर से हुदैबिया वालों के लिए एक उपहार था, जो मौजूद थे, उनके लिए भी और जो मौजूद नहीं थे, उनके लिए भी और हुदैबिया वालों की तायदाद
चौदह सौ थी। जो ख़ैबर आते हुए अपने साथ दो सौ घोड़े लाए थे, चूंकि सवार के अलावा खुद घोड़े को भी हिस्सा मिलता है और घोड़े का हिस्सा डबल यानी दो फ़ौजियों के बराबर होता है, इसलिए ख़ैबर को अठारह सौ हिस्सों पर बांटा गया तो दो सौ घुड़सवारों को तीन-तीन हिस्से के हिसाब से छः सौ मिले, और बारह सौ पैदल फ़ौज को एक-एक हिस्से के हिसाब से बारह सौ हिस्से मिले।
ख़ैबर की ग़नीमत के माल के ज़्यादा होने का अन्दाज़ा सहीह बुखारी में लिखी हज़रत इब्ने उमर रज़ि० की उस रिवायत से होता है कि उन्होंने फ़रमाया, ‘हम लोग आसूदा न हुए, यहां तक कि हमने ख़ैबर जीत लिया।’
इसी तरह हज़रत आइशा रज़ि० की उस रिवायत से मालूम होता है कि उन्होंने फ़रमाया, जब ख़ैबर जीता गया, तो हमने कहा, ‘अब हमें पेट भरकर खजूर मिलेगी। 2
साथ ही जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना वापस तशरीफ़ लाए तो मुहाजिरों ने अंसार को खजूरों के वे पेड़ वापस कर दिए, जो अंसार ने इमदाद के तौर पर उन्हें दे रखे थे, क्योंकि उनके लिए ख़ैबर में माल और खजूर के पेड़ हो चुके थे। 3
हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब और अशअरी सहाबा का आना
इसी लड़ाई में हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हुए। उनके साथ अशअरी मुसलमान यानी हज़रत अबू मूसा और उनके साथी भी थे।
हज़रत अबू मूसा अशअरी रज़ि० का बयान है कि यमन में हमें अल्लाह के रसूल सल्ल० के ज़ाहिर होने का पता चला, तो हम लोग यानी मैं और मेरे दो भाई अपनी क़ौम के पचास आदमियों समेत अपने वतन से हिजरत करके एक नाव में सवार होकेर आपकी सेवा में पहुंचने के लिए चले, लेकिन हमारी नाव ने हमें नजाशी के देश हब्शा में फेंक दिया। वहां हज़रत जाफ़र और उनके साथियों से मुलाक़ात हुई। उन्होंने बताया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हमें भेजा है और यहीं ठहरे रहने का हुक्म दिया है। आप लोग भी हमारे साथ ठहर जाइए ।
चुनांचे हम लोग भी उनके साथ ठहर गए और नबी सल्ल० की खिदमत में
ज़ादुल मआद 2/137, 138, मय वजाहत
सहीह बुखारी 3/609
3. ज़ादुल मआद 2/148, सहीह मुस्लिम 2/96
उस वक़्त पहुंच सके जब आप ख़ैबर जीत चुके थे। आपने हमारा भी हिस्सा लगाया, लेकिन हमारे अलावा किसी भी आदमी का, जो ख़ैबर की जीत में मौजूद न था, कोई हिस्सा नहीं लगाया, सिर्फ़ लड़ाई में शरीक लोगों का ही हिस्सा लगाया। अलबत्ता हज़रत जाफ़र और उनके साथियों के साथ हमारी नाव वालों का भी हिस्सा लगाया और उनको भी ग़नीमत के माल का हिस्सा बांट कर दिया।
और जब हज़रत जाफ़र नबी सल्ल० की खिदमत में पहुंचे तो आपने उनका स्वागत किया और उन्हें चूमकर फ़रमाया, अल्लाह की क़सम ! मैं नहीं जानता कि
मुझे किस बात की खुशी ज़्यादा है, ख़ैबर के जीतने की या जाफ़र के आने की याद रहे कि इन लोगों को बुलाने के लिए अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी को नजाशी के पास भेजा था और उससे कहलवाया था कि वह उन लोगों को आपके पास रवाना कर दे। चुनांचे नजाशी ने दो नावों पर सवार करके उन्हें रवाना कर दिया। ये कुल सोलह आदमी थे और उनके साथ उनके बाक़ी बच्चे और औरतें भी थीं। बाक़ी लोग इससे पहले मदीना आ चुके थे। 3
हज़रत सफ़िया से शादी
हम बता चुके हैं कि जब हज़रत सफ़िया का शौहर कनाना बिन अबू हुक़ैक अपनी बद- अहदी की वजह से क़त्ल कर दिया गया तो हज़रत सफ़िया क़ैदी औरतों में शामिल कर ली गई। इसके बाद जब ये क़ैदी औरतें जमा की गईं तो हज़रत दिया बिन खलीफ़ा कलबी रज़ि० ने नबी की खिदमत में आकर अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के नबी ! मुझे क़ैदी औरतों में से एक लौंडी दे दीजिए । आपने फ़रमाया, जाओ और एक लौंडी ले लो ।
उन्होंने जाकर हज़रत सफ़िया बिन्त हुइ को चुन लिया। इस पर एक आदमी ने आपके पास आकर अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के नबी ! आपने बनी कुरैज़ा और बनी नज़ीर की सैयिदा (सरदारनी) सफ़िया को दिया के हवाले कर दिया, हालांकि वह सिर्फ आपकी शान के मुताबिक़
आपने फ़रमाया, दिया को सफ़िया समेत बुलाओ ।
सहीह बुखारी 1/443, साथ ही देखिए फ़हुल बारी 7/484-487 ज़ादुल मआद 2/139, अल-मोजम अस-सग़ीर अत-तबरानी 1/19 तारीख ख़ज़री 1/128
हज़रत दिया उनको साथ लिए हाज़िर हुए आपने उन्हें देखकर हज़रत दिया से फ़रमाया कि क़ैदियों में से कोई दूसर. लौंडी ले लो। फिर आपने हज़रत सफ़िया पर इस्लाम पेश किया। उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया। इसके बाद आपने उन्हें आज़ाद करके उनसे शादी कर ली और उनकी आज़ादी ही को उनका मह क़रार दिया। मदीना वापसी में सद्दे सहबा पहुंचकर वह हलाल हो गईं। इसके बाद उम्मे सुलैम रज़ि० ने उन्हें आपके लिए सजाया-संवारा और रात में आपके पास रुख्सत कर दिया। आपने दूल्हे की हैसियत से उनके साथ सुबह की और खजूर, घी, और सत्तू सान कर वलीमा खिलाया और रास्ते में तीन रात उनके पास क़ियाम फ़रमाया।
इस मौक़े पर आपने उनके चेहरों पर हरा निशान देखा, पूछा, यह क्या है ?
कहने लगी, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! आपके ख़ैबर आने से पहले मैंने सपना देखा कि चांद अपनी जगह से टूटकर मेरी गोद में आ गिरा है। ख़ुदा की क़सम ! मुझे आपके बारे में कोई ख्याल भी न था, लेकिन मैंने यह सपना अपने पति से बयान किया, तो उसने मेरे चेहरे पर थप्पड़ रसीद करते हुए कहा, यह बादशाह जो मदीना में है, तुम उसकी आरज़ू कर रही हो । 2
विष में बुझी बकरी की घटना
ख़ैबर की जीत के बाद जब अल्लाह के रसूल सल्ल० सन्तुष्ट और एकाग्र हो चुके, तो सलाम बिन मश्कम की बीवी जैनब बिन्त हारिस ने आपके पास भुनी हुई बकरी भेंट की। उसने कुछ पूछ रखा था कि अल्लाह के रसूल सल्ल० कौन-सा अंग पसन्द करते हैं और उसे बताया गया था कि दस्ता। इसलिए उसने दस्ते में खूब विष मिला दिया था, और उसके बाद बाक़ी हिस्सा भी विष में भर दिया था। फिर उसे लेकर वह अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आई और आपके सामने रखा, तो आपने दस्ता उठाकर उसका एक टुकड़ा चबाया, लेकिन निगलने के बजाए थूक दिया, फिर फ़रमाया, यह हड्डी मुझे बता रही है कि इसमें विष घोला गया है।
इसके बाद आपने ज़ैनब को बुलाया तो उसने स्वीकार कर लिया। आपने पूछा, तुमने ऐसा क्यों किया ?
उसने कहा, मैंने सोचा, अगर यह बादशाह है तो हमें इससे राहत मिल
1. सहीह बुखारी 1/54, 2/604, 606, ज़ादुल मआद 2/437
2. वही, जादुल मआद 2/137, इब्ने हिशाम 2/336
जाएगी, और अगर नबी है तो इसे ख़बर दे दी जाएगी। इस पर आपने उसे माफ़ कर दिया।
इस मौक़े पर आपके साथ हज़रत बिच बिन बरा बिन मारूर भी थे। उन्होंने एक लुक्मा निगल भी लिया था, जिसकी वजह से उनकी मौत वाक़े हो गई।
रिवायतों में मतभेद है कि आपने उस औरत को माफ़ कर दिया था, या क़त्ल कर दिया था। तालमेल इस तरह पैदा किया जा सकता है कि पहले तो आपने माफ़ कर दिया था, लेकिन जब हज़रत बिच की मौत हो गई, तो फिर क़सास के तौर पर क़त्ल कर दिया।