मौला अली की जंग ::जंग ए खैबर

खैबर का इस्तेमाल इबरानी जुबाँ में, किले या हिसार के तौर पर होता है। खैबर, मदीने से तकरीबन ८० मील की दूरी पर है। मरहब और कुछ यहूदियों ने इसे अपना गढ़ बना रखा था और सुलह एहुदैबिया के बाद वह इस गलतफहमी के शिकार हो गए थे कि मुसलमानों ने कुरैश से डरकर, सुलह कर ली है और मदीने पर जंग करने की साजिशें रचने लगे थे।

बहुत सारे दुश्मन ए रसूल ए खुदा ने जब मरहब को साथ देने का भरोसा दिया तो उसने साजिशों में इजाफा कर दिया जब ये बात रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को पता चली तो आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम सोलह सौ सहाबियों के साथ, जिनमें दो सौ सवार और बाकि प्यादे थे, खैबर की तरफ़ आए।

यूँ तो रसूलुल्लाह के अलमदार हज़रत अली हुआ करते थे लेकिन आप अलैहिस्सलाम तेज़ बुखार और दर्द की हालत में होने की वजह से रसूलुल्लाह के हुक्म से मदीना में ही रुके थे।

कुछ तारीखों में ये भी मिलता है कि रसूलुल्लाह ने चालीस दिन में खैबर जीतने का ऐलान भी किया था और इस वजह से ये जंग सिर्फ शुजाअत की नहीं बल्कि सदाक़त की भी बन गई थी। मरहब ये चाहता

था कि या तो वह रसूलुल्लाह को हरा दे या फिर किसी तरह चालीस दिन गुजार ले ताकि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को झूठा साबित कर सके।

पहले दिन से ही हर बड़े-बड़े सहाबा रज़िअल्लाह ने अलम उठाया और जीत की खातिर आगे बढ़े लेकिन जीत ना सके, यहाँ तक कई सहाबा रज़िअल्लाह बार-बार जंग में गए, कुछ भागकर वापिस भी आए, कुछ अपनी हिम्मत से टकराते रहे, अलबत्ता की उन्तालीसवाँ दिन आ गया।

सारे सहाबा रज़िअल्लाह एक दूसरे पर इल्जाम डाल रहे थे, कोई कहता कि इसने बुज़दिली दिखाई, कोई कहता कि फलाँ भागकर वापिस आ गया, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम सर दर्द की बात कहते हुए खेमे में गए और कुछ देर बाद आपने बाहर आकर एक तारीखी ऐलान किया और फरमाया

“खुदा की कसम, कल मैं अलम उस मर्द को दूंगा जो कर्रार व गैर ए फ़र्रार और बढ़-बढ़ कर हमले करने वाला होगा। वह ख़ुदा और रसूल को दोस्त रखता होगा और खुदा व रसूल उसको दोस्त रखते होंगे। नीज़ वह मैदान से उस वक्त तक ना पलटेगा जब तक खुदा उस दोनों हाथों को फ़ह से हमकिनार न कर दे।”

कुरैश और लश्कर के हर बड़े सहाबा रजिअल्लाह को उम्मीद और यकीन ये ही था कि कल रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, उनको ही अलम देंगे।

किसी को भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम का ख्याल दूर-दूर तक नहीं आ रहा था, क्योंकि वह वहाँ मौजूद ही नहीं था, बाज़ रिवायतों में ये भी लिखा है कि आप वहाँ मौजूद थे लेकिन बुखार की तेजी इतनी थी कि आप चलने-फिरने में भी तकलीफ़ महसूस कर रहे थे।

जब चालीसवाँ दिन आया तो हर एक सहाबा रज़िअल्लाह, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के सामने आकर खड़े हो गए और आपकी ओर तकने लगे तभी आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली को तलब फरमाया।

कुछ रिवायतों में है कि सहाबा को मौला अली को लेने भेजा, कुछ में है कि खुद, जिब्राईल अलैहिस्सलाम, आपको लेकर आए और कुछ में है कि आप इमाम अलैहिस्सलाम, खुद बा खुद, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आ गए।

जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम आ गए तो मेरे प्यारे आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने, उनका सर अपने जानू पर रखकर, अपना लोआब, आप इमाम के माथे पर लगाया जिससे आप पर छाया दर्द, बुखार और सर्दी के असरात ख़त्म हो गए, आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने दुआ भी फरमाई कि “ऐ परवरदिगार! अली को गर्मी और सर्दी के असरात से महफूज़ रख और दुश्मन के मुकाबले में इसकी नुसरत वाली मदद फरमा।”

इसके बाद आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने, अपने दस्त ए मुबारक से अमीरुल मोमिनीन को ज़ेरह पहनाई, तलवार दी और हुक्म दिया कि “जाओ और खैबर फत्ह करो।”

आप हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पूछा, “या रसूलुल्लाह! कब तक लइँ, आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने जवाब दिया,” जब तक फह हासिल ना कर लो।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम, तेजी से किले की तरफ़ बढ़े और एक पत्थर पर अलम को गाढ़ दिया। एक दुश्मन ने जब ऊपर से देखा तो हैरानी से पूछा कि तुम कौन हो, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया, “मैं अली बिन अबु तालिब हूँ, अब तुम्हारी शिकस्त और मौत यकीनी

है।”

मरहब का भाई, हारिस गुस्से में फौज़ लेकर बाहर निकला और फौज़ ए रसूलुल्लाह पर टूट पड़ा। उसने दो लोगों को शहीद किया ही था कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने एक ही वार में उसका सर तन से जुदा कर दिया, जो पत्थरीली ज़मीन से लुढ़कने लगा।

ये देखकर, मरहब, खुदकी तारीफें करता हुआ बाहर आया और मेरे मौला ने भी कुछ अश्शार पढ़े, “मैं वह हूँ कि मेरी माँ ने मेरा नाम हैदर रखा है, मैं शेर ए मर्द हूँ, शुजाअत का असद हूँ। मैं वही हूँ कि जिसकी कलाई शेर की तरह मजबूत और गर्दन मोटी है। मैं तुम पर ऐसा वार करूँगा जो जोड़ो बन्द को तोड़ दे और हरीफों को दारिन्दों का लुक्मा बनने के लिए छोड़ दे। मैं एक शरीफ़, बाइज़्ज़त और ताकतवर जवान की तरह तुम्हें मौत के घाट उतारूँगा और कत्ल करूँगा।”

लिखने वालों ने ये भी लिखा है कि मरहब की माँ ने उसे हैदर नाम के शख्स से ना लड़ने की नसीहत की थी, इसलिए मौला ने उसे, अपने कलाम से, नसीहत याद दिलाने की कोशिश की थी।

आख़िर उस बदबखत ने आगे बढ़कर मौला पर वार किया जो खाली गया, लेकिन मौला अली ने उसके सर पर एक ऐसी ज़र्ब लगाई जो उसके सर की हड्डियों को काटते हुए, उसके जिस्म को दो हिस्सों में चीरते हुए, ज़मीन तक पहुँच गई. मरहब मैदान पर गिर गया और फौरन मर गया।

दुश्मन भागकर किले के अंदर घुस गए और खैबर का दरवाजा लगा दिया, जिसे मौला अली मुर्तजा ने एक ही झटके में अपने एक हाथ से उखाड़ फेंका, ये वह दरवाज़ा था का जिसे खोलने और बंद करने के लिए चालीस आदमियों कि ज़रूरत पड़ती थी।

जब अमीरुल मोमिनीन से पूछा गया कि आपने ये दरवाज़ा कैसे

मौला ने फरमाया कि ” मैंने खैबर का दरवाजा

उखाइ फेंका, तो खुद

अपनी कुव्वत से नहीं बल्कि रब्बानी कुव्वत से उखाड़ा है। इस तरह जंग

एखैबर में रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को फतह हासिल

हुई।

ऊपर एक हदीस आई थी जिसमें रसूलुल्लाह ने फरमाया था, “खुदा की कसम, कल मैं अलम उस मर्द को दूंगा जो कर्रार व गैर ए फ़र्रार और बढ-बढ़ कर हमले करने वाला होगा। वह खुदा और रसूल को दोस्त रखता होगा और खुदा व रसूल उसको दोस्त रखते होंगे। नीज़ वह मैदान से उस वक्त तक ना पलटेगा जब तक खुदा उस दोनों हाथों को फ़तह से हमकिनार न कर दे।”

इस बात को दोबारा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि इसमें अमीरुल मोमिनीन की बहुत सारी फजीलत छिपी हैं।

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने पहली बात तो ये फरमाई कि वह मर्द होगा। यानी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शुजाअत, हिम्मत और खूबियों की तरफ़ इशारा किया। आपने इशारा किया कि वह दावे नहीं करेगा बल्कि फतह हासिल करके दिखाएगा।

दूसरी बात ये कि आपने फरमाया गैर ए फर्रार होगा, अब जब रसूलुल्लाह ने कर्रार लफ्ज़ का इस्तेमाल किया था, जिसका मतलब ही है आगे डटकर, बढ़-बढ़ कर वार करने वाला तो आगे गैर ए फर्रार क्यों कहा, वह इसलिए ताकि सब अपने-अपने दिलों में झाँककर, अलम हासिल होने की ख्वाहिश, खुद ही दिल से निकाल दें।

तीसरी और ज़रूरी बात ये कि वह खुदा और अपने रसूल को दोस्त रखता है यानी बेइंतहा मुहब्बत करता है। ये ताल्लुक इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि मौला अली अलैहिस्सलाम, अपने रब और आका

सल्लललाह अलैहे वसल्लम का हुक्म पूरा करने जान की बाजी लगा

देंगे, वह भी हर एक मोड़ पर। वफादारी की मिसाल हैं मौला।

चौथी फजीलत ये देखने को मिलती है कि अल्लाह और उसका रसूल भी हज़रत अली को दोस्तरखता है। ये ताल्लुक इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि आखिर क्यों अली, मौला हैं, अव्वल इमाम हैं, अलमदार हैं, विलायत के ताजदार हैं। जिसे अल्लाह और रसूलुल्लाह सल्लललाह

अलैहे व आलिही वसल्लम की दोस्ती यानी मुहब्बत हासिल हो गई वह कामयाबी ऐसे हासिल करता है जैसे मान लो कामयाबी, खुद उसकी

मुन्तज़िर होकर बैठी हो।

पाँचवी बात ये सामने आई कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि खुदा वन्दे आलम, उसके हाथों पर किला फतह करेगा। यानी अल्लाह ने खुद चुना है अपने अली को अली बनाने के लिए।

ला फत्ह इल्ला अली, ला तेग़ इल्ला जुल्फिकार ….

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