
Qaul e Maula Ali AlaihisSalam


** تعلیمات امیر (Taleemat e Ameer r.a)
** چھتیسواں حصہ (part-36)
۸۔ حضرت سرکار امام زید شہید علیہ السلام
ولادت سنہ ۸۰ ہجری مدینہ منورہ، شہادت ۱۲۲ ہجری کوفہ)
آپ چوتھے امام حضرت امام زین العابدین علیہ السلام کے فرزند ہیں۔ ان کی والدہ کے مختلف ناموں کا تذکرہ ملتا ہے: جیدا، جید، حیدان اور حوراء ان اسماء میں شامل ہیں۔ آپ کی والدہ ام ولد (یعنی آپ کی والدہ کنیز) تھی جنہیں مختار ثقفی نے تیس ہزار درہم میں خریدا اور چونکہ ان کی قدر و منزلت کے قائل تھے اس لئے امام سجادؑ کو ہدیہ کر دیا۔ زیدؑ کے علاوہ ان سے دوسری اولاد بھی ہوئیں جن کے اسما: علی، عمر اور خدیجہ ہیں۔
الحیاة السیاسیة و الفکریة للزیدیة فی المشرق الاسلامی، ص۴۲-۳۴ میں درج ہے کہ حضرت زید شہیدؑ قرآن مجید کی مخصوص قرائت کے حامل تھے
اور آپ تقیہ کے مخالف تھے اور ایسے افراد سے جو شیخین پر تبرا کرتے تھے، بیزاری کا اظہار کرتے تھے۔
مستدرک الوسائل و مستنبط المسائل، الخاتمہ، ج ۸ ص ۲۴۲ و ج۹، ص۴۶.و بحار الانوار، ج ۴۶، ص۱۵۷۔۱۵۸ پر یوں رقم ہے کہ امام حسین علیہ السلام کی
شہادت کے بعد بعض علویوں نے مسلحانہ قیام
کی فکر کو امامت کے شرائط اور ظالموں سے مقابلہ کی روش کے عنوان سے پیش کیا۔ اس سیاسی تفکر کی تشکیل کے ساتھ، امام زین العابدین علیہ السلام کے زمانہ میں زیدیہ مسلک کا سنگ بنیاد رکھا گیا۔
علویوں کے درمیان اختلاف کی باز گشت ان دو نظریوں اموی حکومت سے ثقافتی جنگ یا مسلحانہ قیام کی طرف ہوتی ہے۔ اس اختلاف کا نتیجہ امام زین العابدین علیہ السلام کی شہادت کے بعد ظاہر ہوا۔ بعض نے امام محمد باقر علیہ السلام کو قبول کر لیا اور دوسرے گروہ نے جو تلوار کے ذریعہ سے قیام مسلحانہ کا قائل تھا، وہ امام محمد باقر کے بھائی زید بن علی کی امامت کے قائل ہو گئے اور زیدیہ مشہور ہو گئے۔ اس بنیاد پر وہ شیعہ جو قیام مسلحانہ کا عقیدہ رکھتے تھے انہوں نے زید بن علی کو امام علیؑ، امام حسنؑ، امام حسینؑ اور امام حسن مثنیؑ کے بعد اہل بیت علیہم السلام میں پانچویں امام کی حیثیت سے مانتے ہیں۔
معجم البلدان، ج۵، ص:۱۴۳ پر حضرت زید شہیدؑ کے قول کو نقل کیا گیا ہے کہ آپ نے فرمایا: ہر زمانہ میں ہم اہل بیت میں سے ایک شخص حجت خدا ہے اور ہمارے زمانہ کی حجت، میرا بھتیجا حضرت امام
جعفر صادق علیہ السلام بن حضرت محمد الباقر علیہ السلام ہیں۔ جو بھی ان کی پیروی کرے گا گمراہ نہیں ہوگا اور جو بھی ان کی مخالفت کرے گا، اسے ہدایت نصیب نہیں ہوگی۔
آپ کے چار فرزند ہوۓ یحییؑ، حسینؑ، محمدؑ، عیسیؑ
یحیی (سیف الاسلام) بن زید شہید ۔ آپ کی والدہ سیدہ ریطہ بنت ابو ہاشم عبیداللہ ابن حضرت محمد حنیفہ ابن حضرت علی علیہ السلام تھیں۔ آپ نے اپنے والد کی شہادت کے بعد سبزوار میں قیام کیا اور افغانستان کے شہر جوزجان میں شہید ہوئے۔
حسین (ذوالدمعہ) بن زید شہید۔ آپ کی والدہ ام ولد تھیں۔ آپ ذوالدمعہ یا ذی العبرہ سے معروف ہیں، انہیں یہ لقب اس وجہ سے دیا گیا کہ یہ اپنے والد کے فراق میں بیحد گریہ فرماتے تھے۔ زید شہیدؑ کی
شہادت کے بعد امام جعفر صادق علیہ السلام نے ان کی تربیت کی ذمہ داری اپنے ذمہ لی تھی۔
محمد بن زید شہید ؛ آپ کی والدہ کا تعلق سندھ سے تھا۔ آپ بھی امام جعفر صادق علیہ السلام کے اصحاب میں سے تھے۔
عیسی (موتم الاشبال) بن زید شہید ؛ ان کی والدہ کا نام سکن تھا جن کا تعلق نوبہ سے تھا۔ آپ نے ایک عمر تک مخفی طور پر زندگی گزارنے کے بعد ساٹھ سال کی عمر میں کوفہ میں وفات پائی۔ بعض گزارشات کی بنیاد پر آپ بھی امام جعفر صادق علیہ السلام کے اصحاب میں سے تھے۔
📚 ماخذ از کتاب چراغ خضر۔
हिजरत का पाँचवाँ साल

सन ५ हिजरी
जंगे उहुद में मुसलमानों के जानी नुकसान का चर्चा होने और कुफ्फारे कुरैश और यहूदियों की मुश्ती साज़िशों से तमाम कबाइले कुफ्फार का हौसला इतना बुलन्द हो गया कि सब को मदीना पर हमला करने का जुनून हो गया। चुनान्चे ५ हिजरी भी कुफ्र- इस्लाम के बहुत से मश्रिकों को अपने दामन में लिए हुए है। हम यहाँ चन्द मशहूर ग़ज़वात व सराया का जिक्र करते हैं।
गज़वए ज़ातुर रिका
सब से पहले कबाइले “अन्मार व सअलबा” ने मदीना पर चढ़ाई करने का इरादा किया। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इसकी इत्तलाअ मिली तो आपने चार सौ सहाबए किराम का लश्कर अपने साथ लिया। और १० मुहर्रम सन्न ५ हिजरी को मदीना से रवाना हो कर मकाम “जातुर रिकाअ” तक तशरीफ ले गए। लेकिन आपकी आमद का हाल सुनकर ये कुफ्फार पहाड़ों में भागकर छुप गए । इस लिए कोई जंग नहीं हुई। मुशरिकीन की चन्द औरते मिलीं। जिन को सहाबए किराम ने गिरफ्तार कर लिया। उस वक्त नुसलमान बहुत ही मुफ्लिस और तंगदस्ती की हालत में थे। चुनान्चे हज़रते अबू मूसा अशअरी रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि सवारियों की इतनी कमी थी कि छे छे आदमियों की सवारी के लिए एक एक ऊँट था। जिस पर हम लोग बारी बारी से सवार होकर सफर करते थे। पहाड़ी जमीन में पैदल चलने से हमारे कदम जख्मी और पावँ के नाखुन झड़ गए थ। इस लिए हम लोगों ने अपने पाँवों पर कपड़ों की चीथड़े लपेट लिए थे। यही वजह है कि इस गज़वे का नाम “गजवए जातुर रिकाअ* (पैवंदों वाला गजवा) हो गया।
(बुखारी गजवए जातुर रिंकाअ जि.२.स.५९२) बज़ मुअर्रिख़ीन ने कहा कि चूंकि वहाँ की ज़मीन के पत्थर सफेद व स्याह रंग के थे और जमीन ऐसी नजर आती थी गोया सफेद और काले पैवंद एक दूसरे से जोड़े हुए हैं। लिहाजा इस गजवे को “गजवए जातुर रिकाअ कहा जाने लगा। और बअज का कौल है कि यहाँ पर एक दरख्त का नाम “ज़ातुर रिकाअ था। इस लिए लोग इसका गज़वए जातुर रिकाअ कहने लगे। हो सकता है कि ये सारी बातें हों।
(ज़रक़ानी जि. २ स ८८) मशहूर इमाम सीररत इब्ने इस्हाक का कौल है कि सब से पहले इस ग़ज़वे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने “सलातुल ख़ौफ़ पढ़ी।
(जरकानी जि. २ स. ९० बुख़ारी बाब ग़ज़वए जातुर रिकाअ जि. २)
ग़ज़वए दूमतुल जन्दल
रबीउल अव्वल सन्न ५ हिजरी में पता चला कि ‘मकामे दूमतुल जन्दल” में जो मदीना और शहरे दमिश्क के दर्मियान एक किलो का नाम है। मदीने पर हमला करने के लिए एक बहुत बड़ी फौज जमअ हो रही है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम एक हज़ार सहाबए किराम का लश्कर लेकर मुकाबले के लिए मदीने से निकले। जब मुशरिकीन को ये मालूम हुआ तो वो लोग अपने मवेशियों और चरवाहों को छोड़कर भाग निकले। सहाबए किराम ने उन तमाम जानवरों को माले गनीमत बना लिया। और आपने तीन दिन वहाँ कियाम फरमाकर मुख़्तलिफ़ मकामात पर
सहाबा के लश्करों को रवाना फरमाया। इस ग़ज़वे में भी कोई जंग सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम
नहीं हुई। इस सफर में एक महीने से जाइद आप मदीना से बाहर रहे। (जरकानी जि.२ स. ६४ ता ९५)
गज़वए मुरैसीअ
इस का दूसरा नाम “गजवए बनिल मुसतलक भी है “मुरैसीअ” एक मकाम का नाम है जो मदीना से आठ मंज़िल दूर है। कबीलए खुजाआ का एक ख़ानदान “बनूल मुसतलक यहाँ आबाद था। और उस कबीले का सरदार हारिस बिन ज़र्रार था। उसने भी मदीना पर फौज कशी के लिए लश्कर जमअ किया था। जब ये खबर मदीने पहुंची तो २ शबान सन्न ५ हिजरी को हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीने पर हज़रते जैद बिन हारिसा रदियल्लाहु अन्हु को अपना ख़लीफ़ा बनाकर लश्कर के साथ रवाना हुए। इस गज़वे में हज़रते बीबी आइशा और हज़रते बीबी उम्मे सल्मा रदियल्लाहु अन्हा भी आपके साथ थीं। जब हारिस बिन जर्रार को आपकी तशरीफ आवरी की खबर हो गई तो उस पर ऐसी दहशत सवार हो गई कि वो और उसकी फौज भागकर मुन्तशिर हो गई। मगर खुद मुरैसी के बाशिन्दों ने लश्करे इस्लाम का सामना किया। और जमकर मुसलमानों पर तीर बरसाने लगे। लेकिन जब मुसलमानों ने एक साथ मिलकर हमला कर दिया तो दस कुफ्फार मारे गए और एक मुसलमान भी शहादत से सरफ़राज़ हुए। बाकी सब कुफ्फार गिरफ्तार हो गए। जिनकी तअदाद सात सौ से ज़ाएद थी। दो हज़ार ऊँट और पाँच हजार बकरियाँ माले गनीमत में सहाबए किराम के हाक में आई।
(जरकानी जि.२ स. ९७ ता ९८) गजवए मुरैसीअ जंग के एअतबार से तो काई ख़ास अहमियत नहीं रखता। मगर इस जंग में बअज़ ऐसे वाकिआत दरपेश हो गए कि ये गज़वा तारीखे नबवी का एक बहुत ही अहम और शानदार
उनवान बन गया है। उन मशहूर वाकिआत में से चन्द ये हैं।
मुनाफिकीन की शरारत
इस जंग में माले गनीमत के लालच में बहुत से मुनाफिकीन भी शरीक हो गए थे। एक दिन पानी लेने पर एक महाजिर और एक अन्सारी में कुछ तकरार हो गई। महाजिर ने बुलन्द आवाज़ से
“या लिल महाजिरीन” (ऐ महाजिरो! फरयाद है।) और अन्सारी ने “
“या लिल अन्सार’ (ऐ अन्सारियो! फर्याद है।) का नअरा मारा। ये नअरा सुनते ही अन्सार व महाजिरीन दौड़ पड़े। और इस कदर बात बढ़ गई कि आपस में जंग की नौबत आ गई। रईसुल मुनाफ़िकीन अब्दुल्लाह बिन उबई को शरारत का मौका मिल गया। उसने इश्तिआल दिलाने के लिए अन्सारियों से कहा, “लो! ये तो वही मिस्ल हुई कि
“सम्मिन कल-बका लियाअ कु-ल-क” (तुम अपने कुत्ते को फरबा करो ताकि वो तुम्हीं को खा डाले।) तुम अन्सारियों ही ने इन महाजिरों का हौसला बढ़ा दिया है। लिहाजा अब उन महाजिरीन की माली इमदाद बिल्कुल बन्द कर दो। ये ज़लील ख्वार हैं। और हम अन्सार इज्जतदार हैं। अगर हम मदीने पहुंचे तो यकीनन हम उन जलील लोगों को मदीने से बाहर कर देंगे। (कुरआन सूरए मुनाफिकून)
हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब इस हंगामे का शोर- गोगा सुना तो अन्सार व महाजिरीन से फ़रमाया कि क्या तुम लोग ज़मानए जाहिलीयत की नअरा बाजी कर रहे हो? जमाले नुबूव्वत देखते ही अन्सार व महाजिरीन बर्फ की तरह ठन्डे पड़ गए। और. रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चन्द फुकरों ने महब्बत का ऐसा दरिया बहा दिया कि फिर अन्सार व महाजिरीन शीर- शकर की तरह घुल मिल गए।
जब अब्दुल्लाह बिन उबई की बेहूदा बात हज़रते उमर
रदियल्लाहु अन्हु के कान में पड़ी तो वो इस कदर तैश में आ गए कि नंगी तलवार ले कर आए। और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! मुझे इजाजत दीजिए कि मैं इस मुनाफिक की गर्दन उड़ा दूँ। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने निहायत ही नर्मी के साथ इर्शाद फरमाया कि ऐ उमर! खबरदार ऐसा न करो। वर्ना कुफ्फार में ये खबर फैल जाएगी कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अपने साथियों को भी कत्ल करने लगे हैं। ये सुनकर हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु बिल्कुल ही खामोश हो गए मगर इस ख़बर का पूरे लश्कर में चर्चा हो गया। ये अजीब बात है कि अब्दुल्लाह बिन उबई जितना बड़ा इस्लाम और बानीए इस्लाम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का दुश्मन था। उस से कहीं ज्यादा बढ़कर उसके बेटे इस्लाम के सच्चे शैदाई और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के जाँ निसार सहाबी थे। उनका नाम भी अब्दुल्लाह था। जब अपने बाप की बकवास का पता चला तो वो गैज़- गजब में भरे हुए बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! अगर आप मेरे बाप के कत्ल को पसन्द फ़रमाते हों तो मेरी तमन्ना है किसी दूसरे की बजाए मैं खुद अपनी तलवार से अपने बाप का सर काटकर आपके कदमों में डाल दूँ। आपने इर्शाद फ़रमाया कि नहीं, हरगिज़ नहीं। मैं तुम्हारे बाप के साथ कभी भी कोई बुरा सुलूक नहीं करूँगा।
(इने सअद व तबरी वगैरा) और एक रिवायत में ये भी आया है कि मदीना के करीब वादीए अकीक में वो अपने बाप अब्दुल्लाह बिन उबई का रास्ता रोक कर खड़े हो गए। और कहा कि तुमने महाजिरीन और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को जलील कहा है खुदा की कसम! मैं उस वक्त तक तुमको मदीने में दाखिल नहीं होने दूंगा। जब तक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इजाज़त अता न फरमाएँ। और जब तक तुम अपनी ज़बान से ये न कहो कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम
औलादे आदम में सब से ज्यादा इज्जत वाले हैं। और तुम सारे जहान वालों में सब से ज़्यादा ज़लील हो। तमाम लोग इन्तिहाई हैरत और तअज्जुब के साथ ये मंजर देख रहे थे। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वहाँ पहुँचे। और ये देखा कि बेटा बाप का रास्ता रोके हुए खड़ा है। और अब्दुल्लाह बिन उबई ज़ोर ज़ोर से कह रहा है। कि “मैं सब से ज़्यादा ज़लील हूँ। और हुजूर अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सब सब ज़्यादा इज्जतदार हैं। आपने ये देखते ही हुक्म दिया कि उसका रास्ता छोड़ दो ताकि ये मदीना में दाखिल हो जाए।
(मदारिजुन्नबूव्वत जि.२ स. १५७)
हज़रते जुवैरिया से निकाह
गज़वए मुरैसीअ की जंग में कुफ्फार मुसलमानों के हाथ में गिरफ्तार हुए। उनमें सरदारे कौम हारिस बिन ज़र्रार की बेटी हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा भी थीं जब तमाम कैदी लौंडी गुलाम बनाकर मुजाहिदीने इस्लाम में तकसीम कर दिए गए। तो हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा हज़रते साबित बिन कैस रदिय़ल्लाहु अन्हु के हिस्से में आईं उन्होंने हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा से कह दिया कि तुम मुझे इतनी इतनी रकम दे दो तो मैं तुम्हें आज़ाद कर दूंगा। हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा के पास कोई रकम नहीं थीं। वो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दरबार में हाज़िर हुईं। और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! मैं अपने कबीले के सरदार हारिस बिन ज़र्रार की बेटी हूँ। और मैं मुसलमान हो चुकी हूँ। हज़रते साबित बिन कैस ने इतनी इतनी रकम लेकर मुझे आज़ाद कर देने का वअदा कर लिया है। आप मेरी इम्दाद फरमाएँ ताकि मैं रकम अदा करके आज़ाद हो जाऊँ। आपने इर्शाद फ़रमाया कि अगर मैं इससे बेहतर सुलूक तुम्हारे साथ करूँ तो क्या तुम मंजूर कर लोगी? उन्होंने
पूछा
कि वो क्या
है? आपने फरमाया कि मैं चाहता हूँ कि मैं खुद तन्हा तुम्हारी तरफ से सारी रकम अदा कर दूँ। और तुमको आजाद करके मैं तुम
से निकाह कर लूँ। ताकि तुम्हारा ख़ानदानी एअज़ाज़ व वकार बरकरार रह जाए। हजरते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा खुशी खुशी इसको मंजूर कर लिया। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सारी रकम अपने पास से अदा फरमाकर हजरते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा से निकाह फ़रमा लिया। जब ये ख़बर लश्कर में फैल गई कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा से निकाह फरमा लिया। तो मुजाहिदीने इस्लाम के लश्कर में उस ख़ानदान के जितने लौंडी गुलाम थे मुजाहिदीन ने सब को फौरन ही आज़ाद करके रिहा कर. दिया। और लश्करे इस्लाम के हर सिपाही ये कहने लगा कि जिस ख़ानदान में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने शादी कर ली उस ख़ानदान का कोई आदमी लौंडी गुलाम नहीं रह सकता। और हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा कहने लगीं कि हम ने किसी औरत का निकाह हज़रते जुवैरिया के निकाह से बढ़कर खैरो बरकत वाला नहीं देखा कि उसकी वजह से तमाम ख़ानदान बनिल मुसतलिक को गुलामी से आज़ादी नसीब हो गई। (अबू दाऊद किताबुल अतक जि.२ स.५४८)
हज़रते जुवैरिया रदियल्लाहु अन्हा का इस्ली नाम “बर्रा था हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस नाम को बदलकर “जुवैरिया नाम रखा।
(मदारिज जि.२ स. १५५)
वाकिअए इफक
इसी गज़वे से ज़ब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना वापस आने लगे तो एक मंज़िल पर रात में पड़ाव किया। हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा एक बन्द हौदज में सवार होकर सफर करती थीं। और चन्द मख्सूस आदमी उस होदज को
ऊँट पर लादने और उतारने के लिए मुकर्रर थे। हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की रवांगी से कुछ पहले लश्कर से बाहर रफ़अ हाजत के लिए तशरीफ ले गई। जब वापस हुई तो देखा कि उनके गले का हार कहीं टूट कर गिर पड़ा है। वो दोबारा उस हार की तलाश में लश्कर से बाहर चली गई। इस मरतबा वापसी में कुछ देर लग गई। और लश्कर रवाना हो गया। आपका होदज लादने वालों ने ये ख़याल करके कि उम्मुल मोमिनीन होदज के अन्दर तशरीफ फरमा हैं होदज को ऊँट पर लाद दिया। और पूरा काफला मंज़िल से रवाना हो गया। जब हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा मंजिल पर वापस आईं। तो यहाँ कोई आदमी मौजूद नहीं था। तन्हाई से सख़्त घबराईं। अन्धेरी रात में अकेले चलना भी ख़तरनाक था। इस लिए वो ये सोचकर वहीं लेट गईं कि जब अगली मंजिल पर लोग मुझे न पाँएगे तो ज़रूर ही मेरी तलाश में यहाँ आएँगे। वो लेटी लेटी सो गईं। एक सहाबी जिनका नाम हज़रते सफ़वान बिन मुअत्तल सुलमी रदियल्लाहु अन्हु था। वो हमेशा लश्कर के पीछे पीछे इस खयाल से चला करते थे ताकि लश्कर का गिरा पड़ा सामान उठाते चलें। वो जब उस मंज़िल पर पहुँचे तो हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा को देखा और चूँकि पर्दा की आयत नाज़िल होने से पहले वो बारहा उम्मुल मोमिनीन ‘को देख चुके थे। इस लिए देखते ही पहचान लिया। और उन्हें मुर्दा समझकर “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन पढ़ा। इस आवाज़ से वो जाग उठीं। हज़रते सफ़वान बिन मुअत्तल सुलमी रदियल्लाहु अन्हु ने फौरन ही अपने ऊँट पर सवार कर लिया। और खुद ऊँट की मुहार थामकर पैदल चलते हुए अगली मंजिल पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास पहुंच गए।
मुनाफ़िकों के सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई ने इस वाकि को हजरते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा पर तोहमतp लगाने का ज़रीआ बना लिया। और खूब खूब उस तोहमत का चर्चा किया।
यहाँ तक कि मदीने में उस मुनाफिक ने इस शर्मनाक तोहमत को इस कदर उछाला और इतना शोर- गुल मचाया कि मदीने में हर तरफ इस इफ्तरा और तोहमत का चर्चा होने लगा। और बअज मुसलमान मसलन हज़रते हस्सान बिन साबित और हजरते मिसतह बिन उसासा और हज़रते हमना बिन्ते हजश रदियल्लाहु अन्हुम ने भी उस तोहमत को फैलाने में कुछ हिस्सा लिया। हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस शर अंगेज़ तोहमत से बेहद रंज व सदमा पहुँचा। और मुख्लिस मुसलमानों को भी इन्तिहाई रंज व गम हुआ। हज़रते बीबी आएशा रदियल्लाहु अन्हा मदीना पहुँचते ही सख्त बीमार हो गईं। पर्दा नशीन तो थी ही साहिबे फराश हो गईं। और उन्हें इस तोहमत तराशी की बिल्कुल खबर ही नहीं हुई। गो कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी का पूरा पूरा इल्म व यकीन था। मगर चूंकी अपनी बीवी का मामला था। इस लिए आपने अपनी तरफ से अपनी बीवी की बराअत और पाकदामनी का एअलान करना मुनासिब नहीं समझा। और वहीए इलाही का इन्तिज़ार फरमाने लगे। हाँ इस दर्मियान में आप अपने मुख्लिस अस्हाब से इस मामले में मश्वरा फ़रमाते रहे ताकि उन लोगों के ख़यालात का पता चल सके । बुखारी जि.२ स. ५९४)
चुनान्चे हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु से जब आप ने उस तोहमत के बारे में, गुफ्तगू फ़रमाई। तो उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये मुनाफिक यकीनन झूटे है। इस लिए कि जब अल्लाह तआला को ये गवारा नहीं है कि आपके जिस्मे अतहर पर एक मक्खी भी बैठ जाए। क्योंकि मक्खी नजासतों पर बैठती है। तो भला जो औरत ऐसी बुराई की मुरतकब हो खुदावंदे कुडूस कब? और कैसे बर्दाश्त फरमाएगा कि वो आपकी जौजियत में रह सके।
हज़रते उस्मान गनी रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जब अल्लाह तआला ने
आपके साया को जमीन पर नहीं पड़ने दिया ताकि उस पर किसी का पाँव न पड़ सक तो भला उस मअबूदे बरहक की गैरत कब ये गवारा करेगी कि कोई इन्सान आपकी ज़ौजए.मुहतरमा के साथ ऐसी कबाहत का मुरतकब हो सके? हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु ने ये गुज़ारिश की कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) एक मर्तबा आपकी नअलैने अकदस में नजासत लग गई थी। तो अल्लाह तआला ने हज़रते जिबरईल अलैहिस्सलाम को भेजकर आपको खबर दी कि आप अपनी नअलैने अक़दस को उतार दें इस लिए हज़रते बीबी आएशा मआज़ल्लाह अगर ऐसी होतीं तो ज़रूर अल्लाह तआला आप पर वही नाज़िल फ़रमा देता कि ‘आप उनको अपनी जौजियत से निकाल दें।
हज़रते अबू अय्यूब अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु ने जब इस तोहमत की खबर सुनी तो उन्होंने अपनी बीवी से कहा कि ऐ बीवी! तू सच बता! अगर हज़रते सफ़वान बिन मुअत्तल की जगह मैं होता तो क्या तू ये गुमान कर सकती है कि. मैं हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हरम पाक के साथ ऐसा कर सकता था? तो उनकी बीवी ने जवाब दिया। कि अगर हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा की जगह मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बीवी होती। तो खुदा की कसम! मैं कभी ऐसी खयानत नहीं कर सकती थी। तो फिर हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा जो मुझ से लाखों दर्जे बेहतर हैं। और हज़रते सफवान बिन मुअत्तल रदियल्लाहु अन्हु जो बदरजहा तुम से बेहतर हैं भला क्योंकर मुमकिन है कि ये दोनों ऐसी ख़यानत कर सकते हैं? (मदारिकुल तन्जील मिस्री जि.२ स. १३४ ता १३५)
बुखारी की रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस मामले में हज़रते अली और उसामा रदियल्लाहु अनहुमा से जब मशवरा तलब फरमाया तो हज़रते उसामा रदियल्लाहु
ने बरजस्ता कहा कि
“अहलुका वला नअलमु इल्ला खैरा” कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम वो आपकी बीवी हैं और हम उन्हें अच्छी ही जानते हैं। और हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु ने ये जवाब दिया कि या रसूलल्लाह! अल्लाह तआला ने आप पर कोई तंगी नहीं डाली है। औरतें उनके सिवा बहुत हैं। और आप उनके बारे में उनकी लौंडी (हज़रते बरीरा) से पूछ लें। वो आपसे सच मुच
कह देंगी!
हज़रते बरीरा रदियल्लाहु अन्हा से जब आपने सवाल फ़रमाया तो उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) उस जाते पाक की कसम जिसने आपको रसूले बरहक बनाकर भेजा है कि मैं ने हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अनहा में कोई अब नहीं देखा हाँ इतनी बात ज़रूर है कि वो अभी कमसिन लड़की हैं वो गूंधा हुआ आटा छोड़कर सो जाती हैं और बकरी आकर खा डालती है!
फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी जौजए मुहतरमा हज़रते जैनब बिन्ते जहिश रदियल्लाहु अन्हा से दर्याफ्त फ़रमाया जो हुस्न- जमाल में हज़रते आइशा रदियल्लाहु अनहा की मिस्ल थीं। तो उन्होंने कसम खाकर ये अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! “अहमी समई व बसरि वल्लाहि मा अलिम्तु इल्ला खैरा” मैं अपने कान और आँख की हिफाजत करती हूँ। खुदा की कसम मैं तो हज़रते बीबी आइशा को अच्छी ही जानती हूँ।
(बुखारी बाब हदीसुल इफक जि.२ स. ५९६) इस के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक दिन मिंबर पर खड़े होकर मुसलमानों से फ़रमाया कि उस शख्स की तरफ़ से मुझे कौन मझुजूर समझेगा। या मेरी मदद करेगा जिसने मेरी बीवी पर बोहतान तराशी करके मेरी दिल आजारी की है।
अलिन्तु अला अह्या इल्ला खैरा” खुदा की कसम! मैं अपनी बीवी को हर तरह की अच्छी ही जानता हूँ
“व ल-कद ज-क-रू रजूलम मा अलिम्तु अलैहि इल्ला खैरा” और उन लोगों (मुनाफ़िकों) ने (इस बोहतान में) एक ऐसे मर्द (सफ़वान बिन मुअत्तल) का ज़िक्र है। जिसको मैं बिल्कुल अच्छा ही जानता हूँ।
(बुखारी जि.२ स. ५९५ हदीसुल इफक) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बरसरे जिंबर इस तकरीर से मालूम हुआ कि हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हज़रते आइशा और हज़रते सफवान बिन मुअत्तल रदियल्लाहु अन्हुमा दोनों की बराअत व तहारत और इफ्फ़त व पाकदामनी का पूरा पूरा इल्म और यकीन था। और वही नाज़िल होने से पहले ही आपको यकीनी तौर पर मालूम था कि मुनाफिक झूटे और उम्मुल मुमिनीन पाकदामन हैं। वर्ना आप बरसरे मिंबर कसम खाकर उन दोनों की अच्छाई का मजमओ आम में हरगिज़ एअलानं न फ़रमाते। मगर पहले ही एअलाने आम न फ़रमाने की वजह यही थी कि अपने बीवी की पामदामनी का अपनी ज़बान से एअलान करना हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मुनासिब नहीं समझते थे। जब हद से ज़्यादा मुनाफिकीन ने शोर- गोगा कर दिया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मिंबर पर अपने ख़याले अकदस का इज़हार फरमा दिया। मगर अब भी एअलाने आम के लिए आप को वहीए इलाही का इन्तिज़ार ही रहा।
ये पहले तहरीर किया जा चुका है कि उम्मुल मोमिनीन हजरते आइशा रदियल्लाहु अन्हा सफ़र से आते ही बीमार होकर साहिबे फराश हो गई थीं। इस लिए वो इस बोहतान के तूफान से बिल्कुल ही बे खबर थीं। जब उन्हें मर्ज से कुछ सेहत हासिल हुई। और वो एक रात हज़रते उम्मे मिसतह सहाबिया रदियल्लाहु अन्हा
के साथ रफअ हाजत के लिए सहरा में तशरीफ ले गई। तो उनकी जबानी उन्होंने इस दिलखराश और रूहफरसा खबर को सुना जिस से उन्हें बड़ा धचका लगा। और वो शिहते रंज व गम से निढाल हो गईं। चुनान्चे उनकी बीमारी में मजीद इजाफा हो गया। और वो दिन रात बिलक बिलक कर रोती रहीं। आखिर जब उनसे ये सदमए जानकाह बर्दाश्त न हो सका। तो वो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से इजाजत लेकर अपनी वालिदा के घर चली गईं और इस मनहूस खबर का तज़्किरा अपनी वालिदा से किया। माँ ने काफी तसल्ली व तशफ्फी दी। मगर ये बराबर लगातार रोती ही रहीं। इसी हालत में नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए। और फरमाया कि ऐ आइशा! तुम्हारे बारे में ऐसी ऐसी ख़बर उड़ाई गई है। अगर तुम पाकदामन हो और ये ख़बर झूटी है। तो अनकरीब खुदावंद तआला तुम्हारी बराअत का बजरिओ वही एअलान फ़रमा देगा। वर्ना तुम
तौबा व इस्तिगफार कर लो। क्योंकि जब कोई बन्दा खुदा
से तौबा करता है। और बख्शिश माँगता है तो अल्लाह तआला उसके गुनाहों को मुआफ फ़रमा देता है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ये गुफ्तुगू सुनकर हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा के आँसू बिल्कुल थम गए। और उन्होंने अपने वालिद हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु से कहा कि आप रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जवाब दीजिए। तो उन्होंने फरमाया कि खुदा की कसम मैं नहीं जानता कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को क्या जवाब दूं? फिर उन्होंने माँ से जवाब देने की दरख्वास्त की। तो उनकी माँ ने भी यही कहा। फिर खुद हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ये जवाब दिया कि लोगों ने जो एक बे बुनियाद उड़ाई है और ये लोगों के दिलों में बैठ चुकी है। और कुछ लोग इसको सच समझ चुके हैं। इस सूरत में अगर मैं ये कहूँ कि मैं पाक दामन हूँ तो लोग इसकी
तसदीक करेंगे । और अगर मैं इस बुराई का इकरार कर लूँ तो सब मान लेंगे हालाँकि अल्लाह तआला जानता है कि मैं इस इलज़ाम से बरी और पाक दामन हूँ। इस वक्त मेरी मिसाल हज़रते यूसुफ अलैहिस्सलाम के बाप (हजरते यअकूब अलैहिस्सलाम) जैसी है लिहाजा मैं भी वही कहती हूँ जो उन्होंने कहा था यानी
:- “फ-सबरुन जमील। वल्लाहुल मुस-तआनु अला मा तसिफून ।” ये कहती हुई उन्हेंने करवट बदल कर मुँह फेर लिया। और कहा कि अल्लाह तआला जानता है कि मैं इस तोहमत से बरी और पाकदामन हूँ। और मुझे यकीन है कि अल्लाह तआला ज़रूर मेरी बराअत जाहिर फरमा देगा। हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का जवाब सुनकर अभी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी जगह से उठे भी न थे। और हर शख्स अपनी जगह पर बैठा ही हुआ था कि नागहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर वही नाज़िल होने लगी। और आप पर वही के वक्त की बे चैनी शुरू हो गई। और बावुजूद ये कि शदीद सर्दी का वक्त था। मगर पसीने के कतरात मोतियों की तरह आप के बदन से टपकने लगे। जब वही उतर चुकी तो हंसते हुए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ आइशा! तुम खुदा का शुक्र अदा करते हुए उसकी हम्द करो। कि उसने तुम्हारे बराअत और पाकदामनी का एलान फ़रमा दिया। और फिर आपने कुरआन की सूरए नूर में से दस आयतों की तिलावत फरमाई। जो Basn is — “इन्नल्लजीना जाऊका बिल इफ़कि से शुरू होकर
“व अन्नल्लाहा रऊफुर रहीम। पर ख़त्म होती है।
इन आयात के नाज़िल हो जाने के बाद मुनाफ़िकों का मुँह काला हो गया। और हज़रते उम्मुल मोमिनीन बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा की पाकदामनी का आफताब अपनी पूरी
आब-ो ताब के साथ इस तरह चमक उठा कि कियामत तक आने वाले मुसलमानों के दिलों की दुनिया में नूरे ईमान से उजाला हो गया। हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु को हजरते मिसतह बिन उसासा पर बड़ा गुस्सा आया। ये आपके खलाजाद भाई थे और बचपन ही में उनके वालिद वफात पा गए थे तो हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने उनकी परवरिश भी की थी। और उनकी मुफ़िलसी की वजह से आप उनकी माली इमदाद फरमाते रहते थे। मगर इसके बा वुजूद हज़रते मिसतह बिन उसासा रदियल्लाहु अन्हु ने भी इस तोहमत तराशी और इस का चर्चा करने में कुछ हिस्सा लिया था इस वजह से हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने गुस्से में भरकर ये कसम खा ली कि अब मैं मिसतह बिन उसासा की कभी भी कोई माली इमदाद नहीं करूँगा। इस मौकअ पर अल्लाह तआला ने ये आयत नाज़िल फ़रमाई कि – वला यश-तलि ऊलुल फदति मिन्कुम वस-स-अति अय्युअ-तू ऊलिल कुर्बा वल-मसाकीना वलमुहाजिरीना फी सबीलिल्लाहि, वल-यअफू वल-यस- फहू। अला
तुहिब्बूना अय्यगफिरल्लाहु लकुम। वल्लाहु गफूरुर रहीम। तर्जमा :- और कसम न खाएँ वो जो तुम में फजीलत वाले और गुन्जाइश वाले हैं। कराबत वालों, और मिस्कीनों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों को देने की। और चाहिए कि मुआफ करें और दर गुज़र करें। क्या तुम इसे पसन्द नहीं करते कि अल्लाह तुम्हारी बख्रिशश करे, और अल्लाह बहुत बख्शने वाला और बड़ा मेहरबान है।
इस आयत को सुनकर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने अपनी कसम तोड़ डाली। और फिर हज़रते मिसतह बिन उसासा रदियल्लाहु अन्हु का खर्च बदस्तूर साबिक अता फरमाने लगे। (बुखारी हदीसुल इफक जि. २ स. ५९५ ता ५९६)
फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे नबवी में एक खुत्या पढ़ा। और सूरए नूर की आयतें तिलावत फरमाकर मजमले आम में सुना दीं। और तोहमत लगाने वालों में हज़रते हस्सान बिन साबित व हज़रते मिसतह बिन उसासा । हजरते हमना बिन्ते जहिश रदियल्लाहु अन्हु और रईसुल मुनाफिकीन अब्दुल्लाह बिन उबई इन चारों को हद्दे किजफ की सजा में अस्सी अस्सी दुर्रे मारे गए।
(मदारिज जि.२ स. १६३ वगैरा) शारेह बुखारी अल्लामा किरमानी अलैहिर्रहमा ने फ़रमाया कि हज़रते बीबी आएशा की बराअत और पाकदामनी कतई व यकीनी है जो कुरआन से साबित है। अगर कोई इसमें जरा भी शक करे तो वो काफिर है। (हाशिया बुख़ारी जि. २ स. ५९५) दूसरे तमाम फुकहाए उम्मत का भी यही मसलक है।

