
Hadith Kanzul Ummal 2386


The Awaited Imām Mahdī (علیہ السلام)
Economic Prosperity and Fair Distribution of Wealth


मक्का मुअज़्ज़मा में इस्लाम का पहला तालीमी और तब्लीगी मरकज़ कोहे सफा के दामन में वाक़ेअ दारे अरक़म था.. उसी में हुज़ूर नबी ए करीम ﷺ अपने साथियों को इस्लाम की तालीमात से रोशनास फरमाते- अभी मुसलमानों की तादाद 39 तक पहुंची थी कि सैय्यदिना सिद्दीक़ अकबर رضی اللّٰہ عنہ ने इस ख्वाहिश का इज़हार किया कि:
“मैं चाहता हूं कि कुफ्फार के सामने दावते इस्लाम ऐलानिया पेश करूं-“
आक़ा करीम ﷺ के मना फरमाने के बावजूद उन्होंने इसरार किया तो आप ﷺ ने इजाज़त मरहमत फरमा दी-
सैय्यदिना सिद्दीक़ अकबर رضی اللّٰہ عنہ ने लोगों के दरमियान खड़े होकर खुत्बा देना शुरू किया जबकि रसूलुल्लाह ﷺ भी तशरीफ फरमा थे- पस आप ही वो पहले खतीब (दाई) थे जिन्होंने सबसे पहले अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ की तरफ लोगों को बुलाया- इस बिना पर आपको इस्लाम का “खतीबे अव्वल” कहा जाता है-
नतीजतन कुफ्फार ने आप पर हमला कर दिया और आपको इस क़द्र ज़दो कोब किया कि आप खून में लतपत हो गए- उन्होंने अपनी तरफ से आपको जान से मार देने में कोई कसर ना छोड़ी थी जब उन्होंने महसूस किया कि शायद आपकी रूह क़फसे अन्सरी से परवाज़ कर चुकी है तो उसी हालत में छोड़ कर चले गए- आपके खानदान के लोगों को पता चला तो वो आपको उठा कर घर ले गए और आपस में मशवरे के बाद फैसला किया कि हम इस ज़ुल्म का ज़रूर बदला लेंगे लेकिन अभी आपकी सांस और जिस्म का रिश्ता बरक़रार था- आपके वालिदे गिरामी अबू क़ुहाफा वालिदा और आपका खानदान आपके होश में आने के इंतज़ार में था,मगर जब होश आया और आंख खोली तो आप رضی اللّٰہ عنہ की ज़बाने अक़सद पर जारी होने वाला पहला जुमला ये था:
“रसूलुल्लाह ﷺ का क्या हाल है?”
तमाम खानदान इस बात पर नाराज़ होकर चला गया कि :
“हम तो इसकी फिक्र में हैं और इसे किसी और की फिक्र लगी हुई है-“
आपकी वालिदा आपको कोई शय खाने या पीने के लिए इसरार से कहतीं लेकिन उस आशिक़े रसूल ﷺ का हर मर्तबा यही जवाब होता कि :
“उस वक़्त तक कुछ खाऊंगा ना पिऊंगा जब तक मुझे अपने महबूब ﷺ की खबर नहीं मिल जाती कि वो किस हाल में हैं-“
लख्ते जिगर की ये हालते ज़ार देखकर आपकी वालिदा कहने लगीं:
“खुदा की क़सम ! मुझे आपके दोस्त की खबर नहीं कि वो कैसे हैं?”
आप رضی اللّٰہ عنہ ने वालिदा से कहा कि:
“हज़रत उम्मे जमील رضی اللّٰہ عنہا बिन्ते खत्ताब से हुज़ूर ﷺ के बारे में पूछ कर आओ-“
आपकी वालिदा उम्मे जमील رضی اللّٰہ عنہا के पास गईं और अबूबक्र رضی اللّٰہ عنہ का माजरा बयान किया- चूंकि उन्हे भी अपना इस्लाम खुफिया रखने का हुक्म था इसलिए उन्होंने कहा कि:
“मैं अबूबक्र رضی اللّٰہ عنہ और उनके दोस्त मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह ﷺ को नहीं जानती- हां अगर तू चाहती है तो मैं तेरे साथ तेरे बेटे के पास चलती हूं-“
हज़रत उम्मे जमील رضی اللّٰہ عنہا आपकी वालिदा के हमराह जब सैय्यदिना सिद्दीक़ अकबर के पास आईं तो उनकी हालत देखकर अपने जज़्बात पर क़ाबू ना रख सकीं और कहने लगीं:
“मुझे उम्मीद है कि अल्लाह तआला ज़रूर उनसे तुम्हारा बदला लेगा -“
आपने फरमाया! इन बातों को छोड़ो मुझे सिर्फ ये बताओ:
“रसूलुल्लाह ﷺ का क्या हाल है?”
उन्होंने इशारा किया कि:
“आपकी वालिदा सुन रही हैं-“
आपने फरमाया:
“फिक्र ना करो बल्कि बयान करो-“
उन्होंने अर्ज़ किया:
“आप ﷺ महफूज़ और खैरियत से हैं-“
पूछा:
“आप ﷺ इस वक़्त कहां है”
उन्होंने अर्ज़ किया कि:
“आप ﷺ दारे अरक़म में ही तशरीफ फरमा हैं-“
आपने ये सुनकर फरमाया:
“मैं उस वक़्त तक खाऊंगा ना कुछ पियूंगा जब तक कि मैं अपने महबूब ﷺ को इन आंखों से बखैरियत ना देख लूं-“
शमा ए मुस्तफ्वी ﷺ के इस परवाने को सहारा देकर दारे अरक़म लाया गया- जब हुज़ूर ﷺ ने इस आशिक़े ज़ार को अपनी जानिब आते हुए देखा तो आगे बढ़ कर थाम लिया और अपने आशिक़े ज़ार पर झुक कर उसके बोसे लेना शुरू कर दिए- तमाम मुसलमान भी आपकी तरफ लपके- अपने यारे ग़मगुसार को ज़ख्मी हालत में देखकर हुज़ूर ﷺ पर अजीब रिक़्क़त तारी हो गई-
उन्होंने अर्ज़ किया कि:
“मेरी वालिदा हाज़िरे खिदमत हैं उनके लिए दुआ फरमाएं कि अल्लाह तआला उन्हे दौलते ईमान से नवाज़े-” आक़ा करीम ﷺ ने दुआ फरमाई और वो दौलते ईमान से शरफयाब हो गईं…!!!
اللهم صل على سيدنا محمد النبي الأمي
وعلى آلہ وازواجہ واھل بیتہ واصحٰبہ وبارك وسلم ❤
حوالہ :
ابن کثير، البدايه والنهايه (السيرة)، 3 : 230
حلبی، السيرة الحلبيه، 1 : 3475
ديار بکری، تاريخ الخميس، 1 : 4294
طبری، الرياض النضره، 1 : 397

ताज महल को लोग शाहजहां और मुमताज के नाम से जानते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि 1631 से आज तक ताजमहल की रक्षा कौन कर रहा है? इस खूबसूरत इमारत की रक्षा कर रहे हैं चार पीर, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
क्या है मान्यता
हर वर्ष ताजमहल पर मुग़ल बादशाह शाहजहां का तीन दिवसीय उर्स मनाया जाता है लेकिन जिन पीरों (संतों) की वजह से ताजमहल की नींव रखी गई जिनकी वजह से आज ताजमहल की इमारत कायम है, उन पीरों की दरगाह को हर साल उर्स के मौके पर श्रद्धा और सुविधा से वंचित रखा जाता है। इतना ही नहीं, मान्यता भी ये है कि अगर कोई जायरीन शाहजहां की जियारत करने आया है तो उसे सबसे पहले पीर हजरत अहमद बुखारी की दरगाह पर जाकर माथा टेकना होता है उसके बाद शाहजहां की मजार पर जाना चाहिए लेकिन ताजमहल की चकाचौंध में परंपराओं की अनदेखी की जा रही है।
हजरत जलाल शरीफ दरगाह।
भूत औऱ जिन्न नहीं बनने दे रहे थे ताजमहल
दरगाह अहमद बुखारी शाह के सज्जादानशीन मो. निजाम शाह बताते हैं कि जब मुग़ल बादशाह शाहजहां ताजमहल की नींव रखवा रहे थे उसी दौरान भूत-जिन्न कारीगरों को ताजमहल की बुनियाद रखने नहीं दे रहे थे। वे रात में कारीगरों को डराकर भगा देते थे साथ ही रखी हुई नींव को ध्वस्त कर देते थे। इसके चलते कोई भी कारीगर यहां रुकने को तैयार नहीं था।
हजरत लाल शाह बुखारी दरगाह।
अरब से बुलाए गए थे पीर
ताजमहल की नींव रखी जा सके और बिना किसी विघ्न के ताजमहल का निर्माण पूरा हो सके इसके लिए इमामों ने मुग़ल बादशाह शाहजहां को अरब में बुखारा शहर के पीर हजरत अहमद बुखारी को बुलाने की राय दी। शाहजहां के बुलावे पर पीर अपने तीन भाइयों के साथ सैय्यद जलाल बुखारी शाह, सैय्यद अमजद बुखारी शाह और सैय्यद लाल बुखारी शाह भारत चले आए। शाहजहां सभी पीर बाबाओं को खुद लेकर आगरा आए थे।
हजरत अहमद शाह बुखारी दरगाह।
तब जाकर रखी गई नींव
दरगाह कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने बताया कि चारों पीर बंधुओं ने आगरा में ताजमहल के नींव परिसर पर पहुंचकर कुरान और कलमों की तिलावत (पाठ) कराया। इसके बाद शाहजहां के हाथों नींव रखवाकर ताजमहल को बनवाने का काम शुरू करवाया। तब कहीं जाकर ताजमहल का निमार्ण पूरा हो सका।
हजरत अमजद बुखारी दरगाह।
ताकि ताज रहे सुरक्षित
जानकार मुनव्वर अली ने बताया कि चारों पीर बाबाओं के जन्नत में पहुंचने के बाद उन चारों की मजार ताज के चारों कोनों पर बनाई गईं। हजरत अहमद की मजार पूर्वी गेट के पास बनी हुई है। जलाल बुखारी की पश्चिमी, लाल बुखारी की थाना ताजगंज और अमजद बुखारी की बिल्लोचपुरा (तेलीपाड़ा) में बनाई गई। सैय्यद मुनव्वर ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि जब तक ताज के चारों ओर इनकी दरगाह मौजूद हैं तब तक ताज को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
शाहजहां से पहले पीर की जियारत जरुरी
दरगाह अहमद बुखारी के सज्जादानशीन मो. निजाम शाह ने बताया कि उर्स पर जियारत करने वाले श्रद्धालुओं के लिए मान्यता है कि अगर वे जियारत करने शाहजहां की मजार पर जाना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले अहमद बुखारी की दरगाह पर आना होगा, तभी उनकी जियारत पूरी होगी।
ताज की अपेक्षा नहीं है यहां सुविधाएं
स्थानीय निवासी शाहिद ने बताया कि यहां इस परंपरा को माना नहीं जा रहा है। एक तरफ ताजमहल पर दिनभर में 50 से 60 हजार श्रद्धालु आकर चले जाते हैं वहीं, सैय्यद अहमद बुखारी की दरगाह पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कुछ एक हजार होती है। इसके अलावा प्रशासन जितनी मुस्तैदी से ताज परिसर में व्यवस्थाएं करता है उसकी अपेक्षा में यहां कोई ध्यान भी नहीं देता।
क्या कहना है स्थानीय लोगों का
दरगाह कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुईन बाबूजी ने बताया कि शाहजहां के उर्स से पहले पीर अहमद बुखारी शाह का उर्स शुरू हुआ था। लेकिन ताजमहल की चकाचौंध और लोगों की धारणा ने पीर बाबा को पीछे कर दिया। वहीं ताजमहल इंतजामिया कमेटी के सैय्यद मुनव्वर अली ने बताया कि ताजमहल की वजह से लोग शाहजहां का उर्स करने के लिए पहले जाते हैं। लेकिन ये गलत है जो मान्यता और जो परंपरा है उसका पालन करना चाहिए।