Bughz e Ahele Bayt

इस तरह की न जाने कितनी रिवायतें हैं जो बिना किसी गौर ओ फिक्र के अवाम मे आम हैं। सूरह शुअरा की आयत नंबर 214 के कंटेक्स्ट में यह रिवायत है, उस आयत के ज़रिये अपने क़रीबी रिश्तेदारों से तबलीग़ के आग़ाज़ का हुक्म दिया गया। बस उसी पहली तबलीग़ का यह खुतबा इस रिवायत में बयान किया गया है। इस रिवायत को बतौर दलील कुछ पढे लिखे कमअक़्ल लोग निस्बत और सोहबत की तरदीद में इस्तेमाल करते हैं कि “निस्बत या रिश्तेदारी कोई फायदा नहीं देती” अब चंद नुक्ते बयान करता हूँ जिनपर गौर ओ फिक्र करना ज़रूरी है।

1. जिस वक़्त यह पहला खुतबा दिया गया उस वक़्त सैय्यदा फातमा की उम्र कितनी थी?

2. हुज़ूर नबी करीम ने क्या नाबालिग़ बच्चों को भी दीन की तबलीग़ फरमायी?

3. इस खुतबे में क्या मौला अली / सैय्यदा फातमा को हुज़ूर नबी करीम ने बतौर रिश्तेदार दावत दी थी या वो मेज़बान थे ?

4. क्या सैय्यदा खदीजतुल कुबरा भी इस तबलीग़ के बाद ईमान लायी थीं ?

5. क्या सैय्यदना अबू बकर सिद्दीक भी हुज़ूर के इन रिश्तेदारों में शामिल थे ?

6. अगर सैय्यदना अबू बकर सिद्दीक सबसे पहले ईमान लाने वाले हैं, तो क्या मौला अली या सैय्यदा फातमा ने इस खुतबे में इस्लाम की तरदीद की थी ? अब इसके बर अक्स इन्ही कुतुबे अहादीस से सैय्यदा फातमा और दीगर अहले बैत के फ़ज़ाइल भी देखिये इस रिवायत की हैसियत और कमबख्त मुल्लाओं के कमीनेपन की पोल खुल जायेगी। मगर कमीनों को निस्बत के ताल्लुक से ऐसी रिवायत कभी नहीं दिखाई देगी कि –

अगर कोई शख्स बैतुल्लाह के गिलाफ़ में लिपट कर मर जाये और इस हाल में मरे कि अहले बैत से बुग्ज़ रखता था तो जहन्नुम में जायेगा अगरचे तमाम उम्र सजदे में रहे और रोज़े रखे।

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