ACCOUNT OF THE FIRST HIJRAH OF THE COMPANIONS OF THE APOSTLE OF ALLAH, MAY ALLAH BLESS HIM, TO ABYSSINIA I

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Volume 1, Parts 1.50.1

Muhammad Ibn `Umar informed us: Hisham Ibn Sa’d informed us on
the authority of al-Zuhri; he said:
When the number of the Muslims grew and the faith became known and
the subject of common talk, the unbelievers of the Quraysh attacked,
tortured and imprisoned them; they wanted to reconvert them.
Thereupon the Apostle of Allah, may Allah bless him, said: Be scattered
in the earth. They said: Where (are we) to go, 0 Apostle of Allah? He
said: That way, and pointed towards Abyssinia, and it was the dearest of
lands to migrate to. Many Muslims migrated; some of them with their
families and the others without them. Ultimately they reached Abyssinia.

Volume 1, Parts 1.50.2
Muhammad Ibn `Umar informed us: Yunus Ibn Muhammad al-Zafari
informed us on the authority of his father, he on the authority of a man of
his tribe; (second chain) he (Ibn Sa`d) said: ‘Ubayd Allah Ibn al-`Abbas
al-Hudhali informed us on the authority of al-Harith Ibn al-Fudayl; they
said:
They (Muslims) migrated secretly and their number consisted of eleven
men and four women, till they reached al-Shu`aybah. Some of them were
riding while others were walking on foot. When they reached (the coast),
luckily two boats of the merchants (were there); they boarded them,
paying half a dinar each. Their migration took place in the month of
Rajab in the fifth year after the commencement of prophethood of the
Apostle of Allah, may Allah bless him. The Quraysh followed them; but
when they reached the coast they had boarded (the boats); they did not
find them. They (emigrants) said: We landed in Abyssinia where we got
the best of neighbours, and were therefore in peace about our faith; we
worshipped Allah and we were not hurt, nor we heard any word
displeasing to us.

Volume 1, Parts 1.50.3
Muhammad lbn `Umar informed us; he said: Yunus Ibn Muhammad
related to me on the authority of his father; (second chain) he (Ibn Sa`d)
said: `Abd al-Hamid Ibn Ja`far related to me on the authority of
Muhammad Ibn Yahya Ibn Habban; he said:
The name of the men and women (who migrated) are (I) ‘Uthmàn Ibn
‘Affan) with his wife Ruqayyah, the daughter of the Apostle of Allah,
may Allah bless him, (2) Abu Hudhayfah Ibn ‘Utbah Ibn Rabi`ah with
his wife Sahlah, the daughter of Suhayl Ibn ‘Amr, (3) al-Zubayr Ibn al-
`Awwàm Ibn Khuwaylid Ibn Asad, (4) Mus’ab lbn `Umayr Ibn Hashim
Ibn `Abd Manaf Ibn `Abd al-Dar, (5) `Abd al-Rahman Ibn `Awf Ibn
`Abd `Awf Ibn `Abd Ibn al-Harith Ibn Zuhrah, (6) Abu Salamah Ibn
`Abd al-Asad Ibn Hilál Ibn `Abd Allah Ibn Makhzum with his wife Umm
Salamah, the daughter of Abu Umayyah Ibn al-Mughirah, (7) ‘Uthman
Ibn Maz`un al-Jumahi (8) ‘Amir Ibn Rabi`ah al-`Anzi, the ally of Banu
‘Adi Ibn Ka`b with his wife Layla, the daughter of Abu Hathmah, (9)
Abu Sabrah Ibn Abi Ruhm Ibn `Abd al`Uzza al-‘Amiri, [P. 137] (10)
Hatib Ibn `Amr Ibn `Abd Shams, (11) Suhayl Ibn Bayda, a member of
the tribe of Banu al-Harith Ibn Fihr, and (12) `Abd Allah Ibn Mas’ud the
ally of Banu Zuhrah.

Zikr e Hazrat Abdullah Al Mahaz yaum e shahadat 18 Ramzan.

*Hazrat Abdullah Al Mahaz Alaihis Salaam Jo Shaikh e Bani Hashim Ke Naam Se Jaane Jaate Hai Aap Bhi Be Misl o Be Misaal The Aur Aapko Mahaz is Liye Kaha Jata Hai Ki Aap Bahut Khalisun Nasab The Najeeb fatmi Sadaat The Aur Aap Bhi Apne Waqt Ke Peshwa Aur Sardar The Jinki Tazeem Har Adna o Aala Bakhoobi Baja Laata Tha.*
.
*Aapko Iraq Ke ek Qhaid Khane Mein Shahadat Naseeb Hui.
.
*Aap Par Behad Durood O Salaam Ya Hazrat Abdullah Al Mahaz Alaihis Salaam*
.
اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ بَارِکْ وَ س٘لِّمْ

*18 Ramzan ul Mubarak*

*Yaume Shahadat*

*Aale Rasool Aulad e Mola Ali wa Syyeda Batool Noor e Nazar e Mola Imaam Hasan Mujtuba Nawasa e Mola Imaam Hussain Hazrat Syedna Imaam Abdullah Al Mahaz (Alaihis Salam)*

*Aapki Shahadat 18 Ramzan ul Mubarak 145 Hijri Mutabik 9 December 762 Esvi Baroz Jumerat Abbasi Khalifa Abu Jafar Abdullah Al Mansoor Ke Qaid Khane Me Hui, Aap Ameer ul Momineen Hazrat Syedna Mola Imaam Hasan Mujtuba (Alaihis Salam) Ke Pote Aur Syyed ush Shohada Hazrat Syedna Mola Imaam Hussain (Alaihis Salam) Ke Nawase The, Aap Apne Walid e Majid Hazrat Imaam Hasan Musanna (Alahis Salam) Ke Mureed wa Khalifa Hain, Huzoor Ghous ul Aazam Hazrat Syed Abdul Qadir Jilani Mehboobe Subhani (Rehmatullah Alaih) Aapki 8vi Pusht Me Hain, Aap Sabse Pehle Najeeb ut trafain Yani Hasani Hussaini Syed Hain, Aapka Mazar Mubarak Kufa, Iraq Me Marjai Khaliak Hain…*

Hadith:Jo Ali se juda ho gaya.

Rasoolullah (ﷺ) Ne Farmaya Un Logon Ka Kya Haal Hoga Jo Ali Ki Shaan Mein Gustakhi Karte Hein Jaan Lo Jo Ali Ki Gustakhi Karta Hai Woh Meri Gustakhi Karta Hai Aur Jo Ali Se Juda Hua Woh Mujhse Juda Hogaya Beshak Ali Mujhse Aur Mein Ali Se Hun, Uski Takhliq Meri Mitti Se Huyi Aur Meri Ibrahim Ki Mitti Se Aur Mein Ibrahim Se Afzal Hun.

(Mujam al-Awsat, 49)
(Majma al-Zawaid,128)

इतिहास में दफ़्न वो दो मख़सूस फ़तवे

*इतिहास में दफ़्न वो दो मख़सूस फ़तवे जिनकी वजह से आज मुसलमान तालीम ओ तरक़्क़ी में पसमांदा है..*

आज से तक़रीबन एक हज़ार साल पहले 1100 AD में मज़हबे -इस्लाम साइंस के गोल्डन दौर से गुज़र रहा था।
ये वो दौर था जब बग़दाद साइंस और जदीद टेक्नोलॉजी का मरकज़ हुआ करता था। दुनिया भर के तालिब-ए-इल्म साइंस की जदीद तालीम के लिए बगदाद का रुख करते थे। उस दौर में यूरोप तालीम के ऐतबार से तारीकियों में डूबा हुआ था। साइंस मुसलमान की पहचान माना जाता था। ये वो दौर था जब दुनियावी तालीम के हर शोबे Algebra, Algorithm, Agriculture, Medicine, Navigation , Astronomy , Physics, Cosmology, Psychology वग़ैरा वग़ैरा में मुसलमान एक पहचान माना जाता था ।
फिर ये हुआ कि ये सब अचानक रुक गया। इल्म , फ़लसफ़ा , ईजाद और दानाई का ये दौर मुसलमानों के बीच से अचानक ग़ायब होने लगा।
वजह ?
*वजह बना एक फ़तवा जो अपने वक़्त के इस्लामिक विद्वान कहे जाने वाले इमाम अल ग़ज़ाली ( 1058 – 1111 ) ने अपनी मशहूर किताब तहाफुत अल फ़लसफ़ा (تهافت الفلاسفة) के ज़रिये दिया..*

*किताब की इस तफ़्सीर के मुताबिक़ नम्बर्स (संख्याओं) के साथ खेलना शैतान का काम है इसलिए Mathematical calculation से मुसलमानों को दूर रहना चाहिए।*
इमाम अल ग़ज़ाली ईरान के खोर्सान सूबे के तबारन में पैदा हुए। उस दौर के मुसलमानों के बीच उनका इतना रुतबा था कि लोग उन्हें मुजद्दिद और हुज्जत -उल – इस्लाम कहते थे । ज़ाहिर है उस वक़्त के मुसलमानों ने इस फ़तवे के ख़िलाफ़ जाना इस्लाम के ख़िलाफ़ जाना तसव्वुर किया। *नतीजा ये हुआ कि मुसलमानों ने उन सब साइंसी ईजादों और रिसर्च से मुंह फेर लिया जिनमें किसी भी तरह की कैलकुलेशन होती थी..और हम जानते हैं कि बिना मैथमेटिकल कैलकुलेशन के आप किसी भी तरह की जदीद टेक्नोलॉजी में कामयाब हो ही नहीं सकते। यानि लगभग हर तरह के साइंस से मुसलमानों ने मुंह फेर लिया..*

अमेरिका के नील डी ग्रास टाइसन ( Neil deGrasse Tyson ) जिन्हें मौजूदा दौर का आइंस्टीन माना जाता है ,के मुताबिक़ इमाम ग़ज़ाली की यही बुनियादी ग़लती साबित हुई और मुसलमान हर तरह के इल्म से पिछड़ता चला गया।
*इमाम ग़ज़ाली के इस फतवे के बाद सब कुछ जैसे थम सा गया। किसी ने मानो उसे अपाहिज बना दिया। इनके इस ग़लत इंटरप्रिटेशन की वजह से इस्लाम आज तक नहीं उभर पाया है।* उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाया।

*दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब प्रिंटिंग प्रेस की ईजाद हुई और जिसको हराम क़रार दिया गया था।..*
तुर्की के ऑटोमन ख़िलाफ़त ( 1299 – 1922 ) के दौर में जब जर्मनी में 1455 में प्रिंटिंग प्रैस की ईजाद हुई तो उस वक़्त के सुंल्तान सलीम (अव्वल) ने ख़िलाफ़त के शैख़ुल -हदीस के कहने पर किसी भी तरह की किताब के छापने पर पाबन्दी लगा दी। और *एलान किया कि जो कोई भी प्रिंटिंग प्रेस का इस्तेमाल करता पाया गया उसको मौत की सजा दी जाएगी। ये 1515 की बात है।* उस वक़्त ख़िलाफ़त तुर्की से निकलकर साउथ ईस्ट यूरोप , सेंट्रल यूरोप के कुछ हिस्सों , वेस्टर्न एशिया और नार्थ अफ़्रीक़ा तक फैली हुई थी। *इस फ़तवे का बहुत दूर तक असर हुआ और उस वक़्त की मुसलमानों की तरक़्क़ी की रफ्तार यकायक थम गई।*
दूसरी अक़वाम ने उसे हाथों हाथ लिया और साइंस पर मबनी किताबें , रिसर्च पेपर्स , न्यूज़ पेपर्स , इन्वेंशन आर्टिकल्स छापे जाने लगे , दूर दूर तक इल्म फैलने लगा और दूसरी क़ौमें इससे फायदे उठाने लगीं। प्रिंटिंग प्रेस पर मुसलमानों का ये *खुदसाख़्ता बैन तक़रीबन 1784 में जाकर हटाया गया लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया में पहली किताब 1817 में जाकर छापी जा सकी।*
यानि प्रिंटिंग प्रैस की ईजाद से तक़रीबन 362 सालों की तवील मुद्दत के बाद। *इन 362 सालों में पूरी दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई थी। नई -नई ईजादों और इल्म की रौशनी जो प्रिंटिंग प्रैस के ज़रिये फैली थी मुसलमान उस रौशनी से महरूम ही रहा।*

ये थे वो दो फ़तवे जिनकी वजह से मुसलमान आज वहां नहीं है जहाँ उसे होना चाहिए था।

आज अगर हम इन फ़तवों के बारे में सोचते हैं तो अजीब लगता है कि आखिर इसमें ग़ैर इस्लामी और हराम क़रार दिए जाने जैसा क्या था !
*लेकिन आज भी हम ऐसे ही हैं जैसे उस ज़माने में थे। आज भी अजीब -अजीब फ़तवे दिए जाते हैं और हम अपनी ज़बान सिले रहते हैं, बल्कि कहा जाये कि इन फ़तवों का खैर -मक़दम करते हैं।*
और हमारी इस फितरत की वजह साफ़ है कि हम मज़हबे -इस्लाम को आज भी ठीक तरह से नहीं समझ पाए हैं। *जो हमारे उलेमा ऐ दीन ने कह दिया वो हमारे लिए पत्थर की लकीर की तरह है।* हम ये मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि उलेमा ऐ दीन भी ग़लती कर सकते हैं।

*बहरहाल अजीब फ़तवों की फेहरिस्त लम्बी है। कुछ और नमूने पेश हैं -*

जब हवाई जहाज़ की ईजाद हुई तो बर्रे सग़ीर से फ़तवा जारी किया गया कि जहाज़ में सफ़र करना हराम है। फ़तवे के मुताबिक़ इतनी ऊँचाई पर इंसान का सफ़र करना खुदा की कुदरत को ललकारने जैसा है।

इसी तरह जब रेडियो की ईजाद हुई तो फतवा दिया गया कि ये शैतान की आवाज़ है।

कैमरा और टीवी पर तो आज तक फ़तवा जारी है।

इसी तरह आज कोई ब्लड ट्रांसफ्यूजन को हराम क़रार दे रहा है और कोई हेयर ट्रांसप्लांट को। कोई जेनेटिक इंजीनियरिंग को हराम क़रार दे रहा है।

पूरी दुनिया के साइंसदाँ यूनिवर्स के एक्सप्लोरेशन की खोज के सुनहरे दौर तक पहुँच चुके हैं। ग्रैविटेशनल फाॅर्स वेव्स और Higgs पार्टिकल्स की बात हो रही है। लोग एक्सप्लोर कर रहे है ,यूनिवर्स के क्वांटम स्टेट के बारे में पूछ रहे हैं।
Cosmology की infinity के बारे में सवाल उठाये जा रहे हैं। मार्स के सरफेस पर रिसर्च हो रहे हैं। मेडिकल साइंस भी जेनेटिक इंजिनीरिंग तक जा पहुंचा है जिससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी बस ख़त्म होने को है और ये सिर्फ एक छोटी सी झलक है कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी है।

और हम ?
*हमारी समझ और मैच्योरिटी का लेवल ये है कि हम अभी तक इस बात से खुश हो जाते हैं कि एक खीरे में ” अल्लाह ” या ” मुहम्मद ” लिखा पाया गया है। हमारी समझ का लेवल ये है कि किसी क़ुरबानी के बकरे पर ” मुहम्मद ” लिखा हुआ पाया गया है। ये आखिर है क्या और हम इससे दीन की क्या ख़िदमत कर रहे हैं ?*
हम साबित क्या करना चाहते हैं ?
इसी पसमंज़र में आइये देखते हैं कि पिछले सौ सालों में हमने दुनिया को क्या दिया है या क्या उससे लिया है –
आइये देखते हैं कि सन 1900 से 2018 के दौरान नोबेल प्राइज हासिल करने वालों में हम कहाँ है और बाक़ी दुनिया कहाँ है –
पूरी दुनिया में यहूदियों की आबादी ज़्यादा से ज़्यादा एक करोड़ पचास लाख है और मुसलमानों की आबादी लगभग सौ करोड़ पचास लाख। या कह लीजिये कि पूरी दुनिया की आबादी के मुक़ाबले सिर्फ 0.2% . लेकिन नोबेल पाने वालों में उनकी तादाद 21.97% है। आज तक कुल 892 लोगों को नोबेल दिया जा चुका है उसमे से 196 नोबेल यहूदियों के नाम हैं। यहूदियों के मुक़ाबले मुसलमानों की आबादी लगभग सौ गुना है लेकिन कुल मिलाकर सिर्फ तीन नोबेल। सिर्फ़ तीन। ये है दुनिया को हमारा योगदान।
हो दरअसल ये रहा है कि पिछली *एक सदी से हम पहले साइंस और जदीद टेक्नोलॉजी को हराम क़रार देते हैं और फिर मजबूरन उसे अपना भी लेते हैं।*
मोबाइल हराम, इंटरनेट हराम, फेसबुक हराम, ट्विटर हराम, टीवी हराम, तस्वीर बनाना हराम ……..
*लगता है उम्मत सिर्फ़ हराम और हलाल का फ़र्क़ करने में ही ख़त्म हो जाएगी।*