4 Shaban Yaum e Wisal, Ummul Mominen Hazrat Sayyeda Hafsa SalamUllahAlaiha..



4 Shaban Yaume Wisal, Ummul Mominen Hazrat Sayyeda Hafsa SalamUllahAlaiha

Hazrat Hafsa ky walid hazrat umar farooq or apki waleda sahabiya hazrat zainab bint mazoon hai hazrat hafsa us qabeele bani addi se tallok rakhti hai jink 14 afrad ba jange badar wo ohad me sharik hoe or huzor s.a.w.m k mohafiz hoe..or mecca me jo apka

kabela ky log the jo islam nai lae the wo log kuffar mecca ka sath nai diye jange badar wo ohad me..hazrat hafsa us wakat paida hoi jab ahle mecca tameere kaba me masrof the. ap ne 10 saal ki umar me hi islam qubol kr liye the..apka nikah awwal sahabie rasool hazrat

khunais bin huzafa the jo jange badar me shahed hoe tab umar farooq ko apk nikah sani ki zarorat mahsos hoi to ap ne hazrat abu bakar or hazrat usman ko nikah krne se mana farmaya or hazrat abu bakar ne koi jawab nai diya tab hazrat umar ne rasool allah s.a.w.m ko shikayat ki tab ap s.a.w.m ne farmaya ky hafsa ko in se bahtar shohar mile ge fir ap s.a.w.m ne hazrat hafsa se nikah farmae tab hazrat abu bakar r.z ne farmaya tha k mai ne rasool allah s.a.w.m ko hazrat hafsa k mutaliq baat krte hoe suna tha to is wajah se nikah k mutalliq jawab nai diya..hazrat hafsa r.z din ko roza or rato ko qayam farmati, or dajjal k fitno se bahot dara krti. hazrat hafsa azwaj me 4 number per hoi.. isi tarah azwaj me se jin shakisyat ne talimate nabvi ko faylane ka kaam kre un me hazrat hafsa 3 number per hai. imam novi farmate hai ky hazrat hafsa se 160 hadis milti hai.. hazrat hafsa quran ki ayato ko yaad farma leti or hazrat shifa r.zjo huzor s.a.w.m ki dai thi unk zimedari thi k wo hazrat hafsa ko likhna sikhae or bimario ka ilaj sikhae is tarah azwaj me hazrat hafsa doctor bhi hoi.. baad ap ne quran ki ayato ko likhna shro farmaya or yahi nuskha hazrat abu bakar r.z ki khilafat k daur me state document k taur pe use hoa baad me hazrat umar

r.z ko wo nuskha mila fir hazrat hafsa ne usko mahfoz farmaya hazrat usman ne apni

daure khilafat me alal elan ap se wada farmaya k aap mujhe wo quran ka nuskha dijiye mai uski copy banwa k apko return kro ga tab hazrat hafsa ki nigrani me bhi quran sharif

ki wahi copy banwai gai or hazrat hafsa jo jo ayate likhe the likhne wale ko hukm diye the k mere bagair nai likhna qk mai jis tarah rasool allah se suni thi waysa hi likhwao gi or sath hi hazrat hafsa quran suna krti thi. katibo se… isi liye apko hafiza or warise sahifa

kaha gaya. jab ulema me SALATUL WUSTA ka masla pesh aya k kon si namaz central muqam rakhti hai zada afzal hai to hazrat hafsa ki hi bayan ki gai hadiso se asar namaz ko salatul wusta kaha gaya…apki umar 60 baras hoi apki namaz janaza marwan ne padaya jo us wakat madine ka hakim tha.. hazrat abu huraira or hazrat abdullah ibn umar or hazrat asim wagira ne apko jannatul baki me tadfeen kre..

कौन_उमर ?

कौन_उमर ?
हज़रते उमर फारूक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ के दौर में एक बद्दू (कम पढ़ा लिखा ) आप رضی اللہ تعالیٰ عنہ से मिलने मदीने को चला,जब मदीने के पास पहुंचा तो आधी रात का वक़्त हो चुका था साथ में हामिला बीवी थी तो उसने मदीने की हुदूद के पास ही ख़ैमा लगा लिया और सुबह होने का इंतज़ार करने लगा, बीवी का वक़्त क़रीब था तो वो दर्द से कराहने लगी,हज़रत उमर फारूक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ अपने रोज़ के गश्त पर थे और साथ में एक गुलाम था,जब आप ने देखा कि दूर शहर की हुदूद के पास आग जल रही है और ख़ैमा लगा हुआ है तो आपने गुलाम भेजा कि:
“पता करो कौन है-“
जब पूछा तो उसने डांट दिया कि:
“तुम्हे क्यूं बताऊं-“
आप गए और पूछा तो भी नहीं बताया- आपने कहा कि:
“अंदर से कराहने की आवाज़ आती है कोई दर्द से चीख रहा है,बताओ बात क्या है?”
तो उसने बताया कि:
“मैं अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक़ से मिलने मदीना आया हूं मैं गरीब हूं और सुबह मिल कर चला जाऊंगा,रात ज़्यादा है तो खैमा लगाया है और सुबह होने का इंतज़ार कर रहा हूं, बीवी उम्मीद से है और वक़्त क़रीब क़रीब आन पहुंचा है-“
तो आप जल्दी से पलट कर जाने लगे कि:
“ठहरो मैं आता हूं-“
आप अपने घर गए और फौरन अपनी ज़ौजा से मुखातिब हुए कहा कि:
“अगर तुम्हें बहुत बड़ा अज्र मिल रहा हो तो ले लोगी-“
ज़ौजा ने कहा:
“क्यूं नहीं-“
तो आपने कहा:
“चलो मेरे दोस्त की बीवी हामिला है, वक़्त क़रीब है चलो और जो सामान पकड़ना है साथ पकड़ लो-“
आपकी बीवी ने घी और दाने पकड़ लिए और आपको लकड़ियां पकड़ने का कहा,आपने लकड़ियां अपने ऊपर लाद लीं..سبحان اللہ
(ये कोई काउंसलर,नाज़िम,एम पी,या एम एल ए नहीं ये उसका ज़िक्र हो रहा है दोस्तों जो कि 22 लाख मुरब्बा मील का हुक्मरान है जिसके क़वानीन आज भी चलते हैं जो उमर फारूक़ है) जब वो लोग वहां पहुंचे तो फौरन काम में लग गए बद्दू ऐसे हुक्म चलाता जैसे आप शहर के कोई चौकीदार या गुलाम हैं,कभी पानी मांगता तो आप दौड़े दौड़े पानी देते कभी परेशानी में पूछता कि तेरी बीवी को ये काम आता भी है तो आप जवाब देते,जबकि उसको क्या पता कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक़ खुद हैं-
जब अंदर बच्चे की विलादत हुई तो आपकी ज़ौजा ने आवाज़ लगाई:
“या अमीरुल मोमिनीन ! बेटा हुआ है-“
तो या अमीरुल मोमिनीन की सदा सुनकर उस बद्दू की तो जैसे पांव तले ज़मीन निकल गई और बे इख्तियार पूछने लगा:
“क्या आप ही अमीरुल मोमिनीन हैं? आप उम्र फारूक़ हैं? वही जिसके नाम से क़ैसरो किसरा कांपे आप वही वाले उमर हैं ?”
जिसके बारे में हज़रत अली ने कहा कि:
“आपके लिए दुआ करता हूं और जिसके लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने दुआ मांग कर इस्लाम के लिए मांगा वही वाले ना ?”
आपने कहा:
“हां हां मैं वही हूं-“
उसने कहा कि:
“एक गरीब की बीवी के कामकाज में आपकी बीवी, खातूने अव्वल लगी हुई हैं और धुंए के पास आपने अपनी दाढ़ी लपेट ली और मेरी खिदमत करते रहे?”
तो सैय्यिदना उमर रो पड़े उस बद्दू को गले से लगाया और कहा:
“तुझे पता नहीं तू कहां आया है ?? ये मदीना है मेरे आक़ा ﷺ का मदीना यहां अमीरों के नहीं गरीबों के इस्तक़बाल होते हैं, गरीबों को इज़्ज़तें मिलती हैं,मज़दूर और यतीम भी सर उठा कर चलते हैं..!!