सुलतान टीपू पार्ट 5

सुलतान टीपू के कारनामे

जंग और सुलह

सुलतान टीपू अपने बाप हैदर अली की मृत्यु के बाद मैसूर का बादशह बना तो उस वक्त सुलतान के सबसे बड़े दुश्मन अंग्रेज़ थे। लेकिन जब सुलतान ने उन्हें लगातार शिकस्तें दी तो अंग्रेजों को मालूम हुआ कि टीपू अपने बाप हैदर अली से भी ज़्यादा बहादुर, जंगजू और माहिर (कुशल) सिपहसालार है और वे जंग के मैदान में टीपू पर कभी फ़तह हासिल नहीं कर सकते। टीपू को सिर्फ चालाकी व मक्कारी और फ़रेब से ही हराया जा सकता था। चुनांचे उन्होंने चालबाज़ी से काम लेते हुए अपने एलचियों के हाथों बहुत-से कीमती तोहफ़ों के साथ सुलह की दरख्वास्त भेजी। व l
सुलतान टीपू ने अंग्रेज़ वफ़्द (नुमाइन्दों की जमाअत) से चन्द शर्तो पर सुलह का समझौता कर लिया और वफ़्द में शामिल एलचियों को इनाम व इकराम से नवाजा। इस सुलह के बाद सुलतान को अंग्रेजों की तरफ़ से फौरी तौरपर कोई ख़तरा न रहा। उसने एलचियों को बड़ी इज्जत से रुखसत किया और इत्मीनान से दूसरे दुश्मनों से निमटने का सोचने लगा। अंग्रेजों से सुलह की शर्ते यह थी कि अंग्रेज़ सुलतान के कैदियों को रिहा कर देंगे और सुलतान के इलाके भी वापस कर देंगे जबकि सुलतान भी उनके इलाके वापस कर देगा और उनके कैदी भी रिहा कर देगा।

अगरचे अंग्रेजों ने सुलतान टीपू के साथ सुलह कर ली थी लेकिन अन्दर से अब भी वे सुलतान के दुश्मन थे। अंग्रेजों के अलावा मरहटे भी सुलतान के दुश्मन थे। सुलतान का तीसरा दुश्मन हैदराबाद का हुकुमरान निजामुल-मुल्क था। ये तीनों हैदर अली के भी दुश्मन थे। मगर उनमें खुल कर सुलतान टीपू से लड़ने की हिम्मत न थी। चुनांचे अंग्रेज़ों ने मरहटों और निज़ाम हैदराबाद को उकस.या कि वे टीपू का बन्दोबस्त करें और उससे मैसूर का इलाका छीन लें वरना टीपू उनके इलाकों पर कब्जा कर लेगा।

मरहटों को टीपू के पिता हैदर अली ने जो शर्मनाक शिकस्तें दी थीं, उनका बदला लेने के लिए मरहटे पहले ही इन्तिकाम की आग में जल रहे थे। चुनांचे मरहटों ने निज़ाम हैदराबाद से मिलकर मैसूर पर हमला करने की योजना बनाई। उनका ख़याल था कि वह मैसूर को फ़तह करके टीपू को मार भगाएंगे और मैसूर का इलाका आपस में बांट लेंगे। अंग्रेजों ने भी मरहटों और निज़ाम को अपनी तरफ़ से मदद देने का यकीन दिलाया था।

मैसूर पर हमला

रियासत मैसूर की सरहद पर सुलतान का एक किला था। उस सरहदी किले का नाम बादामी था। मरहटों और निज़ाम हैदराबाद की फौजों ने मिल कर उस सरहदी किले पर हमला किया और किला का मुहासिरा करके उसपर गोलाबारी शुरू कर दी। निज़ाम हैदराबाद की फौज में चालीस हज़ार सवार, पचास हज़ार पैदल और बेशुमार गोला बारूद था, जबकि मरहटों की फ़ौज में अस्सी हज़ार सवार, चालीस हज़ार पैदल, पचास तोपें और बहुत-सा दूसरा जंगी सामान था। किला वालों ने नौ महीने तक दुश्मन का मुकाबला किया। लेकिन उनकी तादाद कम थी जबकि हमला करने वालों की कुल तादाद दो लाख के करीब थी। इतनी ज़्यादा फ़ौज का किला वाले आखिर कब तक मुकाबला करते। नौ महीने के लम्बे मुहासिरे से तंग आकर किला के वालों ने हथियार डाल दिए और दुश्मन फ़ौजों ने किला पर कब्जा करके उसे अपनी छावनी बना लिया।

दुश्मन ने किला बादामी से अपनी फ़ौजों को मैसूर के दूसरे इलाकों पर चढ़ाई करने के लिए भेजा तो मैसूर के कई किलादारों ने टीपू से गद्दारी की और दुश्मन का मुकाबला करने की बजाए उनसे भारी रिश्वत व इनामात लेकर किले उनके हवाले कर दिए। इस थोड़े ही दिनों में सुलतान टीपू के बहुत सारे इलाकों पर दुश्मन फौजों ने कब्जा कर लिया। सुलतान टीपू को जंग का हाल और किलादारों की गद्दारी के बारे में पता चला तो वह ग़ज़बनाक हो गया, उसने अपनी फौज को तैयार किया और मार-धाड़ करता हुआ निज़ाम के एक इलाके की तरफ बढ़ने लगा। उस किले का हाकिम या किलादार निज़ाम हैदराबाद का दामाद था।

की सरकूबी की और उन्हें लगातार शिकस्तें देता हुआ दरिया-ए-तंग भद्रा तक पहुंचा। मरहटे पीछे हटते हुए दरिया के पार चले गए, लेकिन सुलतान ने उनका पीछा न छोड़ा और दरिया के पार पहुंच गया। वहां मरहटों के साथ जबरदस्त जंग हुई। आखिरकार मरहटों को शिकस्त हुई और वे मैदान छोड़ कर भाग गए। सुलतान टीपू ने उन्हें संभलने का मौका न दिया और शाहनूर पर हमला कर दिया।

मरहटों ने यहां भी सुलतान की फ़ौज का मुकाबला करने की कोशिश की, लेकिन वे सुलतान की फ़ौज के सामने न ठहर सके। सुलतान टीपू ने उन्हें हरा कर शाहनूर पर कब्जा कर लिया।

फैसलाकुन जंग

सुलतान टीपू ने मरहटों से छोटी-छोटी जंगों के बाद एक फैसलाकुन जंग लड़ने का इरादा करके मरहटों को पैगाम भेजा कि “हार-जीत का एक ही बार फैसला हो जाए तो ज्यादा बेहतर है। चुनांचे छोटी-छोटी जंगों के बजाए एक जगह खुलकर लड़ाई की जाए।” मरहटों ने काफी सोचने के बाद सुलतान से बड़ी जंग लड़ने का फैसला किया और एक दिन दोनों फ़ौजें मैदान में आ गई। पहले दोनों फ़ौजों से एक-एक दस्ता मैदान में आकर मुकाबला करता रहा। सुलतान का पल्ला भारी रहा और मरहटों को काफी नुकसान पहुंचा।

मरहटों को डर हुआ कि इसी तरह मुकाबला होता रहा तो उनकी सारी फ़ौज मारी जाएगी। चुनांचे उन्होंने मुकाबले की शर्त की ख़िलाफ़वर्जी करते हुए पूरे लश्कर के साथ सुलतान की फौज पर हमला कर दिया। सुलतान की फौज ने फौरन ही मरहटों पर गोलाबारी शुरू कर दी और बहादुर सिपाही तलवारबाजी के कमाल दिखाने लगे। सुलतान के इस
अचानक हमले से मरहटे बौखला गए और मैदान से भाग गए। इस तरह सुलतान टीपू ने दुश्मन पर जीत हासिल की।

मरहटों ने इस हार से घबराकर सुलतान टीपू से सुलह की दरख्वास्त की और सुलतान ने इस शर्त पर उनसे सुलह कर ली कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के कैदियों को आजाद करके फ़तह किए गए इलाके भी वापस कर देंगे। फिर दोनों पक्षों ने सुलह की शर्त पर अमल किया। यह सुलह भी सुलतान टीपू की बहुत बड़ी जीत थी।

निजाम की गलती

सुलतान टीपू दिल से चाहता था कि निज़ाम हैदराबाद से भाई-चारे के सम्बंध बनें और दोनों मुसलमान रियासतें मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ डट जाएं, जो हिन्दुस्तान पर कब्जा करके अपनी हुकूमत कायम करने और हिन्दुस्तान के निवासियों को गुलाम बनाने की नीयत रखते थे। अगरचे निजाम ने मरहटों के साथ मिलकर मैसूर पर हमला किया था लेकिन फिर भी सुलतान टीपू निज़ाम हैदराबाद की यह गलती माफ़ करके उसके साथ सुलह व अमन से रहना चाहता था। चुनांचे मरहटों से सुलह करने के बाद उसने एक दूत को पैगाम देकर निज़ाम हैदराबाद के पास भेजा। दूत ने निज़ाम के दरबार में पहुंच कर उसे सुलतान टीपू की तरफ से भेजे गए बहुत से तोहफे पेश किए और सुलतान का संदेश जबानी बयान किया। सुलतान ने अपने पैगाम में कहा,

“जनाब-ए-आली! अंग्रेज़ सिर्फ हमारा ही नहीं आपका भी दुश्मन है। वे पूरे हिन्दुस्तान को गुलाम बनाना चाहते हैं और हमें एक दूसरे के साथ लड़वा कर और हमारी आपस की नाइत्तिफ़ाक़ी से फायदा उठाकर हिन्दुस्तान पर आहिस्ता-आहिस्ता कब्ज़ा करते –
जा रहे हैं। मैसूर और हैदराबाद की सलतनत को बचाने के लिए यही बेहतर है कि हम आपस में सुलह करके इत्तिफ़ाक व मुहब्बत से रहें, अपने-अपने इलाके की तरक्की और सुरक्षा पर ध्यान दें और वादा करें कि आइन्दा हम एक-दूसरे पर हरगिज़ हमला नहीं करेंगे।”

सुलतान टीपू ने अपने अमन व मुहब्बत के पैगाम पर अमल करने का तरीका भी निज़ाम पर स्पष्ट कर दिया। सुलतान ने कहा,

“प्यार व मुहब्बत और अमन व सलामती से रहने का सबसे बेहतरीन तरीका यह है कि आपस में करीबी तअल्लुकात और रिश्तेदारियां कायम की जाएं। यानी हमारे घराने की लड़कियां आपके ख़ानदान में और आपके घराने की लड़कियां हमारे खानदान में में ब्याही जाएं। इस तरह जब हमारी आपस में रिश्तेदारियां कायम हो जाएंगी तो हमारे बीच लड़ाई-झगड़े के इमकानात न रहेंगे और हम रिश्तों का लिहाज़ करने और उन्हें बरकरार रखने पर मजबूर होंगे।”

पहले तो निज़ाम हैदराबाद को सुलतान का यह प्रस्ताव पसन्द आया और उसने इसपर खुशी का इज़हार किया, लेकिन बाद में बिगड़ , गया। क्योंकि उसके वज़ीरों, सलाहकारों और ख़ानदान की औरतों ने सुलतान टीपू के प्रस्ताव का सख़्त विरोध करते हुए निज़ाम को भड़काया कि “हमारी लड़कियां टीपू के ख़ानदान में ब्याही जाएं तो यह हमारे ऊंचे ख़ानदान की बेइज्जती होगी, टीपू नीच जात का है, इस लिए उससे रिश्तेदारी कायम नहीं की जा सकती।” उन लोगों के भड़काने पर निज़ाम को टीपू पर गुस्सा आ गया और उसने टीपू के प्रस्ताव को > ठुकरा दिया।

बाद के हालात ने साबित कर दिया कि निज़ाम ने सुलतान टीपू के प्रस्ताव को न मान कर जबरदस्त गलती की थी। क्योंकि अगर वह सुलतान की सुलह की पेशकश स्वीकार कर लेता तो उन दोनों की ताकत हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के कदम न जमने देती।

कोचीन पर कब्जा

अंग्रेजों ने सुलतान से सुलह के वक्त एक-दूसरे से जंग न करने – का समझौता किया था। लेकिन अंग्रेजों ने मजबूरी में सुलह का समझौता किया था और वे किसी ऐसे बहाने की तलाश में थे कि मैसूर पर वे हमला कर सकें। अंग्रेज़ वादा ख़िलाफ़ थे और उन्हें सुलहनामे की कोई परवाह न थी। फिर मैसूर के इलाके मालाबार में बगावत हो गई। सुलतान ने फ़ौरन बागियों पर हमला करके बग़ावत पर काबू पा लिया। उसे पता चला कि मालाबार की बगावत असल में पड़ोसी रियासत कोचीन और त्रावणकोर के राजा की शरअंगेज़ी थी, तो उसने गुस्से में आकर कोचीन पर हमला कर दिया और उसपर कब्जा करके त्रावणकोर के राजा को सजा देने के लिए बढ़ा। राजा ने घबराकर अंग्रेजों से मदद मांगी। अंग्रेजों ने सुलह के समझौते की ख़िलाफ़वर्जी करते हुए सुलतान टीपू पर हमला कर दिया।
सुलतान टीपू को अंग्रेजों के समझौता तोड़ने पर बेहद गुस्सा आया और उसने डटकर अंग्रेजों का मुकाबला किया। इस जंग में अंग्रेज़ों को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा और अंग्रेज़ फ़ौज बदहवास होकर मद्रास की तरफ भाग गई।

Gazwae Tabook Nabi Pak ﷺ ka akhri gazwa.

⚜️ *GAZWAE TABUK* ⚜️
mahe rajjab wo shaban
*(RASOOL ALLAH ﷺ ka akhri gazwa)*
👉🏻 sure tawba me ayat no 6 se 16 me is gazwe ka zikr hai..
👉🏻ye gazwa me sahabae karam ko bahot zada takleef, bhuk ki shiddat, sakht garmi, tangadsti ka samna krna pada is waja se isko JAISH AL ISRAT kaha gaya.. or is gazwe me munafqen ruswa hoe is waja se isko gazwa fadah kaha gaya..

👉🏻IS MAUKE PE RASOOL ALLAH ﷺ NE *HADIS MANZILAT* Irshad farmae.. madine me hazrat ali r.z ko apna naib banae or farmae AYE ALI TUMHARI MUJ SE WAHI NISBAT HAI JO HARUN KI MUSA SE THI MGR MERE BAAD KOI NABI NAI..

👉🏻mulky sham k karib rumio ne gasni kabele k sath 1 lack ka lashkar tayyar krk madine pe hamla krne wale the jab Rasool Allah ﷺ ko iski khabar pohchi to 30 hazar sahaba k sath aap tabuk pohche..


*MOJZEAE NABI (1)*
Ap ﷺ ne farmaya kal tum sab suraj buland hone k baad tabuk pohcho ge.. lekin koi waha k pani ko hath na lagae.. jab ap ﷺ waha pohche to ek barik pani ki dhar bah rahi thi sahaba ne wo pani jama krk apﷺ ke pas lae to ap ne us se pani se hath or mu dhoe or usi pani me apna loabe dahen shamil kiye or farmae k us barik chashme me usko shamil kr do.. sahaba farmate hai us chashme se fir is qadar pani nikla k ham 30 hazar log sairab ho gae…

👉🏻lashkare islam ki haybat kuffar me baith gai jis se rumio ne ksi qism ki jang krne se apne ap ko roke rakha..

*MOJZAE NABI (2)*
👉🏻Isi mauke pe khane ki shaded killat ho gai to sahaba ne mashora kiya k apni sawari ky unt zibah krk khane ka intezam kre to hazrat umar farooq r.z ne farmaya ya rasool allah ﷺ tamam sahaba apne pas bacha hoa khana ek dastar pe jama kr den or ap ﷺ is me barkat ki dua kren to allah isme barkat dega.. to aysa hi hoa tamam sahaba apne pas ka khana le aae huzor ﷺ ne barkat ki dua farmai or 30 hazar sahaba khana khae or mahfuz bhi kre…

Ref:- msulim sharif hadis no 139, zarkani etc…

22 Rajab ko Sayyeduna Imam Jafar Sadiq Alaihissalam se kya Nisbat hai?

22 Rajab ko Sayyeduna Imam Jafar Sadiq Alaihissalam se kya Nisbat hai?

“Wilayat 2 tarah ki hain. Ek Wilayat e Kubra yaani Badi Wilayat aur dusri Wilayat e Sugra Choti Wilayat. Jaha Wilayat e Sugra ki inteha hai wahase Wiilayat e Kubra ki Ibteda hai. Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne Maula-e-Kainat Sayyeduna Maula Ali Sher e Khuda KarramAllahu Wajhahul Kareem ko Ghadir e Khum ke Muqaam par “Man Kuntu Maula Fa Haza Aliyyum Maula” yaani jiska Mai Maula uska Ali Maula. Aur Jiska Mai Wali uska Ali Wali. Ye Aylan Karke Sayyeduna Ali Alaihissalam ke Zariye Ummat ki Rehnumayi keliye Wilayat ka Darwaza Khola. Ye Wilayat e Kubra Thi. Yaani Imam-e-Wilayat banaya. Sayyeda-e-Kainat Salamullahi Alaiha bhi Is Muqaam par Thin. Fir Hasanain Kareemain Alaihi-Musaalam ko Ye Muqaam Hasil hua. Fir Imam Zainul Aabideen Alaihissalam Samet Purey 11 Imam is Muqaam pe Faaiz hue aur Huzoor Sarkar Gaus ul Aazam RadiAllahu Ta’ala Anhu ko bhi Ye Muqaam Ata hua isliye ab Har Wali Huzoor Sarkar Gaus e Aazam ka Gulam hai. Fir jab 12we Imam Sayyeduna Imam Muhammad Mahdi Alaihissalam ka Zahoor hoga to Aapko bhi ye Muqaam hasil hoga aur Aap par Wilayat ka Darwaza band hojayega yaani Aapke baad koi Wali nahi banega kyunki Qayamat bahot kareeb he hogi us waqt.

To Ye Muqaam Jisey Gausiyat e Kubra bhi kaha jata hai wo sirf In Hastiyo ko Nasib hua aur baaki jitne Aulia hain Sabko Wilayat e Sugra ata hui. To In Mubarak Hastiyo me Jo 6th Imam Hue Unka Naam hai Sayyeduna Imam Jafar Sadiq Alaihissalam!!

Aap Sayyeduna Imam Hussain Alaihissalam ke Pote Sayyeduna Imam Muhammad al Baqir Alaihissalam ke Shehzade Hain. Aur Aap 2 Turk se Sayyeduna Siddiq-e-Akbar RadiAllahu Ta’ala Anhu ke Nawase hain, isliye Aap Farmaya karte ke Mai Hazrat Abu Bakr Siddiq RadiAllahu Ta’ala Anhu Ka Dohra Beta Hun!!

Wilayat ka matlab hota hai Marifat yaani Baatini Uloom ka Ilm. To Aap sabse Unche Muqaam e Wilayat pe Faaiz They, magar Zaahiri Ilm me bhi Aap Jaisa koi na tha isliye to Saare Muhaddiseen aur Fuqaha ke Imam, jinhe Imam e Aazam kaha jata hai, Wo Imam Abu Hanifa RadiAllahu Anhu kehte hain Zindagi ke jo 2 Saal Mai Imam Muhammad Baqir aur Imam Jafar Sadiq (Alaihi-Mussalam) ke Kadmo me baitha, agar wo 2 saal meri zindagi me na hote to mai halaak hogaya hota!!

Yaani Imam Jafar Sadiq Alaihissalam ka Wo Ilmi Muqaam wa Martaba hai ke jo Unke Kadmo me baith jaaye (yaani gulami, shagirdi me aajaye) to wo “Imam-e-Aazam” hojaye!!

Ye to They Deeni Uloom, Scientific Knowledge me bhi Aapka koi Saani nahi.

Chemistry ke founder Imam Jafar Sadiq Alaihissalam Hain aur Mashoor Islamic Scientist Jabir ibne Hayyan, Aap he ke Shagird hain!! Kitabo me Aapke aur bhi Zabardast Scientific Knowledge aur Contribution ke bareme bhi aaya hai!!

To isi tarah 22 Rajjab ul Murajjab ko Allah Ta’ala ne Aapko Gausiyat-e-Kubra ke Muqaam pe Faaiz Farmaya, iske Shukrane ke Taur pe Aapne Niyaz banake logo ko Khilaya.”

Aur aaj Imam Alaihissalam ke Muhibbeen Imam-e-Aali Muqaam ki Bargah me Khiraaj-e-Aqeedat, Isaal-e-Sawab ki niyat se logo ko apne ghar bulaake khilaate hain. Agar to koi Isaale Sawab ka he munkir hai, to ussey to koi baat he nahi. Haan lekin jo Isaal-e-Sawab ko maanta hai, apne gharke marhoomo keliye bhi Isaal e Sawab karta hai, Auliya ke Urs pe bhi karta hai, agar usko Imam Jafar Sadiq Alaihissalam ke Mubarak Naam ki Niyaaz se taklif hai to iska matlab hai ke us badbakht ko Ahle Bayt-e-Ath’aar se he taklif hai. Aur jiske dilme Ahle Bayt-e-Pak Alaihi-Mussalam se bugz hai to uska sab kuch barbaad hai.

Alaihi-Muswalatu was-Salaam

[ye words Shaykh ul Iskam ke nahi hain par Is post me ki almost saari baate sirf Niyaz ki chodkar, Shaykh ul Islam ke alag alag lectures se he jama ki hui hain]

कुंन्डे की नियाज़

कुंन्डे की हकीकत‼️

मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा❤️
22 रज़ब की हकीकत कुछ इस तरह है..👇
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22 रज़ब उल मुरज्जब सैय्यदना इमाम ज़ाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम की न्याज।
*हिजरी सन 122 रज़ब की 22तारीख की रात यानी 21का* दिन गुजर कर22की रात ब वक़्त नमाज़े तहज्जुद *अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने* सैय्यदना इमाम ज़ाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम को *मक़ाम ए वुस अत ए कुबराअता फरमाया*

:-ये ज़हन में रखियेगा की मक़ाम ए वुस अत ए कुबरा सैय्यदना इमाम ज़ाफर सादिक अलैहिस्सलाम को अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने अता फ़रमाइ -:
22 रजब को अज़ीम नेमत मक़ाम ए वूस अत ए *हासिल होने के बाद सैय्यदना इमाम ज़ाफर सादिक़* अलैहिस्सलाम ने सुबह के वक़्त अल्लाह रब्बुल इज्ज्त की जानिब *ब’तौरे शुक्र अदा करने के लिए नियाज़* बनवाई जो दूध और चावल मिलाकर बनाइ गई जिसे हम खीर कहते हैं।

सैय्यदना इमाम ज़ाफर ऐ सादिक़ अलैहिस्सलाम ख़ानदाने रसूल सलल्लाहु अलैहिवसल्लम के चश्मों चिराग है,
आप के घर में टुटी चटाई ओर मिट्टी के बरतन ही थे इसी पर आप शाकिर ओ साबिर थे,
आप मिट्टी के पियाले में नियाज रखकर अपने दोस्तों ओ अहबाब को बुलाकर फरमाया के आज रात अल्लाह पाक ने मुझे मक़ामे गौसियत ऐ कुबरा अता फरमाए इस का शुक्र अदा करते हुए ये न्याज आप लोगों को बतौर ऐ तबर्रूक पेस करता हूं,
आप के शहजादे *सैय्यदना इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम* ओर दीगर मुशाहेबिन ने दरयाफ्त किया के इस न्याज में हमारे लिए फायदा है आप ने फरमाया के रब्बे काबा की कसम अल्लाह ने जो नेअमत मुझे अता फरमाए जिस का मैं शुक्र अदा करता हूं न्याज की शक्ल में *इसी तरह।इसी तारीख में जो भी शुक्र अदा करेगा* और हमारे वसीले से जो दुआ मांगेगा तो अल्लाह रब्बुल इज्ज़त उसकी मुराद ज़रूर पूरी फरमाएगा ओर दुआ ज़रूर क़ुबूल होगी।
क्योंकि *अल्लाह रब्बुल इज्ज़त अपने शुक्र गुजार बंदों को मायूस नहीं फरमाता।* …..

1:मिन्हाजूस्सालेहिंन/मुसन्निफ़; सैय्यदना इमाम मोहिय्युद्दीन इब्ने अबुबकर बग़दाद✍️✍️

2: कशफुल असरार :सैय्यदना इमाम अब्दुलाह बिन अली अशफहानि ✍️✍️

3: मदाम ए असरार अहलेबैत: सैय्यदना इमाम मुहम्मद बिन इस्माइल मुत्तक़ी मक्की ✍️✍️

4: मख’जन ऐ अनवारे विलायत★सैय्यदना इमाम बुरहानुद्दीन
अश्क़’लानी✍️✍️

Maula Ali AlaihisSalam ka Zikr e Jameel 8

Hazrat Ammar bin Yasir Radiallahu anhoo bayan karte hain ke maine Huzoor Nabi
Akram ﷺ Hazrat Ali AlaihisSalam ke liye farmate hue suna: (Ay Ali!)mubarakbaad ho usey jo Tujhse muhabbat karta hai aur Teri tasdeeq karta hai. Aur halakat ho uske liye jo Tujhse bugz rakhta hai aur Tujhe jhutlata hai.”

Is Hadees ko Imam Hakim, Abu Ya’ala aur Tabrani ne riwayat kiya hai. Aur Hakim ne farmaya: Ye Hadees Saheeh ul Isnad hai.

“Hazrat Aisha Siddiqa AlahisSalam se marvi hai ke Huzoor Nabi Akram ﷺ ne farmaya: Mai (tamam) Aulad-e-Aadam ka Sardar hun aur Ali (tamam) Arab ka Sardar hai.”

Is Hadees ko Imam Hakim ne riwayat kiya aur farmaya: Is Hadees ki Sanad Saheeh hai.

Ek riwayat me Hazra Aisha Siddiqa SalamUllahAlaiha se marvi hai ke Huzoor Nabi Akram ﷺ ne farmaya: Mere paas Sardar-e-Arab ko bulao. Maine arz kiya: Ya RasoolAllah! Kya Aap Arab ke Sardar nahi hain? Aap te ne farmaya: Mai (tamam) Aulad-e-Aadam ka Sardar hun aur Ali (tamam)
Arab ka Sardar hai.”

Is Hadees ko Imam Hakim, Tabrani aur Abu Nuaim ne riwayat kiya hai.

“Hazrat Abdullah (ibne Mas’ud) bayan karte hain ke Huzoor Nabi Akram ﷺ
ne farmaya: Ali ke Chehre ko takna Ibadat hai

Is Hadees ko Imam Hakim aur Tabrani ne riwayat kiya hai. Imam Hakim ne farmaya: Is Hadees ki Sanad Saheeh hai aur Hazrat Abdullah ibne Mas’ud Radiallahu anhoo
iske shawahid Saheeh hai.

“Aur ek riwayat me Hazrat Abdullah (ibne Mas’ud) Radiallahu anhoo bayan karte hain ke Huzoor Nabi Akram ﷺ ne farmaya: Ali ki taraf dekhna Ibadat hai.”

Is Hadees ko Imam ibne Asakir ne riwayat kiya hai.