Hazrat Fatimah AlaihisSalam is superior to all the women.

In the whole of Human History, only four women achieved this level of Perfection. There is no stage higher than this for the
Hazrat Saiyeda AlahisSalam superior of these four women

The world is full of women, one better than the other. But the last achievement is that after that, there is only the stage of prophethood. Only four women have achieved this stage in the human world and history. As it is given in Sunan-e-Tirmizi Vol-4 P-229, these holy women are (i)Hazrat Issa’s mother Hazrat Mariyam Siddique-i-Uzma, (ii)Pharaoh’s wife Hazrat A’sia Siddique-i-Uzma (iii) Ummul Mominin Hazrat Khadija Siddique-i-Kubra SalamUllahAlaiha and (iv) Saiyed-i-Aalam Siddique-i-Kainat, Hazrat Fatema Zahara AlahisSalam

Translation: (For acceptance): Hazrat Mariyam, Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha, Hazrat Fatimah AlaihisSalam and Hazrat A’asia SalamUllahAlaiha are enough out of all the women of the world. This indicates that all these four holy women are best among all the women of the world so far as the virtues, devotion, faith, preference of another world over the present one and the higher values of life are concerned.

The experts of Hadiths also have analysed this point in the following words:

Translation: It is sufficient to respect these four holy women who are on the stage of perfection. Let their holy works and virtues be adored. Their attitude, towards the finite world and the preparation for the other world also should be worshipped and followed. (Hashiya-i-Tirmizi Vol-2)

Due to these virtues, these four holy women are considered to be the best among all the women of the world. It is given in Mustadarik that:Hazrat Saiyeda AlahisSalam is superior in all these four holy women.

Hazrat Saiyeda AlahisSalam is superior in all these four holy women. In the explanation of “Saiyedatun-nisa-ul-Alamin” Hazrat Sheikh AbdulHaq Mohaddith Dehlvi writes in Ashiatullm’aat Vol-4, p-684:

Translation: “Let all the people know that this hadith supports the view that Hazrat Fatimah AlaihisSalam is superior to all the women. So much so that she is superior to Hazrat Mariyam , Hazrat Aasiya, Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha and Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha

तेरह सौ साल की उम्र का बादशाह

तेरह सौ साल की उम्र का बादशाह

हज़रत दानयाल अलैहिस्सलाम एक दिन जंगल में चले जा रहे थे। आपको एक गुंबद नज़र आया । आवाज़ आई कि ऐ दानयाल! इधर आ । दानयाल अलैहिस्सलाम उस गुंबद के पास गये। मालूम हुआ कि किसी मकबरे का गुंबद है। जब आप मक़बरे के अंदर तशरीफ़ ले गये तो देखा बड़ी इमारत है। इमारत के बीच एक आलीशान तख़्त बिछा हुआ है। उस पर एक बड़ी लाश पड़ी है। फिर आवाज़ आई कि दानयाल तख्त के ऊपर आओ। आप ऊपर तशरीफ ले गये तो एक लंबी चौड़ी तलवार मुर्दे के पहलू में रखी हुई के नज़र आई उस पर यह इबारत लिखी हुई नज़र आई कि मैं कौमे आद से एक बादशाह हूं। खुदा ने तेरह सौ साल की उम्र मुझे अता फ़रमाई । बारह हजार मैंने शादियां कीं। आठ हज़ार बेटे हुए। लातादाद खजाने मेरे पास थे। इस क़द्र नेमतें लेकर भी मेरे नफ़्स ने खुदा का शुक्र न किया बल्कि उल्टा कुफ्र करना शुरू किया और खुदाई का दावा करने लगा। खुदा ने मेरी हिदायत के लिए एक पैगम्बर को भेजा | हर चंद उन्होंने मुझे समझाया मगर मैंने कुछ न सुना। अंजामकार वह पैगम्बर मुझे बद्दुआ देकर चले गये।

. हक तआला ने मुझ पर और मेरे मुल्क पर कहत मुसल्लत कर दिया जब मेरे मुल्क में कुछ पैदा न हुआ तब मैंने दूसरे मुल्कों में हुक्म भेजा कि हर में एक किस्म का गल्ला और मेवा मेरे मुल्क में भेजा जाए। मेरे हुक्म के मुताबिक हर किस्म का गल्ला और मेवा मेरे मुल्क में आने लगा। जिस वक्त वह गल्ला या मेवा मेरे शहर की सरहद में दाखिल होता फ़ौरन मिट्टी बन जाता। वह सारी मेहनत बेकार जाती | कोई दाना मुझे नसीब न होता। इसी तरह सात दिन गुज़र गये और मेरे किले से सारे अहाली मवाली, बीवियां बच्चे सब भाग गये। मैं तंहा किले में रह गया। सिवाए फाके के मेरी कोई गिजा न थी। एक दिन में निहायत मजबूर होकर फ़ाके की तकलीफ़ में किले के दरवाजे पर आया वहां मुझे एक शख्स नज़र आया जिसके हाथ में कुछ गल्ले के दाने थे जिनको वह खाता चला जाता था। मैंने उस जाने वाले को कहा कि एक बड़ा बर्तन भरा हुआ मोतियों का मुझसे ले ले और यह अनाज के दाने मुझे दे दे। मगर उसने न सुना और जल्दी से इन दानों को खाकर मेरे सामने से चला गया। अंजाम यह हुआ कि इस फ़ाके की तकलीफ से मैं मर गया। यह मेरी कहानी है जो शख्स मेरा हाल सुने वह कभी दुनिया के करीब न आए। (सीरतुस-सालिहीन सफा ७६)

सबक : खुदा से हर किस्म की नेमत पाकर फिर उसकी नाशुक्री करना
इंतिहाई नाआक़बत अंदेशी (अंजाम को न सोचना) है। अल्लाह की नाशुक्री से भूख, फाका, कहत और मुख़्तलिफ किस्म की बलाएं नाज़िल होती हैं। यह भी मालूम हुआ कि इंसान चाहे कितनी बड़ी उम्र पाए, एक दिन उसे मरना ज़रूर है।

सुलतान टीपू शहीद पार्ट 7

शहजादों की वापसी

सुलतान ने सलतनत के मुआमलात को संवारा, मुल्की ख़ज़ाने में
पैसा जमा किया, फिर सुलह की शर्त के मुताबिक उसने अंग्रेजों को तावाने जंग की बाकी रकम दो करोड़ रुपय अदा कर दी, अंग्रेजों ने दोनों शहज़ादे सुलतान के हवाले कर दिए। शहज़ादों की वापसी पर श्रीरंगापटनम के लोगों ने खुशियां मनाई, क्योंकि वे उनके बहादुर बादशह के बेटे थे। शहज़ादों की जुदाई में शाही महल पर जो उदासी छाई हुई थी, उनके वापस आने पर दूर हो गई और वहां फिर से खुशी का माहौल हो गया।

अंग्रेजों के नए नियम

ब्रिटिश हुकूमत ने हिन्दुस्तान के अंग्रेज़ गवर्नर जनरल को तबदील ने करके लार्ड वेलेस्ले को नया गर्वनर जनरल बनाकर भेजा। लार्ड वेलेस्ले बहुत चालाक और साज़िशी जेहन का मालिक था। उसने वहां आकर ऐसे नियम बनाए जो ज़ाहिरी तौरपर तो हिन्दुस्तान वालों के लिए फ़ायदेमन्द नज़र आते थे, लेकिन हकीकत में उनकी आज़ादी को ख़त्म करने वाले थे। उन नियमों के तहत हिन्दुस्तान की हर रियासत के हुकुमरान को मजबूर किया जाता था कि वह अपनी रियासत की हिफाजत के लिए अंग्रेज़ फ़ौज रखे और फ़ौज की तनख्वाह और सारे खर्चे रियासत के ख़ज़ाने से पूरे किए जाएं। जो रियासत अंग्रेजों की इस मांग को स्वीकार न करती उसके साथ अंग्रेज़ जंग शुरू कर देते। न

अंग्रेजों ने इस कानून के तहत सबसे पहले निज़ाम हैदराबाद को मजबूर किया, लेकिन उसने इनकार किया। तब अंग्रेजों ने अचानक अपनी फ़ौज हैदराबाद में दाखिल कर दी। चुनांचे निज़ाम हैदराबाद को अपनी हुकूमत बचाने के लिए निम्नलिखित शर्ते कबूल करना पड़ी:

1. हैदराबाद का हुकुमरान तोपखाने से लैस 6 हजार अंग्रेज़ फौज
हैदराबाद में रखेगा। इस फ़ौज के अफ़सर भी अंग्रेज़ होंगे।

2. फ़ौज के तमाम ख़र्च निज़ाम हैदराबाद के जिम्मे होंगे और वह अंग्रेजों के सिवा किसी और यूरोपी (जैसे फ्रांसीसी) को आइन्दा अपनी हुकूमत में नौकर की हैसियत से नहीं रखेगा।

अंग्रेज़ों के इस कानून को हिन्दुस्तान के कुछ दूसरे हुकुमरानों और राजाओं ने खुशी से स्वीकार किया और कुछ को अंग्रेजों ने ताकत इस्तेमाल करके इस कानून को स्वीकार करने पर मजबूर किया। अलबत्ता मरहटों के सदरार और मज़हबी पेशवा नाना फ़रनुवैस ने इस कानून को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और वादा किया कि वह अंग्रेजों से दोस्ती के पुराने समझौतों पर कायम रहेंगे। लार्ड वेलेस्ले ने मरहटों की बात मान ली। उसका असल मकसद यही था कि इस कानून से हिन्दुस्तान के हुकुमरानों को इतना पाबन्द कर दिया जाए कि वे सुलतान टीपू की कभी मदद न कर सकें और सुलतान तनहा रह जाए ताकि अंग्रेज़ आसानी से उसकी रियासत पर कब्जा कर सकें।

जंग का बहाना

लार्ड वेलेस्ले ने एक तरफ़ तो सुलतान के वज़ीरों, सलाहकारों को रिश्वतें देकर उन्हें सुलतान से गद्दारी पर आमादा करने की कोशिशें शुरू कर दी। दूसरी तरफ़ वह टीपू सुलतान से जंग छेड़ने का बहाना तलाश कर रहा था। उसने बहुत जल्द सुलतान के ऐसे गद्दारों की खिदमात हासिल कर लीं जो उसे पल-पल की खबरें पहुंचाने लगे। उन गद्दारों के सरगना पुरनया, बदरुज्जमां नायता और मीर सादिक सुलतान के अमीर थे। लेकिन सुलतान उन नमकहरामों और उनकी साज़िशों से बेख़बर था। लार्ड वेलेस्ले को सुलतान पर हमला करने का
बहाना भी मिल गया। उन दिनों फ्रांस हुकूमत और सुलतान के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत फ्रांस ने ज़रूरत के वक्त सुलतान की फौजी मदद करने का वादा किया। लार्ड वेलेस्ले ने उनके इस रक्षा समझौता को बहाना बनाकर सुलतान को पैगाम भेजा कि चूंकि आपने हमारे दुश्मन फ्रांस से समझौता किया है, इसलिए मैजर डूट्टन को भेज रहा हूं। उसे इख़्तियार है कि अंग्रेज़ों की हिफ़ाज़त के लिए आपके कुछ इलाके आपसे मांगे।

फिर मैजर डूट्टन ने सुलतान से जो इलाके मांगे, वे लिए बहुत अहम थे। इसलिए सुलतान ने वे इलाके अंग्रेजों के हवाले करने से इनकार कर दिया। सुलतान टीपू का इनकार लार्ड वेलेस्ले के लिए जंग का बहाना बन गया और अंग्रेज़ फ़ौज ने निज़ाम हैदराबाद की फ़ौज की मदद से 23 फ़रवरी 1799 को मैसूर पर हमला कर दिया। सुलतान के

गद्दार जरनेल

अंग्रेजों ने मैसूर पर हमला किया तो रास्ते में कहीं भी उन्हें रोकने की ख़ास कोशिश नहीं की गई। सुलतान के धोखेबाज़ किलादारों और दरबारियों को अंग्रेज़ पहले ही ख़रीद चुके थे। इसलिए वे किसी रुकावट के बगैर मैसूर के अन्दर बढ़ते चले गए। सुलतान टीपू को इस हमले की ख़बर न हो सकी। गद्दार मीर सादिक और पुरनया ने सुलतान तक । कोई खबर पहुंचने हो न दी। मगर जब सुलतान को किसी तरह ख़बर हो गई तो उसने हिम्मत से काम लिया और अपना लश्कर लेकर तेजी से अंग्रेज़ फ़ौज की तरफ बढ़ा। कुछ जगहों पर अंग्रेज़ फ़ौज से जंग हुई। लेकिन सुलतान के लश्कर के अकसर जरनेल अंग्रेजों से मिले सुलतान टीपू शहीद

हुए थे और उन्होंने कहीं भी सच्ची नियत से अंग्रेजों का मुकाबला न किया और जान-बूझ कर अपनी ही फ़ौज को नुकसान पहुंचाया। गुलशनाबाद के मैदान-ए-जंग में अंग्रेज़ हार कर भागने ही वाले थे कि एक जरनेल कमरुद्दीन की गद्दारी से जीती हुई जंग सुलतान की हार में बदल गई।

कमरुद्दीन उस वक्त जबकि सुलतान की फ़ौज को जीत हासिल हो रही थी, सुलतानी फ़ौज को जानबूझ कर अंग्रेज़ी तोपों की जद में ले आया और कुछ लमहों में ही सुलतान के बेशुमार सिपाही मारे गए। सुलतानी फ़ौज हारकर मैदान से भाग गई।

श्रीरंगापटनम का मुहासिरा

सुलतान के सलतनत के सरदारों और जरनेलों की गद्दारी के सबब कुछ और जगहों पर भी सुलतानी फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा और अंग्रेज़ी फ़ौज कामयाबियां हासिल करती हुई श्रीरंगापटनम के करीब पहुंच गई। सुलतान टीपू को भी श्रीरंगापटनम पहुंचना पड़ा ताकि अंग्रेज़ों का मुकाबला कर के श्रीरंगापटनम को बचाने की कोशिश की जाए। यहां भी अंग्रेजों ने सुलतान के गद्दारों की तरफ़ से दी गई मालूमात से फायदा उठाया और श्रीरंगापटनम का मुहासिरा करके किले पर गोलाबारी शुरू कर दी। सुलतानी फ़ौज ने किले की दीवार पर से अंग्रेज़ी फ़ौज पर हम्ले किए, लेकिन फ़ौजी अफ़सरों और जरनेलों की गद्दारी के सबब नुकसान सुलतानी फौज को ही हुआ और वे कामयाब नहीं हो पाए। अंग्रेजों ने सुलतानी फ़ौज के कई अहम मोरचों पर कब्जा कर लिया और मजबूर होकर सुलतान की फौज को पीछे हट
जाना पड़ा। सुलतान टीपू बेबसी महसूस करने लगा। उसे अपने सरदारों और जरनेलों की गद्दारी का अभी तक पता नहीं चला था।

Sitare Hamare Ma Tehat Hain..

ONE MAN ARMY
RASULALLAH ﷺ
ALI IBNE
ABU TALIB ALEHISALAM

Jang_E_Khaiber Ka Ek Waqia“`

“`Khaiber Me Maula Ali Ne Ek Patthar Me Alam Gaada“`
“`Ye Dekh Kar Ek Shaks Wahan Ek Najoomi Ke Pass Gaya Aur Usko Hairaan Hokar Ye Baat Batai“`
“`Najomi Ne Sun Kar Kaha Ke Jis Waqt Ali Ne Patthar Me Alam Gaada Us Waqt 2 Aise Sitaron Ka Milaap Tha Ke Jin Ke Milne Se Koi Bhi Shaks Koi Bhi Na Mumkin Kaam Ko Anjaam De Sakta Hai“`

“`Wo Shaks maula Ali Ke Pass Aaya Aur Najoomi Ki Baat Sunai“`

“`Maula Ne Farmaya
Aye Shaks Ja Jaa Ke Najoomi Se Pooch Ke Ab Wo Sitare Kab Milenge ??“`

“`Najoomi Ne Apne Ilm Se Dekh Kar Kaha Ke Wo 2 Sitare Ek Taveel Muddat Ke Baad Aapas Me Milte Hain Es Waqt Unke Milne Ka Koi Chance Nahi Hai“`

“`Us Shaks Ne Ye Paigham Maula ALI Ko Diya“`

“`Maula Ne Farmaya
Us Najoomi Ke Paas Jakar Khara Ho Aur Usko Kaho Ke Ab Wo Mujhe Dekhta Jaye“`
“`Jaise Jaise Maula ALI Alam Lekar Patthar Ke Qareeb Jane Lage Wo Sitare Qareeb Aana Shuru Ho Gaye“`
“`Jab Maula Patthar Ke Qareeb Pahunche To Wo Sitare Mil Chuke The
Mola Ne Alam Gaada Aur Wapis Apne Kheme Ki Taraf Chal Diye“`

“`Wo Najoomi Bhagta Hua Maula Ke Paas Aaya Aur Kehne Laga Ke Aye ALI Tum Ne Ye Kaise Kiya ??“`

“`Maula Ne Muskurate Hue Jawab Diya“`
“`Aye Najoomi Tum Log Sitaron Ke Ma_Tehat Ho Aur Ye Sitare Hamare Ma_Tehat Hain“`
..

जंगे ख़ैबर और क़िला ए ख़ैबर



रजब महीने की चौबीस तारीख़ सन सात हिजरी (मई 628 ईस्वी) में रसूले ख़ुदा (स) की क़यादत में मुसलमानों और यहूदियों के बीच यह जंग हुई जिसको ख़ैबर की जंग कहते हैं जिसमें मुसलमान फ़तहयाब हुए।

ख़ैबर यहूदियों का मरकज़ था जो मदीना से डेढ़ सौ से दो सौ किलोमीटर अरब के शुमाल मग़रिब (उत्तर पश्चिम) में था जहां से वह दूसरे यहूदी क़बीलों के साथ मुसलमानों के ख़िलाफ़ लगातार साज़िशें करते रहते थे चुनांचे मुसलमानों ने इस मसले को ख़त्म करने के लिए एक जंग शुरू की। ख़ैबर का क़िला ख़ास कर उसके कई क़िले यहूदी फ़ौज की ताक़त के मरकज़ थे जो हमेशा मुसलमानों के लिए ख़तरा बने रहे और मुसलमानों के ख़िलाफ़ कई साज़िशों में शरीक रहे इन साज़िशों में खंदक की जंग और जंगे ओहद के दौरान यहूदियों की कार्रवाइयाँ शामिल है इसके अलावा ख़ैबर के यहूद ने क़बीला ए बनी नज़ीर को भी पनाह दी थी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली साज़िश और जंग में शामिल थे।



ख़ैबर के यहूदियों के तअल्लुक़ात बनी कुरैज़ा के साथ भी थे जिन्होंने जंगे ख़ंदक में मुसलमानों से वादा ख़िलाफ़ी करते हुए उन्हें सख़्त मुश्किल से दो चार कर दिया था और ख़ैबर वालों ने फ़दक के यहूदियों के अलावा नज्द के क़बीला बनी ग़तफ़ान के साथ भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ मोआहिदे (अग्रीमेंट) किए थे।

सन 7 हिजरी (मई 628 ईस्वी) में हज़रत मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही व सल्लम ने 1600 की फ़ौज के साथ जिनमें से 100 से कुछ ज़ियादा घुड़सवार थे ख़ैबर की तरफ़ जंग की नियत से रवाना हुए और 5 छोटे क़िले फ़तह करने के बाद ख़ैबर क़िले का मुहासिरा कर लिया जो दुश्मन का सबसे बड़ा और मज़बूत क़िला था। एक ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ था और उसका सुरक्षा का इंतज़ाम बहुत मज़बूत था।

यहूदियों ने अपनी औरतों और बच्चों को एक क़िले में और खाने पीने के दीगर सारे सामान एक और क़िले में रख दिये और हर क़िले पर तीरंदाज़ खड़े कर दिए जो क़िले में घुसने की कोशिश करने वालों पर तीरों की बारिश कर देते थे।

मुसलमानों ने पहले 5 क़िलों को एक-एक करके फ़तह किया जिसमें 50 मुजाहिदीन जख़्मी और एक शहीद हुआ, यहूदी रात के तारीकी में एक से दूसरे के क़िले तक अपना माल, सामान और लोगों को मुन्तक़िल करते रहे बाक़ी 2 क़िलों में, क़िला ए कमूस सबसे बुनियादी और बड़ा था और यह एक पहाड़ी पर बना हुआ था।

हुज़ूरे अकरम (स) ने बारी-बारी हज़रत अबू बकर, उमर और सअद बिन उबादा की क़यादत में फ़ौज को इस क़िले को फ़तह करने के लिए भेजा मगर यह सभी जान के ख़ौफ़ से मैदान छोड़कर भाग आएं और कामयाब ना हो सके। यह सिलसिला तक़रीबन 39 दिन चला। सहाबा जाते फिर मरहब जंगजू के ख़ौफ़ से भाग आते।



आख़िर में रसूले ख़ुदा (स) ने इरशाद फ़रमाया कि कल मैं अलम (इस्लामी फ़ौज का झंडा) उसे दूंगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं, वह शिकस्त खाने वाला और भागने वाला नहीं है, ख़ुदा उसके दोनों हाथों से फ़तह अता करेगा। यह सुनकर तमाम सहाबा ख़्वाहिश करने लगे कि इस्लाम के अलम की अलमबरदारी की यह सआदत उन्हें नसीब हो। अगले दिन हुज़ूरे अकरम (स) ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को तलब किया। सहाबा इकराम ने बताया कि उन्हें आशूबे चश्म (आंखों का दर्द) है लेकिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम हुज़ूरे काएनात (स) के फ़रमान पर लब्बैक कहते हुए आये तो हुज़ूर (स) ने अपना लो आबे दहन (थूंक) उनकी आंखों में लगाया जिसके बाद पूरी ज़िंदगी उन्हें कभी आशूबे चश्म नहीं हुआ।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम क़िला ए ख़ैबर पर हमला करने के लिए पहुंचे तो यहूदियों के मशहूर पहलवान और जंगजू मरहब का भाई मुसलमानों पर हमलावर हुआ मगर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उसे क़त्ल कर दिया और उसके साथी भाग गए उसके बाद मरहब रजज़ पढ़ता हुआ मैदान में उतरा उसने ज़िरह बख़्तर और खोद (फ़ौलादी हेलमेट) पहना हुआ था उसके साथ एक ज़बरदस्त लड़ाई के दौरान हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उसके सर पर तलवार का ऐसा वार किया कि उसका खोद और सर दरमियान में से दो टुकड़े हो गया। उसके हलाकत पर ख़ौफ़ज़दा होकर उसके साथी भागकर क़िले में पनाह लेने पर मजबूर हो गए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने क़िले का मज़बूत बड़ा दरवाज़ा जिसे चंद आदमी मिलकर खोलते और बंद करते थे उसे उखाड़ लिया और उस ख़ंदक पर रख दिया जो यहूदियों ने क़िले के आस पास खोद रखी थी ताकि कोई क़िले के अंदर ना आ सके।

इस फ़तह में 93 यहूदी मौत के घाट उतरे और क़िला फ़तह हो गया। मुसलमानों को हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बदौलत शानदार फ़तह नसीब हुई। हुज़ूरे अकरम (स) ने यहूदियों को उनकी ख़्वाहिश पर पहले की तरह क़िला ए ख़ैबर में रहने की इजाज़त दे दी और उनके साथ मुआहेदा (अग्रिमेंट) किया कि वह अपनी आमदनी का आधा हिस्सा बतौर जीज़िया मुसलमानों को देंगे और मुसलमान जब मुनासिब समझेंगे उन्हें ख़ैबर से निकाल देंगे।

इस जंग में बनी नज़ीर के सरदार हई बिन अख़तब की बेटी सफ़िया भी क़ैद हुई जिनको आज़ाद करके हुज़ूरे करीम (स) ने उन की फ़रमाइश पर उनसे निकाह कर लिया।

इस जंग से मुसलमानों को एक हद तक यहूदियों की घिनौनी साज़िशों से निजात मिल गई और उन्हें मआशी फ़ायदा भी हासिल हुआ।

इस जंग के बाद बनी नज़ीर की एक यहूदी औरत ने रसूले ख़ुदा (स) को भेड़ का गोश्त पेश किया जिसमें एक सरी उल सर ज़हर मिला हुआ था। पैग़म्बरे अकरम (स) ने उसे महसूस होने पर थूक दिया कि उसमें ज़हर है मगर उनके एक सहाबी जो उनके साथ खाने में शरीक थे शहीद हो गए।



एक सहाबी की रिवायत के मुताबिक़ बिस्तरे वफ़ात पर हुज़ूर (स) ने फ़रमाया कि उनकी बीमारी उस ज़हर का असर है जो ख़ैबर में दिया गया था। मुसलमानों को इस जंग से भारी तादाद में जंगी सामान और हथियार मिले जिससे मुसलमानों की ताक़त बढ़ गई। उसके 18 महीने बाद मक्का फ़तह हुआ उस जंग के बाद हज़रत जाफ़र तैयार हबशा (अफ़्रीका) से वापस आए तो हुज़ूरे अकरम (स) ने फ़रमाया कि समझ में नहीं आता कि मैं किस बात के लिए ज़ियादा ख़ुशी मनाऊं‌! फ़तह ख़ैबर के लिए या जाफ़र की वापसी पर।

हवाला: मग़ाज़ी, जिल्द 2, पेज 637 / तारीख़ इब्ने कसीर, जिल्द 3 / इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इस्लाम, अल मग़ाज़ी, वाक़दी, जिल्द 2, पेज 700 / तारीख़ इब्ने कसीर, जिल्द 3, पेज 375 / अल सीरत नबविया अज़ इब्ने हिशाम, पेज 144 ता 149 / सहीह बुख़ारी, जिल्द 2, पेज 35

🤲 *अल्लाह हुम्मा अज्जिल ले वलियेकल फ़रज…*