मौला अली की जंग:: जंग ए बद्र

यूँ तो मौला अली मुर्तजा ने जिस भी जंग में कदम रख दिया, फत्ह ही हासिल की और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की जीत में अहम किरदार निभाते हुए दीन का परचम और तकबीर बुलंद की। मैं सारी जंगों को अगर तफ्सीर से लिखने बैलूं तो एक किताब, उसी पर लिखा सकती है। अगर आप जंगों के बारे में तफ्सीर से पढ़ना चाहे तो आप, तारीख़ की किताबों को पढ़-समझ सकते हैं।

मैं ये किताब मौला अली अलैहिस्सलाम की फजीलतें आम करने की नियत से लिख रहा हूँ इसलिए मैं जंगों की तफ्सीर में ना जाकर, मौला अली अलैहिस्सलाम की शान बयान करने की कोशिश कर रहा हूँ। इसी सिलसिले में, कुछ जंगों में मौला की शुजाअत को आप सबके सामने रख रहा हूँ। सबसे पहले मैं बद्र का जिक्र करूँगा।

मदीने के यहूदियों ने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की आमद पर उनसे ये मुहायिदा कर लिया था कि अगर मदीने पर हमला हुआ तो

जंग ए बद्र

वह, दुश्मनों के खिलाफ़ , एक दूसरे की मदद करेंगे। लेकिन बाद में जब

उन्होंने रसूलुल्लाह की कुव्वत और ताकत को समझा तो कुफ्फारे कुरैश के साथ जा मिले । कई तरह से मुसलमानों को परेशान किया गया, कभी उनके मवेशियों को चुराया गया , कभी उनके चारागाहों पर हमले किए गए। जंग शुरू होने की वजहें आप तारीख़ की किताब में तफसीर से पढ़ सकते हैं , दुश्मनों की तादाद लगभग एक हजार थी, सात ऊँट, तीन सौ घोड़े, तलवारों , तीरों , नेजों और हथियारों की कोई कमी नहीं थी । वहीं रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम , अपने साथ ३१३ का लश्कर ले कर गए, जिनमें से ७७ मुहाज़रीन थे और बाकि के अंसार थे । इनके पास सिर्फ दो घोड़े थे , हथियार भी बहुत कम थे । जब दुश्मनों ने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के लश्कर के सामने सफ़बंदी कर ली तो रसूलुल्लाह ने भी अपने लश्कर को सफ़ बंद कर लिया । आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने अन्सार का अलम , साद बिन अबादा और मुहाज़िरीन का अलम , हज़रत अली के सुपुर्द किया , जबकि आप मौला अली अलैहिस्सलाम , उस वक्त सिर्फ बीस साल के थे । कुरैश, अंसार को अपना हरीफ़ नहीं समझते थे, उन्होंने साद बिन अबादा से लड़ने से मना किया, तब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने, अबीदा इब्ने हारिस और हमजा इब्ने अब्दुल मुत्तालिब को भेजा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम को आप, पहले ही भेज चुके थे। 2. इन तीनों ने जब जंग शुरू की तो दुश्मन के खेमों में घबराहट पैदा ही गई. एक-एक वार दुश्मन की फौज़ पर भारी पड़ रहा था, इसी बीच अबीदा घायल हुए और उन्हें खेमे में वापिस लाया गया, हालाँकि चंद रोज़ बाद वह शहीद हो गए थे ।

इसके बाद फिर हज़रत अली और हज़रत हमजा ने हमले जारी कर दिए , दुश्मन के लश्कर के हौसले टूट रहे थे, अबु जहल उन्हें चीख चीखकर, हिम्मत बंधा रहा था।

हज़रत अली ने जब आठ-दस, दुश्मनों को जहन्नुम पहुँचा दिया तो सब मिलकर हमलावर हो गए।

दूबदू की जंग, मग़लूबा जंग में बदल गई. रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने भी इतिमाई हमले का हुक्म दिया। सारी तलवार एक साथ म्यान से निकलीं, तीरों की बौछार, घमासान रन शुरू हो गया। हज़रत अली और हज़रत हमज़ा के हमलों से, दुश्मनों के पाँव उखड़ने

यह इस्लाम का पहला गज़वा था, जिसमें तकरीबन ७० दुश्मन मारे गए और ७० दुश्मन, गिरफ्तार किए गए. बाकियों ने भागकर अपनी जान बचाई. रसूलुल्लाह की फौज़ से चौदह लोग शहीद हुए, जिनमें छः मुहाज़िर और आठ अंसार थे।

हज़रत अली की तलवार से हलाक़ होने वाले दुश्मनों की तादाद तकरीबन ३५ बताई जाती है। अल्लाह के खास करम और आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की दुआ से जंग ए बद्र में कामयाबी भी अली अलैहिस्सलाम की शुजाअत और बाजुओं की दम से ही मिली।

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