विलायत ए अली

विलायत की बात शुरू करने से पहले बता दूँ कि विलायत को मानना भी ईमान का हिस्सा है और खुदा को पाने के लिए बहुत ज़रूरी है। सिर्फ मौला अली को ही नहीं बल्कि अली सहित पूरी अहलेबैत से मवद्दत करना ज़रूरी है।

हम अक्सर तकरीरों में या जुमा की नमाज़ के खुत्बों में सुनते हैं कि नमाज़ फर्ज़ है, रोज़े फर्ज़ हैं, ज़कात देना फर्ज़ है, हज अदा करना फर्ज़ है। बताने वाले ये भी बताते हैं कि ये चार फों के पहले एक फर्ज और है ईमान, जब तक ये दिल में नहीं आएगा, किसी आमाल में ना दिल लगेगा, ना ही कामयाबी मिलेगी। तो बताया ये जाता है कि ये पाँच अरकान हर मुसलमान पर फर्ज़ हैं और इसमें ना शक की गुंजाइश है ना ही किसी फिरकेबाजी की, सारे ही लोग इस से सहमत हैं। हर रोज़ होने वाली तकरीरों में सालों से ये बातें होती आ रही हैं लेकिन हालात ज्यों के त्यों हैं। कभी आपने सोचा कि ऐसा क्यों?

लोग कलमा पढ़ रहे हैं, ईमान वाले होने का दावा कर रहे हैं लेकिन अमल शैतानों वाले। दरअसल गलती इनकी नहीं है और मुझे आजतक ये भी समझ नहीं आया की हक़ छिपाया क्यों जाता है, वह भी आलिमों के द्वारा। आज हमारी हालत इतनी खराब इसलिए है क्योंकि हमने

बुनियाद ही कमजोर कर रखी है।

मेरे अपनों! इन सारे अरकानों से पहले भी एक फर्ज़ है, ईमान से पहले भी एक फर्ज़ है और जब तक ये अदा ना किया जाए, ईमान भी दिलों में आ ही नहीं सकता और वह फर्ज़ है “अहलेबैत से मुहब्बत”

आका मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया, “लम यद खुलि-ल ईमानु फी रजुलिन हत्ता युहिब्बुल अहलेबैति”, यानी “तुम्हारे अंदर ईमान तब तक दाखिल नहीं होगा, जब तक तुम मेरी अहलेबैत से मुहब्बत ना करो।”

अगर आप कुरआन को पढ़कर समझें तो आप आयत ए मवद्दत पढ़कर इस नतीजे पर पहुंचेंगे की हमें, अहलेबैत से मवद्दत करना है। आलिम मवद्दत के मायने भी मुहब्बत बताते हैं और हब्ब / हुब्ब के मायने भी मुहब्बत बताते हैं।

इक दफा मैंने एक अल्लाह वाले बुजुर्ग से इस बारे में पूछा की अगर मायने एक ही हैं तो दो अलग लफ्ज़ इस्तेमाल क्यों किए जा रहे हैं?, तब उन्होंने बताया कि ये सब साजिशन किया जा रहा है, उन्होंने कहा कि ये दोनों अलग लफ्ज़ है जैसे बत्तख़ पानी में रहती है लेकिन पानी में रहना उसके जिंदा रहने के लिए शर्त नहीं। वह पानी में रहना पसंद करती है लेकिन पानी के बिना भी रह सकती है। ये है मुहब्बत।

और जिस तरह मछली पानी में रहती है, पानी से निकालते ही मर जाती है यानी उसे पानी सिर्फ़ पसंद नहीं है बल्कि उसके जिंदा रहने की ज़रूरत है। ये है मवद्दत। समझये आता है कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम से मुहब्बत करना है तो मवद्दत के दर्जे तक करना है। अफसोस! हमारे बहुत सारे आलिमों ने हक़ बताना छोड़ दिया।

अब बात करते हैं विलायत की, आप सब जानते ही हैं कि आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, अल्लाह के आख़िरी रसूल हैं यानी बाद ए मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, अब कोई नबी या रसूल, दुनिया में नहीं आएगा। फिर दुनिया को हिदायत कैसे मिलती रहेगी?

अल्लाह अपने बंदों में से ही किसी को हादी बना देता है और हिदायत आम करने के लिए रब ने बारह इमामों को चुना, इसके बाद भी ये सिलसिला नहीं रोका बल्कि विलायत के ज़रिए इसे जारी रखा जो बाद ए नबी से अब तक चलता आ रहा है और इमाम मेंहदी अलैहिस्सलाम के जुहूर और दुनिया के मिटने के पहले तक चलता रहेगा।

ये हमारी गलती है कि हमें आलिम तो याद रह जाते हैं जैसे अबु हनीफा रहमातुल्लाह आलेह लेकिन हम उन वलियों को भूल जाते हैं जिन्हें आलिम भी अपना उस्ताद माना करते थे। ऐसा ही एक नाम है बहलोल दाना का, जिन्हें दुनिया पागल समझती रही और वह जिंदा रहते में ही जन्नत का सौदा करवा देते थे। हज़रत अबु हनीफा, बहलोल को अपने उस्तादों में से एक बताते थे, कोई जाकर पूछे आलिमों से कि इतने बड़े आलिम, उस शख्स से क्या सीखने जाते थे, जिसे दुनिया पागल कहती थी?

आज कुछ मसलकों को ऐतराज़ हो जाता है बुजुर्गों की शान बयान करने पर। शिया-सुन्नियों के बीच का एक मुद्दा विलायत ए अली भी है, कुछ लोग कहते हैं कि शिया अपनी अजानों में अली की विलायत का ऐलान करते हैं, कुछ कहते हैं शियाओं का कलमा अलग है।

तो मेरे अपनों एक बात बता दूँ सुन्नियों में भी कई मसलक अजान के साथ दरूद जोड़कर पढ़ते हैं, इसका भी जिक्र कहीं नहीं, दूसरी और ज़रूरी बात ये कि अहले तशय्यो, कलमे में अलीयुन वलीयुल्लाह पढ़ना मुस्तहब मानते हैं, कुछ वाज़िब मानते हैं, फर्ज़ उनके यहाँ भी नहीं है। । खैर हम तो वह कौम हैं जिसने कभी अपने आलिमों से ये भी नहीं जानना

चाहा कि कलमा होता क्या है?

सोचता हूँ तो ताज्जुब होता है, आपस में लड़ाई की एक वजह “अलीयुन वलीयुल्लाह” कहना है, ऐसा कौन-सा मुसलमान है जो अली मौला को अल्लाह का वली नहीं मानता, किसी ने कह दिया तो ऐतराज़ कैसा, हकीकत ये है कि मानते तो सब हैं कुछ कहते हैं, कुछ दिल में रखते हैं लेकिन दिल तो सबका ये ही कहता है कि मौला अली, अल्लाह के वली हैं।

इन अल्लाह के वलियों को विलायत, मौला अली अलैहिस्सलाम के ही सदके से मिलती है। चाहे शियाओं को देख लें या सुन्नियों को, जिनके भी पीर हैं वह अली मौला के नाम पर ही बैअत लेते हैं।

इन बुजुर्गों ने जो दीन की ख़िदमत की है, उसे चाहकर भी नहीं भुलाया जा सकता, चाहे वह शाहबाज़ कलंदर रहमातुल्लाह आलेह हों, चाहे अब्दुल कादिर जीलानी रहमातुल्लाह आलेह हों, चाहे ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती रहमातुल्लाह आलेह हों या कोई और। इन सारे वलियों ने दीन की तब्लीग के लिए जो रास्ता निकाला, उसके आगे बड़े से बड़े जालिमों ने भी घुटने टेक दिए और ये भी हकीकत है कि अल्लाह हर दौर में, अपने वलियों के जरिए, अपने दीन का काम लेता रहता है और आगे भी इन्हीं को ज़रिया बनाएगा।

जिस तरह हमें तौहीद ए अल्लाह पर ईमान रखना है, जिस तरह से हमें रिसालत ए मुहम्मद पर ईमान रखना है, ठीक इसी तरह से हमें विलायत ए अली भी मानना है। अली को पाए बिना नबी नहीं मिलते और जिसे नबी नहीं मिलते उसे खुदा मिल ही नहीं सकता। तो विलायत ए अली के बारे में फिक्र करें और अपने ईमान का हिस्सा बनाएँ।

एक और ज़रूरी और फिक्र करने लायक बात ये है कि हमारे हालात खराब चल रहे हैं, चारों ओर से बस परेशानियाँ ही परेशानियाँ आ रही हैं,

आज हम ये रोना रोते हैं कि सब कुछ हमारे ख़िलाफ़ चल रहा है लेकिन हम ये भूलकर बैठे हैं कि हमारे आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम हमें जिन दो चीजों को थामने का कहकर गए थे, हमने वह ही दो चीजों को छोड़ रखा है-कुरआन और अहलेबैत।

पहली बात तो ये याद रखें की अहलेबैत अलैहिस्सलाम किसी एक मसलक या कौम के नहीं, इश्क में शिया या सुन्नी नहीं होता, यहाँ तक अहलेबैत को चाहने वाले दूसरे मज़हबों में भी आसानी से मिल जाते हैं और मैंने बहुत सारे ग़ैर मुसलमानों के मुँह से पंजतन की तारीफ़ सुनी हैं।

यहाँ तक कुछ लोगों का कहना ये भी है कि ना सिर्फ मुसलमानों को बल्कि तमाम इंसानियत को अहलेबैत से कुछ ना कुछ सीखते रहना चाहिए और मैं भी मानता हूँ कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम इस्लाम के साथ साथ, इंसानियत के भी मुहाफिज़ हैं।

अहलेबैत की अज़मत और फजीलत बयान कर पाना नामुमकिन है। इल्म और अक्ल में अहलेबैत को घेर पाना नामुमकिन है। हमें चाहिए की हम अहलेबैत अलैहिस्सलाम से बहुत मुहब्बत करें और उनके बताए तरीकों पर अमल करते रहें, उनके बताए रास्ते पर चलें। याद रखें इश्क का इज़हार, अमल से होता है।

अगर अपनी नस्लों में इस्लाम और इंसानियत को जिंदा रखना चाहते हो तो उन्हें अहलेबैत की तरफ़ मोड़ दो। उन्हें हैदर ए कर्रार की ज़िन्दगी समझाओ, उन्हें मौला अली की शुजाअत और जंग समझाओ, अपनी औलाद को सुलह ए हसन समझाओ. अगर चाहते हो औलाद बुज़दिल ना बने तो उसे करबला समझाओ, हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम की कुर्बानी और सब्र समझाओ.

एक बात हमेशा कहता हूँ कि जब तक अहलेबैत का जिक्र मिम्बरों से म नहीं किया जाएगा तब तक कौम के हालात नहीं बदलेंगे।

कुरआन और अहलेबैत को छोड़कर, हालात बदलने का तसव्वुर भी करना, जहालत के सिवा और कुछ नहीं।

Zikr e Hazrat Zaid Ibn Ali Shaheed AlahisSalam.

2 Safar ko Unki Shahadat hai Jinke Murid Imam-e-Aazam Abu Hanifa Jaisi Azeem Hasti hai! Unke baareme Muhaddis-e-Akbar Imam Shuabi ne farmaya:
“Allah Ta’ala ki Qasam! Kisi aurat ne bhi Unse zyada Fazilat ka Hamil, Unse zyada Faqih, Unse zyada Shujaah aur Unse zyada Zahid paida nahi kiya!!”

Aur Unke bare Khud Imam-e-Aazam Abu Hanifa RadiAllahu Anhu farmate hain:
“Maine Unke Zamane me Unse zyada Faqih, Unse zyada Aalim, Unse zyada Haazir Jawab, Unse zyada baat ki Wazahat karne wala kisiko nahi dekha!!”

Wo Azeem Hasti hain Imam Hussain Alaihissalam ke Potey, Imam Zainul Aabideen Alaihissalam ke Shahzade, Hazrat Sayyeduna Imam Zaid bin Ali Alaihi-Mussalam!!
(Imam Muhammad al Baqir Alaihissalam ke Bhai)

Aap Ilm o Amal ke Samandar to they he aur Aap Haq ki aawaz buland karne se bhi nahi darte they (jo ke Ahle Bayt-e-Athaar ki Shaan hai!)

Aapne hukumat ke kiye jaane waale zulm ke khilaf aawaz uthayi to hukumat ne Imam Abu Hanifa ko Unke khilaf fatwa deno ko kaha. To Imam-e-Aazam ne fatwa diya ke Jo Imam Zaid Alaihissalam ki Madat karega usko Badr Waalo jaisa Sawab milega!!

Jab Imam Zaid Alaihissalam ko Shaheed kiya gaya to us hukmraan ne Aapke Jism-e-Aqdas se kapde nikaale aur Aapko suli par chadhaya aur kaha ke Ahle Bayt ke Log koi khaas nahi hote Inke Jism bhi maut ke baad sad jaate hain (maazAllah).

To 4 saal tak Aapka (ba-zaahir) murda Jism-e-Pak suli pe latka raha lekin jo bhi shakhs kareeb se guzrata usko Mushk se behtar khushu aati!! Aur Allah ne Aapke Satr ki Hifazat ki!!

Jab Aapke Shahdat ki Khabar Aapke Bhatije Imam Jafar as Sadiq Alaihissalam tak pahunchi to gum ke maare Aap nidhaal hogaye, kai hafto tak Apne Chacha ke gum me rote rahe. Aur farmaya:

“Allah Rabbul Izzat ki Qasam! Imam Zaid Hum me sabse zyada Quran ko padhne waale, Allah ke Deen ki Hum me sabse zyada Samajh bujh rakhne waale aur Hum me sabse zyada Sulah Rehmi karne waale they. Allah Rabbul Izzat ki Qasam! Duniya aur Aakhirat me ab Hum me Unki Misl koi bhi maujud nahi..”

Imam Zaid Alaihissalam Bahot Bade Muhaddis bhi they aur aaj duniya me available gaaliban jo sabse purani Hadees ki Kitaab hai, Wo Imam Zaid bin Ali Alaihi-Mussalam ki Murattab ki hui “Musnad Zaid” hai! Jisme Aapne Apni Sanad se Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Ahadees Riwayat ki Hain aur Wo Kitab pdf aur hard copies me kai languages me maujud hai!

kamse kum 2 rakat Nafl padhke Uska Sawab Aapki Bargah me Bataor-e-Hadiya pesh karen.. InshaAllah

Allahumma Salle Ala Sayyedina Muhammadiw wa Ala Aali Sayyedina Muhammadin
(SallAllahu Alaihi wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim)

Tarzuman-E-Hazrat-E-Zain’ul Aba Zaid-As Shaheed
Nusrat-E-Islam Hai Muskil’Kusha Zaid-As Shaheed
Momino Ki Jis Tarah Fariyad Sunte Hai Imam
Ha usi Surat Se Sunte Hai Dua Zaid-As Shaheed
Jo Mila Hai Hazrat-E-Abbas Ko Baad-E-Imam
Bas Wahi Hai Aap Ka Bhi Martaba Zaid-As Shaheed
Ho Yaqee’n Dil Main Aqeedat Main Ho Shamil Gar Khuloos
Khaakh-E-Dar Hai Aap Ki Khaakh-E-Shifa Zaid-As Shaheed
Waqt-E-Muskil Kyu Na Main Aakhir Pukar’u Aap Ko
Aap Bhi To Hai Mere Hajat’Rawa Zaid-As Shaheed 🙏🙏
Jaan Di Hai Aap Ne Bhi Nusrat-E-Shabbbir Main
Aap Bhi To Hai Shaheed-E-Qarbala Zaid-As Shaheed
Sari Duniya Main To Teri Nasl’e Hai Pheli Hui
Kyu Biche Na Fir Tera Farsh-E-Aza Zaid-As Shaheed
Main To In Ko Isliye Kehta Hu “Mehsar” Be-misaal
Phir Na Aaya Is Jaha’n Main Dusra Zaid-As Shaheed

हज़रत मुख़्तार सक्फ़ी की आमद

कातिल ने किस सफाई से पोंछी हैं आस्तीन वह जानता नहीं कि लहू बोलता भी है 65 हिज. में हज़रत मुहम्मद बिन हनफीया और हज़रत मुख्तार ने खूने इमाम आली मकाम रज़ि अल्लाहु अन्हु का बदला लेना शुरू किया और कहा कि मैं इंशाअल्लाह इसी तरह बनी उमैया और उसके मुआवनीन का खून बहाऊंगा जिस तरह. बख्त नम्र ने यहूदियों का खून बहाया था।

(मिरातुल-असरार) जिस रोज़ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जंगे तबूक में तशरीफ

उसी रोज़ मुख़्तार कूफा में पैदा हुआ। मुख़्तार के वालिद का नाम हज़रत उबैदा था और वालिदा का नाम हुलिया था। मुख्तार के मां-बाप ने मुख्तार को तमाम उलूम व फुनून पर महारत दे रखी थी। यज़ीद पलीद के मरने के बाद हर चहार जानिब अफरा तफरी का माहौल था। इसी दर्मियान मुख़्तार सकफी खूने इमाम हुसैन रजि अल्लाहु अन्हु का बदला लेने के लिए निकले। और सबसे पहले मुख्तार सीधा हज़रत सैय्यदना इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास मदीना पहुंचा और उनकी ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि हुजूर मैं खूने इमाम आली मकाम का इंतिक़ाम लेने के लिए निकला हूं, सारे यज़ीदियों को चुन-चुन कर कत्ल करूंगा। बस आपकी दुआ चाहिए जैसा कि उन्होंने आले रसूल को कत्ल किया है।

यह सुन कर हज़रत सैय्यदना इमाम ज़ैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु रोने लगे और फरमाया कि ऐ मुख्तार अगर वह लोग भाग जाएं तो तू क्या करेगा।

मुख्तार ने कहा हुजूर रब्बे काबा की कसम अगर वह सांप के सूराख़ में भी छुप जाएं तब भी खूने इमाम का बदला लिए बेगैर न छोडूंगा हज़रत सैय्यदना इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु से दुआ व इजाज़त लेकर मुख्तार मदीना से रुख्सत हुआ और कसीर फौज तैयार किया और हज़रत सैय्यदना मुहम्मद हनफीया की हिमायत में कूफा पहुंचा, यह वही मुहम्मद हनीफा हैं जो हज़रत अली के बेटे हैं।

दोज़ख़ का सांप

दोज़ख़ में एक बहुत बड़ा सांप है जिसका नाम शदीद है। हर रोज वह सत्तर मरतबा लरज़ता है और उसके जिस्म से ज़हर टपकता है। अल्लाह तआला उस से इरशाद फरमाता है कि ऐ शदीद तू क्या चाहता है? शदीद अर्ज करता है कि ऐ हमारे रब कातेलीने इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को मेरे हवाले कर दे ताकि मैं उन पर अपना जहर डालूं। अल्लाह तआला फरमाता है कि ऐ शदीद ठहर कातेलीने इमाम को मैं तेरे ही हवाले करूंगा, तू जिस तरह चाहे उन्हें अज़ाब दे।

तरजुमा : अल्लामा बैहकी व अबू नईम व इने असाकिर व दैलमी हज़रत अबू हुरैरह रज़ि अल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं। फरमाते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का कातिल दोज़ख़ के अन्दर एक आग के सन्दूक के अन्दर रखा जाएगा। दुनिया के आधे लोगों पर जो अज़ाब अलग-अलग होगा, वह उस पर तन्हा होगा। जहन्नम की जंजीरों से उसके दोनों हाथ और दोनों पैर बं ने रहेंगे, वह जहन्नम में उलटा लटकाया जाएगा। और उस तरह-तरह के अज़ाब होंगे। और वह जहन्नम में हमेशा-हमेशा रखा जाएगा।

कातिलाने इमाम हुसैन का इबरतनाक अंजाम यज़ीद की भयानक मौत का मन्ज़र!

कातिलाने इमाम हुसैन का इबरतनाक अंजाम यज़ीद की भयानक मौत का मन्ज़र!

हाकिम ने हजरत सैय्यदना इब्ने अब्बास रजि अल्लाहु अन्हु से रिवायत की है:

तरजुमा : यानी अल्लाह ने अपने प्यारे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि व व सल्लम पर वही भेजी कि मैंने यहिया इन्ने जकरिया के एवज सत्तर हज़ार को मारा और ऐ महबूब आपके नवासे के एवज सत्तर हज़ार और सत्तर हज़ार यानी एक लाख चालीस हज़ार मारूंगा।

यज़ीद एक ऐसे ला इलाज मरज़ में मुलला हो गया था जिसकी वजह से उसकी मुंह से बदबू बहुत तेज़ आती थी। उसकी जुबान और तालू में कीड़े पड़ गये थे। जिसकी वजह से उसके घर वाले बेचैन रहते थे। एक दिन रूम से एक आतिश परस्त हकीम बुलाया गया। हकीम ने यज़ीद की नब्ज़ पर हाथ रखा तो उसने बरजसता कहा कि यह तो ला इलाज बीमारी है। तुम जंगल की सैर किया करो। यज़ीद ने फौरन अपने टटू सिपाहियों को हुक्म दिया कि फौरन जंगल की सैर को

चलो। सारे सिपाही फौरन तैयार हो गये और जंगल में जा पहुंचे। वहां एक खूबसूरत हिरन नज़र आया यज़ीद ने उसका पीछा किया। हिरन कुछ दूर जा कर गायब हो गया। जब यज़ीद मायूस हो कर वापस होने लगा तो अचानक एक आग की दीवार जाहिर हुई जिसने यज़ीद को चारों तरफ से घेर लिया।

रिवायतों में है कि वह सहरा जहन्नम का था जिस जगह जहन्नमियों को क्यामत तक अज़ाब दिया जाता है। जब यज़ीद की फौज तलाश करते हुए वहां पहुंची तो एक गैबी आवाज़ आई कि यज़ीद जहन्नम के एक दलदल में जा फंसा।

जो आग और सांप और बिच्छुओं से पुर है। जब सिपाहियों ने यह सुना तो अपने-अपने सरों पर ख़ाक डालते हुए दमिश्क की राह ली और फरार हो गये।

यज़ीद की हुकूमत कुल तीन साल आठ माह थी। 64 हिजरी में मरवान ने यज़ीद की बीवी से निकाह कर लिया मगर किसी बात पर झगड़ा हो जाने से उस औरत ने मरवान को कत्ल करवा दिया।