मौला अली का घराना

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घराने का जिक्र, कुरआन और हदीस में मौजूद है। आप अहलेबैत अलैहिस्सलाम की अजमत को पता नहीं क्यों लेकिन कभी छिपाने की कोशिश की गईं, कभी दबाने की कोशिश की गई लेकिन कहते हैं कि हक कभी नहीं छिपाया जा सकता। आइए देखते हैं कि अहलेबैत और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में कुरआन और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने क्या-क्या फरमाया है।

आयत ए मुबाहला

वैसे तो सारा का सारा कुरआन ही रसूलुल्लाह और अहलेबैत की शान बयान कर रहा है लेकिन लोग दलील नहीं मानते हालाँकि अगर आप सूरः आल ए इमरान की आयत ६१ पढ़कर देखेंगे तो पाएंगे कि अल्लाह ने इन्हें दलील से ऊपर रखा है। ये आयत, आयत ए मुबाहला कहलाती है। हक छिपाने वाले कुछ मौलवी साहब को भी मजबूरन ये आयत तो बताना ही पड़ती है क्योंकि ये कुरआन का हिस्सा है लेकिन वह तफ्सौर ना बताकर अपना बचाव कर ही लेते हैं।

इस आयत में अल्लाह रब उल इज्जत फरमाता है, जिसका तर्जुमा है “फिर जब तुम्हारे पास कुरआन आ चुका, उसके बाद भी अगर तुमसे कोई हुज्जत बाजी करे तो उन्हें कहो कि हम और तुम अपने-अपने बेटों लाएँ और हम अपनी औरतों को बुला लाएँ, तुम अपनी औरतों को बुला लाओ. हम अपनी जानों को बुलाएँ और तुम अपनी जानों को और सब मिलकर दिल से दुआ करें कि जो झूठा हो उस पर खुदा की लानत हो”

अब हम देखते हैं कि आखिर ऐसी क्या बात हुई जो बात मुबाहला तक पहुँची। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में नजरान के नसारा को हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने बहुत समझाया कि उनको खुदा का बेटा ना कहो, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की भी मिसाल दी, मगर उन लोगों ने नबी की एक ना सुनी, आख़िर में खुदा के ही हुक्म से बात कसम और लानत की दुआ पर आकर ठहरी। ऊपर आयत में दोबारा देख सकते हैं।

यहाँ पर गौर करने वाली बात है अल्लाह ने बेटों को साथ लाने का हुक्म दिया और शिया-सुन्नी दोनों मसलक इस बात पर सहमत हैं कि रसूलुल्लाह के बेटे नहीं थे यानी हुए भी तो अल्लाह को प्यारे हो गए. फिर वह कौन हैं जिन्हें रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने बेटा माना और वह नबी सल्लललाह अलैहे वसल्लम की जान हैं?

बहरहाल, जिस दिन मुबाहला होने वाला था, अस्हाब तैयार होकर रसूलुल्लाह के पास आए कि शायद आप साथ ले लें लेकिन आपने सुबहसुबह ही हज़रत सलमान फारसी रजिअल्लाहु अन्हो को चार लकड़ी

और एक कम्बल देकर उस मैदान की तरफ़ रवाना किया और छोटा-सा सायबान तैयार करने का हुक्म दिया और खुद इस शान से निकले की हज़रत हसन अलैहिस्सलाम का हाथ थामा, हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को गोद में लिया, जनाब फातिमा सलामुल्लाह अलैहा अपने बाबा के पीछे हो गईं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम उनके पीछे हो गए।

यानी बेटों की जगह नवासों को, इमाम हसन और इमाम हुसैन और औरतों की जगह फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को और जानों की जगह हज़रत अली अलैहिस्सलाम को लेकर मुबाहला की तरफ़ चल दिए. इसलिए हम मौला अली को नफ्स ए रसूल भी कहते हैं।

आपने निकलने के पहले ये दुआ भी की खुदाया हर नबी के अहलेबैत होते हैं और ये मेरे अहलेबैत हैं, इनको हर बुराई से दूर और पाक व पाकीज़ा रखना। आपको इस शान से तश्-रीफ़ लाता देख, नसारा का सरदार, आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम और अहलेबैत की तरफ़ देखकर कहने लगा, ” खुदा की कसम, मैं ऐसे नूरानी चेहरे देख रहा हूँ कि अगर ये पहाड़ को अपनी जगह से हट जाने के लिए कहें तो यकीनन वह हट जाएगा इसलिए खैरियत इसी में है कि मुबाहला ना किया जाए वरना कयामत तक के लिए हमारी नस्ल ही ख़त्म हो जाएगी।

आखिर उन लोगों ने सारी बातें मान लीं तब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि अगर ये बात ना मानते तो ये मैदान आग में तब्दील हो जाता, इनकी शक्लें सुअर और बन्दरों की तरह हो जाती और यहाँ सब तबाह हो जाता।

जी हाँ आप अपने घर में रखे कुरआन में खुद देख सकते हैं, एक ऐसी आयत जिसकी तफ्सीर बताने से कुछ मौलवी साहब घबराते हैं।

आयत ए मवद्दत

सूरः शूरा की आयत २३ को आयत ए मवद्दत भी कहते हैं। इस आयत में अल्लाह फरमाता है –

जिसका तर्जुमा है “यही (इनआम) है जिसकी खुदा अपने बन्दों को खुशख़बरी देता है, जो ईमान लाए और नेक काम करते रहे। तुम (ऐ रसूल!) कह दो, मैं इस (तब्लीग ए रिसालत) का अपने क़राबत दारों (अहलेबैत) की मुहब्बत के सिवा कोई सिला नहीं माँगता और जो शख्स नेकी हासिल करेगा हम उसके लिए उसकी खूबी में इजाफा कर देंगे बेशक खुदा बख्शने वाला कद्रदान है।”

इस आयत से साफ़ है कि रसूलुल्लाह ने इस उम्मत से कोई सिला नहीं माँगा सिवाय अपनी अहलेबैत से मुहब्बत के लेकिन आज इस आयत की तफ्सीर को भी कुछ हज़रात छिपाना चाहते हैं, वजह साफ़ है अगर इस आयत को खोल खोलकर बयान करेंगे तो उम्मत समझने लगेगी कि रसूलुल्लाह ने बस एक ही सिला माँगा था और बदले में लोगों ने मुहब्बत ना दी तो ना दी बल्कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम पर जुल्म की हद कर दी।

आलिम लिखते हैं कि ये आयत तब नाज़िल हुई जब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, अंसार को फजीलत ए अहलेबैत बता रहे थे और साथ-साथ ये भी बता रहे थे कि आल ए मुहम्मद से मुहब्बत ईमान को कामिल करती है और इनकी मुहब्बत में जान गंवाने वाला भी शहीद है। कर * में मिलता है कि “अल्लाह अहलेबैत से मुहब्बत करने

वालों को और भी ज्यादा नेकी देगा”

आयत ए ततहीर –

सूरः अहजाब की आयत ३३ में अल्लाह रब उल इज्जत , नबी अलैहिस्सलाम की बीवियों को समझाईश दे रहे हैं फिर इसी आयत में आगे अहलेबैत के लिए फरमाते हैं –

” ऐ पैगम्बर के अहलेबैत ! खुदा तो बस ये चाहता है कि तुमको (हर तरह की) बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा रखने का हक़ है , वैसा पाक व पाकीज़ा रखे। “

यहाँ भी शिया – सुन्नी के बीच कोई इख्तिलाफ़ नहीं है , सब मानते हैं कि चादर ए ततहीर में पाँच लोग हैं जिनके लिए खास तौर पर ये आयत आई हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम , हज़रत अली अलैहिस्सलाम , हज़रत फातिमा सलामुल्लाह अलैहा , हज़रत हसन अलैहिस्सलाम और हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम ।

आलिमों ने अपने अपने हिसाब से अहलेबैत को समझाया है , कुछ ने इन पाँच को अहलेबैत माना कुछ ने रसूलुल्लाह की बीवियों और बच्चों को शुमार किया और कुछ ने कयामत तक पैदा होने वाली हर हसनी – हुसैनी औलाद को अहलेबैत में शुमार माना बहरहाल इसमें इख्तिलाफ़ है लेकिन इसमें भी कोई इतिलाफ़ नहीं की अहलेबैत में पंजतन का मर्तबा ज्यादा बुलंद है।

अल्लाह ने अहलेबैत को हर तरह की गंदगी से , बुराई से दूर रखकर पाक किया । यहाँ पाक करने से मुराद सिर्फ़ जिस्मानी नहीं है बल्कि अहलेबैत अलैहिस्सलाम की रूह और कल्ब भी पाक हैं । ये गलत काम नहीं करते , ना झूठ ही बोलते हैं , ये ऐबों से पाक हैं , बहुत नेक और पाकदामन हैं।

आयत ए विलायत

बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्होंने ग़दीर को या तो झुठलाने की कोशिश की है या फिर बयान गलत ढंग से करने की कोशिश की है। मेरा अल्लाह, लोगों के हर फैल जानता है और वो कभी नहीं चाहता कि उसके बंदे गुमराह हों। इसलिए मेरे रब ने अपना कलाम हमें दिया, जिसमें सारे जवाब मौजूद हैं तो क्या ऐसा हो सकता है कि इसमें विलायत से कोई बात ना आई हो?

आई है और साफ़ साफ़ इशारा करते हए आई है, जाहिर सी बात है, जहाँ बात विलायत की हो, इशारा मेरे मौला अली अलैहिस्सलाम की तरफ़ ही होगा, आइए कुरआन में देखते हैं कि क्या लिखा है।

जब आप सूरः माइदा की आयत नंबर ५५ पर पहुँचोगे तो पाओगे कि अल्लाह रब उल इज्जत फरमाते हैं –

जिसका तर्जुमा ये है कि, “ऐ ईमानवालों! तुम्हारे सरपरस्त(वली) तो बस यही हैं, खुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो नमाज़ अदा करते हैं और हालत ए रुकू में ज़कात देते हैं”

इस आयत के बारे में एक बात बता दूं कि शिया और सुन्नी के हर बड़े आलिम ने तफ्सीर में ये बात मानी है कि ये आयत, हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शान में नाज़िल हुई है, लेकिन आज देखता हूँ कि ज्यादातर कुरआन के तर्जुमों में तर्जुमा करने वालों ने इस आयत को सही तरह से नहीं समझाया, कुछ कुरान के तर्जुमों में तो बस इतना लिखा है कि “नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं” यानी “हालत ए रुकू”, तर्जुमे से ही गायब कर दिया।

अल्लाह ही जाने ऐसा क्यों किया गया बाकि एक बात मैं ये जानता हूँ कि हालत ए रुकू में, कभी किसी ने ज़कात दी हो, ऐसा तारीख़ में नहीं मिलता सिवाय मौला अली अलैहिस्सलाम के।

आप मौला अली अलैहिस्सलाम ने दौरान ए रुकू, एक माँगने वाले को अपनी अँगूठी ज़कात कर दी थी और उलेमाओं ने लिखा है कि उसके बाद ही ये आयत नाज़िल हुई।

इस आयत में भी साफ़ इशारा है कि हमारा मौला, हमारा वली, हमारा सरपरस्त सिर्फ़ अल्लाह है और अल्लाह ने ही हमें दो सरपरस्त और दिए हैं पहले तो हमारे आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भी मौला हैं और तीसरे हमारे मौला अली अलैहिस्सलाम।

अल्लाह रब उल इज्जत, हम सबको हक़ पर चलने वाला और हक़ कहने वाला बनाए।

दो गराँकद्र चीजें

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम ने फरमाया-” बिला शुबह मैं तुम लोगों में दो गराँकद्र चीजें छोड़े जाता हूँ जो ऐसी हैं कि अगर तुम इन दोनों से तमस्सुक रखोगे (यानी दोनों को मजबूती से थामकर रहोगे) तो मेरे बाद हरगिज़ गुमराह ना होगे। वह हैं अल्लाह की किताब, कुरआन और मेरी इतरत, अहलेबैत।

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने ये भी फरमाया कि “अल्लाह की किताब और मेरे इतरत अहलेबैत अलैहिस्सलाम एक दूसरे से ता-कयामत जुदा ना होंगे हता के हौज़ ए कौसर पर भी मेरे पास दोनों इकट्ठे ही आएँगे। अगर तुम इन दोनों से तमस्सुक रखोगे, इन दोनों को थामकर रखोगे तो मेरे बाद तुम्हारे गुमराह न होने का कोई इम्कान ही ना बचेगा और साबित कदम रहोगे।”

इस्लाम में कई फिरके हैं, सब एक दूसरे से नफ़रत भी कर रहे हैं और लड़ भी रहे हैं लेकिन मैं आपको बता दूँ इस्लाम का रास्ता एक है, फिरकापरस्ती छोड़कर लोगों को ये दो चीजें थामना चाहिए. इनसे तमस्सुक रखना ही फलाह ए दुनिया ओ आख़िरत है।

सफीना ए नूह

मुहम्मद मुस्तफा सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया की “मेरी अहलेबैत अलैहिस्सलाम की मिसाल, सफीना फ नूह की मिसाल के मानिंद है, जो उसमें सवार हुआ उसने निजात पाई और जो उससे पीछे रह गया वह गर्क हो गया”

अगर आप कुरआन की रौशनी में देखें तो सफीना ए नूह, ना ही सितारों को देखकर चल रहा था, ना ही कोई अपने मुताबिक चला रहा था

वसी-ए-रसूल

बल्कि वह कश्ती तो अल्लाह की निगरानी में चल रही थी।

इस हदीस से ये भी साबित होता है कि अहलेबैत ज़रिया ए निजात हैं, उनके तरीकों पर चलने वाला और उनसे मवद्दत करने वाला बच जाएगा लेकिन उनके खिलाफ़ रहने वाला दोनों आलम में डूब जाएगा।

बाब ए हिता

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने ये भी फरमाया कि “मेरे अहलेबैत की मिसाल बनी इस्राईल के बाब ए हिता यानी दरवाजा ए बख्शिश की मानिंद है, जो भी इसमें दाखिल हुआ उसकी मगफिरत हो गई।”

जाहिर-सी बात है कि गुमराहों के लिए बख्शिश नहीं यानी अल्लाह ने अहलेबैत अलैहिस्सलाम को “गुमराही से बचाने वाला बनाया है” और ज़रिया ए मगफिरत भी। अगर ये एक बात लोग समझ लें तो फिरके की गुंजाइश नहीं रहेगी लेकिन ये भी हक़ है, जो कौम हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम के पुकारने पर एक नहीं हुई वह एक नहीं होगी।

लेकिन हिदायत अल्लाह के हाथ में है और हमें हक़ आम करना चाहिए।

हदीस ए अमान

नबी सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “सितारे ज़मीन वालों के लिए गर्क होने से अमान हैं और मेरे अहलेबैत अलैहिस्सलाम, मेरी उम्मत के लिए इखतिलाफ़ से अमान हैं यानी साफ है, जब कोई गिरोह उनसे इखतिलाफात करेगा तो गिरोह एइब्लीस से होगा।”

इस हदीस से भी साफ़ साबित हो रहा है, अहलेबैत का दुश्मन शैतान के गिरोह से है और अहलेबैत के गुलाम और आशिक़, कामयाब होंगे।

मन कुन्तो मौला

हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि मैं जिसजिस का मौला हूँ, अली भी उसका मौला है। यहाँ मौला के मायने सरपरस्त से ही हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने विलायत भी अता की और आप तमाम वलियों के सरदार हैं। आपकी विलायत को मानना भी ज़रूरी है क्योंकि आप अलैहिस्सलाम की मुहब्बत ही मोमिन और मुनाफिक के बीच का फर्क बताने वाली है।

इल्म ए रसूल का दरवाज़ा

तमाम फिरकों के ओलेमा ने यह हदीस नक्ल की है कि सरकार ए दो जहाँ मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया, “मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है”

यानी इल्म के शहर में जाना है तो बाब, अली हैं और याद रखें तालिब ए इल्म, दरवाजे से ही दाखिल होता है, खिड़कियों से दाखिल होने की कोशिश करने वाला चोर होता है।

हिकमत ए रसूल का दरवाज़ा

रसूल ए खुदा सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि ” मैं हिकमत का घर हूँ और अली उसका दरवाजा” यानी हिकमत भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज़रिए ही मिलती है।

हज़रत अली और अलामत ए इश्क ए रसूल

सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो ने पूछा-या रसूलुल्लाह! आपकी मुहब्बत की अलामत क्या है?

आप हज़रत सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली के कन्धे पर मारते हुए इशारा किया यानी ये मेरी मुहब्बत की अलामत है।

यानी जिसके दिल में मौला अली अलैहिस्सलाम का बुग्ज़ भी हो और इश्क एनबी का दावा भी हो, तो ये दावा झूठा है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम और कुरआन

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया कि “अली, कुरआन के साथ है और कुरआन, अली के साथ है और ये दोनों एक दूसरे से जुदा ना होंगे। हता कि इकट्ठे ही हौज़ ए कौसर पर वारिद होंगे।”

हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हक़

कुछ मुहद्दिसीन ने अम्मा सलमा रजिअल्लाहु अन्हा से रिवायत कर के

लिखा है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया की अली हक़ के साथ है और हक़ अली के साथ है।

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