अमीर यूसुफ़ बिन ताशफीन पार्ट 2

वह दोपहर के वक्त बुख़ार से बेहोश था और अमीर यूसुफ़ परेशानी की हालत में उसके सरहाने बैठा था। डाक्टर (वैद्य) उसे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे। सयर बिन अबूबकर जो अमीर यूसुफ़ का चाचा ज़ाद भाई था अमीर यूसुफ़ की क़ियाम गाह में दाखिल हुआ और उनसे गमगीन हजे में कहा, “अगर आप हुक्म दें तो आज पेश कदमी का इरादा मुलतवी कर दिया जाए, मगरिब से तूफ़ान के आसार नमूदार हो रहे हैं और बीमार की हालत भी ऐसी नहीं कि आप उसे छोड़कर जा सकें।”

अमीर यूसुफ ने इत्मीनान से जवाब दिया, “नहीं, तुम तैयारी करो, मैं अभी बन्दरगाह पहुंचता हूं।” सयर बिन अबूबकर मजीद कुछ और कहे बगैर बाहर निकल गया। थोड़ी देर बाद मरीज़ ने होश में आकर आंखें खोली और अपने बाप की तरफ़ देख कर कहा,

अब्बा जान! आप अभी तक गए क्यों नहीं? मेरे लिए अपना इरादा तबदील न कीजिए। मैं तन्दरुस्त होते ही जिहाद में शरीक होने के लिए उन्दुलस पहुंच जाऊंगा।”

बाप ने जवाब दिया, “मैंने इरादा तबलीद नहीं किया बेटा! अब तुम्हारी तबीअत कैसी है?”

“अब्बा जान! मैं बहुत जल्द ठीक हो जाऊंगा। जिहाद में शरीक होने की ख़ाहिश मुझे ज़्यादा अरसा बिस्तर पर लेटने नहीं देगी।”

अचानक हवा का एक तेज़ झोंका आया और दरवाजे के दोनों पट एक धमाके से खुल गए। अमीर यूसुफ़ ने बाहर झांक कर देखा, फ़ज़ा में तारीकी छा रही थी।

एक फकीह (आलिमे दीन) ने कहा, “यह तूफ़ान ख़तरनाक अमीर यूसुफ़ बिन ताशफीन

मालूम होता है, शायद कुदरत को भी यही मनजूर है कि आप सफ़र का इरादा मुलतवी कर दें।”

अमीर यूसुफ़ ने कहा, “कुदरत हमारा इम्तिहान ले रही है।” फ़ज़ा की तारीकी और तूफ़ान की शिद्दत बढ़ती गई। एक और फ़ौजी अफ्सर भागता हुआ अन्दर दाखिल हुआ और उसने कहा, “मुझे अमीरुल-बहर सयर बिन अबूबकर ने भेजा है। तूफ़ान की शिद्दत बढ़ गई है अगर आप इजाज़त दें तो रसद का सामान और घोड़े वगैरह उतार लिए जाएं”?

‘नहीं! उनसे कहो मैं खुद वहां पहुंच रहा हूं।”

” अफ्सर तेज़ी से बाहर निकल गया। अमीर यूसुफ़ ने अपने बेटे की तरफ़ देखा। उसपर दोबारा बेहोशी तारी हो रही थी। अमीर यूसुफ ने उसकी पेशानी पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा! मैं जा रहा हूं!”

बेटे ने दोबारा आंखें खोली और अपने बापका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “अल्लाह हाफ़िज़ अब्बाजान! अल्लाह आपको फ़तह दे! (आमीन)”

‘अल्लाह हाफ़िज़”। अमीर यूसुफ़ यह कहकर बाहर निकल गया।

बन्दरगाह में जहाज़ तिनकों की तरह डोल रहे थे। मल्लाह उनके बादबान गिराने में मसरूफ़ थे। अमीर यूसुफ़ को देखते ही चन्द फ़ौजी अफ्सर, उलमा और सरदारें उसके इर्द-गिर्द जमा हो गए।

एक फ़क़ीह ने आगे बढ़कर कहा, “अगर आप तूफ़ान की शिद्दत कम हो जाने तक इन्तिज़ार कर लें तो इसमें कोई हर्ज नहीं।” >

अमीर यूसुफ ने चन्द कदम आगे बढ़कर जवाब दिया, “अगरअमीर

कुदरत ने हमें उन्दुलस के मुसलमानों की नजात के लिए मुन्तख़ब किया है तो यह तूफ़ान हमारा रास्ता नहीं रोक सकता। पहले मेरा ख़याल था कि तमाम फ़ौज को रवाना करके आख़िरी जहाज़ पर जाऊं, लेकिन अब मेरा जहाज़ सबसे आगे होगा!” 19 >

हवा के तेज़ झोंकों के साथ पानी के छींटे अमीर यूसुफ़ के लिबास को तर कर रहे थे। अचानक साहिल से थोड़ी दूर पानी की सतह पर एक दीवार-सी नज़र आने लगी। सयर बिन अबूबकर समुन्दर की तरफ़ इशारा करते हुए चिल्लाया,

“आप पीछे हट जाएं, यह लहर बहुत ख़ौफ़नाक है।”

> अमीर यूसुफ़ के इर्द-गिर्द जमा होने वाले आदमी भाग-भाग कर साहिल की चट्टानों का रुख करने लगे। मगर अमीर यूसुफ़ इत्मीनान से अपनी जगह जमकर खड़ा रहा। सयर बिन अबूबकर ने उनका हाथ पकड़ कर पीछे हटाने की कोशिश की, लेकिन अमीर यूसुफ़ ने जंबिश न की, वह चट्टान की तरह खड़ा मुस्कुरा रहा था। लहर छोटी-छोटी चट्टानों को अपनी आगोश में लेकर आगे बढ़ी। आन की आन में अमीर यूसुफ़ पानी में खड़ा था। उसने अपने चाचाज़ाद भाई की तरफ़ देखा और कहा, “सयर! मैं अल्लाह गफूर व रहीम से दुआ करता हूं कि अगर हम किसी ऐसे इरादे से निकले हैं जो उसे पसन्द नहीं तो ये लहरें हमें अपनी आगोश में ले लें और अगर हमारा मकसद नेक है तो मैं इस तूफ़ान से मरऊब होकर पीछे हटने की बजाए उसकी रहमत का सहारा लेकर आगे बढ़ने को तरजीह दूंगा।” >

सरकश लहरें मुजाहिद की कबा को बोसे देने के बाद सिमटने लगीं। आहिस्ता-आहिस्ता फ़ज़ा पुर सुकून होने लगी। सयर बिन अबूबकर

अपने अमीर का अज्म व सबात देखकर मुस्कुराया और हाथ बुलन्द करते हुए कहा, “मुजाहिदो! लंगर उठा लो! बादबान खोल दो। हमारी मन्ज़िले मकसूद जज़ीरा अलखज़रा है।”

– एक आलिम-ए-दीन ने आगे बढ़कर कहा, “या अमीर! आपको फ़तह मुबारक हो, ये लहरें आपके इस्तिकबाल के लिए उठी थीं।”

दस दिन तक जज़ीरा-ए-ख़ज़रा उन्दुलस के मुसलमानों की तवज्जुह का मरर्कज़ बना रहा। इस अरसे में मुराबितीन की 12 हज़ार फ़ौज के अलावा रसद का सामान और घोड़े वगैरह पहुंच चुके थे। उन्दुलस से मुजाहिदीन और रजाकार जमा हो रहे थे।

ग्यारहवीं दिन अमीर यूसुफ़ बिन ताशफ़ीन की फ़ौज इश्बीला का रुख कर रही थी। रास्ते में जगह-जगह लोगों के हुजूम मसर्रत (खूशी) के नारों के साथ मुराबितीन की फ़ौज का इस्तिकबाल कर रहे थे। जब यह फ़ौज इश्बीला के सामने नमूदार हुई तो हज़ारों मर्द, ख़वातीन और बच्चे शहर से बाहर उसके इस्तिकबाल के लिए जमा थे। अमीर यूसुफ़ के कियाम के लिए इश्बीला के शाही महल को ख़ास तौरपर सजाया गया था। लेकिन उन्होंने फ़ौज के साथ शहर के बाहर खुले मैदान में पड़ाव डाल दिया। अलफ़ान्सू ने उन दिनों सरकस्ता का मुहासिरा कर रखा था। अमीर यूसुफ़ ने उसके नाम एक ख़ात लिखवाया जिसका मज़मून यह था,
“मैंने सुना है कि तुम उन्दुलस के बाद अफ्रीका फ़तह करने का इरादा रखते थे। मैं वहां तुम्हारा इन्तिज़ार न कर सका और खुद ही उन्दुलस पहुंच गया हूं। तुम्हारे लिए सिर्फ तीन रास्ते हैं हो, अगर यह
इस्लाम कबूल कर लो तो तुम हमारे भाई मन्जूर नहीं तो जिज़या देना पड़ेगा, अगर यह भी मन्जूर नहीं तो जंग के लिए तैयार हो जाओ।”

अलफ़ान्सू ताक़त के नशे में चूर था। उसने इस ख़त के जवाब में लिखा कि,

“तुम मौत की तलाश में यहां आए हो। उन्दुलस मेरा है और दुनिया की कोई ताक़त उसे मुझसे नहीं छीन सकती। अगर तुम्हारे सिपाही अपनी ज़िन्दगी से बेज़ार नहीं तो अब भी मौका है कि अपने मुल्क वापस चले जाएं।”

कातिब ने अलफ़ान्सू का ख़त पेश किया तो अफ्रीका के मुजाहिद ने अपने कलम से उसके कोने पर यह अलफ़ाज़ लिख दिए,

“जो कुछ पेश आने वाला है वह तुम खुद ही देख लोगे।”

अलफ़ान्सू ने तमाम महाजों से अपनी फौजों को जमा किया और सरक़स्ता का मुहासिरा छोड़कर तुलैतुला का रुख किया। जलीक़या, इस्चुरिया, लिओन, अरगौन और अननवार के हुकुमरानों के अलावा फ्रान्स और इतालिया के कई अमीर उसके साथ थे। तुलैतुला पहुंचकर उसने अपनी टिड्डी दल फ़ौज की तरफ़ देखा और कहा, “इस फ़ौज के साथ मैं इनसानों, जिन्नों और अगर आसमान से फ़रिश्ते भी उतर आएं, तो उनके साथ भी लड़ सकता हूं।” उसकी पयादा और सवार फ़ौज की तादाद 50 हज़ार और बाज़ तारीखदानों के मुताबिक़ 80 हज़ार थी।

अमीर यूसुफ़ ने उसकी पेशक़दमी की इत्तिला मिलते ही मुजाहिदीन को इश्बीला से कूच का हुक्म दिया। बितलियूस से चन्द कोस दूर जुलाक़ा के मैदान में मुसलमानों और ईसाइयों की फौजों ने पड़ाव डाल दिए। बितलियूस और इश्बीला, मालका और गरनाता के हुकुमरान अमीर यूसुफ़ के झंडे तले जमा हो गए थे। मरिया और मुरसिया के अमीरों को हिसनुल-यत के ईसाइयों ने परेशान कर रखा था। ताहम उन्होंने मुत्ताहिदा लशकर के लिए अपनी थोड़ी-सी फ़ौज भेज दी थी। मुराबितीन और मुलूकुत-तवाइफ़ के लशकर की मजमूई तादाद दुशमन के मुकाबले में तीन गुना कम थी। अफ्रीकी और उन्दुलसी फ़ौजों के पड़ाव एक-दूसरे से तकरीबन तीन मील के फासले पर थे और उनके दरमियान एक पहाड़ी भी हायल थी।

रमज़ान 480 हिजरी जुमारात के दिन जब लशकर-ए-इस्लामी दुशमन पर हमले की तैयारी कर रहा था, अलफ़ान्सू ने अमीर यूसुफ के नाम पैगाम भिजवाया कि कल जुमा है जो आपका मुक़द्दस दिन है और इतवार हमारा मुक़द्दस दिन है, इसलिए ताक़त आज़माई के लिए पीर का दिन मुकर्रर करें। अमीर यूसुफ़ ने दुशमन का यह मुतालबा मान लिया, लेकिन उसे मोतमिद का पैगाम मिला कि दुशमन ज़रूर धोका देगा, इस लिए आप होशियार रहें।

और ऐसा ही हुआ। अमीर यूसुफ़ की फ़ौज जुमा की नमाज़ के लिए खड़ी थी कि अलफ़ान्सू ने पहाड़ के दूसरी तरफ़ उन्दुलस की फ़ौज के पड़ाव पर धावा बोल दिया। मोतमिद ने पहले ही अपनी फ़ौज को तैयार कर रखा था, लेकिन यह हमला इस कदर शदीद था कि उनके पांव उखड़ गए और उन्दुलस की बेशतर फ़ौज बितलीयूस की तरफ़ पसपा होने लगी। मुलूकुत-तवाइफ़ में से सिर्फ मोतमिद ही ऐसा था जिसने मैदान छोड़कर भागना गवारा न किया। अपने अमीर की बहादुरी देखकर इश्बीला के सिपाहियों की गैरत ने जोश मारा और वे भी डटकर लड़ने लगे। उन्दुलसी फ़ौज के मुन्तशिर दस्तों का सफ़ाया करने के लिए अननवार की फ़ौज को काफ़ी समझकर अलफ़ान्सू के के सवारों ने पहाड़ों के गिर्द चक्कर काट कर अमीर यूसुफ़ की फ़ौज के मैमना और मैसरा पर हमला कर दिया। इस अरसा में मुराबितीन को तैयारी का मौका मिल चुका था। ताहम यह हमला इस क़दर जोरदार था कि मुराबितीन को पीछे हटना पड़ा। मुसलमानों को पसपा होता देखकर ईसाइयों के हौसले बढ़ गए और लिओन और फ्रान्स के सवारों के दस्ते मुराबितीन के लशकर के बाएं बाजू को तितर-बितर करते हुए कल्ब तक पहुंच गए।

ईसाइयों को अपनी फ़तह का यकीन हो चुका था। पहाड़ी की दूसरी तरफ़ अहले इशबीला भी दिफ़ाअ की हालत में लड़ रहे थे। अननवार के सिपाही उनसे कह रहे थे, “तुम्हारे हलीफ़ मैदान छोड़कर भाग रहे हैं। अब हथियार डाल दो, खुदकुशी का फायदा नहीं”। इन मायूसकुन हालात में भी एक शख्स को इस्लाम की फ़तह पर कामिल भरोसा था और वह अमीर यूसुफ़ था। वह इत्मीनान से अपने एक जरनेल से कह रहा था, “सयर यह जंग मेरी तवक्को से पहले ख़तम हो जाएगी, इनशाअल्लाह। फ़ौज को आगे बढ़ने का हुक्म दो। साद से कहो कि वह अपने दस्ते उन्दुलसी सिपाहियों की मदद के लिए ले जाए। हम पहाड़ी की दूसरी तरफ़ मिलेंगे।”

अमीर यूसुफ़ यह कहकर लशकर के पीछे जा पहुंचा और महफूज़ दस्तों के पांच हज़ार सवारों को लेकर एक तरफ़ निकल गया। एक लम्बा चक्कर काटने के बाद वह नसरानी लशकर के पड़ाव के पीछे जा पहुंचा। बरबर सवारों ने पड़ाव के मुहाफ़िजों को आन की आन में तलवार से कत्ल कर दिया और मों और सामाने रसद के जखीरों को आग लगा दी। उसके बाद उसने दोबारा मैदान-ए-जंग का रुख किया और फिर एक चक्कर काटकर दुशमन की फौज के मैमना पर हमला कर दिया।

इतनी देर में साद का लशकर उन्दुलसी फ़ौज की मदद को पहुंच चुका था और उसके असवदी दस्ते अहले इश्बीला पर अननवार के सिपाहियों की यलगार रोकने की कोशिश कर रहे थे। अचानक दाएं तरफ़ यके बाद दीगरे पांच-पांच सौ सवारों की दो टोलियां नमूदार हुईं। उन्होंने अल्लाहु अकबर का फ़लक शिगाफ़ नारा लगाया और दुशमन पर हमला कर दिया। सवारों का एक और दस्ता बाएं तरफ़ से नमूदार हुआ और उन्होंने भी किसी तवक्कुफ़ के बगैर दुश्मन पर धावा बोल दिया। यह ताज़ा दम सिपाही मरिया, मरसिया, गरनाता और फ़ज्जारा के पहाड़ी इलाकों के रज़ाकार थे।

इस महाज़ पर जंग का नक्शा बदलता देखकर अलफ़ान्सू के के चन्द और दस्ते अननवार के सिपाहियों की मदद के लिए पहुंच गए। लेकिन अब उन्दुलसी पहले के मुकाबले में ज़्यादा पुर उम्मीद होकर लड़ रहे थे। मोतमिद ज़ख़्मों से चूर होने के बावजूद शेर की तरह गरज रहा था। उन्दुलस की वह फ़ौज जो कुछ देर पहले मैदान छोड़ कर भाग निकली थी अब वापस आकर अहले इशबीला के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रही थी।

पहाड़ के दूसरी तरफ़ जंग इससे कहीं ज्यादा शदीद थी। अलफ़ान्सू को यक़ीन था कि अगर अमीर यूसुफ़ की फौजों के पांव उखड़ गए तो उसे न सिर्फ जंग में फ़तह होगी बल्कि बुहैरा-ए-रूम के साहिल तक उसका रास्ता रोकने वाला कोई न होगा। इसलिए उसने अपनी ज़्यादातर फ़ौज उसी महाज़ पर झोंक दी। वह अपली इब्तिदाई कामयाबियों


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