Month: September 2021
Jiski Ye Khwahish ho…

Jiski Ye Khwahish ho…!!!
Hazrat ibne Abbas RadiAllahu Anhuma se riwayat hai ke Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya:
“Jo shakhs ye pasand karta hai, Meri tarah Zindagi basar kare, Meri tarah Wisaal paaye, Jannat-e-Edn uska thikana ho jisey Mere Rabne Sanwara hai, pas wo Mere baad ALI ko Dost rakhe aur Uske dost ko bhi dost rakhe!
Aur Mere baad Aaimma ki iqteda karey kyunki Wo Mera Kumba hai Jinhe Meri Khilqat par Paida kiya hai (aur Unhe) Ilm wa Feham ata kiya gaya hai.
Meri ummat ke unlogo keliye halaqat hai jo Unki Fazilat ka inkar karenge aur unke darmiyan Mere Rishte ko kaatenge. Allah Ta’ala unhe Meri Shafa’at nasib nahi karega.”
Imam Abu Nuaim Asfahaani, Hilyatul Aulia wa Tabqatul Asfia, 1/86,
Rafayi, at Tadween, 2/485
“Aaimma” se murad Aaimma e Ahle Bayt Alaihi-Mussalam!Allahumma Salli wa Sallim Ala Sayyedina Muhammadiw wa Ala Aali Sayyedina Muhammadin Ala Qadree Muhabbatika Feeh.
Hadith Muslim 1914
HUZOOR E AKRAM ﷺ ne farmaya :
“Ek shaqs kisi raaste se guzar raha tha usne us raaste par ek Kaantedaar Shaaq ko paya to use Raaste se hata diya, ALLAH ko uska ye Amal pasand aaya aur us bande ki Maghfirat farma di.”
Muslim Sharif, Hadis No. 1914
ईमाम अली अलेहिस्लाम फरमातें है

ईमाम अली अलेहिस्लाम फरमातें है
अगर कोई आपकी फ़िक्र करता है तो उसकी कद्र करो क्योकि दुनिया मे तमाशबीन ज्यादा ओर फिक्र करने वाले बहुत कम होते है
IMAM ALI (AS) “Agar Koi Apki Fikar Karta Hai Toh Uski Qadr Karo Kyunki Duniya Me Tamashai Zyada Aur Fikar Karne Wale Bahut Kam Hote Hai.”
तमस्सुक ए सकलैन

अगर आँखों पर पड़ा हुआ गफ़लत का पर्दा हटाकर हकीकत को देखा जाए तो नज़र ये आएगा कि हम सब इस्लाम से बहुत दूर निकल चुके हैं बल्कि यूँ कहना सही होगा हम पिछड़ चुके हैं। वजह एक बार लिखू या बार-बार लिखू ये ही लिखना होगा कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हमें जिन दो चीजों को थामने का हुक्म दिया था वह कुरआन और अहलेबैत है। यानी इल्म कुरआन में है और उस इल्म को बताने वाले अहलेबैत हैं, दोनों का साथ कभी ना ख़त्म होने वाला है।

इन दो चीजों को छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि हम अस्ल इस्लामी निजाम को कभी समझ ही नहीं पाए. आज हम सब अपनेअपने मौलवियों के बनाए और बताए हुए रास्तों पर चल रहे हैं। अहलेबैत और हमारे बारह इमामों को छोड़कर कोई कामयाबी पा ही नहीं सकता, ना ही हक़ तक पहुँच सकता है।

आज लोग समझ ही नहीं पाते कि सही क्या है? और गलत क्या है, क्योंकि अगर कोई शरीयत ना जानने वाला हुक्मरान भी कोई कानून बना देता है, जो इस्लाम की शरीयत के कानून की तरह दिखता है तो कुछ नादान लोग उसे, इस्लाम की शरीयत साबित करने की कोशिश में लग जाते हैं। इस बात से अनजान की कोई भी शरीयत और कोई भी निज़ाम,
इस्लाम की शरीयत और इस्लामी निजाम की जगह नहीं ले सकता, वह पस्त ही साबित होगा।
आज हमारी कौम की हालत अगर देखी जाए तो हालात खराब नज़र आएँगे, कौम गफ़लत में पड़ी नज़र आएगी, गुनाहों में फँसी, दुनिया के जाल में जकड़ी हुई, मायूस, डरी हुई, हर ऐब और बुराई में शामिल। अपनी पहचान भूलती हुई, अपनी हकीकत भूलती हुई, हक़ और नाहक की तमीज़ खोती हुई।
हर जुमे खुत्बे दिए जा रहे हैं, दीन की अहमियत बताई जा रही है, आमाल नामे की कीमत बताई जा रही है लेकिन हमारी कौम आख़िरत को भूलकर, हक़ से मुँह फेरकर किस ओर जा रही है?
मस्जिदें खाली हैं, खानकाहों से ज्यादा भीड़ बाजारों में है, मदरसे की जगह, दुनियावी तालीमखानों ने ले ली है। ना हक़ सीखने वाले नज़र आ रहे हैं और ना ही हक़ सिखाने वाले ही नज़र आ रहे हैं। अगर हालात यूँ ही चलते रहे तो जल्द ही हक़ कहने वालों को ढूँढ पाना नामुमकिन-सा हो जाएगा और जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन आपकी नस्लों को डूबने से कोई नहीं बचा सकेगा।
आज से ही खुद को बेदार करिए. बेदार करिए उस गफ़लत की नींद से, जो आपके ईमान और नस्लों को खा रही है। इस गफ़लत से बाहर निकलना बहुत आसान है। जिक्र ए अहलेबैत को मिम्बरों से बुलंद कीजिए, अपनी नस्लों को हैदर ए कर्रार और करबला की दास्तान समझाइए, हसन अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी समझाई, अपनी बेटियों को फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िन्दगी समझाइए. इनकी सीरतों को आम कीजिए।
इमामों ने जो इल्म सिखाया है, तर्बियत ओ तालीम दी है, उसे अपनाकर, आमाल में उतारिए, फिर देखिए अपने आप हालात कैसे
और अहलेबैत अलैहिस्सलाम को थाम लीजिए. ये बदलेंगे। कुरआन ही फलाँ का एक वाहिद रास्ता है, जो अल्लाह और अल्लाह के हबीब सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हमें दिया है।
आज अक्सर लोग ये कहते हुए मिल जाते हैं कि दीन पर चलना आसान नहीं है क्योंकि वह समझे ही नहीं दीन क्या है?
दीन कोई अलग से मानने की चीज़ नहीं है, अपनी ज़िन्दगी को ही अल्लाह, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम और इमामों के बताए तरीके पर बसर करना। आने वाली हर तकलीफ़, हालात और रुकावटों से उस इल्म और तरीके से निपटना, जिस तरह से इमाम अलैहिस्सलाम ने सिखाया है ये ही दीन पर चलना है। इसमें इबादत से लेकर ख़िदमत और मज़लूम की आह बनने से लेकर जालिम से जंग करने तक सब शामिल है।

