
सवाल होता है कि और सहाबा का ज़िक्र कम और अ़ली का ज़िक्र ज़्यादा क्यूँ?
यहाँ पर तुम्हे ऐतेदाल याद नहीं आता ?
क्या तुम दोनो का ज़िक्र बराबर नहीं कर सकते ?
क्या तुम तफ़ज़ीली हो ?
जवाब – जो हुज़ूर ए अकरम सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम दें उसे लेलो
प्यारे आक़ा सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम ने अपनी उम्मत को एक फ़िक्र दी है हुज़ूर अलैहिस्सलाम का हर अमल हमारे लिए सुन्नत है या नहीं ?
अगर है तो ईमानदारी से पढ़ो और देखो की सबसे ज़्यादा फ़ज़ीलत मेरे आक़ा सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम ने किस ज़ात की बयान फ़रमाई है ?
सबसे ज़्यादा ख़साइस किस ज़ात की शान मे वारिद हैं
तुम्हे अ़ली ही अ़ली मिलेगा !
तो पता चला की और सहाबा से ज़्यादा अ़ली की फ़ज़ीलत बयान करना और सहाबा की तौहीन नहीं कोई हसद नहीं कोई बैर नहीं बल्कि सुन्नत ए मुस्तफ़ा है और अगर यहाँ मेरे आक़ा ऐतेदाल फ़रमाते तो हम भी ऐतेदाल करते लेकिन सय्यदुना मौला अ़ली अलैहिस्सलाम की शान मे सबसे ज़्यादा हदीसें मिलना ही बता रहा है कि अ़ली अ़ली करना हुज़ूर ए अकरम सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम की सुन्नत और क़ुर्बे मुस्तफ़ा का ज़रिया है !
जिसको एतेराज़ हो और हिम्मत हो तो वो मैदान ए हश्र में हुज़ूर ए अकरम सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम से सवाल करना कि या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम आपने सबसे ज़्यादा हदीसें अ़ली की शान मे ही क्यूँ बयान फ़रमाई 😊
” अना मदीनतुल इल्म व अलीय्युन बाबुहा “
मैं इल्म का शहर हूँ अ़ली उस इल्म के शहर का दरवाज़ा
( फ़रमाने मुस्तफ़ा सल्लल्लाहू अलैही व आलेही वसल्लम )
” अल्लाहुम्मा सल्लि अ़ला सय्यदुना व मौलाना मुहम्मद व अ़ला आले सय्यदुना व मौलाना मुहम्मद व बारिक वसल्लि “

