Elan e Nabuwat se phele ke waqia

जंगे फुज्जार

इस्लाम से पहले अरबों में लड़ाईयों का एक तवील सिलसिला जारी था। उन ही लड़ाईयों में से एक मशहूर लड़ाई “जंगे फुज्जार’ के नाम से मशहूर है। अरब के लोग जुल कदा, जुल हिज्जा, मुहर्रम और रजब इन चार महीनों का बे हद एहतराम करते थे। और इन महीनों में लड़ाई करने को गुनाह जानते थे। यहाँ तक कि आम तौर पर इन महीनों में लोग तलवारों को नियाम में रख देते थे। और नेजों की बरछियाँ उतार लेते थे। मगर इस के बा वुजूद कभी कभी कुछ ऐसे हंगामी हालात दर पेश हो गए कि मजबूरन इन महीनों में भी लड़ाईयाँ करनी पड़ी। तो इन लड़ाईयों को अले अरब “हुरूबे फुज्जार’ (गुनाह की लड़ाईयाँ) कहते थे। सब से आख़िरी जंग फुज्जार जो क़ुरैश और कैस’ के कबीलों के दर्मियान हुई उस वक्त हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उम्र शरीफ बीस बरस की थी। चूँकि कुरैश, इस जंग में हक पर थे। इस लिए अबू तालिब वगैरा चचाओं के साथ आप ने भी इस जंग में शिरकत फ़रमाई। मगर किसी पर हथियार नहीं उठाया। सिर्फ इतना ही किया कि अपने चचओं को तीर उठा उठा कर देते रहे इस लड़ाई में पहले “कैस’ फिर कुरैश गालिब आएं

और आख़िरकार सुलह पर इस लड़ाई का खात्मा हो गया

(सीरत इले हश्शाम जि.२ स. १८६)

हिल्फुल फुजूल

रोज़ रोज़ की लड़ाईयों से अरब के सैकड़ों घराने बरबाद हो गए थे। हर तरफ बद अमनी और आए दिन की लूट मार से मुल्क का अमन-ो अमान गारत हो चुका था। कोई शख्स अपनी जानमाल को महफूज़ नहीं समझता था। न दिन को चैन न रात को आराम इस वहशत नाक सूरते हाल से तंग आकर कुछ सुलह पसन्द लोगों ने जंगे फुज्जार के खात्मे के बाद एक इस्लाही तहरीक चलाई। चुनान्चे बनू हाशिम, बनू जहरा, बनू असद वगैरा कबाएले कुरैश के बड़े बड़े सरदारान अबदुल्लाह

बिन जुदआ

के मकान पर जमा हुए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा जुबैर बिन अब्दुल मुत्तलिब ने ये तजवीज़ पेश की कि मौजूदा हालात को सुधारने के लिए कोई मुआहदा होना चाहिए। चुनान्चे ख़ानदाने कुरैश के सरदारों ने “बकाए बाहम” के उसूल पर “जियो और जीने दो” के किस्म का एक मुआहदा किया। और हलफ़ उठाकर अहद किया कि हम लोग :(१) मुल्क से बे अमनी दूर करेंगे! (२) मुसाफिरों की हिफाज़त करेंगे! (३) गरीबों की इमदाद करते रहेंगे! (४) मज़लूम की हिमायत करेंगे। (५) किसी जालिम या गासिब को मक्का में नहीं रहने देंगे!

इस मुआहदा में हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी शरीक हुए और आप को ये मुआहदा इस कदर अजीज़ था कि एअलाने नुबूव्वत के बाद आप फरमाया करते थे कि इस मुआहदा से मुझे इतनी खुशी हुई कि अगर इस मुआहदा के बदले में कोई मुझे सुर्ख रंग के ऊँट भी देता तो मुझे इतनी

सीरतुल मुस्तफा अलौह वसा खुशी नहीं होती। और आज इस्लाम में भी अगर कोई मजलूम ।  “या आले हिलफुल फुजूल” कहकर मुझे मदद के लिए पुकारे तो मैं उस की मदद के लिए तय्यार हूँ। इस तारीख़ी मुआहदा को “हलफुल फुजूल” इस लिए कहते हैं कि कुरैश के इस मुआहदे से बहुत पहले मक्का कबीलए जुरहम के सरदारों के दर्मियान भी बिल्कुल ऐसा ही एक मुआहदा हुआ था। और चूँकि कबीलए जुरहम के वो लोग जो मुआहदे के मुहरिंक थे उन सब लोगों का नाम “फज्ल” था यानी फज्ल बिन हारिस और फज्ल बिन वदाआ, और फज्ल बिन फ़जाला इस लिए इस मुआहदे का नाम “हिलफुल फुजूल’ रख दिया गया। यानी उन चन्द आदमियों का मुआहदा जिन के नाम “फज्ल” थे। (सीरत इने हश्शाम जि.१ स.१३४)

मुल्के शाम का दूसरा सफ़र

जब आप की उम्र शरीफ़ तक़रीबन पच्चीस साल की हुई तो आप की आमनत व सदाकत का चरचा दूर दूर तक पहुँच चुका था। हज़रते ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा मक्का की एक बहुत ही मालदार औरत थीं। को ज़रूरत थी कि कोई अमानतदार आदमी मिल जाए तो उस के साथ अपनी तिजारत का माल व सामान मुल्के शाम भेजें। चुनान्चे उन की नज़रे इन्तिखाब ने इस काम के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मुन्तख़ब किया। और कहला भेजा कि आप मेरा माले तिजारत ले कर मुलके शाम जाएँ। जो मुआवजा मैं दूसरों को देती हूँ। आपकी अमानत व दियानत दारी की बिना पर मैं आपको दुगना दूंगी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनकी दरख्वासत मंजूर फ़माली। और तिजारत का माल व सामान ले कर मुल्के शाम को रवाना हो गए। इस सफ़र में हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा ने अपने मुअतमिद गुलाम

“मैसरा” को भी आप के साथ रवाना कर दिया ताकि वो आप की खिदमत करता रहे। जब आप मुल्के शाम के मशहूर शहर “बुसरा” के बाज़ार में पहुंचे तो वहाँ “नसतूरा’ राहिब की खानकाह के करीब में ठहरे। “नसतूरा” मैसरा को बहुत पहले से जानता पहचानता था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सूरत देखते ही ‘नसतूरा” मैसरा के पास आया। और दर्याफ्त किया कि ऐ मैसरा! ये कौन शख्स हैं जो इस दरख्त के नीचे उतर पड़े हैं। मैसरा ने जवाब दिया कि ये मक्का के रहने वाले हैं और खानदाने बनू हाशिम के चश्म- चिराग हैं। इन का नामे नामी “मुहम्मद’ और लकब अमीन है। नसतूरा ने कहा कि सिवाए नबी के इस दरख्त के नीचे आज तक कभी कोई नहीं उतरा। इस लिए मुझे यकीने कामिल है कि “नबी “आखिरुज-जमाँ यही हैं। क्योंकि आखिरी नबी की तमाम निशानियाँ जो मैं ने तौरेत व इन्जील में पढ़ी हैं। वो सब मैं इन में देख रहा हूँ। काश मैं उस वक्त ज़िन्दा रहता जब ये अपनी नुबूव्वत का एअलान करेंगे तो मैं इनकी भरपूर मदद करता। और पूरी जाँ निसारी के साथ इन की ख़िदमत गुजारी में अपनी तमाम उम्र गुज़ार देता। ऐ मैसरा! मैं तुम को नसीहत और वसीय्यत करता हूँ कि खबरदार! एक लम्हा के लिए तुम इन से जुदा न होना। और इन्तिहाई खुलूस व अकीदत के साथ इन की खिदमत करते रहना क्योंकि अल्लाह तआला ने इन को ख़ातिमुन नबीय्यीन होने का शरफ अता फरमाया है। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बुसरा के बाजार में बहुत जल्द तिजारत का माल फरोख्त करके मक्का मुकर्रमा वापस आ गए वापसी में जब आप का काफिला शहरे मक्का में दाखिल होने लगा। तो हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा एक बाला खाना पर बैठी हुई काफिला की आमद का मंजर देख रही थीं। जब उन की नज़र हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर पड़ी तो उन्हें ऐसा नजर आया कि दो फिरिश्ते आप
के सर पर धूप से साया किए हुए हैं। हजरते ख़दीजा रदियल्लाहु हसीन जलवा देखती रहीं। फिर अपने गुलाम मैसरा से उन्होंने कई अन्हा के कल्ब पर इस नूरानी मंज़र का एक खास असर हुआ। और वो फर्ते अकीदत से इन्तिहाई वालिहाना महब्बत के साथ ये
दिन के बाद इस का जिक्र किया। तो मैसरा ने बताया कि मैं तो पूरे सफर में यही मंज़र देखता रहा हूँ और इस के इलावा मैं ने बहुत सी अजीब व गरीब बातों का मुशाहदा किया है। फिर मैसरा ने नसतूरा राहिब की गुफ्तुगू और उसकी अकीदत व महब्बत का तकिरा भी किया। ये सुन कर हज़रत बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा को आप से बे पनाह कल्बी तअल्लुक और बे हद अकीदत व महब्बत हो गई। और यहाँ तक कि उन का दिल झुक गया। कि उन्हें आप से निकाह की रगबत हो गई ।(मदारिजुन नुबूब्वा जि. २ स.२७)
निकाह हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा माल व दौलत के साथ इंन्तिहाई शरीफ़ और इफ्फ़त मआब ख़ातून थीं। अहले मक्का उन की पाक दामनी और पारसाई की वजह से उन को ताहिरा (पाकबाज) कहा करते थे बड़े बड़े सरदाराने कुरैश उन के साथ अक्दे निकाह के ख्वाहिशमंद थे। लेकिन उन्होंने सब के पैग़ामों को ठुकरा दिया। मगर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पैगम्बराना अख्लाक- आदात को देखकर, और आप के हैरत अंगेज हालात को सुनकर

यहाँ तक कि उनका दिल आप की तरफ माएल हो गया। कि खुद ब खुद उनके कल्ब में आप से निकाह की रगबत पैदा हो गई। कहाँ तो बड़े बड़े मालदारों, और शहरे मक्का के सरदारों के पैगामों को रद्द कर चुकी थीं। की अपील

की समय और कहाँ खुद ही हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की फूफी हज़रते सफीय्या को बुलाया। जो उन के भाई अव्वाम बिन खुवैलद की बीवी थीं। उन से अहुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कुछ ज़ाती हालात के बारे में मजीद मालूमात हासिल की। फिर “नफीसा बिन्ते उमय्या के ज़रीओ खुद ही हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास निकाह का पैगाम भेजा। मशहूर इमामे सीरत मुहम्मद बिन इसहाक ने लिखा है कि इस रिश्ते को पसन्द करने की जो वजह हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा ने खुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बयान की है वो खुद उनके अल्फाज़ में ये है

“इन्नी कद रगिब्तु फीका लि-हुस्नि खुल-किका व सिदकि हदीसिका” यानी मैं ने आप के अच्छे अख्लाक और आप की सच्चाई की वजह से आप को पसन्द

(जुरकानी अलल मवाहिब जि. १ स. २००)

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस रिश्ते को अपने चचा.

हजरत

अबू तालिब और ख़ानदान के दूसरे बड़े बूढ़ों के सामने पेश फरमाया। भला हज़रते ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा जैसी पाकदामन, शरीफ, अकलमंद और मालदार औरत से शादी करने को कौन न कहता? सारे खानदान वालों ने निहायत खुशी के साथ इस रिश्ते को मंजूर कर लिया। और निकाह की तारीख मुकर्रर हुई। और हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम हजरते हम्जा रदियल्लाहु अन्हा और

हजरत

अबू तालिब वगैरा अपने चचाओं और
खानदान के दूसरे log और शुरफाए बनी हाशिम, व सरदाराने मुजर को अपनी बरात में ले कर हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा के मकान पर तशरीफ ले गए और निकाह हुआ। इस निकाह के वक्त

हजरत

अबू तालिब ने निहायत ही फसीह व बलीग खुत्बा पढ़ा। इस खुत्बे से बहुत अच्छी तरह इस बात का अन्दाजा हो जाता है कि एअलाने नुबूब्बत से पहले आपके खानदानी बड़े बूढों का आपके मुतअल्लिक कैसा खयाल था। और आप के अख्लाक व आदात ने उन लोगों पर कैसा असर डाला था।
तमाम Tarref उस खुदा के लिए हैं जिस ने हम लोगों को हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नस्ल और हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में बनाया और हम को मअद्द और

मुज़र के खानदान में पैदा फ़रमाया। और अपने घर (कबा) का निगेहबान और अपने हरम का मुन्तज़िम बनाया। और हम को इल्म व हिकमत वाला घर, और अमन वाला हरम अता फरमाया। और हम को लोगों पर हाकिम बनाया।

ये मेरे भाई का फ़रज़न्द मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह है। ये एक ऐसा जवान है कि कुरैश के जिस शख्स का भी इस के साथ मवाज़ना किया जाए। ये उस से हर शान में बढ़ा हुआ ही रहेगा। हाँ माल इसके पास कम है। लेकिन माल तो एक ढलती हुई छाँव और अदल बदल होने वाली चीज़ है। अम्मा बअद। मेरा भतीजा मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) वो शख्स है जिस के साथ मेरी कराबत और कुरबत व महब्बत को तुम

लोग अच्छी तरह जानते हो वो ख़दीजा बिन्ते खुवैल्द से निकाह करता है। और मेरे माल में से बीस ऊँट महर मुकर्रर करता है। और इस का मुस्तकबिल बहुत ही ताबनाक, अज़ीमुश्शान और जलीलुल कद्र है।

(जुरकानी अलल मवाहिब जि. १ स.२०१)
जब  Hazrat अबू तालिब अपना ये वलवला अंगेज़ खुत्बा ख़त्म कर एनात
चुके तो हजरते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा के चचा जाद भाई वरका बिन नौफल ने भी खड़े हो कर एक शानदार खुत्बा पढा। जिस का मजमून ये है। खुदा ही के लिए हम्द है जिस ने हम को ऐसा ही बनाया जैसा कि Hazrat अबू तालिब! आप ने जिक्र किया। और हमें वो तमाम फजीलतें अता फरमाईं जिन को आप ने शुमार किया। बिला शुब्हा हम लोग अरब के पेश्वा और सरदार हैं। और आप लोग भी तमाम फजाएल के अहल हैं। कोई कबीला आप लोगों के फजाएल का इन्कार नहीं कर सकता। और कोई शख्स आप लोगों के फख व शर्फ को रद्द नहीं कर सकता। और बे कशक हम लोगों ने निहायत रगबत के साथ आप लोगों के साथ मिलने और रिश्ते में शामिल होने को पसन्द किया। लिहाजा ऐ कुरैश! तुम गवाह रहो कि ख़दीजा बिन्ते खुवैल्द को मैं ने मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की जौजियत में दिया चार सौ मिस्काल महर के बदले। गरज़ हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा के साथ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का निकाह हो गया और हुजूर महबूबे खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का खानए मअशियत अज़दवाजी ज़िन्दगी के साथ आबाद हो गया। हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा तकरीबन २५ बरस तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में रहीं। और उन की ज़िन्दगी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कोई दूसरा निकाह नहीं फरमाया । और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के एक फरजन्द हज़रते इब्राहीम के सिवा बाकी आप की तमाम औलाद हजरते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा ही के बतन से पैदा हुईं। जिन का तफ्सीली बयान आगे आएगा। हज़रते बीबी खदीजा रदियल्लाहु अन्हा ने अपनी सारी दौलत
हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कदमों पर कुर्बान कर दी और अपनी तमाम तर उम्र हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की गमगुसारी और खिदमत गुज़ारी में निसार कर दी। जिन की तफ्सील आइन्दा सफहात में तहरीर की जाएगी। कबा की तश्मीर आप की रास्तबाजी, और अमानत व दियानत की बदौलत खुदावंदे आलम ने आप को इस कदर मकबूले खलाएक बना दिया। और अक्ले सलीम और बे मिसाल दानाई का ऐसा अजीम जौहर अता फरमा दिया कि कम उम्री ही में आप ने अरब के बड़े बड़े सरदारों के झगड़ों का ऐसा ला जवाब फैसला फरमा दिया कि बड़े बड़े दानिशवरों और सरदारों ने इस फैसले की अज़मत के आगे सर झुका दिया । और सब ने बिल इत्तिफाक आप को अपना हकम और सरदारे अअज़म तस्लीम कर लिया। चुनान्चे इस किस्म का एक वाकिआ तअमीरे कबा के वक्त पेश आया। जिस की तफ्सील ये है कि जब आप की उम्र पैंतीस बरस की हुई तो जोर दार बारिश से हरमे कबा में ऐसा अज़ीम सैलाब आ गया। कि कअबा की दीवार बिल्कुल मुनहदम हो गई। हज़रते इब्राहीम व हजरते इस्माईल अलैहिमुस्सलाम का बनाया हुआ कबा बहुत ही पुराना हो चुका था। अमालका कबीलए जुरहम और कुसय्यी वगैरा अपने अपने वक्तों में इस कञ्बे की तअमीर व मरम्मत करते रहे। मगर चूँकि इमारत नशेब में थी। इस लिए पहाड़ियों से बरसाती पानी का बहाव का जोरदार धारा वादीए मक्का में हो कर गुजरता था और अकसर हरम कबा में सैलाब आ जाता था। कबा की हिफाजत के लिए बालाई हिस्से में कुरैश ने कई बन्द भी बनाए थे मगर वो बन्द बार बार टूट जाते थे इस लिए कुरैश ने ये तय किया कि इमारत को ढाकर फिर से कबा की एक मजबूत इमारत बनाई जाए। जिस का बरवाजा बुलन्द हो। और छत भी हो। चुनान्चे कुरैश ने मिल जुल कर तअमीर का काम शुरू कर दिया। इस तअमीर में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी शरीक हुए। और सरदाराने कुरैश के दोश बदोश पत्थर उठा उठा कर लाते रहे मुख्तलिफ कबीलों ने तअमीर के लिए मुख्तलिफ हिस्से आपस में तक्सीम कर लिए। जब इमारत “हजरे असवद” तक पहुंच गई। तो कबाएल में सख्त झगड़ा खड़ा हो गया। हर कबीला यही चाहता था कि हम ही “हजरे असबद” को उठाकर दीवार में नसब करें। ताकि हमरे कबीले के लिए ये फख व एअज़ाज़ का बाइस बन जाए। इसी कशमकश में चार दिन

गुज़र गए। यहाँ तक नौबत पहुँची कि तलवारें निकल आईं। बनू

अदी के कबीलों ने तो इस पर जान की बाजी लगा दी। और ज़मानए जाहिलीयत के दस्तूर के मुताबिक अपनी कसमों को मजबूत करने के लिए एक पियाला में खून भर कर अपनी उंगलियाँ उस में डिबोकर चाट लीं। पाँचवें दिन हरमे कबा में तमाम कबाएले अरब जमअ हुए। और इस झगड़े को तय करने के लिए एक बूढ़े शख्स ने ये तजवीज़ पेश की। कि कल जो शख्स सुबह सवेरे सब से पहले हरमे कबा में दाखिल हो उस को पन्च मान लिया जाए वो जो फैसला कर दे सब उस को तस्लीम कर लें। चुनान्चे सब ने ये बात मान ली। खुदा की शान कि सुबह को जो शख्स हरमे कबा में दाखिल हुआ वो हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही थे। आप को देखते ही सब पुकार उठे कि वल्लाह ये “अमीन” हैं। लिहाजा हम सब इन के फैसले पर राज़ी हैं। आप ने इस झगड़े का इस तरह तसफिया फरमाया कि पहले आप ने ये हुक्म दिया कि जिस जिस कबीले के लोग हजरे असवद को उस के मकाम पर रखने के मुद्दई हैं उन का एक एक सरदार चुन लिया जाए। चुनान्चे हर कबीले वालों ने अपना अपना सरदार चुन लिया। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी चादर मुबारक को बिछाकर हजरे
सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम असवद को उस पर रखा। और सरदारों को हुक्म दिया कि सब लोग इस चादर को थाम कर मुकद्दस पत्थर को उठाएँ । चुनान्चे सब सरदारों ने चादर को उठाया और जब हरे असवद अपने मकाम तक पहुँच गया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने मुतबर्रक हाथों से उस मुकद्दस पत्थर को उठाकर उस की जगह पर रख दिया इस तरह एक ऐसी खून रेज लडाई टल गई जिस के नतीजे में न मालूम कितना खून खराबा होता। (सीरते इने हश्शाम जि. १ स. १९६ ता १९७) खानए कबा की इमारत बन गई। लेकिन तअमीर के लिए जो सामान जमअ किया गया था वो कम पड़ गया इस लिए एक तरफ का कुछ हिस्सा बाहर छोड़कर नई बुनियाद काएम करके छोटा सा कबा बना लिया गया। कबा मुअज्जमा का यही हिस्सा जिस को कुरैश ने इमारत से बाहर छोड़ दिया। “हतीम’ कहलाता है। जिस में कबा मुअज्जमा की छत का परनाला गिरता है।

कबा कितनी बार तअमीर किया गया? हजरते अल्लामा जलालुद्दीन सियूती रहमतुल्लाह अलैहि ने “तारीखे मक्का में तहरीर फ़रमाया है कि “खानए कबा दस बार तअमीर किया गया। (१) सबसे पहले फिरिश्तों ने ठीक “बैतुल मअमूर के सामने जमीन पर खानए कबा को बनाया। (२) फिर हजरते आदम अलैहिस्सलाम ने इस की तअमीर फ़रमाई। (३) इस के बाद हज़रते आदम अलैहिस्सलाम के फरज़न्दों ने इस इमारत को बनाया। (४) इस के बाद हज़रते इब्राहीम ख़लीलुल्लाह और उनके फ़रज़न्दे अरजुमंद हजरते इस्माईल अलैहिमुस्सलाम ने इस मुकद्दस घर को तअमीर किया। जिस का तज़्किरा कुरआन में है।
(५) कौमे अमालका की इमारत। (६) इस के बाद कबीलए जुरहम ने इस की इमारत बनाई। (७) कुरैश के मूरिसे अअला “कुसय्यी बिन कल्लाब” (८) कुरैश की तअमीर जिस में खुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला
अलैहि वसल्लम ने भी शिरकत फरमाई और कुरैश के साथ खुद भी अपने दोशे मुबारक पर पत्थर उठा उठाकर लाते
रहे।
(९) हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हु ने अपने दौरे
खिलाफ़त में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तजवीज़ का नक्शे के मुताबिक तअमीर किया। यानी हतीम की जमीन को कबा में दाखिल कर दिया। और दरवाज़ा सतहे ज़मीन के बराबर नीचे रखा। और एक दरवाज़ा मशरिक
की जानिब और एक दरवाज़ा मगरिब की सम्त बना दिया। (१०) अब्दुल मलिक बिन मरवान उमवी के ज़ालिम गवरनर हज्जाज
बिन यूसुफ़ सकफ़ी ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर को शहीद कर दिया। और उन के बनाए हुए कबा को ढा दिया। और फिर ज़मानए जाहिलीय्यत के नक्शे के मुताबिक कबा बना दिया। जो आज जक मौजूद है
लेकिन हज़रते अल्लामा हलबी रहमतुल्लाह अलैहि ने अपनी सीरत में लिखा है कि नए सिरे से कबा की तअमीरे जदीद सिर्फ तीन ही मरतबा हुई। (१) हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तअमीर। (२) ज़मानए जाहिलीय्यत में कुरैश की इमारत । और इन दोनों
तअमीरों में दो हजार सात सौ पैंतीस (२७६५) बरस का
फासला है। (३) हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हु की तअमीर
जो कुरैश की तअमीर के बयासी साल बाद हुई। हज़राते मलाएका और हज़रते आदम अलैहिस्सलाम और उन
के फरजन्दों की तअमीरात के बारे में अल्लामा हलबी ने फ़रमाया कि ये सही रिवायतों से साबित नहीं है। बाकी तअमीरों के बारी में उन्हों ने लिखा है कि ये इमारत में मामूली तरमीम, या टूट फूट की मरम्मत थी। तअमीरे जदीद नहीं थी। वल्लाहु तआला अअलम।

(हाशिया बुख़ारी जि. १ स.२१५ बाब फज्ले मक्का)

मख्सूस अहबाब एअलाने नुबूवत से कब्ल जो लोग हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मख्सूस अहबाब व रुफका थे वो सब निहायत ही बुलन्द अख़्लाक, आली मर्तबा, होशमंद और बा वकार लोग थे। इन में सब से ज़्यादा मुकर्रब हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु थे। जो बरसों आप के साथ वतन और सफर में रहे और तिजारत नीज़ कारोबारी मुआमलात में हमेशा आप के शरीक कार व राजदार रहे। इसी तरह हज़रते ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा के चचा ज़ाद भाई हज़रते हकीम बिन हज़ाम दियल्लाहु अन्हु जो कुरैश के निहायत ही मुअज्ज रईस थे। ये भी हूजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मख्सूस अहबाब में खुसूसी इम्तियाज़ रखते थे। हजरते ज़िमाद बिन सअल्बा रदियल्लाहु अन्हु जो ज़मानए जाहिलीय्यत में तबाबत और जर्राही का पेशा करते थे। ये भी अहबाबे खास में से थे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के एअलाने नुबूव्वत के बाद ये अपने गाँव से मक्का आए। तो कुफ्फारे कुरैश की जबानी ये प्रोपागन्डा सुना कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मजनून हो गए हैं। फिर ये देखा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रास्ते में तशरीफ ले जा रहे हैं। और आप के पीछे लड़कों का एक गौल है जो शोर मचा रहा है। ये देखकर हज़रते जम्माद बिन सअल्बा रदियल्लाहु अन्हु को कुछ शुब्हा पैदा हुआ। और पुरानी दोस्ती की बिना पर उनको इन्तिहाई रंज व कलक हुआ । चुनान्चे ये हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास आए। और कहने लगे कि ऐ मुहम्मद! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं तबीब हूँ और जुनून का इलाज कर सकता हूँ ये सुनकर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुदा की हम्द- सना के बाद चन्द जुम्ले इर्शाद फरमाए। जिन का हज़रते जम्माद बिन सअल्बा रदियल्लाहु अन्हु के कल्ब पर इतना गहरा असर पड़ा कि वो फौरन ही मुशर्रफ ब इस्लाम हो गए। (मिश्कात बाबे अलामतुन नुबूब्वा स. २२५ व मुस्लिम जि.१ स.२८५ किताबुल जुमआ)

हज़रते कैस बिन साएब महजूमी रदियल्लाहु अन्हु के कारोबार में आप के शरीक कार रहा करते थे। और आप के गहरे दोस्तों में से थे। ये कहा करते थे कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मुआमला अपने तिजारती शुरका के साथ हमेशा निहायत ही साफ़ सुथरा रहता था। और कभी कोई झगड़ा पेश नहीं आता था। (इस्तीआब जि. २ स. ५३७)


मुवहद्दीने अरब से तअल्लुकातअरब में अगरचे हर तरफ शिर्क फैल गया था। और घर घर में
बुत परस्ती का चर्चा था। मगर इस माहौल में भी कुछ ऐसे लोग थे जो तौहीद के परस्तार और शिर्क व बुत परस्ती से बेज़ार थे। इन्ही खुश नसीबों में जैद बिन अमर बिन नुफैल हैं। ये अलल एअलान शिर्क व बुत परस्ती से इन्कार, और जाहिलीय्यत की मुशरिकाना रस्मों से नफ़रत का इज़हार करते थे। ये हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु के चचा जाद भाई हैं। शिर्क व बुत परस्ती के खिलाफ एअलाने मज़म्मत की बिना पर इन का चचा “ख़त्ताब बिन नुफैल इन को बहुत ज़्यादा तकलीफें दिया करता था। यहाँ तक कि इन को मक्का से शहर बदर कर दिया था। और इन को मक्का में दाखिल नहीं होने देता था। मगर ये हजारों ईजाओं के बा वुजूद अकीदए तौहीद पर पहाड़ की तरह डटे हुए थे।
ये मुशरिकीन के दीन से मुतनफ़िफ़र हो कर दीने बरहक की तलाश में मुलके शाम चले गए थे। वहाँ एक यहूदी आलिम से मिले। फिर एक नसरानी पादरी से मुलाकात की। और जब आपने यहूदी व नसरानी दीन को कब्ल नहीं किया तो इन दोनों ने “दीने हनीफ की तरफ आप की रहनुमाई की जो हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह अलैहिस्सलाम का दीन था। और इन दोनों ने ये भी बताया कि हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम न यहूदी थे न नसरानी और वो एक खुदाए वाहिद के सिवा किसी की इबादत नहीं करते थे। ये सुनकर जैद, बिन अमर बिन नुफैल मुल्के शाम से मक्का वापस आ गए। और हाथ उठा उठा कर मक्का में ब-आवाज़ ये कहा करते थे कि ऐ लोगो! गवाह रहो कि मैं हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर हूँ। (सीरते इने हश्शाम जि.१ स.२२५)

एअलाने नुबूब्बत से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ जैद बिन अमर दिन नुफैल को बड़ा ख़ास. तअल्लुक था। और कभी कभी मुलाकातें भी होती रहती थीं। चुनान्चे हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु रावी हैं कि एक मर्तबा वही नाज़िल होने से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मकामे “बलदह” की तराई में जैद बिन अमर बिन नुफैल से मुलाकात हुई। तो उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सामने दस्तरख्वान पर खाना पेश किया। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खाने से इन्कार फमा दिया। तो जैद बिन अमर बिन नुफैल कहने लगे कि मैं बुतों के नाम पर ज़िब्ह किए हुए जानवरों का गोश्त नहीं खाता । मैं सिर्फ वही ज़बीहा खाता हूँ जो अल्लाह तआला के नाम पर जिब्ह किया गया हो। फिर कुरैश के ज़बीहों की बुराई बयान करने लगे। और कुरैश को मुखातिब करके कहने लगे कि बकरी को अल्लाह तआला ने पैदा फ़रमाया। और अल्लाह तआला ने उस के लिए आस्मान से बरसाया। और ज़मीन से घास उगाई। फिर ऐ कुरैश! तुम बकरी को अल्लाह के गेर (बुतों) के नाम पर जिब्ह करते हो।

हज़रते अस्मा बिन्ते अबू बकर रदियल्लाहु अन्हा कहती हैं कि मैं ने जैद बिन अमर बिन नुफैल को देखा कि वो ख़ानए कबा से टेक लगाए हुए कहते कि ऐ जमाअते कुरैश! खुदा की कसम! मेरे सिवा तुम में से कोई भी हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन पर नहीं है। बुख़ारी जि.१ बाब हदीस जैद बिन अमर नुफैल स. ५४०)

कारोबारी मशागिल हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम काअसल खानदानी पेशा तिजारत था। चूँकि आप बचपन ही में अबू तालिब के साथ कई बार तिजारती सफ़र फ़रमा चुके थे जिस से आप को तिजरती लेन देन का काफी तजरुबा भी हासिल हो चुका था। इस लिए ज़रीअए मआश के लिए आप ने तिजारत का पेशा इख्तियार फरमाया। और तिजारत की गरज़ से शाम व बुसरा और यमन का सफर फरमाया। और ऐसी रास्त बाज़ी और अमानत व दियानत
के साथ आप ने तिजारती कारोबार किया कि आप के शुरकाए

सीरतुल मुस्तफा सल्लल्लाहु ताला कार और तमाम अहले बाज़ार आप को “अमीन” के लकब से पुकारने लगे।

एक कामयाब ताजिर के लिए अमानत, सच्चाई वअदा की पाबन्दी, खुश अख़्लाकी तिजारत की जान हैं। इन खुसूसियात में मक्का के ताजिर अमीन ने जो तारीख़ी शाहकार पेश किया है उस की मिसाल तारीखे आलम में नादिरे रोज़गार है। हज़रते अब्दुल्लाह बिन अबिल हमसा सहाबी रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि नुजूले वही और एअलाने नुबूव्वत से पहले मैं ने आप से कुछ ख़रीदने फरोख्त का मुआअमला किया। कुछ रकम अदा कर दी, कुछ बाकी रह गई थी। मैं ने वअदा किया कि मैं अभी अभी आ कर बाकी रकम भी अदा कर दूंगा। इत्तिफ़ाक़ से तीन दिन तक मुझे अपना वअदा याद ही नहीं आया। तीसरे दिन जब मैं उस जगह पहुँचा जहाँ मैं ने आने का वअदा किया था तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उसी जगह मुन्तज़िर पाया। मगर मेरी इस वदा ख़िलाफ़ से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माथे पर इक जरा बल नहीं आया। बस सिर्फ इतना ही फ़रमाया कि तुम कहाँ थे? मैं तीन दिन से तुम्हारा इन्तिज़ार कर रहा हूँ। (सुनन अबू दाऊद जि. २ स.३३४ बाब फ़िल इद्दतुल मुजतबाई)

इसी तरह एक सहाबी हज़रते साएब रदियल्लाहु अन्हु जब मुसलमान होकर बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और लोगों ने उन से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के “खुल्के अज़ीम’ का तजकिरा करना शुरू किया तो उन्होंने फ़रमाया कि मैं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तुम लोगों से ज्यादा जानता हूँ। एअलाने नुबूब्वत से पहले आप मेरे शरीके तिजारत थे। लेकिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हमेशा मुआमला इतना साफ और सुथरा रखा। कि कभी भी कोई तकरार, या तू तू, मैं मैं की नौबत ही नहीं आई।

(सुनन अबू दाऊद जि.२ स.३१७ बाब करहियतुलमरा मुजकतबाई)

गैर मअमूली किरदार

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जमानए तुफूलीय्यत खत्म हुआ। जवानी का ज़माना आया तो बचपन की तरह आप की जवानी भी आम लोगों से निराली थी। आप का शबाब मुजस्सम हया और चाल चलन असमत व वकार का कामिल नुमूना था। एअलाने नुबूव्वत से कब्ल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तमाम जिन्दगी बेहतरीन अख्लाक व आदात का ख़ज़ाना थी। सच्चाई, दियानत दारी, वफादारी, अहद की पाबंदी, बुजुर्गों की अज़मत, छोटों पर शफ़क़त, रिश्तेदारों से महब्बत रहम व सखावत, कौम की खिदमत, दोस्तों से हमदर्दी, अज़ीज़ों की गमख्वारी, गरीबों और मुफ़लिसों की ख़बरगीरी, दुश्मनों के साथ नेक बरताव, मख्लूके खुदा की खैर ख़्वाही, गरज कि तमाम ख़सलतों और अच्छी अच्छी बातों में आप इतनी बुलन्द मंज़िल पर पहुँचे हुए थे कि दुनिया के बड़े से बड़े इन्सानों के लिए वहाँ तक रिसाई तो क्या? इस का तसव्वुर भी मुमकिन नहीं है।

कम बोलना फजूल बातों से नफरत करना, खन्दा पेशानी और खुशरुई के साथ दोस्तों और दुश्मनों से मिलना, हर मुआमले में सादगी और सफ़ाई के साथ बात करना हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख़ास शेवा था। हिर्स, तमझ, दगा, फ़रेब, झूट, शराब ख़ोरी, बदकारी, नाच गाना, लूट मार, फहश गोई, इश्क बाज़ी, ये तमाम बुरी आदतें और मज़मूम ख़सलतें जो ज़मानए जाहिलीय्यत में गोया हर बच्चे के खमीर में होती थीं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की जाते गिरामी इन तमाम उयूब व नकाएस से पाक रही। आप की रास्तबाज़ी और अमानत व दियानत का पूरे अरब में शोहरा था। और मक्का के हर छोटे बड़े के दिलों में आप के बरगुज़ीदा अख़्लाक का एअतिबार और सब की नज़रों में आप का एक ख़ास वकार था।

बचपन से तकरीबन चालीस बरस की उम्र शरीफ हो गई।
लेकिन जमानए जाहिलीय्यत के माहौल में रहने के बा वुजूद तमाम मुशरिकाना रुसूम और जाहिलाना अतवार से हमेशा आप का दामने असमत पाक ही रहा। मक्का शिर्क व बुत परस्ती का सब से बड़ा मरकज़ था। खुद ख़ानए कबा में तीन सौ साठ बुतों की पूजा होती थी। आप के ख़ानदान वाले ही कबा के मुतवल्ली और सज्जादा नशीन थे लेकिन इस के बा वुजूद आप ने कभी बुतों के आगे सर नहीं झुकाया।

गरज नुजूले वही और एअलाने नुबूव्वत से पहले भी आप की मुकद्दस ज़िन्दगी अख्लाके हसना और महासिने अफ़आल का मुजस्समा और तमाम उयूब व नकाएस से पाक व साफ़ रही। चुनान्चे एअलाने नुबूब्बत के बाद आप के दुश्मनों ने इन्तिहाई कोशिश की कि कोई अदना सा झैब या ज़रा सी ख़िलाफे तहज़ीब कोई बात आप की ज़िन्दगी के किसी दौर में भी मिल जाए तो उस को उछाल कर आप के वकार पर हमला करके लोगों की निगाहों में आप को जलील- वार कर दें। मगर तारीख गवाह है कि हज़ारों दुश्मन सोचते सोचते थक गए। लेकिन कोई एक वाकिआ भी ऐसा नहीं मिल सका जिस से वो आप पर अंगुश्त नुमाई कर सकें। लिहाज़ा हर इन्सान इस हकीकत के एअतिराफ़ पर मजबूर हैं कि बिला शुब्हा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का किरदार इन्सानियत का एक ऐसा मुहय्येरुल उकूल और गैर मअमूली किरदार है जो नबी के सिवा किसी दूसरे के लिए मुमकिन । ही नहीं है। यही वजह है कि एअलाने नुबूब्बत के बाद सईद रूहें आप का कलिमा पढ़कर तन मन धन के साथ इस तरह आप पर कुरबान होने लगी कि इन की जाँ निसारियों को देखकर शमा के परवानों ने जाँ निसारी का सबक सीखा। और हकीकत शनास लोग फर्ते अकीदत से आप के हुस्ने सदाक़त पर अपनी अक्लों को कुर्बान करके आप के बताए हुए इस्लामी रास्ते पर आशिकाना अदाओं के साथ ज़बाने हाल से ये कहते हुए चल पड़े कि – चलो वादीए इश्क में पा बरहना
ये जंगल वो है जिस में काँटा नहीं है

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