Taleemat e Ameer 5

** تعلیمات امیر ( Taleemat e Ameer r.a)
** پانچوا حصہ ( part-5)

۲۔ حضرت مولی علی علیہ السلام کے دوسرے خلیفہ کی حیثیت سے حضرت امام عالی مقام حسین شہید کربلا علیہ السلام نے خرقہ خلافت حاصل کیا اور علم ظاہر و باطن کی تکمیل آپ نے اپنے پدرے بزرگوار حضرت مولی متقیان امام علی علیہ السلام اور اپنے برادر ے اکبر امام حسن ال مجتبی علیہ السلام سے کیا۔ پس آپ کے جانشین آپکے فرزند اوسط حضرت امام زین العابدین علیہ السلام اور ابن برادر ے اکبر حضرت امام حسن ال مثنی علیہ السلام ہوئیں جیسا کہ اوپر ذکر ہو چکا ہے۔ پس امام زین العابدین علیہ السلام سے امام زید شہید ہوئے جن سے خاندان و سلسلہ زیدیہ جاری ہوا اور ان دونوں سلسلوں کے حامل و امین حضرت سرکار امام محمدؐ ذوالنفس زکیہ شہید علیہ السلام ہوۓ جن سے خاندان و سلسلہ قطبیہ کبیریہ جاری ہوا جیسا کہ اوپر ذکر ہو چکا ہے۔ پس حسنی حسینی نجابت اور شرافت جو بدرجہ اتم خانوادہ قطبیہ کبیریہ میں موجود ہے وہ شاید ہی کسی اور خانوادے میں موجود ہو۔ پس اسی شرافت و نجابت کی بنا پر اس خاندان کو تمام سادات و اشراف کی نقابت و سرداری کا شرف بھی حاصل تھا۔

📚 ماخز از کتاب چراغ خضر و منبع الولایت۔

आदाब महफ़िले मिलाद शरीफ़

जगह पाक हो पैसा हलाल कमाई का सर्फ़ किया जाए खुशबू नुजूरात अतरयात और फूल वगैरह जिस क़दर मुमकिन हो बेहतर है, नमूद रियाको बिल्कुल दखल न होमिमबर या चौकी ऊँची हो उसपर मसनद

या कोई कपड़ा पाक हो आराइश जेबो जीनत का इज़हार मुसर्रत के वास्ते जितनी बन पड़े एहतिमाम करे, गुरबा व मसाकीन वगैरह के वास्ते मुयस्सर हो तो खाने का भी इन्तेजाम करें फातिहा के वास्ते मुसलमान हलवाई के यहां की बनी हुई शीरीनी हो और रोशनी के वास्ते मोमबत्ती होतो अच्छा है क्योंकि मिट्टी के तेल वगैरह की बदबू से भी यह मजलिसे मुबारक पाक होनी चाहिये सामईन व हाज़रीन पाक व साफ़ बा वुजू हों और अदबसे बैठे मिलाद शरीफ़ के पढ़ने वाले मुत्तबे शरीअत हों, दुरूद ख्वानी की बार-बार ताकीद हो।

फ़ज़ाइल मिलाद शरीफ़

ज़िक्र सालेहीनके वक्त अल्लाह तआला की रहमत का नुजूल होता है, चे जाएकि तमाम सालेहीन और मुरसलीन के पेशवा हज़रत अहमद मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्ल० का ज़िकरे खैर हो और उस पर यह भी खूबी कि दुरूद.शरीफ़ की सदायें बुलंद हों वहां के हाज़रीन पर क्यों न रहमत का नुजूल होसामईन को क्यों न नक़द मुददुआ वसूल हो मनकूत है कि जिस मकान में यह महफ़िले मुबारक होती है उसपर साल भरतक रहमत का मेंह बरसता है और उस मकान के रहने वाले हिफज व अमान में रहते हैं और बे इन्तेहा खैरो बरकत शामिले हाल रहती है, और मक्का मुअज्जमा व मदीना मुनव्वरा में तो यह हाल है कि जब किसी के यहां लड़का पैदा होता है या ख़त्ना या शादी या नया मकान बने, या सफ़र से कोई वापस आये या बीमारी से सेहत पाए, हर किस्म की तकरीबों में महफिले मिलाद शरीफ ज़रूर होती है। अल्लाह पाक हम लोगों को भी ऐसी ही तौफीक दे कि अपने घरों को और मजलिस को जिके मुहम्मदी से मुनव्वर और मुशर्रफ़ किया करें, और तमाम रुसूमाते खुराफ़ात मिस्ले नाच गाना रंगे या बाजा वगैरह से बचते रहें। आमीन या रब्बिल आलमीन ।

हिजरत का दूसरा साल part 3

अबुल बख्तरी का कत्ल

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जंग शुरु होने से पहले ही फरमा दिया था कि कुछ लोग कुफ्फार के लश्कर में ऐसे भी हैं। जिनको कुफ्फारे मक्का दबाव में डाल कर लाए हैं। ऐसे लोगों को कत्ल नहीं करना चाहिए। इन लोगों के नाम भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बता दिए थे। उन्ही लोगों में से अबुल बख्तरी भी था जो अपनी खुशी से मुसलमानों से लड़ने के लिए नहीं आया था। बल्कि कुफ्फारे कुरैश इस पर दबाव डाल कर जबरदस्ती कर के लाए थे। जैन जंग की हालत में हज़रते मुजज़िर बिन ज़ियाद रदियल्लाहु अन्हु की नज़र अबुल बख़्तरी पर पड़ी जो अपने एक गहरे दोस्त जुनादह बिन मलीहा के साथ घोड़े पर सवार था हज़रते मुजजिर रदियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि ऐ अबुल बख़्तरी! चूँकि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम लोगों को तेरे कत्ल से मनअ फ़रमाया है इस लिए मैं तुझ को छोड़ देता हूँ। अबुल बख्तरी ने कहा कि मेरे साथै जुनादह के बारे में तुम क्या कहते हो? तो हज़रते मुजज़िर रदियल्लाहु अन्हु ने साफ़ साफ़ कह दिया कि इस को हम जिन्दा नहीं छोड़ सकते। ये सुनकर अबुल बख़्तरी तैश में आ गया। और कहा कि मैं अरब की औरतों का ये तअना सुनना पसन्द नहीं कर सकता। कि अबुल बख़्तरी ने अपनी जान बचाने के लिए अपने साथी को तन्हा छोड़ दिया। ये कहकर अबुल बख्तरी ने रजज़ का ये शेअर पढ़ा कि

लंय्युस-लिमब-नु हुर्रतिन ज़मीलह

हत्ता यमूत् अव यरा सबीलह (एक शरीफ ज़ादा अपने साथी को कभी हरगिज़ नहीं छोड़ सकता। जब तक मर न जाए। या अपना रास्ता न देख ले।)

उमय्या की हलाकत

उमय्या बिन खल्फ बहुत ही बड़ा दुश्मने रसूल था। जंगे बदर में जब कुफ्र व इस्लाम के दोनों लश्कर गुथ्थम गुथ्था हो गए। तो उमय्या अपने पुराने तअल्लुकात की बिना पर हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु अन्हु से चिमट गया। कि मेरी जान बचाईए । हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु अन्हु को रहम आ गया। और आप ने चाहा कि उमय्या बचकर निकल भागे। मगर हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अनहु जब उमय्या को देख लिया। हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु ने उमय्या के गुलाम थे तो उमय्या ने उनको बहुत ज्यादा सताया था। इस लिए जोशे इन्तिकाम में हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु ने अन्सार को पुकारा । अन्सारी लोग दफ़अतन टूट पड़े। हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु अन्हु ने उमय्या से कहा कि तुम ज़मीन पर लेट जाओ वो लेट गया तो हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रदियल्लाहु अन्हु उसको बचाने के लिए उस के ऊपर लेट कर उस को छुपाने लगे। लेकिन हज़रते बिलाल और अन्सार रदियल्लाहु अन्हुम ने उन की टाँगों के अन्दर हाथ डालकर और बगल से तलवार घोंप घोंप कर उस को कत्ल कर दिया।

बुबख़ारी जि.१ स.३०८ बाबा इज़ा वक्कलल मुस्लिम हरीबन)

फ़रिश्तों की फौज

जंगे बदर में अल्लाह तआला ने मुसलमानों की मदद के लिए आस्मान से फरिश्तों का लश्कर उतार दिया था। पहले एक हजार फरिश्ते आए। फिर तीन हज़ार हो गए। इस के बाद पाँच हजार हो गए। (कुरआन सूरए आले इमरान व अन्फाल)

जब खूब घमसान का रन पड़ा तो फरिश्ते किसी को नजर नहीं आते थे। मगर उनकी हर्ब व ज़ब के असरात साफ़ नज़र आते थे। बअज काफिरों की नाक और मुँह पर कोड़ों की मार का

निशान पाया जाता था। कहीं बिगैर तलवार मारे सर कट कर गिरता नज़र आता था। ये आरमान से आने वाले फरिश्तों की फौज के कारनामे थे।

कुफ्फार ने हथियार डाल दिए उतबा, शैबा, अबू जहल वगैरा कुफ्फारे कुरैश के सरदारों की हलाकत से कुफ्फ़ारे मक्का की कमर टूट गई। और उनके पावँ उखड़ गए। और वो हथियार डालकर भाग खड़े

हुए

और मुसलमानों ने उन लोगों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया।

इस जंग में कुफ्फार के सत्तर आदमी कत्ल और सत्तर आदमी गिरफ्तार हुए। बाकी अपना सामान छोड़कर फरार हो गए। इस जंग में कुफ्फारे मक्का को ऐसी ज़बरदस्त शिकस्त हुई। उन की अस्करी ताक़त ही फना हो गई। कुफ्फ़ारे कुरैश के बड़े बड़े नामवर सरदार जो बहादुरी और फन्ने सिपह गिरी में यकताए रोज़गार थे। एक एक करके सब मौत के घट उतार दिए गए। इन नामवरों में उतबा, शैबा, अबू जहल, अबुल बख़्तरी, जमआ, आस बिन हश्शाम, उमय्या बिन ख़लफ, मुनब्बह बिनुल हज्जाज, उकबा बिन अबी मुईत, नज़र बिनुल हारिस वगैरा कुरैश के सरताज थे। ये सब मारे गए।

शोहदाए बदर

जंगे बदर में कुल चौदह मुसलमान शहादत से सरफराज हुए। जिन में छ: मुहाजिर और आठ अन्सार थे।

शोहदाए मुहाजिरीन के नाम ये हैं :– (१) हज़रते उबैदा बिनुल हारिस (२) हज़रते उमैर बिन अबी वक्कास (३) हजरते जुश्शमालीन उमैर बिन अब्द (४) हज़रते आकिल बिन अबी बकीर (५) हज़रते मिहजअ (६) हज़रते सफ़वान बिन बैजा। और अन्सार के नामों की फेहरिस्त ये है :- (७) हज़रते सअद बिन खैसमा (८) हज़रते मुबरिश्र बिनुल अब्दुल मुन्जर (९) हज़रते हारिसा बिन

सुराका (१०) हज़रते मुअव्वज़ बिन उफरा (११) हज़रते उमैर बिन हुमाम (१२) हजरते राफेअ बिन मुअल्ला (१३) हज़रते औफ बिन उफ़रा (१४) हज़रते यज़ीद बिन हारिस रदियल्लाहु अन्हुम अजमईन

(जरकानी जि.१ स.४४४, ४४५) इन शोहदाए बदर में से तेरह हजरात तो मैदाने बदर ही में मदफून हुए मगर हजरते उबैदा बिन हारिस रदियल्लाहु अन्हु ने चूँकि बदर से वापसी पर मंज़िल “सुफ़रा” में वफात पाई। इस लिए उनकी कब्र शरीफ़ “सुफरा” में है। (ज़रकानी जि.१ स.४१५)

बदर का गड्ढा

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का हमेशा ये तर्जे अमल रहा कि जहाँ कभी कोई लाश नजर आती थी आप उस को दफ्न करवा देते थे लेकिन जंगे बदर में कत्ल होने वाले कुफ्फार चूँकि त दाद में बहुत ज्यादा थे। सब को अलग अलग दफ्न करना एक दुशवार काम था इस लिए तमाम लाशों को आप ने बदर के एक गड्ढे में डसल देने का हुक्म फ़रमाया । चुनान्चे सहाबए किराम ने तमाम लाशों को घसीट घसीट कर गड्ढे में डाल दिया। उमय्या बिन खलफ की लाश फूल गई थे। सहाबए किराम ने ‘उस को घसीटना चाहा तो उस के अअज़ा अलग अलग होने लगे, इस लिए उसकी लाश वहीं मिट्टी में दबा दी गई।

(बुखारी किताबुल मगाजी बाब कत्ल अबी जहल जि.२ स.५६६)

कुफ्फार की लाशों से खिताब

जब कुफ्फार की लाशें बदर के गड्ढे में डाल दी गईं। तो हुजूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस गड्ढे के किनारे खड़े हो कर मकतूलीन का नाम लेकर इस तरह पुकारा कि ऐ उतबा बिन रबीआ ऐ फुलाँ! ऐ फुलाँ! क्या तुम लोगों ने अपने रब के वअदा को सच्चा पाया, हम ने तो अपने रब के

वअदे को बिल्कुल टीक ठीक सच पाया। हजरते उमर फारूक रदियल्लाहु अन्हु ने जब देखा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कुफ्फार की लाशों से खिताब फरमा रहे हैं। तो उनको बड़ा तअज्जुब हुआ। चुनान्चे उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! क्या आप इन बे रूह के जिस्मों से कलाम फरमा रहे हैं? ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फरमाया कि ऐ उमर! कसम खुदा की जिस के कब्जए कुदरत में मेरी जान है। कि तुम (ज़िन्दा लोग) मेरी बात को इन से ज्यादा नहीं सुन सकते। लेकिन इतनी बात है कि ये मुर्दे जवाब नहीं दे सकते। (बुखार जि.१ स.१८३ बाब जा फी अज़ाबल कब्र) (व बुख़ारी जि.२ स.५६६)

ज़रूरी तंबीह

बुख़ारी वगैरा की हदीस से ये मस्अला साबित होता है कि जब कुफ्फ़ार के मुर्दे जिन्दों की बात सुनते हैं। तो फिर मोमिनीन खुसूसन औलिया, शोहदा, अंबिया अलैहिमुस्सलाम वफ़ात के बाद यकीनन हम ज़िन्दों का सलाम व कलाम, और हमारी फरयादें सुनते हैं। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब कुफ्फार की मुर्दा लाशों को पुकारा तो फिर ख़ुदा के बरगुज़ीदा बन्दों यनी वलियों, शहीदों और नबियों को उनकी वफात के बाद पुकारना भला क्यों नजाएज और दुरुस्त न होगा? इसी लिए तो हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब मदीना के कब्रिस्तान में तशरीफ ले जाते तो कब्रों की तरफ अपना रुखे अनवर करके यूँ फरमाते कि (

“अस्सलामु अलैकुम या अलल कुबूरि यगफिरुल्लाहु लना व लकुम अन्तुम स-ल-फुना व ननु बिल असरि।

(मिश्कात बाब जियारतुल कुबूर)

(यानी ऐ कब्र वालो! तुम पर सलाम हो। खुदा हमारी और तुम्हारी मगफिरत फरमाए। तुम लोग हम से पहले चले गए। और हम तुम्हारे बाद आने वाले हैं।)

और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को भी यही हुक्म दिया है। और सहाबए किराम को इस की तअलीम देते थे कि तुम लोग कब्रों की जियारत के लिए जाओ तो

) ‘अस्सलामु अलैकुम अह्लद दियारि मिलन मुअमिनीना वल मुस्लिमीना व इन्ना इन्शा अल्लाहु बिकुम लला हिकूना नस-अलुल्लाहा लना व ल-कुमुल आफि-यता।

(मिश्कात बाब जियरतुल कुबूर स.१५४) इन हदीसों से जाहिर है कि मुर्दे ज़िन्दों का सलाम व कलाम सुनते हैं वर्ना ज़ाहिर है कि जो लोग सुनते ही नहीं उनको सलाम करने से क्या हासिल?

Madine को वापसी

फतहे के बाद तीन दिन तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने “बदर* में कियाम फरमाया। फिर तमाम अमवाले गनीमत और कुफ्फार कैदियों को साथ ले कर रवाना हुए। जब “दादीए सुफरा” में पहुंचे तो अमवाले गनीमत के मुजाहिदीन के दर्मियान तकसीम फरमाया!

हज़रते उस्माने गनी रदियल्लाहु अन्हु की ज़ौजए मुहतरमा हज़रते बीबी रुकय्या रदियल्लाहु अन्हा जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की साहिबज़ादी थीं। जंगे बदर के मौके पर बीमार थीं। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते उस्माने गनी रदियल्लाहु अन्हु को तीमारदारी के लिए

मदीना में रहने का हुक्म दे दिया था। इस लिए वो जंगे बदर में शामिल न हो सके। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने माले गनीमत में से उनको मुजाहिदीने बदर के बराबर ही हिस्सा दिया। और उनके बराबर ही अज्र- सवाब की बिशारत भी दी। इस लिए हजरते उस्माने गनी रदियल्लाहु अन्हु को भी असहाब बदर की फेहरिस्त में शुमार किया जाता है।

मुजाहिदीने बदर का इस्तिकबाल

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फतह के बाद हज़रते जैद बिन हाररिसा रदियल्लाहु अन्हु को फ़तहे मुबीन की खुशखबरी सुनाने के लिए मदीना भेज दिया था। चुनान्चे हज़रते ज़ैद बिन हारिसा रदियल्लाहु अन्हु ये खुशख़बरी ले कर जब मदीना पहुँचे। तो तमाम अहले मदीना जोशे मुसर्रत के साथ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आमद आमद के इन्तिजार में बेकरार रहने लगे। और जब तशरीफ आवरी की ख़बर पहुँची। तो अहले मदीना ने आगे बढ़कर मकामे “रूहा” में आप का पुर जोश इस्तिकबाल किया! (इब्ने हुश्शाम जि.२ स.६४३)

कैदियों के साथ सुलूक

कुफ्फारे मक्का जब असीराने जंग बनकर मदीना में आए तो उनको देखने के लिए बहुत बड़ा मजमअ इकट्ठा हो गया और लोग उनको देखकर कुछ न कुछ बोलते रहे। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़ौजा मुहतरमा हज़रते बीबी सौदह रदियल्लाहु अन्हा उन कैदियों को देखने के लिए तशरीफ़ लाई और ये देखा कि उन कैदियों में उन के एक करीबी रिश्तेदार “सुहैल भी हैं तो वो बे साख्ता बोल उठीं कि “ऐ सुहैल! तुम ने भी औरतों की तरह बेड़ियाँ पहन लीं। तुम से ये न हो सका कि गदुर मर्दो के तरह लड़ते हुए कत्ल हो जाते।

(सीरते इले हुश्शाम जि.२ स. ६४५)

उन कैदियों को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबा में तकसीम फरमा दिया। और ये हुक्म दिया कि इन कैदियों को आराम के साथ रखा जाए। चुनान्चे दो दो चार चार कैदी सहाबा के घरों में रहने लगे। और सहाबा ने उन लोगों के साथ ये हुसने सुलूक किया कि उन लोगों को गोश्त रोटी वगैरा हस्बे

मकदूर खाना खिलाते थे और खुद खजूर खाकर रह जाते थे (इब्ने हुश्शाम जि.२ स.६४६)

कैदियों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हज़रते अब्बास के बदन पर कुर्ता नहीं था। लेकिन वो इतने लम्बे कद के आदमी थे कि किसी का कुर्ता उनके बदन पर ठीक नहीं उतरता था। अब्दुल्लाह बिन उबई (मुनाफ़िकीन का सरदार) चूंकि कद में उनके बराबर था। इस लिए उसने अपना कुर्ता उन को पहना दिया। बुखारी शरीफ में ये रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अब्दुल्लाह बिन उबई के कफ़न के लिए जो अपना पैराहन शरीफ अता फरमाया था। वो इसी एहसान का बदला था। (बुखारी बाबुल किसवतुल असारा जि.१ स.४२२)

असीराने जंग का अंजाम

इन कैदियों के बारे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़राते सहाबा रदियल्लाहु अन्हुम से मश्वरा फ़रमाया कि उन के साथ क्या मामला किया जाए? हजरते उमर रदियल्लाहु अन्हु ने ये राय दी कि इन सब दुश्मनाने इस्लाम को कत्ल कर देना चाहिए। और हम में से हर शख्स अपने अपने रिश्तेदारों को अपनी तलवार से कत्ल करे। मगर हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु ने ये मश्वरा दिया कि आखिर ये सब लोग अपने अज़ीज़ व अकारिब ही हैं। लिहाज़ा इन्हें कत्ल न किया जाए। बल्कि इन लोगों से बतौरे फिदया कुछ रकम लेकर इन सब को रिहा कर दिया जाए। इस वक्त मुसलमानों की माली हालत

बहुत ही कमज़ोर है। फ़िदया की रकम से मुसलमानों की माली इमदाद का सामान भी हो जाएगा। और शायद आइन्दा अल्लाह तआला इन लोगों को इस्लाम की तौफीक नसीब फरमाए । हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु की संजीदा राय को पसन्द फ़रमाया । और इन कैदियों से चार चार हजार दिरहम फिदया ले कर उन लोगों को छोड़ दिया। जो लोग मुफ्लिसी की वजह से फिदया नहीं दे सकते थे। वो यूँ ही बिला फ़िदया छोड़ दिए गए। उन कैदियों में जो लोग लिखना जानते थे। उन में से हर एक का फिदया ये था कि वो अन्सार के दस लड़कों को लिखना सिखा दें।

(इब्ने हुश्शाम जि.२ स.६४६)

हज़रते अब्बास का फ़िदया

अन्सार ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ये दरख्वास्त अर्ज की कि या रसूलल्लाह! हज़रते अब्बास हमारे भान्जे हैं। लिहाज़ा हम उनका फ़िदया मुआफ करते हैं। लेनि आपने दरख्वास्त मंजूर नहीं फरमाई। हज़रते अब्बास कुरैश के उन दस दौलतमंद रईसों में से थे जिन्होंने लश्करे कुफ्फार के राशन की जिम्मेदारी अपने सर ली थी। इस गरज़ के लिए हज़रते अब्बास के पास बीस उकिया सोना था। चूंकि फ़ौज को खाना खिलाने में अभी हज़रते अब्बास की बारी नहीं आई थी। इस लिए वो सोना अभी तक उनके पास महफूज़ था, उस सोने को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने माले गनीमत में शामिल फरमा लिया। और हज़रते अब्बास से मुतालबा फरमाया कि वो अपना और अपने दोनों भतीजों अकील बिन अबी तालिब, और नौफल बिन हारिस और अपने हलीफ अमर बिन जिहदम चार शख्सों का फिदया अदा करें। हज़रते अब्बास ने कहा कि मेरे पास कोई माल ही नहीं है, मैं कहाँ से फिदया अदा करूँ? ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि चचा जान! आपका वो

माल कहाँ है? जो आपने जंगे बदर के लिए रवाना होते वक्त अपनी बीवी “उम्मुल फजल” को दिया था। और ये कहा था कि अगर मैं इस लड़ाई में मारा जाऊँ तो इस में से इतना इतना माल मेरे लड़के को दे देना ये सुनकर हज़रते अब्बास ने कहा कि कसम है उस खुदा की जिसने आप को हक के साथ भेजा है कि यकीनन आप अल्लाह के रसूल हैं। क्योंकि इस माल का इल्म मेरे और मेरी बीवी उम्मुल फज़ल के सिवा किसी को नहीं था। चुनान्चे हज़रते अबबास ने अपना और अपने दोनों भतीजों और अपने हलीफ का फिदया अदा करके रिहाई हासिल की। फिर इस के बाद हजरते अब्बास और हज़रते अकील और हज़रते नौफ़ल तीनों मुशर्रफ़ ब-इस्लाम हो गए। (रदियल्लाहु अन्हुम)

(मदारिजुन्नुबूब्बत जि.२ स.६७, व ज़रकानी जि. ४४७)

हज़रते जैनब का हार

जंगे बदर के कैदियों, में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दामाद अबुल आस बिनुर रबीअ भी थे। ये हाला बिन्ते खुवैलद के लड़के थे। और हाला हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा की हकीकी बहन थीं। इस लिए हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मश्वरा लेकर अपनी लड़की हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा का अबुल आस बिनुर रबीअ से निकाह कर दिया था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब अपनी गुबूव्वत का एलान फ़रमाया तो आप की साहिबज़ादी हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा ने तो इस्लाम कुबूल कर लिया। मगर उनके शौहर अबुल आस मुसलमान नहीं हुए। और न हज़रते जैनब रदियल्लाहु अनहा को जुदा किया। अबुल आस बिनुर रबीअ ने हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा के पास कासिद भेजा कि फ़िदये की रकम भेज दें। हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा को उनकी. वालिदा हज़रते बीबी ख़दीजा

सल्लल्लाहु तआला रदियल्लाहु अन्हा ने जहेज में एक कीमती हार भी दिया था। हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा ने फिदया की रकम के साथ वो हार भी अपने गले से उतारकर मदीना भेज दिया। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नजर इस हार पर पड़ी तो हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा और उनकी महब्बत की याद ने कल्बे मुबारक पर एक रिक्कत अंगेज असर डाला कि आप रो पड़े। और सहाबा से फरमाया कि “अगर तुम लोगों की मर्जी हो तो बेटी को उसकी माँ की यादगार वापस कर दूँ।” ये सुनकर तमाम सहाबए किराम ने सरे तस्लीम खम कर दिया। और ये हार हज़रते बीबी जैनब रदियल्लाहु अनहा के पास मक्का भेज दिया गया।

(तारीखे तबरी स.१३४८) अबुल आस रिहा होकर मदीने से मक्का आए। और हजरते बीबी जैनब को मदीना भेज दिया। अबुल आस बहुत बड़े ताजिर थे ये मक्का से अपना सामाने तिजारत लेकर शाम गए। और वहाँ से खूब नफअ कमाकर मक्का आ रहे थे। कि मुसलमान मुजाहिदीन ने उनके काफिले पर हमला करके उन का सारा माल-ो असबाब लूट लिया। और ये माले गनीमत तमाम सिपाहियों पर तक्सीम भी हो गया। अबुल आस छुपकर मदीना पहुँचे। और हजरते जैनब रदियल्लाहु अन्हा ने उनको पनाह देकर अपने घर में उतारा । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम से फ़रमाया कि अगर तुम लोगों की खुशी हो तो अबुल आस का मालसामान वापस कर दो। फरमाने रिसालत का इशारा पाते ही तमाम मुजाहिदीन ने सारा मालो सामान अबुल आस के सामने रख दिया। अबुल आस सारा माल असबाब लेकर मक्का आए। और अपने तमाम तिजारत के शरीकों को पाई पाई का हिसाब समझाकर और सब को उसके हिस्से की रकम अदा करे अपने मुसलमान होने का एलान कर दिया। और अहले मक्का से कह दिया कि मैं यहाँ आ कर और सब का पूरा पूरा हिसाब अदा करके मदीना जाता हूँ। ताकि कोई ये न कह सके कि अबुल आस हमारा रुपया

लेकर तकाज़ा के डर से मुसलमान हो कर मदीना भाग गया। इसके बाद हज़रते अबुल आस रदियल्लाहु अन्हु मदीना आकर हज़रते बीबी जैनब रदियल्लाहु अन्हा के साथ रहने लगे ।(तारीख़ तबरी)

मकतूलीने बदर का मातम

बदर में कुफ्फ़ारे कुरैश की शिकस्ते फ़ाश की ख़बर जब मक्का में पहुँची। तो ऐसा कोहराम मच गया कि घर घर मातम कदा बन गया। इस ख़याल से कि मुसलमान हम पर हंसेंगे अबू सुफ़यान ने तमाम शहर में एअलान करा दिया कि ख़बरदार कोई शख्स रोने न पाए। इस लड़ाई में असवद बिन अब्द यगूस के दो लड़के “अकील” और “ज़मआ” और एक पोता “हारिस बिन ज़मआ” क़त्ल हुए थे। इस सदमए जानकाह से असवद का दिल फट गया था वो चाहता था कि अपने मकतूलों पर खूब फूट फूटकर रोए ताकी दिल की भडासं निकल जाए। लेकिन कौमी गैरत के ख़याल से रो नहीं सकता था। मगर दिल ही दिल में

कुढ़ता रहता था। और आँसू बहाते बहाते अंधा हो गया था। एक दिन शहर में किसी औरत के रोने की आवाज़ आई। तो उसने अपने गुलाम को भेजा कि देखो कौन रो रहा है? क्या बदर के मकतूलों पर रोने की इजाजत हो गई है? मेरे सीने में रंज- गम की आग सुलग रही है। मैं भी रोने के लिए बेकरार हूँ। गुलाम ने बताया कि एक औरत का ऊँट गुम हो गया है वो इसी गम में रो रही है। असवद शाएर था। ये सुनकर बे इख्तियार उसकी ज़बान से ये दर्दनाक अश्आर निकल पड़े जिस के लफ्ज़ लफ़्ज़ से खून टपक

घुटता और

रहा है।

अ-तब्की अंय-यदिल्ला लहा बद्दरुन व-यमनहा मिनन नवमिस सुहूदु क्या वो औरत एक ऊँट के गुम हो जाने पर रो रही है? और बे ख्वाबी ने उसकी नींद को रोक दिया है।

वला तब्की अला बकरिवं-वलाकिन

अला बदरिन तकास-र-तिल जुदूहू तो वो एक ऊँट पर न रोए। लेकिन “बदर” पर रोए जहाँ किस्मतों ने कोताही की है।

व बक्की इन बकैति अला अकीलिन व बक्की हारिसन अ-स-दल उसूदी

अगर तुझ

को रोना है तो अकील पर रोया कर। और हारिस पर रोया कर जो शेरो का शेर था।

व बक्कीहिम वला तुस-मी जमीअन

वमा लि-अबी हकी-म-ता मिन नदीही और उन सब पर रोया कर। मगर उन सभों का नाम मत ले। और “उमैर और सफ़वान की ख़ौफ़नाक साज़िशअबू हकीमा ज़मआ” का तो कोई हमसर ही नहीं है।

(इब्ने हुश्शाम जि.२ स.६५७)

उमैर और सफ़वान की ख़ौफ़नाक साज़िश

एक दिन उमैर और सफवान दोनों हतीमे कबा में बैठे हुए मकतूलीने बदर पर आँसू बहा रहे थे। एक दम सफवान बोल उठा कि ऐ उमैर! मेरा बाप और दूसरे रोउसाए मक्का जिस तरह बदर में कत्ल हुए। उन को याद करके सीने में दिल पाश पाश हो रहा

है। और अब जिन्दगी में कोई मजा बाकी नहीं रह गया है। उमेर ने कहा कि ऐ सफवान! तुम सच कहते हो। मेरे सीने में भी इन्तिकाम की आग भड़क रही है। मेरे अइज्जा व अकरबा भी बदर में बेदर्दी के साथ कत्ल किए गए। और मेरा बेटा मुसलमानों की कैद में है। खुदा की कसम अगर मैं कर्जदार न होता और बाल बच्चों की फिक्र से दो चार न होता। तो अभी अभी तेज रफ्तार घोड़े पर सवार होकर मदीना जाता। और दम ज़दन में धोके से मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को कत्ल करके फ़रार हो जाता। ये सुनकर सफ़वान ने कहा कि ऐ उमैर! तुम अपने कर्ज और बच्चों की ज़रा भी फ़िक्र न करो। मैं खुदा के घार में अहद करता हूँ कि तुम्हारा सारा कर्ज अदा कर दूंगा। और मैं तुम्हारे बच्चों की परवरिश का भी ज़िम्मेदार हूँ। इस मुआहदे के बाद उमैर सीधा घर आया। और जहर में बुझाई हुई तलवार लेकर घोड़े पर सवार हो गया। जब मदीना में मस्जिदे नबवी के करीब पहुँचा। तो हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु ने उसको पकड़ लिया और उसका गला दबाए और गर्दन पकड़े हुए दरबारे नुबूब्बत में ले गए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पूछा, कि क्यों? ऐ उमैर किस इरादे से आए हो? जवाब दिया कि अपने बेटे को छुड़ाने के लिए। आप ने फरमाया कि क्या तुमने और सफ़वान ने हतीमे कबा में बैठकर मेरे कत्ल की साज़िश नहीं की है? उमैर इस राज़ की बात सुनकर सन्नाटे में आ गया। और कहा कि मैं गवाही देता हूँ कि बेशक आप अल्लाह के रसूल हैं। क्योंकि खुदा की कसम! मेरे और सफ़वान के इस राज़ की किसी को भी खबर न थी। इधर मक्का में सफ़वान हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कत्ल ख़बर सुनने के लिए इन्तिहाई बेकरार था और दिन गिन गिनकर उमैर का इन्तिजार कर रहा था। मगर जब उसने नागहाँ ये सुना कि उमैर मुसलमान हो गया। तो फर्ते हैरत से उसके पावँ के नीचे की जमीन निकल गई और वो बौखला गया।

हज़रते उमैर मुसलमान हो कर मक्का आए और जिस तरह वो पहले मुसलमान के खून के प्यासे थे। अब वो काफिरों की जान के दुश्मन बन गए। और इन्तिहाई बे खौफी और बहादुरी केसाथ मक्का में इस्लाम की तब्लीग करने लगे। यहाँ तक कि उन की दअवते इस्लाम से बड़े बड़े काफिरों के अंधेरे दिलों में नूरे ईमान की रौशनी से उजाला हो गया। और यही उमैर अब सहाबीए रसूल हज़रते उमैर रदियल्लाहु अन्हु कहलाने लगे। (तारीख तबरी स.१३५४)

मुजाहिदीने बदर के फ़ज़ाएल

जो सहाबए किराम जंगे बदर में शरीक हुए। वो तमाम सहाबा में खुसूसी शर्फ के साथ मुमताज़ हैं। और उन खुश नसीबों के फ़ज़ाएल में एक बहुत ही अज़ीमुश्शान फजीलत ये है कि इन सआदतमंदों के बारे में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ये फ़रमाया कि –

“बेशक अल्लाह तआला अले बदर से वाकिफ है। और उसने ये फ़रमा दिया है कि तुम अब जो अमल चाहो करो। बिला शुबह तुम्हारे लिए जन्नत वाजिब हो चुकी है। या (ये फ़रमाया) कि मैं ने तुम्हें बख़्श दिया है।

(बुखारी बाब फ़ज़ल मिन शहद बदरन जि.२ स.५६७)

अबू लहब की इबरतनाक मौत

अबू लहब जंगे बदर में शरीक नहीं हो सका। जब कुफ्फारे कुरैश शिकस्त खाकर मक्का वापस आए। तो लोगों की जबानी जंगे बदर के हालात सुनकर अबू लहब को इन्तिहाई रंजो मलाल हुआ। इस के बाद ही वो बड़ी चेचक की बीमारी में मुब्तला हो गया। जिससे उस का तमाम बदन सड़ गया। और आठवें दिन मर गया। अरब के लोग चेचक से बहुत डरते थे। और इस बीमारी में मरने वाले को बहुत ही मन्हूस समझते थे इस लिए उसके बेटों ने

भी तीन दिन तक उस कि लाश को हाथ नहीं लगाया। मगर इस खयाल से कि लोग तअना मारेंगे एक गढ़ा खोदकर लकड़ियों से ढकेलते हुए ले गए। और उस गढ़े में लाश को गिराकर ऊपर से मिट्टी डाल दी। और बअज मुअर्रिख़ीन ने तहरीर फरमाया कि दूर से लोगों ने उस गढ़े में इस कदर पत्थर फेंका कि उन पत्थरों से उस की लाश छुप गई। (जुरकानी जि.१. स.४५२).

ग़ज़वए बनी कैनुकाअ

रमज़ान २ हिजरी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जंगे बदर के मरिका से वापस हो कर मदीना वापस लौटे उस के बाद ही १५ शव्वाल २ हिजरी में ग़ज़वए बनी कैनुकाअ का वाकिआ दरपेश आया। हम पहले लिख चुके हैं कि मदीना के अतराफ़ में यहूदियों के तीन बड़े बड़े कबाएल आबाद थे। बनू कैनुकाअ, बनू नुज़ैर, बनू कुरैज़ा । इन तीनों से मुसलमानों का मुआहदा था। मगर जंगे बदर के बाद जिस कबीले ने सब से पहले मुआहदा तोड़ा। वो कबीलए बनू कैनुकाअ के यहूदी थे। जो सब से ज़्यादा बहादुर और दौलतमंद थे। वाकिआ ये हुआ कि एक बुरक पोश औरत यहूदियों के बाज़ार में आई। दुकानदार ने शरारत की। और अस औरत को नंगा कर दिया। इस पर तमाम यहूदी कहकंहा लगाकर हंसने लगे। औरत चिल्लाई तो एक अरब आया। और दुकानदार का कत्ल कर दिया। इस पर अरबों और यहूदियों में लड़ाई शुरू हो गई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख़बर हुई तो तशरीफ़ लाए। और यहूदियों को उनकी इस गैर शरीफ़ाना हरकत पर मलामत फरमाने लगे। इस पर बनू कैनुकाअ के ख़बीस यहूदी बिगड़ गए। और बोले कि जंगे बदर की फतह से आप मगरूम न हो जाएँ। मक्का वाले जंग के मामले में बे ढंगे को इस लिए आने उनको मार लिया। अगर हम से आप का साबका पड़ा तो आप को मालूम हो जाएगा कि जंग किस चीज़

का नाम है? और लड़ने वाले कैसे होते हैं? जब यहूदियों ने मुआहदा तोड़ दिया। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने निस्फ शव्वाल २ हिजरी सनीचर के दिन उन यहूदियों पर हमला कर दिया। यहूदी जंग की ताब न ला सके। और अपने किलओं का फाटक बंद करके किलआ बंद हो गए। मगर पन्द्रह दिन के मुहासिरे के बाद बिल आखिर यहूदी मगलूब हो गए। और हथियार डाल देने पर मजबूर हो गए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम के मश्वरे से उन यहूदियों को शह बदर कर दिया । और ये अहद शिकन, बद जात यहूदी मुल्के शाम के मकाम “अजरिआत” में जा कर आबाद हो गए।

(जरकानी जि.१ स.४५८)

ग़ज़वए सवीक

ये हम तहरीर कर चुके हैं कि जंगे बदर के बाद मक्का के हर घर में सरदाराने कुरैश के कत्ल हो जाने का मातम बरपा था। और अपने मकतूलों का बदला लेने के लिए मक्का का बच्चा बच्चा मुजतरिब और बे करार था। चुनान्चे गजवए सवीक और जंगे उहुद वगैरा की लड़ाइयाँ मक्का वालों की इसी जोशे इन्तिकाम का नतीजा हैं। उतबा और अबू जहल के कतल हो जाने के बद अब कुरैश का सरदारे अअज़म अबू सुफ़यान था। और इस मन्सब का सब से बड़ा काम गजवए बदर का इन्तिकाम था। चुनान्चे अबू सुफयान ने कसम खा ली कि जब तक बदर के मकतूलों का मुसलमानों से बदला न ले लूँगा। न गुस्ले जनाबत करूँगा न सर में तेल डालूँगा चुनान्चे जंगे बदर के दो माह बाद जुल हिज्जा २ हिजरी में अबू सुफ़यान दो सौ सत्तर सुवारों का लश्कर ले कर मदीना की तरफ बढ़ा। उसको यहूदियों पर बड़ा भरोसा बल्कि नाज था कि मुसलमानों के मुकाबले में वो उसकी मदद करेंगे। इसी उम्मीद पर अबू सुफयान पहले “हुय्यि बिन अखतब यहूदी के

पास गया। मगर उसने दरवाज़ा भी नहीं खोला। वहाँ से

मायूस होकर सल्लाम बिन मुश्कम से मिला। जो कबीलए बनू नुजैर के यहूदियों का सरदार था। और यहूदी के तिजारती ख़ज़ाना का मैनेजर भी था। उसने अबू सुफ़यान का पुर जोश इस्तिकबाल किया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तमाम जंगी राज़ों से अबू सुफयान को आगाह कर दिया। सुबह को अबू सफयान ने मकामे “उरैज़ पर हमला किया। ये बस्ती मदीना से तीन मील की दूरी पर थी। इस हमले में अबू सुफयान ने एक अन्सारी सहाबी जिनका नाम सद बिन अमर रदियल्लाहु अन्हु था कत्ल कर दिया। और कुछ दरख्तों को काट डाला। और मुसलमानों के चन्द घरों और बाग़ात को आग लगाकर फूंक दिया। इन हरकतों से उनके गुमान में उसकी क़सम पूरी हो गई। जब हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इसकी ख़बर हुई। तो आप ने उसका तआकुब किया। लेकिन अबू सुफ़यान बद हवास होकर इस कदर तेज़ी से भागा कि भगते हुए अपना बोझ हल्का करने के लिए सत्तू की बोरीयाँ जो वो अपनी फौज के राशन के लिए लाया था फेंकता चला गया। जो मुसलमानों के हाथ आए । अरबी ज़बान में सत्तू को “सवीक कहते हैं। इसी लिए इस गज़वे का नाम “गज़वए सवीक पड़ गया।

(मदारिज जि.२ स. १०४)

हज़रते फातिमा की शादी

इसी साल २ हिजरी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सब से प्यारी बेटी हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा की शादी ख़ाना आबादी हज़रते अली कर्रमल्लाहु वजहुल करीम के साथ हुई। ये शादी इन्तिहाई वकार और सादगी के साथ हुई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अनस रदियल्लाहु अनहु को

हुक्म

दिया कि हज़रत अबू बकर व उमर व उस्मान व

अब्दुर्रहमान बिन औफ और दूसरे चन्द मुहाजिरीन व अन्सार रिदवानुल्लाहि अलैहिम अजमईन को मदऊ करें। चुनान्चे जब सहाबए किराम जमअ हो गए। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुत्बा पढ़ा और निकाह पढ़ा दिया। शहंशाहे कौनैन ने शहज़ादीए इस्लाम हज़रते बीबी फातिमा रदियल्लाहु अन्हा को जहेज़ में जो सामान दिया उसकी फेहरिस्त ये है। एक कमली, बान की एक चारपाई, चमड़े का गद्दा जिस में रुई की जगह खजूर की छाल भरी हुई थी, एक छागल, एक मश्क, दो चक्कीयाँ, दो मिट्टी के घड़े। हज़रते हारिसा बिन नुअमान अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु ने अपना एक मकान हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस लिए नज़ कर दिया कि उसमें हजरते अली और हज़रते बीबी फातिमा रदियल्लाहु अन्हुमा सुकूनत फ़रमाएँ। जब हज़रते बीबी फातिमा रदियल्लाहु अन्हा रुख़सत हो कर नये घर में पहुँच गईं। तो इशा की नमाज़ के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ लाए और एक बरतन में पानी तलब फ़रमाया। और इस में कुल्ली फ़रमाकर हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु के सीने और बाजुओं पर पानी छिड़का और फिर यूँ दुआ फ़रमाई कि “या अल्लाह मैं अली और फातिमा और इनकी औलाद को तेरी पनाह में देता हूँ कि ये सब शैतान के शर से महफूज रहें। (जुरकानी जि.२ स.४ वगैरा)

सन्न २ हिजरी के मुतफ़रिक

वाकिआत (१) इसी साल रोज़ा और ज़कात की फर्जीयत के अहकाम

नाज़िल हुए और नमाज़ की तरह रोजा और ज़कात भी

मुसलमानों पर फर्ज हो गए। (२) इसी साल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने

ईदुल फित्र की नमाज जमाअत के साथ ईदगाह में अदा फरमाई। इस से कब्ल ईदुल फित्र की नमाज़ नहीं हुई थी।

(३) सदकए फित्र अदा करने का हुक्म इसी साल जारी हुआ। (४) इसी साल १० जुल हिज्जा को हुजूर सल्लल्लाहु तआला

अलैहि वसल्लम ने बकर ईद की नमाज अदा फरमाई और

नमाज़ के बाद दो मेंढों की कुर्बानी फरमाई। (५) इसी साल “गजवए कर करुल कुद्र” व “गजवए. बुहरान”

वगैरा चन्द छोटे गजवात भी पेश आए जिन में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने शिरकत फरमाई। मगर इन गजवात में कोई जंग नहीं हुई।

दूरूदो सलाम की फजीलत पर हदीसें

(१) कियामत के दिन लोगों में से मेरे नज़दीक ज्यादा करीब वो

होगा जिसने दुनिया में मुझ पर ज़्यादा दुरूद पढ़ा होगा। (२) जिसने मुझ पर एक मर्तबा दुरूद शरीफ़ पढ़ा अल्लाह तआला

उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है और उसके दस गुनाह

मिटाता है और उसके दस दर्जात बुलन्द फ़रमाता है। (३) तुम अपनी मजलिसों को मुझ पर दुरूदे पाक पढ़कर आरास्ता

करो क्योंकि तुम्हारा दुरूदे पाक पढ़ना कियामत के रोज़

तुम्हारे लिए नूर होगा। (४) मुझ पर दुरूदे पाक पढ़ने वाले को पुल सिरात पर अज़ीमुश्शान

नूर अता होगा और जिसको पुल सिरात पर नूर अता होगा वो

अहले नार (दोज़ख़) से न होगा। (५) मेरे हौज़े कौसर पर कियामत के रोज़ कुछ गिरोह आएँगे जिन्हें

मैं कसरते दुरूदे पाक से पहचानता हूँगा। (६) जिसने मुझ पर एक बार दुरूदे पाक पढ़ा अल्लाह तआला उस

पर दस बार रहमतें नाज़िल फ़रमाता है और जो मुझ पर दस बार दुरूदे पाक भेजता है अल्लाह तआला उस पर सौ रहमतें नाज़िल फ़रमाता है और जो मुझ पर सौ बार दुरूदे पाक भेजे अल्लाह तआला उसकी दोनों आँखों के दर्मियान लिख देता है कि ये बन्दा निफाक और दोज़ख़ की आग से बरी है और कियामत के दिन उसको शहीदों के साथ रखेगा।

Jashn e Eid ul Miladun Nabi

“Hazrat Khureem bin Ows bin Haarisa bin Laam RadiAllahu Anhu bayan karte hain ki:
Hum Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Khidmat-e-Aqdas me maujud they,
Hazrat Abbas ibne Abdul Muttalib
RadiAllahu Anhuma ne Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki Khidmat me arz kiya:
Ya RasoolAllah !Mai Aapki Madah wa Naat padhna Chahta hun.
To Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya:
Laao Mujhe Sunao, Allah Ta’ala Tumhare Daanat Sahih wa salam rakhe (yaani Tum isi tarah ka umda kalaam padhte raho).
So Hazrat Abbas RadiAllahu Anhune ye padhna shuru kiya:
Tarjuma:
“Aap Wo Zaat Hain Jab Aapki iladat-e-Ba Sa’aadat hui to
(Aapke Noor se)
saari zameen chamak uthi aur Aapke Noor se Ufooq-e-Aalam roshan hogaya.
Pas Hum Aapki ata karda Roshani aur Aap he ke Noor me in Hidayat ki Raaho par gaamzan hain.”
.
Is Hadees ko Imam Tabarani, Hakim aur Abu Nuaim ne riwayat kiya hai.
.
Note*: reference Arabic version ke khitabo me se hai.
.
(Arabic )
: أخرجه الطبراني في المعجم الكبير، ۲۱۳/4، الرقم: 4167،
والحاكم في المستدرك، ۳۶۹/۳، الرقم: 5417، و أبو نعيم في
حلية الأولياء 369/3، والذهبي في سير أعلام النبلاء،
۱۰۲/۲، وابن الجوزي في صفوة الصفوة، 53/1، و ابن عبد
البر في الاستیعاب، 448/۲، الرقم: 664، والعسقلاني في
الإصابة، ۲/ ۲۷۹، الرقم: ۲۲۹۷، والهيثمي في مجمع الزوائد،
۲۱۷/۸، والخطابي في إصلاح غلط المحدثین، ۱۰۱/۱،.
الرقم: 57، وابن قدامة في المغني، ۱۷۹/۱۰، و السيوطي في
الخصائص الکبری، 66/۱، وابن كثير في البداية والنهاية
السيرة)، ۲۰۸/۲، والقرطبي في الجامع لأحكام القرآن،
146/۱۳، و الحلبي في إنسان العيون في سيرة الأمين المامون،
۹۲/۱۔
.
.اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد

Eid_e_Milaad_un_Nabiﷺ_Mubarak 

Tamaam Muhammadi Momin’on Ko
Huzoor Sarwar e Qounain, Aaqa o Maula,
Muhammad e Mustafaﷺ ka Zahoor e Pak
Bohat Bohat Mubarak Ho ❣️
——————————————————————
Aaqa Ke Ghulamoñ Ko Ab Eid Manane Do,
Sarkaar ki Aamad Hai Raaho ko Sajane Do..

Charcha hai yahi Har-Su Kehte hai Ye Har Koi,
Tashreef Nabi Laye, Mehfil Ko Sajane Do..

Ghar Ghar Ye Charaga Hai Rehmat Ka Ujala Hai,
Aaqa Ki Sana Kar’ke Taqdeer Jagane Do..

Khushiyañ Hai Sabhi Karte Sarkaar Ki Aamad Par,
Ek Naat E Nabi Yaaro Mujhko Bhi Sunane Do..

Hai Noor E Muhammad Ki Sab Roushni Duniya Me,
Sab Kuch Hai Basheer Unka Sadqa To Lutane Do..

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد ❣️

तमाम आलम को सरकार ए दो आलम नूर ए मुज़स्सम सल्ललाहु अलैही व आलेही वसल्लम की आमद तहेदिल से मुबारक़

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ°

तर्जुमा-:और हमने आप को तमाम जहानों के लिए रह़मत बना कर भेजा.

“क़द जा अकुम मिनल्लाहि नूर”

तर्जुमा : बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से एक नूर आया…

आया, आ गया, याद रहे आज आया है, पैदा नहीं हुआ है क्योंकि पैदा तो उस दिन हो गया था जबकि दिन भी पैदा नहीं हुआ था।

जलवे आपके उस वक्त भी थे और कम भी नहीं थे,
यह तब की हैं बातें कि जब आदम भी नहीं थे.

सैय्यदे आलम नूरे मुजस्सम आका़ ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं – अव्वलो मा ख़ल्कल्लाहु नूरी यानी सबसे पहले अल्लाह ने मेरे नूर को पैदा फ़रमाया।

मैं उस वक्त भी नबी था जिस वक्त आदम रुहो जसद की मंजि़लें तय कर रहे थे।
मैं उस वक्त भी नबी था जब आदम आबो गुल की मंजि़लें तय कर रहे थे।

जब आदम भी नहीं थे…. तो जब आदम से पहले… तो आदमियत से भी पहले
जब पहले बशर से पहले तो बशरियत से भी पहले…

नूर आ गया,
कहाँ से आया ?? अर्श से।
अर्श का तो वजूद ही नहीं था।
चाँद से.. तारों से.. सूरज से.. मुख़्तलिफ़ सितारों, ग्रहों से ??

नहीं! नहीं! इन सबका तो वजूद ही नहीं था।
फिर यह नूर आया कहाँ से ??

तो सुनो जवाब भी इसी आयते करीमा में है – #मिनल्लाह… यह आने वाला बारगाहे इलाही से आया है, यह आने वाला आलमे कु़द्स से आया है, यह आने वाला आलमे लाहूत से आया है।

यह ऐसे आलम से आया है कि जिसको आलम कहना भी हकी़क़त नहीं।
बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से एक नूर आया…

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد ﷺ

*दोनो आलम की ज़िया है आमना की गोद में*
*रहमतों का सिलसिला है आमना की गोद में*
*हश्र तक महकेगा जिससे गुलसिताँ तौहीद का*
*फूल इक ऐसा खिला है आमना की गोद में*
*रहमतुल्लिल आलमिन चारा गरे बेचारगाँ*
*और दवाए ला दवा है आमना की गोद में*
*मज़हरे नूरे क़िदम महबूबे रब्बे जुल जलाल*
*क़िबला गाहे अम्बिया है आमना की गोद में*
*जिस पर खुद शैदा है क़ासिम खालिके अर्ज़ो समाँ*
*वो जमाले दिलरुबा है आमना की गोद में*
✍ *जनाब मौहम्मद क़ासिम मियां नियाज़ी साहब*

How beautiful is today’s dawn. It’s the dawn when Beloved of Allah and Most high in the entire creation Prophet Muhammadﷺ was born.

Prophet Isa (May Allah’s blessings be upon him) said regarding his own birth that:
“And peace be upon me on the day of my birth, the day of my demise and the day I shall be raised up alive!’” [Qur’an, 19:33]

If Sayyiduna Isa (May Allah’s blessings be upon him) sensed so much blessings from the day of his own birth then what do you think about the tranquility, peace, beauty and illumination that he would sense from the birth of his leader and the leader of the entire creation?

Sayyidi Habeeb ‘Umar bin Hafidh (May Allah protect him and benefit us from him) said: “The Day of Resurrection is the celebration of Prophet Muhammadﷺ. So rejoice as long as you are in this life, for if you were to enter Paradise, you must celebrate Himﷺ everywhere, for Hisﷺ name is written above every door. So what are the celebrations in this life compared to those? The celebration is yet to come!” This month isn’t just for the Pious and Saints, it’s for each and everyone may who he is good or bad, pious or sinner and great or small as Heﷺ doesn’t mind what you ever done and how huge it was. Heﷺ is still waiting for you with Hisﷺ heart open wide saying, “Ummati (My People/My nation)! I ﷺ miss you, return quickly!” Forever shall Hisﷺ indestructible excellence be publicised. While the jealous will burn in their jealousy to ashes. | Habeeb Sohail Al-Aidroos |