ताइफ़ वगैरा का सफर

मक्का वालों की अनाद (दुश्मनी) और सरकशी को देखते हुए जब हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उन लोगों के ईमान लाने से मायूसी नज़र आई। तो आप ने तब्लीगे इस्लाम के लिए मक्का के कुर्ब व जवार की बस्तियों का

रुख किया। चुनान्चे इस सिलसिले में आप ने “ताइफ का भी सफ़र फ़रमाया। इस सफर में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के गुलाम हज़रते जैद बिन हारिसा रदियल्लाहु तआला अन्हु भी आप के हमराह थे। ताइफ में बड़े बड़े उमरा और मालदार लोग रहते थे। उन रईसों में “उमैर का खानदान तमाम कबाएल का सरदार शुमार किया जाता था। ये लोग तीन भाई थे। अब्द या लैल , मसऊद , हबीब । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उन तीनों के पास तशरीफ ले गए। और इस्लाम की दवत दी। उन तीनों ने इस्लाम कबूल नहीं किया। बलिक इन्तिहाई बेहूदा और गुस्ताख़ाना जवाब दिया। और उन बद नसीबों ने इसी पर बस नहीं किया। बल्कि ताएफ के शरीर गुन्डों को उभार दिया कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ बुरा सुलूक करें। चुनान्चे लफंगों का ये शरीर गिरोह हर तरफ से आप पर टूट पड़ा। और ये शरारतों के मुजस्समे आप पर पत्थर बरसाने लगे। यहाँ तक कि आप के मुकद्दस पावँ ज़ख्मों से लुहूलुहान हो गए और आप के मोज़े और नअलैने मुबारक खून से भर गए। जब आप ज़ख्मों से बेताब हो कर बैठ जाते। तो ये ज़ालिम इन्तिहाई बे दर्दी के साथ आप का बाजू पकड़कर उठाते। और जब आप चलने लगते तो फिर आप पर पत्थरों की बारिश करते और साथ साथ तअना ज़नी करते। गालियाँ देते। तालियाँ बजाते। हंसी उड़ाते। हज़रते जैद बिन हारिस रदियल्लाहु तआला अन्हु दौड़ दौड़ कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर आने वाले पत्थरों को अपने बदन पर लेते थे। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बचाते थे। यहाँ तक कि वो भी खून में नहा गए। और ज़ख्मों से निढाल हो कर बे काबू होगए। यहाँ तक कि आखिर आप ने अंगूर के एक बाग में पनाह ली। ये बाग मक्का के एक मशहूर काफ़िर उतबा बिन रबीआ का था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ये हाल देखकर उतबा बिन रबीआ

और उस के भाई शैबी बिन रबीआ को आप पर रहम आ गया। और काफिर होने के बावुजूद ख़ानदानी हमय्येत ने जोश मारा।

चुनान्चे इन दोनों काफिरों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपने बाग में ठहराया। और अपने नसरानी “अद्दास” के हाथ से आप की ख़िदमत में अंगूर का एक खूशा भेजा। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बिस्मिल्लाह पढ़कर खूशा को हाथ लगाया। तो अद्दास तअज्जुब से कहने लगा। कि इस अतराफ के लोग तो ये कलिमा नहीं बोला करते हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस से दर्याप्त फ़रमाया कि तुम्हारा वतन कहाँ है. अद्दास ने कहा कि मैं शहरे नैनवा का रहने वाला हूँ आप ने फरमाया कि वो हजरते यूनुस बिन मत्ता का शहर है। वो भी. मेरी तरह खुदा के पैगम्बर थे। ये सुनकर अद्दास आप के हाथ पाँव चूमने लगा। और फौरन ही आप का कलिमा पढ़कर मुसलमान हो गया।

(जरकानी अलल मवाहिब जि. १ स.३००) इसी सफर में जब आप मकाम ‘नख्ला” में तशरीफ फरमा हुए और रात को नमाज़े तहज्जुद में कुरआन मजीद पढ़ रहे थे। तो “नसीबीन’ के जिन्नों की एक जमाअत आप की खिदमत में हाज़िर हुई और कुरआन सुन कर ये सब जिन्न मुसलमान हो गए। फिर इन जिन्नों ने लौट कर अपनी कौम को बताया। को मक्का मुकर्रमा में जिन्नों की जमाअत ने फौज दर फौज आ कर इस्लाम कबूल किया। चुनान्चे कुरआन मजीद में सूरए जिन की इब्तिदाई आयतों में खुदावंद आलम ने इस वाकिआ का तज़्किरा फ़रमाया है।

(जरकानी जि. १ स.३०३) मकामे नख्ला में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने चन्द दिनों कियाम फ़रमाया। फिर आप मकामे “हिरा” में तशरीफ लाए और कुरैश के एक मुम्ताज. सरदार मुतअम बिन अदी के पास ये पैगाम भेजा कि क्या तुम मुझे अपनी पनाह में ले सकते हो?

अरब का दस्तूर था कि जब कोई शख्स उन से हिमायत और पनाह तलब करता। तो वो अगरचे कितना ही बड़ा दुश्मन क्यों न हो। वो पनाह देने से इन्कार नहीं कर सकते थे। चुनान्चे मुतअम बिन अदी ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी पनाह में ले लिया। और उस ने अपने बेटों को हुक्म दिया कि तुम लोग हथियार लगा कर हरम में जाओ। और मुतअम बिन अदी खुद

घोड़े पर सवार होकर गया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपने साथ मक्का लाया। और हरमे कबा में अपने साथ लेकर गया। और मजमले आम में एअलान कर दिया। कि मैं ने मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को पनाह दी है। इसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इत्मिनान के साथ हजरे अस्वद को बोसा दिया। और कबा का तवाफ़ करके हरम में नमाज़ अदा की और मुतअम बिन अदी और उस के बेटों ने तलवारों के साए में आप को आप के दौलत खाना तक पहुंचा दिया।

(ज़रकानी जि. १ स.३०६) इस सफ़र के मुद्दतों बाद एक मर्तबा उम्मुल मोमिनीन आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से दर्याप्त किया कि या रसूलल्लाह! क्या जंगे उहुद के दिन से भी ज़्यादा सख्त कोई दिन आप पर गुंज़रा है? तो आप ने इर्शाद फरमाया कि हाँ। ऐ आइशा! वो दिन मेरे लिए जंग उहूद के दिन से भी ज्यादा सख्त था। जब मैं ने ताइफ में वहाँ के एक सरदार “अब्द या लैल’ को इस्लाम की दअवत दी। उस ने दअवते इस्लाम को हिकारत के साथ ठुकरा दिया। और अहले ताइफ ने मुझ पर पथराव किया। मैं इस रंज-ने गम में सर झुकाएं चलता रहा। यहाँ तक कि मकाम करनुस्सआलिब में पहुँच कर मेरे होश- हवास बजा हुए। वहाँ पहुँच कर जब मैं ने सर उठाया। तो क्या देखता हूँ कि एक बदली मुझ पर साया किए हुए है उस बादल में से हज़रत जिबरील अलैहिस्सलाम ने मुझे आवाज़ दी।

और कहा कि अल्लाह तआला ने आप की कौम का कौल और उनका जवाब सुन लिया। और अब आप की खिदमत में पहाड़ों फिरिश्ता हाजिर है। ताकि वो आप के हुक्म की तअमील करे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का बयान है कि पहाड़ों का फिरिश्ता मुझे सलाम करके अर्ज करने लगा। कि ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह ने आप की कौम का कौल और उन्होंने आप को जो जवाब दिया है वो सब कुछ सुन लिया है और मुझ को आप की खिदमत में भेजा है ताकि आप मुझे जो चाहें हुक्म दें। और मैं आप का हुक्म बजा लाऊँ। अगर आप चाहते हैं कि मैं “अख़्शबैन” (अबू कुबैस और कुकिआन) दोनों पहाड़ों को उन कुफ़्फ़ार पर उलट दूँ। तो मैं उलट देता हूँ। ये सुनकर हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया कि “नहीं बल्कि मैं उम्मीद करता हूँ कि अल्लाह तआला उनकी नस्लों से अपने ऐसे बन्दों को पैदा फ़रमाएगा जो सिर्फ अल्लाह तआला ही की इबादत करेंगे और शिर्क नहीं करेंगे। बुखारी बाब ज़िकरुल-मलाइका जि. १ स. ४५८ व ज़रकानी जि.१ स. २९७)

कबाइल में तब्लीगे इस्लाम

र नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का तरीका था कि हज्ज के ज़माना में जब कि दूर दूर के अरबी कबाइल मक्का में जमा होते थे तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम कबाइल में दौरा फ़रमा कर लोगों को इस्लाम की दअवत देते थे इसी तरह अरब में जा ब-जा बहुत से मेले लगते थे। जिन में दूर दराज़ के कबाइले अरब जमझ होते थे उन मेलों में भी आप तब्लीगे इस्लाम के लिए तशरीफ़ ले जाते थे। चुनान्चे उकाज, मजिन्ना, जूलमजाज़ के बड़े बड़े मेलों में आप ने कबाइले अरब के सामने दअवते इस्लाम पेश फ़रमाई। अरब के कबाइल बनू आमिर, मुहारिब, फज़ारा, गस्सान, मुर्रा, सुलैम, अबस,

नजर, किन्दा, कलब, उजरा, हजारमा, वगैरा इन सब मशहूर कबाइल के सामने आप ने इस्लाम पेश फरमाया, मगर आप का चचा अबू लहब हर जगह आप के साथ साथ जाता। और जब आप किसी कबीला के सामने वअज़ फरमाते। तो अबू लहब चिल्ला चिल्ला कर ये कहता कि ये “दीन से फिर गया है। ये झूट कहता

(ज़रकानी जि. १ स.३०९) कबीलए बनू जहल बिन शैबान के पास जब आप तशरीफ़ ले गए। तो हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु आप के साथ थे। उस कबीला का सरदार “मफरूक आपकी तरण मुतवज्जह हुआ। और उस ने कहा कि ऐ कुरैशी बिरादर! आप लोगों के सामने कौन सा दीन पेश करते हैं? आप ने फरमाया कि खुदा एक है। और मैं उस का रसूल हूँ। फिर आप ने सूरए इनआम की चन्द आयतें तिलावत फ़रमाईं। ये सब लोग आप की तकरीर और कुरआनी आयतों की तासीर से इन्तिहाई मुतास्सिर हुए। लेकिन ये कहा कि हम अपने इस खान्दानी दीन को भला एक दम कैसे छोड़ सकते हैं? जिस पर हम बरसहा बरस से कारबंद हैं। इस के अलावा हम मुल्के फ़ारस के बादशाह किसरा के जेरे असर और रअइय्यत हैं। और हम ये मुअहदा कर चुके हैं कि हम बादशाह किसरा के सिवा किसी और के जेरे असर नहीं रहेंगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन लोगों की साफ गोई की तीफ फ़रमाई। और इर्शाद फरमाया कि खैर। खुदा अपने दीन का हामी व नासिर और मुईन व मददगार है।

(रौजुल अनफ बहवाला सीरतुन नबी)

अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाहि व अला आलिका व अस्हाबिका या हबीबल्लाहि

फरमाने हबीबे रब्बल आल-लमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम : वो शख्स बख़ील है जिसके सामने मेरा

ज़िक्र किया जाए और वो मुझ पर दुरूद न पढ़े।