नमाज़ और अबवाबे जन्नत का खुलना

नमाज़ और अबवाबे जन्नत का खुलना

रसूल ए पाक ने इरशाद फ़रमाया के जन्नत के आठ दरवाज़े हैं जब कोई बन्दा नमाज़ में दाख़िल होता है और उसे पूरे तक़ाज़ों के साथ अदा करता है तो उसपर यह आठों दरवाज़े खोल दिये जाते हैं आहादीसे मुबारका में उसकी जो तफ़सील बयान की गई है यहाँ उसका इजमाली तज़किरा किया जाता है,

बाबुल मआरिफ़ा(पहला दरवाज़ा)

नमाज़ में दाख़िल होते ही जब बन्दा कलिमाते सना अपनी ज़बान से अदा करता है तो उसपर पहला दरवाज़ा…… बाबे मआरिफ़त….. खोल दिया जाता है जिस से उसे मआरिफ़ते इलाही का ख़ज़ाना अता कर दिया जाता है,

बाबुज़ ज़िक्र (दूसरा दरवाज़ा)

जब बन्दा अपनी ज़बान से तसमियह कलिमात (بسم اللّه الرحمن الرحيم )
अदा करता है तो जन्नत का दूसरा दरवाज़ा जो ….. बाबुज़ ज़िक्र….. से मोसूम है खुल जाता है जिसके नतीजे में वो बन्दा ज़िक्रे इलाही की नेअमतों का हक़दार बन जाता है,

बाबुश शुक्र (तीसरा दरवाज़ा)

बन्दा जब अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन के कलिमात पर पहुँचता है तो उसका दिल अहसास तशक्कुरो इम्तिनान से मग़लूब हो जाता है और वो बारगाहे एज़दी में इस बात का ऐतिराफ़ व इक़रार करता है कि वो ज़ात बे हमताही तमाम तारीफ़ो़ं की सज़ावार है तो उसपर……. बाबुश शुक्र…….खोल दिया जाता है,

बाबुर रिजा (चोथा दरवाज़ा)

जब बन्दा अल्हम्द के बाद अर्रहमानिर्रहीम के कलिमात ज़बान पर लाता है तो बारी तआल़ा अपने फ़रिश्तों को हुक्म देता है कि मेरा बन्दा मेरी बे पायाँ रहमतों का ज़िक्र कर रहा है इसलिए इसपर…..बाबुर रिजा …… खोल दिया जाए,

बाबुल ख़ौफ़ (पाँचवा दरवाज़ा)

जब बन्दा क़ल्बो रूह की गहराइयों में डूब कर मालिकि यौमिद्दीन के अल्फ़ाज़ अपनी ज़बान से अदा करता था तो गोया वो ख़ुद को मुल्ज़िम की तरह सबसे बड़े बादशाह के दरबार में पेश कर देता है ख़ौफ़े ख़ुदा से लर्ज़ा बर अन्दाम होकर जब वो अहसासे जुर्म से मग़लूब हो जाता है तो रहमते परवरदिगार फ़रिश्तों को निदा देती है कि मेरे इस बन्दे पर….बाबुल ख़ौफ़…. खोल दिया जाए ताकि ख़श्यते इलाही की वजह से वो मेरी रहमतों से नवाज़ा जा सके,

बाबुल इख़्लास (छटा दरवाज़ा)

इय्या क नअबुदु व इय्या क नस्तईन कह कर जब बन्दा ख़ुदा की बन्दगी का इक़रार करता हुआ उस से इस्तिआनत का तलबगार होता है तो उसपर…. बाबुल इख़्लास….. खोल दिया जाता है जिस से उसे ख़ालिक़े हक़ीक़ी की मअरिफ़त में इख़्लास नसीब होता है,

बाबुद दुआ (सातवां दरवाज़ा)

जब बन्दा इहदि नस्सिरातल मुस्तक़ीम पर पहुँच कर ख़ुदा की बारगाह में सीधी राह पर चलने की हिदायत का ख़्वास्तगार होता है तो फ़रिश्तों को जन्नत का सातवां दरवाज़ा… बाबुद दुआ…. खोल देने का हुक्म दे दिया जाता है,

बाबुल इक़्तदा (आठवां दरवाज़ा)

आख़िर में जब बन्दा वलद दाल्लीन तक पहुँचता है और मुनइमे हक़ीक़ी से उसके इनआम याफ़ता बन्दों के ज़मरे में शरीक होने का तलबगार होता है और उन लोगों से बर्रियत का इज़हार करता है जो ज़लालते गुमराही की वजह से उसके ग़ैज़ो ग़ज़ब का निशाना बने तो फ़रिश्तों को जन्नत के आख़िरी दरवाज़े…. बाबुल इक़्तदा…. को खोलने का हुक्म दे दिया जाता है और इस तरह उसकी नमाज़ मेअराज के दर्जे को पहुँच जाती है۔۔۔۔۔۔۔۔۔

Ishq-e-Rasul Paak (sallallaho alaihi wa aalihi wa salam)

Sir Syed Ahmed Khan –

17th October birth anniversary of Sir Syed Ahmed Khan founder of Aligarh Muslim University Aligarh. Lot of posts are available on fb today regarding his contributions in the field of education but i would like to discuss an important aspect of his personality that is Ishq-e-Rasul Paak (sallallaho alaihi wa aalihi wa salam) that is love for the Holy Prophet peace be upon him and his progeny. He was not a so called ashiq-e-rasul like those who in the name of Ishq-e-Rasul charge lakhs of rupees for a single sitting of mawalid naatkhwani and takreers. Anyways a European William Muir wrote a very controversial book on Prophet of Islam titled Life of Muhammad. This book was full of lies and false accusations that the reader will have an extremely negative picture of Prophet Muhammad and Islam. Sir Syed Ahmed Khan decided to refute this book point by point. In one of his letters to his colleagues, he says that i will not be able to sleep until and unless i have refuted this book. As most of the sources cited in the book were not available in India and were from British library, He sold his property and went to England to consult the references and than he wrote the refutation titled Khutbat-e-Ahmadiya. Such was his love for the Holy Prophet (s.a.w).
Unfortunately Sir Syed Ahmed Khan was declared kafir by famous scholar Ahmed Raza Khan of barelliy. When Maulvi Ahmad Raza Khan went for Haj he brought a fatwa of kufr on Sir Syed. When Sir Syed Ahmed Khan came to knew about this he smiled and said “Humara Kufr Bhi Bahut Mubarak Hai Logon Ko Haji Bana Deta Hai.”
Sir Syed was from the progeny of the Holy Prophet. He was a Rizvi Syed. His Shajra is written on his grave. May Allah elevate his rank in jannah aameen.

मक्की ज़िन्दगी पहला बाब बरकाते नुबूव्वत का ज़हूरबर

मक्की ज़िन्दगी

खानदानी हालात

नसब नामा । हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नसब शरीफ वालिद माजिद की तरफ से ये है। हज़रत मुहम्मद’. सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम – बिन अब्दुल्लाह ? – बिन अब्दुल मुत्तलिब – बिन हाशिम

बिन अब्दे मनाफ़ बिन कुस्सा – बिन कलाब’ बिन मुर्रह बिन कब

बिन लुवई10 – बिन गालिब11 – बिन फेहर12 – बिन मालिक! -बिन नजर14 – बिन किनाना15 – बिन खुजैमा16 — बिन मुदरिका” बिन इलयास18 बिन मुजर19 – बिन नज़ार20

बिन नज़ार20 – बिन मअद्द बिन अदनान22

(बुख़ारी जि: १. बाब मुबअसुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

और वालिदा माजिदा की तरफ से हुजूर का शजरए नसब ये है:

हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम – बिन आमिनार बिन्ते वहब – बिन अब्द मनाफ

बिन जुहरा बिन किलाब – बिन मुर्रह

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदैन का नसब नाम “किलाब बिन मुर्रह” पर मिल जाता है। और आगे चल कर दोनों का सिलसिला एक हो जाता है। अदनान तक आप का नसब नामा सही सनदों के साथ ब-इत्तेफाक मुअरिंखीन साबित है। इस के बाद के नामों में बहुत कुछ इख्तिलाफ़ है और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब भी अपना नसब नामा बयान फरमाते थे तो “अदनान ही तक ज़िक्र फरमाते थे। (करमानी बहवाला हाशिया बुखारी जि. १ स.५४३) मगर इस पर तमाम मुअरिंखीन का इत्तिफाक है कि ‘अदनान हज़रते इस्लामईल अलैहिस्सलाम की औलाद में से हैं और हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम, हजरते इब्राहीम ख़लीलुल्लाह अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्दे अरजुमन्द हैं।

ख़ानदानी शराफत

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख़ानदान व नसब, नजाबत- शराफ़त में तमाम दुनिया के खानदानों से अशरफ़ व अअला है और ये वो हकीकत है कि आप के बद तरीन दुश्मन कुफ्फारे मक्का भी कभी इस का इन्कार न कर सके। चुनान्चे अबू सुफ़ियान जब बादशाहे रूम हरकुल के भरे दरबार में इस हकीकत का इकरार किया कि “हुवा फ़ीना जु नसब यानी नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आली ख़ानदान हैं!

(बुखारी जि. १.स.४)

हालाँकि वो आप के बद तरीन दुश्मन थ। और चाहते थे कि अगर जरा भी कोई गुन्जाइश मिले तो आप की जाते पाक पर कोई अब लगाकर बादशाहे रूम की नज़रों से आप का वकार गिरा दें। मुस्लिम शरीफ की रिवायत है कि अल्लाह ताला ने हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में से किनाना को बरगुजीदा बनाया। और “किनाना’ में से कुरैश’ को चुना और

“कुरैश’ में से “बनी हाशिम” को मुन्तख़ब फरमाया और “बनी हाशिम” में से मुझको चुन लिया। (मिश्कात फजाएल सय्येदुल मुरसलीन)

बहर हाल ये एक मुसल्लिमा हकीकत है कि

लहुन नस्बुल आली फ-लैसा कमिस-लिही

हसीबुन नसीबुन मुन-अमुन मु-त-कर-रमु यानी हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का खानदान इस कदर बुलन्द मर्तबा है कि कोई भी हसब व नसब वाला, और नेअमत व बुजुर्गी वाला आप के मिस्ल नहीं है।

कुरैश

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ख़ानदाने नुबूव्वत में सभी हज़रात अपनी गुनागों खुसूसियात की वजह से बड़े नामी गिरामी हैं। मगर चन्द हस्तियाँ ऐसी हैं जो आस्माने फज़्ल- कमाल पर चाँद तारे बन कर चमके। उन बा कमालों में से फ़िहर बिन मालिक भी हैं उन का लकब “कुरैश है। और उन की औलाद “कुरैशी” या “करशी’ कहलाती है।

“फ़िहर बिन मालिक कुरैश इस लिए कहलाते हैं। कि “कुरैश” एक समुन्दरी जानवर का नाम है जो बहुत ही ताकतवर होता है और समुन्दरी जानवरों को खा डालता है। ये तमाम जानवरों पर हमेशा गालिब ही रहता है। कभी मगलूब नहीं होता। चूँकि “फिहर बिन मालिक अपनी शुजाअत. और खुदादाद ताकत की बिना पर तमाम कबाएले अरब पर गालिब थे। इस लिए तमाम अले अरब उन को “कुरैश के लकब से पुकारने लगे। चुनाचे इसबारे में “शमरख बिन अमर हिमयरी’ का शेअर बहुत ही मशहूर है कि

बिहा सुम्मियत कुरैशुन कुरैशन यानी “कुरैश” एक जानवर है जो समुन्दर में रहता है। उसी के नाम पर कबीलए कुरैश का नाम “कुरैश रख दिया गया।

। (जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.७६) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माँ बाप दोनों का सिलसिलए नसब “फिहर बिन मालिक से मिलता है। इस लिए हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम माँ बाप दोनों की तरफ से कुरैशी हैं।

हाशिम हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पर दादा “हाशिम बड़ी शान- शौकत के मालिक थे। उन का असली नाम ‘अमर’ था, इन्तिहाई बहादुर, बे हद सखी और अअला दर्जे के मेहमान नवाज़ थे। एक साल अरब में बहुत सख्त कहत पड़ गया।

और लोग दाने दाने को मुहताज हो गए। तो ये मुल्के शाम से खुश्क रोटियाँ ख़रीद कर हज्ज के दिनों में मक्का पहुंचे। और रोटियों का चूरा करके ऊँट के गोश्त के शोरबे में सरीद बनाकर तमाम हाजियों को खूब पेट भर कर खिलाया उस दिन से लोग उन को “हाशिम (रोटियों का चूरा करने वाला) कहने लगे।

(मदारिजुन नुबूब्बत जि. २ स.८) चूँकि ये .”अब्दे मनाफ” के सब लड़कों में बड़े और बा सलाहियत थे। इस लिए अब्दे मनाफ के बाद कबा के मुतवल्ली,

और सज्जादा नशीन हुए। बहुत हसीन व खूबसूरत और वजीह थे। जब सिन्ने शुऊर को पहुँचे तो उन की शादी मदीना में कबीलए

यानी “कुरैश” एक जानवर है जो समुन्दर में रहता है। उसी के नाम पर कबीलए कुरैश का नाम “कुरैश रख दिया गया।

(जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.७६)

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माँ बाप दोनों का सिलसिलए नसब “फिहर बिन मालिक से मिलता है। इस लिए हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम माँ बाप दोनों की तरफ से कुरैशी हैं।

हाशिम

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पर दादा ‘हाशिम बड़ी शानो शौकत के मालिक थे। उन का असली नाम “अमर” था, इन्तिहाई बहादुर, बे हद सख़ी और अअला दर्जे के मेहमान नवाज़ थे। एक साल अरब में बहुत सख्त कहत पड़ गया। और लोग दाने दाने को मुहताज हो गए। तो ये मुल्के शाम से खुश्क रोटियाँ ख़रीद कर हज्ज के दिनों में मक्का पहुँचे। और रोटियों का चूरा करके ऊँट के गोश्त के शोरबे में सरीद बनाकर तमाम हाजियों को खूब पेट भर कर खिलाया उस दिन से लोग उन को “हाशिम (रोटियों का चूरा करने वाला) कहने लगे।

(मदारिजुन नुबूब्बत जि. २ स.८)

चूँकि ये .”अब्दे मनाफ़’ के सब लड़कों में बड़े और बा सलाहियत थे। इस लिए अब्दे मनाफ के बाद कबा के मुतवल्ली, और सज्जादा नशीन हुए। बहुत हसीन व खूबसूरत और वजीह थे। जब सिन्ने शुऊर को पहुंचे तो उन की शादी मदीना में कबीलए

खुदवाकर दुरुस्त किया। और लोगों को आबे जमजम से सैराब किया। आप भी कबा के मुतवल्ली और सज्जादा नशीन हुए। असहाबे फील का वाकिआ आप के वक्त में पेश आया। एक सौ बीस बरस की उम्र में आप की वफात हुई। (जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.७२)

असहाबे फील का वाकिआ

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की पैदाइश से सिर्फ पचपन दिन पहले यमन का बादशाह “अबरहा” हाथियों की फौज ले कर कबा ढाने के लिए मक्का पर हमला आवर हुआ था। इस का सबब ये था कि “अबरहा” ने यमन के दारुल सल्तनत “सनआ” में एक बहुत ही शानदार और आलीशान “गिरजा घर’ बनाया। और ये कोशिश करने लगा कि अरब के लोग बजाए ख़ानए कबा के यमन आ कर उस गिरजा घर का हज्ज किया करें। जब मक्का वालों को ये मालूम हुआ तो कबीलए “किनाना’ का एक शख़्स गैजो ग़ज़ब में जल भुनकर यमन गया। और वहाँ के गिरजा घर में पाएखाना फिर कर इस को नजासत से लतपत कर दिया। जब अबरहा ने ये वाकिआ सुना तो वो तैश में आपे से बाहर हो गया और ख़ानए कबा को ढाने के लिए हाथियों की फौज ले कर मक्का पर हमला कर दिया और उस की फौज के अगले दस्ते ने मक्का वालों के तमाम ऊँटों और दूसरे मवेशियों को छीन लिया। इस में दो सौ या चार सौ ऊँट अब्दुल मुत्तलिब के भी थे। (जुरकानी जि.१ स.८५) Hazrat अब्दुल मुत्तलिब को इस वाकिआ से बड़ा रंज पहुँचा। चुनान्चे आप इस मुआमले में गुफ्तगू के लिए उस के लश्कर में तशरीफ ले गए। जब अबरहा को मालूम हुआ कि कुरैश का सरदार उस से मुलाकात करने के लिए आया है। तो उसने आप को अपने खेमा में बुला लिया। और जब अब्दुल मुत्तलिब को देखा कि एक

बुलन्द कामत, रुअबदार और निहायत ही हसीन- जमील आदमी हैं जिन की पेशीनी पर नूरे नुबूव्वत का जाह- जलाल चमक रहा है । तो सूरत देखते ही अबरहा मरऊब हो गया। और बे इख्तियार तख्ते शाही से उतरकर आप की तअजीम-7 तकरीम के लिए खड़ा हो गया। और अपने बराबर बिठाकर दर्याप्त किया कि कहिए। सरदारे कुरैश! यहाँ आप की तशरीफ़ आवरी का क्या मकसद है? अब्दुल मुत्तलिब ने जवाब दिया कि हमारे ऊँट और बकरियाँ वगैरा जो आप के लश्कर के सिपाही हाँक लाए हैं। आप उन सब मवेशियों को हामरे सिपुर्द कर दीजिए। ये सुनकर अबरहा ने कहा कि ऐ सरदारे कुरैश! मैं तो ये समझता था कि आप बहुत ही हौसलामंद और शानदार आदमीहैं। मगर आपने मुझसे अपने ऊँटों का सुवाल करके मेरी नज़रों में अपना वकार कम कर दिया। ऊँट और बकरी की हकीकत ही क्या है? मैं तो आप के कबा को तोड़ फोड़कर बरबाद करने के लिए आया हूँ, आपने इस के बारे में गुफ्तुगू ही नहीं की। अब्दुल मुत्तलिब ने कहा कि मुझे तो अपने ऊँटों से मतलब है कबा मेरा घर नहीं बल्कि वो खुदा का घर है। । वो खुद अपने घर को बचा लेगा मुझे कबा की ज़रा भी फिक्र नहीं है ये सुनकर अबरहा अपने फ़िरऔनी लहजे में कहने लगा। कि ऐ सरदारे मक्का! सुन लीजिए मैं कबा को ढाकर उस की ईंट से ईंट बजा दूंगा। और रुए ज़मीन से उस का नाम- निशान मिटा दूंगा। क्योंकि मक्का वालों ने मेरे गिरजाघर की बड़ी बे हुर्मती की है। इस लिए मैं उस का इन्तिकाम लेने के लिए कबा को मिसमार कर देना ज़रूरी समझता हूँ। अब्दुल मुत्तलिब ने फ़रमाया कि फिर आप जानेंऔर खुदा जाने। मैं आप से सिफारिश करने वाला कौन? इस गुफ़्तुगू के बाद अबरहा ने तमाम जानवरों को वापस कर देने का हुक्म दे दिया। और अब्दुले मुत्तलिब तमाम ऊँटों और बकरियों को साथ ले कर अपने घर चले आए। और मक्का वालों से फरमाया कि तुम लोग अपने अपने माल, मवेशियों

को ले कर मक्का से बाहर निककल जाओ। और पहाडों की चोटियों पर चढ़कर और दरों में छुपकर पनाह लो। मक्का वालों से ये कहकर फिर खुद अपने खानदान के चन्द आदमियों को साथ ले कर खानए कबा में गए। और दरवाजा का हल्का पकड़कर इन्तिहाई बे करारी और गिरया वजारी के साथ दरबारे बारी में इस तरह दुआ माँगने लगे कि

ऐ अल्लाह बेशक हर शख्स अपने अपने घर की हिफाज़त करता है। लिहाज़ा तू भी अपने घर की हिफाजत फ़रमा। और सलीब वालों, और सलीब के पुजारियों (ईसाईयों) के मुकाबले में अपने इताअत शिआरों की मदद फरमा। अब्दुल मुत्तलिब ने ये दुआ माँगी और अपने खानदान वालों को साथ ले कर पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। और खुदा की कुदरत का जल्वा देखने लगे। अबरहा जब सुबह को कबा ढाने के लिए अपने लश्करे जर्रार और हाथियों की कतार के साथ आगे बढ़ा। और मकामे “मुग़म्मस’ में पहुंचा। तो खुद उस का हाथी जिस का नाम “महमूद था एक दम बैठ गया। हर चन्द मारा और बार बार ललकारा मगर हाथी नहीं उठा। इसी हालत में करे इलाही अबाबीलों की शकल में नुमूदार हुआ। और नन्हे नन्हे परिन्दे झुंड के झुंड जिन की चोंच और पन्जों में तीन तीन कंकरियों थीं। समुन्दर की जानिब से हरमे कञ्बा की तरफ आने लगे। अबाबीलों के इन दल बा दल लश्करों ने अंबरहा के फौजों पर इस ज़ोर शोर से संग बारी शुरू कर दी के आन की आन में अबरहा के लश्कर और उस के हाथियों के परख्चे उड़ गए। अबाबीलों की संग बारी खुदावंदे कहार व

जब्बार के कहर व ग़ज़ब की ऐसी मार थी कि जब कोई कंकरी किसी फील सवार के सर पर पडती थी तो वो उस आदमी के बदन को छेदती हुई हाथी के बदन से पार हो जाती थी. अबरहा की फौज का एक आदमी भी जिन्दा नहीं बचा। और सब के सब अबरहा और उस के हाथियों समेत इस तरह हलाक व बरबाद हो गए कि उन के जिस्मों की बोटियाँ टुकड़े टुकड़े होकर जमीन पर बिखर गईं। चुनान्चे कुरआन मजीद की “सूरए फील” में खुदावंदे कुहूस ने इस वाकिआ का जिक्र करते हुए इर्शाद फरमाया कि

यानी (ऐ महबूब) क्या आप ने न देखा कि आप के रब ने उन हाथी वालों का क्या हाल कर डाला? क्या उन के दाओं को तबाही में न डाला? और उन परिन्दों की टुकड़ियाँ भेजीं ताकि उन्हें कंकर के पत्थर से मारें। तो उन्हें चबाए हुए भुस जैसा बना डाला! जब अबरहा और उस के. लश्करों का ये अंजाम

हुआ

तो हजरत अब्दुले मुत्तलिब पहाड़ से नीचे उतरे। और खुदा का शुक्र अदा किया उन की इस करामत का दूर दूर तक चर्चा हो गया और तमाम अहले अरब उनको एक खुदा रसीदा बुजुर्ग की हैसियत से काबिले एहतिराम समझने लगे।

हज़रते अब्दुल्लाह

ये हमारे हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदे माजिद हैं। ये अब्दुल मुत्तलिब के तमाम बेटों में सब से ज्यादा बाप के लाडले और प्यारे थे। चूँकि उन की पेशानी में नूरी मुहम्मदी अपनी पूरी शान- शौकत के साथ जलवागर था। इस लिए हुस्न- खूबी के पैकर और जमाले सूरत

व कमाले सीरत के आईनादार और इफ्फत व पारसाई में यकताए रोजगार थे। कबीलए कुरैश की तमाम हसीन औरतें उन के हुस्न- जमाल पर फरेफ्ता और उन से शादी की ख्वास्तगार थीं। मगर अब्दुल मुत्तलिब उन के लिए एक ऐसी औरत की तलाश में थे जो हुस्न- जमाल के साथ साथ हसबने नसब की शराफत, और इफ्फत- पारसाई में भी मुम्ताज़ हो अजीब इत्तिफाक कि एक दिन अब्दुल्लाह शिकार के लिए जंगल में तशरीफ ले गए। मुल्के शाम के यहूदी चन्द अलामतों से पहचान गए थे कि नबी आखिरुज ज़माँ के वालिदे माजिद यही हैं। चुनान्चे इन यहूदियों ने हजरते अब्दुल्लाह को बारहा कत्ल कर डालने की कोशिश की

! इस मर्तबा भी यहूदियों की एक बहुत बड़ी जमाअत मुसल्लह हो कर इस निय्यत से जंगल में गई कि अब्दुल्लाह को तन्हाई में धोके से कत्ल कर दिया जाए। मगर अल्लाह तआला की हिफाजत ने इस मर्तबा भी अपने फज्ल-ो करम से बचा लिया। आलमे गैब से चन्द ऐसे सवार नागहाँ नुमूदार हुए। जो इस दुनिया के लोगों से कोई मुशाबहत ही नहीं रखते थे। इन सवारों ने आकर यहूदियों को मार भगाया। और अब्दुल्लाह को ब-हिफाजत उनके मकान तक पहुंचा दिया। “वहब बिन मनाफ भी उस दिन जंगल में थे। और उन्होंने अपनी आँखों से ये सब कुछ देखा इस लिए उनको अब्दुल्लाह से बे इन्तिहा महब्बत व अकीदत पैदा हो गई। और घर आ कर ये अज्म कर लिया कि मैं अपनी नूरे नज़र “आमिना” की शादी अब्दुल्लाह ही से करूँगा। चुनान्चे अपनी इस दिली तमन्ना को अपने चन्द दोस्तों के जरीओ उन्होंने अब्दुल मुत्तलिब तक पहुँचा दिया। खुदा की शान कि अब्दुल मुत्तलिब अपने नूरे नजर अब्दुल्लाह के लिए जैसी दुल्हन की तलाश में थे। वो सारी खूबियाँ हजरत आमिना बिन्ते वहब में मौजूद थीं। अब्दुल मुत्तलिब ने इस रिश्ते को खुशी खुशी मंजूर कर लिया। चुनान्चे चौबीस साल की उम्र में हजरते अब्दुल्लाह का हजरते बीबी आमिना से निकाह हो

गया। और नूरे मुहम्मदी हज़रते अब्दुल्लाह से मुन्तकिल हो कर हजरते बीबी आमिना के शिकमेअतहर में जलवा गर हो गया। और जब हमल शरीफ को दो महीने पूरे हो गए। तो अब्दुल मुत्तलिब ने हज़रते अब्दुल्लाह को खजूरें लेने के लिए मदीना शरीफ भेजा या तिजारत के लिए मुल्के qशाम रवाना किया। वहाँ से वापस लौटते हुए मदीने में अपने वालिद के नन्हाल ‘बनू अदी बिन नज्जार* में एक माह बीमार रह कर पच्चीस बरस की उमर में वफ़ात पा गए और वहीं “दारे नाबगा” में मदफून हुए।

(जुरकानी अलीयल मवाहिब जि.१ स. १०१ व मदारिज जि.२ स.१४)

काफिला वालों ने जब मक्का वापस लौटकर अब्दुल मुत्तलिब को हज़रते अब्दुल्लाह की बीमारी का हाल सुनाया। तो उन्होंने ख़बर गीरी के लिए अपने सब से बड़े लड़के “हारिस को मदीना शरीफ़ भेजा। उनके मदीना पहुँचने से कल ही हज़रते अब्दुल्लाह राही मुल्के बका हो चुके । हारिस ने मक्का वापस हो कर जब वफात की ख़बर सुनाई। तो सारा घर मातम कदा बन गया। और बनू हाशिम के हर घर में मातम बरपा हो गया। खुद हज़रते आमिना ने अपने मरहूम शौहर का ऐसा पुर दर्द मरसिया कहा है कि जिस को सुनकर आज भी दिल दर्द से भर जाता है। रिवायत है कि हज़रते अब्दुल्लाह की वफ़ात पर फरिश्तों ने गमगीन हो कर बड़ी हसरत के साथ कहा कि इलाही! तेरा नबी यतीम हो गया। हज़रते हक ने फ़रमाया क्या हुआ? मैं इस का हामी व हाफिज हूँ

(मदारिजुन नुबूवत) हजरते अब्दुल्लाह का तर्का एक लौंडी उम्मे अमन जिन का नाम “बरका” था। कुछ, ऊँट कुछ बकरियाँ थीं। ये सब तर्का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मिला। ‘उम्मे अमन बचपन में हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की देख भाल भाल करती थीं। खिलाती, कपड़ा पहनाती, परवरिश की

जरूरियात मुहय्या करती। इस लिए हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम उम्र “उम्मे अमन” की दिलजुई

फरमाते रहे अपने महबूब व मुतबन्ना गुलाम हजरते जैद बिन हारिसा से उन का निकाह कर दिया। और उनके शिकम से हज़रते उसामा पैदा हुए। (आम्मा कुतुबे सैर)

हुजूर के वालिदैन का ईमान

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदैने करीमैन के बारे में ओलमा का इख्तिलाफ है कि वो दोनों मोमिन हैं या नहीं। बअज ओलमा इन दोनोंको मोमिन नहीं मानते। ओर बअज ओलमा ने इस मस्अले में तवक्कुफ किया। और फ़रमाया कि इन दोनों को मोमिन या काफिर कहने से ज़बान को रोकना चाहिए। और इस का इल्म खुदा के सिपुर्द कर देना चाहिए। मगर अहले सुन्नत के ओलमा मुहक्कीन मसलन इमाम जलालुद्दीन सुयूती, व अल्लामा बिन हजर हैतमी व इमाम कुरतबी, व हाफिज अलशाम इब्ने नासिरुद्दीन, व हाफिज शम्सुद्दीन दमिश्की, व काजी अबू बकर इब्नुल अरबी मालिकी, व शैख अब्दुल हक मुहद्दिस. देहलवी, व साहिबुल अकलील मौलाना अब्दुल हक मुहाजिर मदनी वगैरा रहमतुल्लाह अलैहिम का यही अकीदा और कौल है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के माँ, बाप दोनों यकीनन बिला शुब्हा

मोमिन हैं। इस बारे में हज़रते शैख़ अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैहि का इर्शाद है कि :

हुजूर के वालिदैन को मोमिन न मानना ये ओलमा मुतकद्दिमीन का मसलक है। लेकिन ओलमाए मुताख्खिरीन ने तहकीक के साथ इस मसले को साबित किया है कि हुजूर के वालिदैन, बल्कि हुजूर के तमाम आबा व अजदाद हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तक सब के सब “मोमिन हैं।

और उन हज़रात के ईमान को साबित करने में ओलमाए मुताख्खिरीन के तीन तरीके हैं। अव्वल ये कि हुजूर के वालिदैन और आबा व अजदाद सब हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दीन

रोजगार थे। कबीलए करे की समान हसीन और उनके हुस्न- जमाल पर करता और उन से शादी की बात की। मगर अब्दुल मुत्तलिब उन के लिए एक ऐसी औरत की तलाश में थे जो हुस्न- जमाल के साथ साथ हसबने नहब की शराफत, और इफ्कत- पारसाई में भी मुम्ताज ही अजीब हरितकाक कि एक दिन अब्दुल्लाह शिकार के लिए जंगल में तशरीफ ले गए। मुल्क शाम के यहूदी चन्द अलामतों से पहचान गए थे कि नदी आखिरुज जमाँ के वालिद माजिद यही हैं। चुनाचे इन यदियों ने हजरते अब्दुल्लाह को बारहा कल कर डालने की कोशिश की इस मर्तबा भी यहूदियों की एक बहुत बड़ी जमाअत मुसलह हो कर इस निय्यत से जंगल में गई कि अब्दुल्लाह को तन्हाई में धोके से कत्ल कर दिया जाए। मगर अल्लाह तआला की हिफाजत ने इस मर्तबा भी अपने फज्ल-करम से बचा लिया। आलम मैब से चन्द ऐसे सवार नागहाँ नुमूदार हुए। जो इस दुनिया के लोगों से कोई मुशाबहत ही नहीं रखते थे। इन सवारों ने आकर यहृदियों को मार भगाया। और अब्दुल्लाह को ब-हिफाजत उनके मकान तक पहुंचा दिया। वहब बिन मनाफ भी उस दिन जंगल में थे। और उन्होंने अपनी आँखों से ये सब कुछ देखा इस लिए उनको अब्दुल्लाह से बै इन्तिहा महब्बत व अकीदत पैदा हो गई। और घर आ कर ये अज्म कर लिया कि मैं अपनी नूरे नज़र आमिना की शादी अब्दुल्लाह ही से करूँगा। चुनान्चे अपनी इस दिली तमन्ना को अपने चन्द दोस्तों के जरीओ उन्होंने अब्दुल मुत्तलिब तक पहुँचा दिया। खुदा की शान कि अब्दुल मुत्तलिब अपने नूरे नजर अब्दुल्लाह के लिए जैसी दुल्हन की तलाश में थे। वो सारी खूबियों हजरत आमिना बिन्ते वहब में मौजूद थीं। अब्दुल मुत्तलिब ने इस रिश्ते को खुशी खुशी मंजूर कर लिया। चुनान्चे चौबीस साल की उम्र में हजरते अब्दुल्लाह का हजरते बीबी आमिना से निकाह हो

पर थे। लिहाजा “मोमिन” हुए। दुव्वम ये कि तमाम हज़रात हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के एअलाने नुबूव्वत से पहले ही ऐसे जमाने में वफात पा गए जो जमाना “फतरत” कहलाता है। और उन लोगों तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दअवते ईमानी पहुँची ही नहीं। लिहाज़ हरगिज़ हरगिज़ इन हजरात को काफिर नहीं कहा जा सकता, बल्कि इन लोगों को मोमिन ही कहा जाएगा। सुव्वम ये कि अल्लाह तआला ने इन हजरात को जिन्दा फरमाकर उन की कब्रों से उठाया। और उन लोगों ने कलिमा पढ़कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तस्दीक की। और हुजूर

के वालिदैन को ज़िन्दा करने की हदीस अगरचे बजाते खुद जईफ है। मगर इस की सनदें इस कदर कसीर हैं कि ये हदीस “सही और हसन” के दर्जे को पहुँच गई है।

और ये वो इल्म है जो मुतकद्दिमीन पर पोशीदा रह गया। जिस को हक तआला ने ओलमा मुताख्खिरीन पर मुनकशिफ फरमाया। और अल्लाह तआला जिस को चाहता है अपने फज्ल से अपनी रहमत के साथ ख़ास फमा लेता है। और शैख जलालुद्दीन सुयूती रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस मसले में चन्द रसाएल तस्नीफ किये हैं और इस मसले को दलीलों से साबित किया है और मुखालिफीन के शुब्हात का जवाब दिया है।

(अशअतुल लम्आत जि. अव्वल.स.१८) इसी तरह ख़ातिमुल मुफस्सिरीन हज़रते शैख़ इस्माईल हक्की रहमतुल्लाह का बयान है कि इमाम कुरतबी ने अपनी किताब “तज्किरा” में तहरीर फ़रमाया कि हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा ने फरमाया कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब “हज्जतुल विदाअ में हम लोगों को साथ लेकर चले। और “हजून” की घाटी पर गुज़रे । तो रंज- गम में डूबे हुए रोने लगे। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को रोता देखकर

मैं भी रोने लगी। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी ऊँटनी से उतर पड़े और कुछ देर के बाद मेरे पास वापस तशरीफ लाए। तो खुश खुश मुस्कुराते हुए तशरीफ लाए। मैं ने दर्याफ्त किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! आप पर मेरे माँ बाप कुर्बान हों, क्या बात है? कि आप रंज- गम में डूबे हुए ऊँटनी से उतरे। और वापस लौटे तो शादाँ फरहाँ मुस्कुराते हुए तशरीफ फरमा हुए तो हुजूर ने इर्शाद फ़रमाया कि मैं अपनी वालिदा हज़रते आमिना की कब्र की जियारत के लिए गया था। और मैं ने अल्लाह तआला से सवाल किया कि वो उन को ज़िन्दा फरमा दे। तो खुदावंद तआला ने उन को ज़िन्दा फरमा दिया और वो ईमान लाईं।

और “अलअशबाह वल नज़ाएर में है कि हर वो शख्स जो कुफ्र की हालत में मर गया हो उस पर लअनत करना जाएज है। बजुज रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदैन के। क्योंकि इस बात का सुबूत मौजूद है कि अल्लाह तआला ने इन दोनों को ज़िन्दा फरमाया। और ये दोनों ईमान लाए।

और ये भी जिक्र किया गया है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने माँ बाप की कब्रों के पास रोए। और एक खुश्क दरख्त जमीन में बो दिया। और फरमाया कि अगर ये दरख्त हरा हो गया तो ये इस बात की अलामत होगी कि इन दोनों का ईमान लाना मुमकिन है। चुनान्चे वो दरख्त हरा हो गया। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दुआ की बरकत से वो दोनों अपनी अपनी कब्रों से निकल कर इस्लाम लाए। और फिर अपनी अपनी कब्रों में तशरीफ ले गए।

और इन दोनों का जिन्दा होना, और ईमान लाना अकलन मुहाल है न शरअन । क्योंकि कुरआन शरीफ से साबित है कि बनी इसराईल के मकतूल ने ज़िन्दा हो कर अपने कातिल का नाम बताया। इसी तरह हज़रत ईसा.अलैहिस्सलाम के दस्ते मुबारकं से

हुजूर

भी चन्द मुर्दे जिन्दा हुए। जब ये सब बातें साबित हैं। तो सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विलिदैन के जिन्दा हो कर ईमान लाने में भला कौन सी चीन मानेअ हो सकती है? और जिस हदीस में आया है कि “मैं ने अपनी वालिदा के लिए दुआए मगफिरत की इजाजत तलब की तो मुझे इस की इजाजत नहीं दी गई” ये हदीस हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदैन का जिन्दा होकर ईमान लाना ये “हज्जतुल विदा मौकअ पर हुआ है। (जो हुजूर के विसाल से चन्द ही माह पहले का वाकिआ है।) और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मरातिब व दरजात हमेशा बढ़ते ही रहे तो हो सकता है कि पहले

हुजूर को खुदावंद तआला ने ये शरफ नहीं अता फरमाया था कि आप के वालिदैन मुसलमान हों। मगर बाद में इस फज्लशरफ से भी आप को सरफ़राज़ फ़रमा दिया कि आप के वालिदैन को साहिबे ईमान बना दिया। और काजी इमाम अबू बकर इनुल अरबी मालिकी से ये सवाल किया गया कि एक शख्स ये कहता है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के आबा व अजदाद जहन्नम में हैं तो आप ने फरमाया कि ये शख़्स मलऊन है। क्योंकि अल्लाह तआला ने कुरआन में इर्शाद फ़रमाया है कि

(अहजाब) (यानी जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को ईज़ा देते हैं। अल्लाह तआला उनको दुनिया व आख़िरत में मलऊन कर देगा।) हाफिज शम्सुद्दीन दमिश्की अलैहिर्रहमा इस मसले को अपने नअतिया अशआर में इस तरह बयान फ़रमाया है

(अल्लाह तआला ने नबी को फज्ल बालाए फज्ल से भी बढ़ कर फजीलत अता फरमाई और अल्लाह तआला उन पर बहुत मेहरबान है।)

(क्योंकि खुदावंदे तआला ने हुजूर के माँ बाप को हुजूर पर ईमान लाने के लिए अपने फज्ले लतीफ से ज़िन्दा फरमा दिया।)

(तो तुम इस बात कोमान लो । क्योंकि खुदावंद कदीम बस बात पर कादिर है अगरचे ये हदीस जईफ है।)

(तफ़सीरे रूहुल बयान जि.१ स. २१७ ता २१८) साहिबुल अकलील हज़रते अल्लामा शैख़ अब्दुल हक मुहाजिर मदनी कुदुस सिर्रहुल अज़ीज़ ने तहरीर फ़रमाया कि

अल्लामा इब्ने हजर हतीमी ने मिश्कात की शरह में फरमाया है कि “हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिदैन को अल्लाह तआला ने ज़िन्दा फरमाया। यहाँ तक कि वो दोनों ईमान लाए और फिर वफ़ात पा गए। ये हदीस सही है। और जिन मुहद्दिसीन ने इस हदीस को सही बताया है उन में से इमाम कुरतुबी और शाम के हाफिजुल हदीस इब्ने नासिरुद्दीन भी हैं और इस में तअन करना बे महल और बेजा है। क्योंकि करामात और खुसुसियात की शान ही ये है किवो कवाइद और आदात के ख़िलाफ़ हुआ करती हैं। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म के वालिदैन का मौत के बाद उठकर ईमान लाना। ये

ईमान उन के लिए नाफेअ है। हालाँकि दूसरों के लिए ये ईमान मुफीद नहीं। इस की वजह ये है कि हुजूर के वालिदैन को निस्बते रसूल की वजह से जो कमाल हासिल है। वो दूसरों के लिए नहीं है और हुजूर की हदीस ” (काश मुझे खबर होती कि मेरे वालिदैन के साथ क्या मुआमला कियागया।) के बारेमें इमाम सुयूती ने “दुरे मनसूर” में फरमाया कि ये हंदीस मुरसल और ज़ईफुल असनाद है।

(अकलील अला मदारिकुल तन्जील जि.२ स.१०) बहर कैफ मुन्दर्जा बाला इक्तिबासात जो मुअतबर किताबों से लिए गए हैं उन को पढ़ लेने के बाद । हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म के साथ वालिहाना अकीदत और ईमानी महब्बत का यही तकाज़ा है कि हुजूर के वालिदैन और तमाम आबा व अजदाद, बल्कि तमाम रिश्तेदारों के साथ अदब व एहतराम रखा जाए। बजुज़ इन रिश्तेदारों के जिन का काफ़िर और जहन्नमी होना कुरआन व हदीस से यक़ीनी तौर पर साबित है जैसे “अबू लहब” और उस की बीवी “हम्मा लतुल हतब” बाकी तमाम कराबत वालों का अदब मलहूज़ रखना लाज़िम है क्योंकि जिन लोगों को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म से निस्बते कराबत हासिल है उनकी बे अदबी व गुस्ताखी यकीनन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म की ईजा रिसानी का बाइस होगा। और आप कुरआन का फरमान पढ़ चुके कि जो लोग अल्लाह और उस के रसूल

को ईजा देते हैं। वो दुनिया व आखिरत में मलकन हैं! इस मसाले में अअला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खाँ साहिब किबला बरेलवी रहमतुल्लह अलैहि का एक मुहक्किाकाना रिसाला भी है जिस का नाम “शमूलुल इस्लाम लिआबाहुल किराम” है जिसमें आप ने निहायत ही मुफस्सल व मुदल्लल तौर पर ये तहरीर फरमाया है कि हुजूरम के आबा व अजदाद मुवहद व मुस्लिम हैं। (वल्लाहु तआला अअलम)

बरकाते नुबूव्वत का ज़हूर

जिस तरह सूरज निकलने से पहले सितारों की रुपोशी, सुबह सादिक की सफेदी, शफक की सुर्सी सूरज निकलने कीखुशखबरी देने लगती है। इसी तरह जब आफ्ताबे रिसालत के तुलूअ का ज़माना करीब आ गया। तो अतराफे आलम में बहुत से ऐसे अजीब वाकिआत और ख़वारिके आदात बतौरे अलामात के ज़ाहिर होने लगे। जो सारी काएनात को झंझोड़ झंझोड़कर ये बिशारत देने लगे कि अब रिसालत का आफ्ताब अपनी पूरी आब व ताब के साथ तुलूअ होने वाला है।

चुनान्चे असहाबे फील की हलाकत का वाकिआ। नागहाँ बाराने रहमत से सर ज़मीने अरब का सर सब्ज़ व शादाब हो जाना। और बरसों की खुश्क साली दफ़अ हो कर पूरे मुल्क में खुश हाली का दौर दौरा हो जाना। बुतों का मुँह के बल गिर पड़ना। फ़ारस के मजूसियों की एक हज़ार साल से जलाई हुई आग का एक लम्हा में बुझ जाना। किसरा के महल का ज़लज़ला। और उस के चौदह कंगूरों का मुन्हदम हो जाना। हमदान और “कुम’ के दर्मियान छ: मील लम्बे और छ: मील चौड़े “बुहैरए सावह’ का यकायक बिल्कुल खुश्क हो जाना। शाम और कूफा के दर्मियान वादी “समावा की खुश्क नदी का अचानक जारी हो जाना। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वालिदा के बदन से एक ऐसे नूर का निकलना जिस से ‘बुसरा के महल रौशन हो गए। ये सब वाकिआत इसी सिलसिले की कड़याँ हैं जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तशरीफ आवरी से पहले ही “मुबश्शिरात’ बनकर आलमे काएनात को ये खुशखबरी देने लगे कि

मुबारक हो वो शह पर्दे से बाहर आने वाला है गदाई को ज़माना जिस के दर पर आने वाला हैi

हजरात अंबियाए किराम अलैहिमुस्सलाम से कल एअलाने नुबूव्वत जो खिलाफ आदत और अक्ल को हैरत में डालने वाले वाकिआत सादिर होते हैं उन को शरीअत की इस्तिलाह में “इरहास’ कहते हैं। और एअलाने नुबूव्वत के बाद इन्ही को “मुअजिजा’ कहा जाता है। इस लिए मजकूरा बाला तमाम वाकिआत “इरहास हैं जो हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के एअलाने नुबूव्वत करने के कब्ल ज़ाहिर हुए। जिन को हम ने “बरकाते नुबूव्वत’ के उनवान से बयान किया है। इस किस्म के वाकिआत जो ‘इरहास’ कहलाते हैं। इनकी तअदाद बहुत ज्यादा है। उनमें से चन्द का ज़िक्र हो चुका है चन्द दूसरे वाकिआत भी पढ़ लीजिए! (१) मुहद्दिस अबू नईम ने अपनी किताब “दलाएलुन नुबूब्बत में हज़रते अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा की रिवायत से ये हदीस बयान की है कि जिस रात हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नूरे नुबूब्बत हज़रते अब्दुल्लाह की पुश्ते अकदस से हज़रते आमिना के बतने मुकद्दस में मुन्तकिल हुआ। रुए जमीन के तमाम चौपायों, खुसूसन कुरैश के जानवरों को अल्लाह तआला ने गोयाई अता फरमाई। और उन्होंने ब-जुबान फ़सीह एअलान किया कि आज अल्लाह का वो मुकद्दस रसूल शिकमे मादर में जलवागर हो गया। जिस के सर पर तमाम दुनिया की इमामत का ताज है। और जो सारे आलम को रौशन करने वाला चराग’ है। मशरिक़ के जानवरों ने मगरिब के जानवरों को बिशारत दी।

इसी तरह समुन्दरों और दरयाओं के जानवरों ने एक दूसरे को ये खुशखबरी सुनाई कि हज़रते अबुल कासिम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते बा-सआदत का वक्त करीब आ गया।

(जुकौनी अलल मवाहिब जि.१ सफा १०८) (२) खतीबे बगदादी ने अपनी सनद के साथ ये हदीस रिवायत

की है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वालिदा माजिदा हज़रत बीबी आमिना ने फरमाया कि जब हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पैदा हुए। तो मैंने देखा कि एक बहुत बड़ी आई जिस में रौशनी के साथ घोड़ों के हिनहिनाने, और परिन्दों के उड़ने की आवाज़ थी। और कुछ इन्सानों की बोलियाँ भी सुनाई देती थीं। फिर एक दम हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरे सामने से गाएब हो गए और मैंने सुना कि एक एअलान करने वाला एअलान कर रहा है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मशरिक व मगरिब में गश्त कराओ और उनको समुन्दरों की भी सैर कराओ ताकि तमाम काएनात को इनका नाम, इनका हुलया, इनकी सिफ़त मालूम हो जाए। और इनको तमाम जानदार मख्लूक यानी जिन्न- इन्स, मलाइका और चरिन्दों व परिन्दों के सामने पेश करो। और इन्हें हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की सूरत, हज़रत शीस अलैहिस्सलाम की मरिफ़त, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की शुजाअत, हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की खुल्लत, हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की ज़बान, हज़रंत इस्हाक अलैहिस्सलाम की रज़ा, हज़रते सालेह अलैहिस्सलाम की फ़साहत, हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की हिकमत, हज़रत यअकूब अलैहिस्सलाम की बिशारत, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की शिद्दत, हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का सब्र हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की ताअत, हज़रत यूशअ अलैहिस्सलाम का जिहाद, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की आवाज़, हज़रत दानियाल अलैहिस्सलाम की महब्बत, हज़रत इलयास अलैहिस्सलाम का वकार, हज़रत यहया अलैहिस्सलाम की इस्मत, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का जुहद अता करके इनको तमाम पैगम्बरों के कमालात और अख्लाके हसना से मुज़य्यन कर दो इस के बाद वो बादल छट गया फिर मैंने देखा आप रेशम के सब्ज़ कपड़े में लिपटे

हैं। और उस कपड़े से पानी टपक रहा है। और कोई मुनादी

एलान कर रहा है कि वाह वाह! क्या खूब मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तमाम दुनिया पर कब्ज़ा दे दिया के कब्जए इक्तिदार व गलबए इताअत में न हो। अब.मैने चेहए

। खुश्बू आ रही थी। फिर तीन शख्स गया। और काएनाते आलम की कोई चीज़ बाकी न रही जो न अनवर को देखा तो चौदहवीं के चाँद की तरह चमक रहा था और नजर आए। एक के हाथ में चाँदी का लोटा, दूसरे के हाथ में सब्ज जमुर्रद का तश्त, तीसरे के हाथ में एक चमकदार अंगूठी थी। अंगूठी को सात मर्तबा धोकर उस ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दोनों शानों के दर्मियान मुहरे नुबूव्वत लगादी। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को रेशमी कपड़े में लपेट कर उठाया और एक लम्हा के बाद मुझे सिपुर्द कर दिया।

(जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ सफा ११३ ता ११)