Brief Chapter on Life of Imam Hasan AlahisSalam part3

During the reign of Hazrat Uthman Radiallahu anhoo

During the Caliphate of Hazrat Uthman Radiallahu anhoo both Hazrat Hasan AlahisSalam and Hazrat Husain AlaihisSalam were completely mature. Now, both these gentries also started participating in the crusades. Hence during Hijri 30, they took part in the movement of Tabaristan.

When Hazrat Uthman Radiallahu anhoo was encircled by the rebels, Hazrat Ali AlaihisSalam sent Hazrat Hasnain AlahisSalam to protect Amir-ul-Mominin. Both these princes kept standing on the gates and prevented the rebels from entering inside. Nobody could enter from the gate where both these noble and loved children of Huzur best to were standing. All the rebels failed. From the other side, two wicked persons pushed in and killed Amir-ul-Mominin. Had the children of Bani Umaiyya been guarding on all the sides of the house like Hazrat Hasnain AlahisSalam, the rebels could not have succeeded.

During the battle of Jamal

During the battle of Jamal, Saiyedna Imam Hasan AlahisSalam rendered a great service to, the religion and human community along with the protection to the Caliphate. He went to Kufa with Hazrat Ammar-bin-Yasir Radiallahu anhoo and delivered a very effective speech in the mosque (Jama-i-Masjid) against the mutiny. Hazrat Ammar-bin-Yasir Radiallahu anhoo also made an impressive speech. Both these speeches inspired people to cooperate Amir-ul-Mominin. The statements they made during their speeches were very much appealing and effective. They said,

“O’ people, worship Allah, the Almighty, respect Hazrat Rasulallah ﷺ and Amir-ul-Mominin. O’ people, Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha is a holy wife of Hazrat Rasulallah ﷺ. But in this respect, Allah, the Almighty wishes to test your faith. Allah wants to see whether you respect Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha or Allah.”

In short, the addresses made by Saiyedna Hazrat Imam Hasan AlahisSalam and Hazrat Ammar-bin-Yasir Radiallahu anhoo were so much powerful and effective that an army of ten thousand people came and stood shoulder to shoulder for the support of these gentries. These brave people, at once, joined the holy army of Hazrat Amir-ul-Mominin AlaihisSalam

During the battle of Jamal, Saiyedna Hazrat Imam Hasan AlahisSalam was the commander-in-chief of the right-wing and Saiyedna Hazrat Imam Husain AlaihisSalam of the left-wing, of Haidari Army.

During the battle of Siffin

Here also he exhibited his spirit of bravery. There was his signature as a witness on the treaty, which was signed after the battle of Siffin.

मलिकुल-अफजल नूरुद्दीन

मलिकुल-अफजल नूरुद्दीन –

– सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी का बड़ा बेटा वली-ए-अहद शहज़ादा मलिकुल-अफ़ज़ल नूरुद्दीन भी सुलतानी सिपाह का एक अहम रुकन था।
तारीख में आता है कि सुलतान के 17 बेटे उनके शाना बशाना मैदान-ए-जिहाद में मौजूद होते थे। मलिकुल-अफ़ज़ल उन सबमें बड़े और सुलतान के नूर-ए-नज़र और काबल-ए-एतिमाद जरनेल थे।
जिन दिनों सलाहुद्दीन अय्यूबी ने बुकास का मुहासिरा किया हुआ ने था मलिकुल-अफ़ज़ल शिमाली साहिल के अहमतरीन किले बुरजिया
में जंग में मसरूफ़ थे। शाहे बुरज़िया, शाहे अनताकिया बोहमन्द का हम जुल्फ़ था। अन्ताकिया की मलिका और बुरज़िया की मलिका दोनों सगी बहनें थीं। अरबों के हमले के डर से बुरज़िया की हिफ़ाज़त का खास इन्तिज़ाम किया गया था।
बुरज़िया भी सहयून की तरह पहाड़ की बुलन्दी पर तामीर हुआ था। एक रिवायत के मुताबिक़ उसकी बुलन्दी 575 हाथ थी और अमूदी चट्टान की तरह जमीन की छाती में गिरा हुआ था। बुरज़िया और हिसने रिफ़ामिया के दरमियान एक गहरी झील थी। दरिया-ए-आस और इर्द-गिर्द के नदी-नाले और चश्मे इसी झील में गिरते थे।
इब्ने असीर के मुताबिक़ बुरज़िया के लोग इस्लाम दुश्मनी में दूर दूर तक मशहूर थे। वे क़िले से निकलकर शाम के इस्लामी इलाकों में घुस जाते, बस्तियों को ताख़्त व ताराज करते, घरों को लूटते और आग के हवाले कर देते। मर्दो, औरतों और बच्चों का बेदरीग कत्ले आम करते और कभी-कभी उन्हें जन्जीरों में जकड़ कर ले जाते थे। मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान या तो अहले बुरज़िया ने पहुंचाया या फ़िर जुनूबो साहिल पर रेजनाल्ड वाली-ए-कर्क ने, जिसे सुलतान अपने हाथ से क़त्ल कर चुके थे।
जूही मलिकुल-अफ़ज़ल अपने वालिद से मिलने के लिए शिमाली साहिल की तरफ़ बढ़े, लोगों ने बुरज़िया की तरफ़ शहज़ादे को मुतवज्जह किया। सुलतान के जवान मर्द बेटे ने इस किले का मुहासिरा कर लिया जो इन्तिहाई मुश्किल नज़र आता था। –
सुलतान को बुकास में बुरजिया के मुहासिरे की इत्तिला मिली। वह बुकास की फ़तह के बाद फ़ौरन छावनी उठाकर बुरजिया की
– तरफ रवाना हुए और इन्तिहाई तेज़ पेशक़दमी करके शहज़ादे मलिकुल अफ़ज़ल के लशकर के साथ मिल गए। फ़ौज को तीन हिस्सों में तशकील दिया। बुरज़िया पर हमला कर दिया और बिलआख़िर जान तोड़ हमलों और पित्ते-पानी कर देने वाली यलगार ने ईसाइयों को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। 22 जुमादा उल सानी, 584 हिजरी को बुरज़िया फ़तह हो गया। शहज़ादा मलिकुल-अफ़ज़ल की बुलन्द हिम्मती और हौसलों की बदौलत सुलतान को यह कामयाबी मिली। बुरज़िया की फ़तह 1188 ई. के जिहाद की सबसे बड़ी कामयाबी थी जिसने शाह-ए-अनताकिया को भी खौफ़ज़दा कर दिया।
वली-ए-अहद मलिकुल-अफ़ज़ल सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी के होनहार फ़रज़न्द, आलमे इस्लाम का वह कीमती हीरा जो सलाहुद्दीन अय्यूबी के ख़ज़ाने में जगमगाता नज़र आता है। ऐसे ही हीरों की मौजूदगी में सुलतान आलम-ए-इस्लाम का हीरो बनकर उभरता है और तारीख़-ए-इस्लाम में रहती दुनिया तक के लिए ज़िन्दा व जावेद हो जाता है। –
अक्का के साहिल पर जब यूरोप से सलीबी रजाकारों के काफ़िले जमा हो रहे थे तो सुलतान बड़े फ़िक्रमन्द थे। दुश्मन की तादाद बढ़ती जा रही थी। ऐसे में सुलतान ने मुसलमानों की धाक बिठाने और दुश्मन को मरऊब (खौफ़ज़दा) करने के लिए हमला करने का सोचा। उन्होंने फ़ौज को दो हिस्सों में तक़सीम किया। एक की क़ियादत मलिकुल-अफ़ज़ल कर रहा था। सबसे पहले मलिकुल-अफ़ज़ल अपने लशकर को लेकर दुश्मन पर टूट पड़ा और देर तक मैदाने कारजार (जंग का मैदान) गरम रहा। सलीबी बहादुरों ने भी खूब दादे शुजाअत दी। मालुम होता था वे सीसा पिलाई हुई दीवार बन गए हैं और अरबों को शहर की तरफ़ जाने का रास्ता नहीं देंगे।
शहज़ादा मलिकुल-अफ़ज़ल ने उस रोज़ गैर मामूली बहादुरी दिखाई और सलीबी लशकरों को रोका जो आगे बढ़कर इस्लामी छावनी को तबाह कर देना चाहते थे। फिर मलिकुल-अफ़ज़ल ने दिफ़ाई हैसियत को छोड़कर अपने बहादुरों को हमले का हुक्म दिया। यह हमला इस क़दर शदीद था कि दुशमन के छक्के छूट गए। दुशमन हज़ारों लोशें छोड़कर मैदान से फरार हो गया। मलिकुल-अफ़ज़ल एक कामयाब सिपहसालार था जो सुलतान की फ़ौजों को कामयाबी से लड़ाता। यही वजह थी कि सुलतान अपने बेटों पर बेइन्तिहा भरोसा करते थे और फ़ख़र भी। यही वजह है कि आज भी सुलतान के साथ उनका नाम ज़िन्दा है।

खुशनसीब काफिला

खुशनसीब काफिला

हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को उनके भाईयों ने जंगल के एक तारीक कुएं में फेंक दिया। यह समझकर कि हमने यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को मार डाला है, वापस चले गये। मगर अल्लाह तआला ने हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को कुएं में महफूज़ रखा। तीन दिन तक आप इस कुएं में रहे। यह कुंआ जंगल में आबादी से बहुत दूर था। इसका पानी बेहद खारी था। मगर यूसुफ अलैहिस्सलाम की बर्कत से इसका पानी मीठा हो गया। एक दिन वहां से एक काफिला गुज़रा। यह काफिला मदयन से मिस्र की तरफ जा रहा था। यह काफ़िले वाले इस कुएं के करीब उतरे तो उन्होंने इस कुएं पर एक आदमी भेजा ताकि वह इससे पानी खींच कर लाये। उसने कुंए में अपना डोल डाला तो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने वह डोल पकड़ लिया। उसमें लटक गये। डोल वाले ने डोल खींचा तो यूसुफ़ अलैहिस्सलाम बाहर तशरीफ़ ले आये। उस शख्स ने आपका जो हुस्न व जमाल देखा तो निहायत खुशी में आकर अपने साथियों को मज़दा सुनाया कि यह देखो कुएं से एक खूबसूरत लड़का निकला है। हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के भाई जो जंगल में अपनी बकरियां चराते थे वह देखभाल रखते थे। आज जो उन्होंने यूसुफ अलैहिस्सलाम को कुएं में न देखा तो उन्हें तलाश हुई और काफिले में पहुंचे। वहां उन्होंने यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को देखा तो सालारे काफिला से कहा कि यह गुलाम है हमारे पास से भाग आया है। किसी काम का नहीं। नाफमान है। अगर खरीदो तो हम इसे सस्ता बेच देंगे फिर इसे कहीं इतनी दूर ले जाना कि इसकी खबर भी हमारे सुनने में न आये। यूसुफ अलैहिस्सलाम इनके खौफ से खामोश रहे। फिर आपके भाईयों ने आपको काफिले वालों के हाथ चंद खोटे दामों में बेच दिया और काफिले वाले आपको खरीदकर अपने साथ मिस्र ले गये। न

(कुरआन करीम पारा १२, रुकू १२, खज़ाइनुल इरफान सफा ३३७) सबक़ : जिसे अल्लाह रखे उसे कौन चखे। ज़माना लाख बुरा चाहे मगर वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है। यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह वालों की बर्कत से खारा पानी भी मीठा हो जाता है।

SHABE MERAJ AUR AZMAT E MAULA ALI AlahisSalam.



👉🏻Hazrat abul hamr razi allah anh r.z (jo Rasool Allah ﷺ ky khadim the) in se jalilul qadar tabai hazrat saeed bin jubair r.z ne ye hadis li..
🌹RASOOL ALLAH ﷺ ne farmaya ky *MERAJ KI RAAT MAI NE ARSH PE YE LIKHA HOA DEKHA*
لا الہ الہ اللہ محمد رسول اللہ ایدته بعلي و نصرته
👉🏻Allah k siwa koi mabud nahi Mohammed allah ky rasool hai or MAI (ALLAH) NE ALI KY ZARIYE RASOOL ALLAH KI TAID WO NUSRAT FARMAI…

👉🏻 *YEHI HADIS MUKHTALIF HALAAT K SATH BAYAN KRNE WALE SAHABA*
hazrat anas bin malik, hazrat abu huraira r.z, or hazrat jabir bin abdullah r.z, hazrat Abdullah ibn abbas r.z… ye hadis 5/3 alag alag sanad se kitabo me aai hoi hai..

👉🏻Ref:-
👉🏻mojam al kabir tabrani hadis no 526 …
al mutwafa 360 hijri
👉🏻ibn asakir tarikh damishq hadis no 911
👉🏻aldurul mansor 2/199
etc etc