Hayat‐e‐Waris:Jouney’s of Alampannah Hazrat Waris Pak Rehmatullahi Alaihi Agra

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AGRA 
Later on our Saint went to Agra. Hafiz Gulab Shah Sahib Warisi a resident of Agra residing at 
Katra  Madar  Khan  Mohalla  related  a  strange  incident  of  his  becoming  our  Saint’s  disciple. 
During his school days his classmate became a disciple of some dervish and urged him follow 
in his footsteps. He rather hesitated and his friend urged him repeatedly to become the disciple 
of his murshid. While sleeping he saw in his dream an elderly person of benign countenance 
telling him  that his desire  to become a disciple would be  fulfilled, but asked him  to await his 
spiritual guide from the west. 
Hafiz  Gulab  Shah  continued,  “I  became  restless  and was  anxious to  see  the  venerable  face.  I 
saw him in my dream and  felt a kind of relief. After  three years  the same  face appeared in a 
dream and said that my spiritual guide has arrived and asked me to meet him in the Sarai (rest 
house) to enroll myself as his disciple. Hearing the glad tidings I opened my eyes in a state of 
frenzy and anxiety, wending my steps in the short hour of the morning, I reached the Sarai and 
enquired  from  the watchman about  the arrival  of  our Saint. Without  replying he  opened  the 
door and told me to find him myself. I inspected every room and could not find him. Suddenly 
from a different room I heard a voice saying, “Gulab Shah, you have come after all. I am here.” 
When I peered into the room I was stunned to see a noble youth of angelic face sitting on bare 
ground in deep contemplation. I ran, fell on his feet and with folded hands pleaded, “Oh Leader 
of mankind and Guide of the world, help a sinner and vagabond like myself deviating from the 
right  path  by  taking me in  your  fold as  your  slave.  In  reply  the Saint  said,  “You are with me 
from the dawn of the world and if such in your desire take the oath of allegiance on my hand.” 
After the oath of allegiance I heard our Saint remark about the transient worldly life advising 
to adhere to path of rectitude and concluded saying, “God willing we’ll meet again.” I humbly 
pleaded that it is not proper for such an eminent person to stay in an ordinary rest house and 
accompanied me. His only luggage was a solitary blanket which I carried on my head. 
The  public  of  Agra  learning  of  his  stay  with  me  came  in  large  numbers  and  became  his 
disciples. 
One day in the late afternoon our Saint expressed his desire for a kite flying session. Some time 
elapsed in securing it and in the night it was flown quite unsuccessfully. Artlessly smiling our Saint said that the kite has disappointed us and is not in mood to reach higher altitude. But it 
was a marvel what effect it had on others. Meanwhile Mir Altaf Ali still a young man later on a 
Hakim of celebrated fame came to our Saint accompanied by his father and became a disciple, 
Addressing them to lead a life of purity invoking Divine blessing. 
Khalipha  Maulvi  Bakhshi  Sahib  of  Agra  recounts  his  experience  thus,  “One  day  I  noticed  an 
unusual  crowd  in  the  house  of  Hafiz  Gulab  Shah  Sahib  and  imagining  it  to  be  some  bridal 
occasion  went  to  see  it.  On  entering  the  house  I  was  stunned  to  see  a  noble  youth  seated 
dressed in simple clothes. His dignified face suffused with “Inner Truth” looked a personality of 
awe  and  respect.  When  I  greeted  him  he  returned  it  in  a  jovial  mood  and  asked  me  close 
questioning  where  I  had  been  since  the  past  two  days.  I  replied  that  I  was  unlucky  to  have 
wasted two precious days and promised  to be at his service day and night.  In the evening he 
asked me to take my leave but I declined to lose his company and accompanied him as far as 
Kutghar where he advised me to go  to  the  tomb of Shah Vilayat Sahib and distribute  the rest 
among the poor and deserving. Saying this Sarkar Waris proceeded to Fatehpur Sikri.  
For thirteen years Khalipha Maulvi Bakhshi Warisi spent his life as a sweeper of Hazrat Shah 
Vilayat Sahib’s tomb. When our Saint returned from Mecca from his third journey he reached 
Agra  and  thus  the  object  and  aim  of  Khalipha  Maulvi  Bakhshi  Warisi  was  fulfilled.  By  Our 
Saint’s command he came to Deva Shareef on foot and remained there permanently in a room 
at the sacred shrine and left this world permanently in 1311 Hijrah.

HARDADAL 
The  next journey  of  Saint Waris‐e‐Pak was  towards Hardadal  from  Fatehpur  Sikri where  he 
remained  the guest of Thakur Panjam Singh Warisi. Some of his Rajput  friends came  to meet 
our Saint. During  the conversation  there was a  reference about Bharatpur and its subsidiary 
states  and  our  Saint  praised  the  benevolent  and  generous  attitude  of  the  chief  of  Hardadal 
towards the poor and needy. 

Zikr e Hazrat Waris Pak Rehmatullahi Alaihi part 2

Hazrat khawaja gareeb nawaj ke jis ruhni salatanat ki buniyad war sageer hind Pakistan wa bangaladesh me dali. Is saltanat aaj bhi suraj gurab nahi hota hai .

Hazrat khawaja gareeb nawaaj se jo roshni feli wah ab tak tab wa darkhshahh hai . iske asraat numaaya hai.

Hazrat khwaja gareeb nawaj ke sajjadah nasheen qutub la kataab hazrat khwaja qutubddin bakhtiyar kaki rahmatullahi ne dahli ko apni rashad wa hidayat ka markas banaya . qutub alqutab ke sajjada nasheen hazrat baba fareeduddin mas’ood ganj shakr rehmatullahi alaihi ajudahan me rehkar taaleem wa talkeen farmayi..

Hazrat baba fareed ganj shakr ke 2 mumtaj khulfaye yaani khawaja nizamuddin auliya aur hazrat Alauddin Ali ahmed sabir kaliyar sharif se 2 silsile jari hue.

Jo silsila hazrat nizamuddin auliya rehmatullahi se chala woh nizami kehlata hai, jo alauddin ali ahmed sabir rehmatullahi alahi se chala woh sabri kehlata hai aur silsile wajood me aaye jo dar asal silsila e chishtiya ki 1 shaakh hai in silsilo me silsila kalmiya silsila farookiya silsila warsiya silsilal guddishahi khaas tour par qaabil zikr hai. Chunki silsila warsiya aur silasila guddishah 2 bade mumtaz silsila yaani qadriya or chistiya 1 shaakh hai ..

कौन है इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम ।

*🔮इमाम जाफर सादिक रजि अल्लाह अन्हु🔮*
💝💖💝💖💝💖💝💖

*🟢महान वैज्ञानिक🟢*

*🔴इमाम जाफर सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने 1400 साल पहले ही बता दिया था कि धरती चौकोर नहीं बल्कि गोल है, और अपनी धुरी पर घूमती है।*
*🔵जिनकी याद में रजब माह में कुंडों की नज़र नियाज़ अपने घरों में दिलाते है, उनमें से बहुत लोग नहीं जानते कि वह दुनिया के पहले ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने 1400 साल पहले ही ब्रह्माण्ड के बारे में ऐसी बातें बताई जो बहुत बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने बहुत खोज करके सही सिद्ध कर दी, उन्होंने लगभग 1400 साल पहले ही बता दिया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और चौकोर नहीं गोल है। जिसे बाद में गैलेलीयो ने सही सिद्ध किया।*
*🔴ज़ाफ़र अल सादिक़ रजि अल्लाह अन्हु (जन्म 20 अप्रैल 700) हज़रत अली रजि अल्लाह अन्हु की चौथी पीढी में थे। उनके पिता इमाम मोहम्मद बाक़र रजि अल्लाह अन्हु एक वैज्ञानिक थे, और मदीना शरीफ में पढ़ाया करते थे। आपके दादा हज़रत जैनुल आबदीन रजि अल्लाह अन्हु थे।*

*🏟️🔮परिचय🔮🏟️*

*🟣इमाम जाफ़र सादिक़ रजि अल्लाह अन्हु का मुख़्तसर तआर्रूफ़*…..

*🌺आप एक वैज्ञानिक, चिन्तक और दार्शनिक थे*,
*🌺आप आधुनिक केमिस्ट्री के पिता जाबिर इब्ने हय्यान (गेबर) के उस्ताद थे*
*🌺आप अरेबिक विज्ञान के स्वर्ण युग के आरंभकर्ता थे*
*🌺आप ने विज्ञान की बहुत सी शाखाओं की बुनियाद रखी*.
*🌺20 अप्रैल 700 में अरेबिक भूमि पर जन्मे उस वैज्ञानिक का नाम था इमाम जाफर अल सादिक रजि अल्लाह अन्हु*।
*🌺इस्लाम की एक शाखा इनके नाम पर जाफरी शाखा कहलाती है जो इन्हें इमाम मानती है*।
*🌺जबकि सूफी शाखा के अनुसार ये वली हैं. इस्लाम की अन्य शाखाएँ भी इनकी अहमियत से इनकार नहीं करतीं*.
*🌺इमाम जाफर अल सादिक रजि अल्लाह अन्हु हज़रत अली रजि अल्लाह अन्हु की चौथी पीढी में थे. आपके पिता इमाम मुहम्मद बाक़र रजि अल्लाह अन्हु स्वयं एक वैज्ञानिक थे और मदीने में अपना कॉलेज चलाते हुए सैंकडों शिष्यों को ज्ञान अर्पण करते थे*.
*🌺अपने पिता के बाद इमाम जाफर अल सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने यह कार्य संभाला और अपने शिष्यों को कुछ ऐसी बातें बताईं जो इससे पहले अन्य किसी ने नहीं बताई थीं*.
*🌺उन्होंने अरस्तू की चार मूल तत्वों की थ्योरी से इनकार किया और कहा कि मुझे आश्चर्य है कि अरस्तू ने कहा कि विश्व में केवल चार तत्व हैं, मिटटी, पानी, आग और हवा. मिटटी स्वयं तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं*.

*🔮इसी तरह जाफर अल सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना. हवा को भी तत्वों का मिश्रण माना और बताया कि इनमें से हर तत्व सांस के लिए ज़रूरी है. मेडिकल साइंस में इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने बताया कि मिटटी में पाए जाने वाले सभी तत्व मानव शरीर में भी होते हैं. इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में, आठ कम मात्रा में और आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं. आधुनिक मेडिकल साइंस इसकी पुष्टि करती है*.

*🔮आपने एक शिष्य को बताया, “जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज़ गतियाँ हो रही हैं.” उसके बाद कहा, “यह पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था में था. आज भी अगर इस पत्थर को बहुत अधिक गर्म किया जाए तो यह द्रव अवस्था में आ जायेगा*.”

*🔮ऑप्टिक्स (Optics) का बुनियादी सिद्धांत ‘प्रकाश जब किसी वस्तु से परिवर्तित होकर आँख तक पहुँचता है तो वह वस्तु दिखाई देती है. इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु का ही बताया हुआ है*.

*🔮एक बार आपने अपने लेक्चर में बताया कि शक्तिशाली प्रकाश भारी वस्तुओं को भी हिला सकता है. लेजर किरणों के आविष्कार के बाद इस कथन की पुष्टि हुई*.

*🔮आपका एक अन्य चमत्कारिक सिद्धांत यह है की हर पदार्थ का एक विपरीत पदार्थ भी ब्रह्माण्ड में मौजूद है. यह आज के Matter-Antimatter थ्योरी की झलक थी. एक थ्योरी इमाम ने बताई कि पृथ्वी अपने अक्ष के परितः चक्कर लगाती है. जिसकी पुष्टि बीसवीं शताब्दी में हो पाई. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है. सब कुछ गतिमान है.*

*🔮ब्रह्माण्ड के बारे में एक रोचक थ्योरी उन्होंने बताई कि ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता. एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है*।.

*🔮कुछ सन्दर्भों के अनुसार इमाम जाफर सादिक रजि अल्लाह अन्हु के शिष्यों की संख्या हजारों थी. दूर दूर से लोग इनके पास ज्ञान हासिल करने के लिए आते थे*.

*🔴आपके प्रमुख शिष्यों में Father of Chemistry जाबिर इब्ने हय्यान, इमाम अबू हनीफ़ा,रहमत उल्लाह अलैहि जिनके नाम पर इस्लाम की हनफी शाखा है, तथा मालिक इब्न अनस रहमत उल्लाह अलैहि (Malik Ibn Anas), मालिकी शाखा के प्रवर्तक, प्रमुख हैं*.

*🔴हज़रत इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु आईम्मा ए अहलेबेत के 12 इमामों मे से छठे इमाम हैं आप की विलादत मदीना मुनव्वरा मे 17 रब्बी उल् अव्वल 83 हिजरी मुताबिक 20 अप्रेल 702 ईसवी बरोज जुमेरात हुई आप के वालिद हज़रत इमाम मोहम्मद बाकर रजि अल्लाह अन्हु और वालदा फरदा बिन्ते कासिम रजि• बिन्ते इब्ने मोहम्मद रजि• बिन हज़रत अबूबक्र सिद्दिक रज़ि अल्लाह अन्हु थीं*!

*🔮आप का इल्म कमालत, माहारत, शर्क से गर्ब तक मशहूर है सब का इत्तेफाक है कि आप के इल्म से तमाम उलेमा तक कासिर थे*।

*🔮सुन्नियों के सब से बड़े इमाम फिकह हज़रत इमाम अबू हनीफा रहमत उल्लाह अलैहि नोमानी रजि• आप के शागिर्द थे और अकीदत भी रखते थे*!

*🔮हज़रत इमाम अबू हनीफा रहमत उल्लाह अलैहि ब गरज हूसूल फैज़ ज़ाहिरी और बातिनी दो साल इमाम ज़ाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु. की खिदमत मे रहे*!

*🔮आपका सुलूक बातिनी इमाम की खिदमत मे ही मुकम्मल हुआ और जब रुख्सत हुए तो हमेशा फरमाते थे अगर दो साल खिदमत के ना मिलते तो नोमान हलाक हो जाता*!

*🔮नक्शबंदी सिलसिले के बड़े बुजूर्ग सुलतान उल अरीफींन हज़रत बायज़िद बिस्तामी रज़ि• अरसे तक सिक्का (पानी भरने वाले ) दरगाह ए ईमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु. रहे हज़रत बायज़िद बिस्तामी रज़ि• का काम और मरतबा आप ही की निगाह ए करम से तकमील को पहूँचा*!

*🔮वह कारमात ओ तसर्रूफात जो आपके आबा ओ अजदाद के वक़्त से परदे मे थे आप से बिला तकल्लुफ़ ज़ाहिर हुए वह अजीब तरीन इल्म जो वारिसतन सरकार ए दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सिना ब सिना चले आ रहे थे आप ने ज़ाहीर किये* !

*🔮”आप फरमाते थे पूछ लो जो कुछ पूछना है हमारे बाद कोई ऐसी बातें बताने वाला नही होगा”*❓

*🔮आप से बहुत सी करामात ज़ाहिर हुईं*!

*🔮एक दिन हज़रत इमाम जाफिर ए सादिक रजि अल्लाह अन्हु एक गली में से गुजर रहे थे देखा एक औरत अपने बाल बच्चों के साथ बेठी रो रही है आप ने उस से दरयाफत किया क्यूँ रो रही हो* ❓

*🔮उसने कहा मेरे पास एक गाय थी जिसके दूध पर मेरा और मेरे बच्चों का गुजारा था अब वोह गाय मर गयी हेरान हूँ क्या करूँ*❓

*🔮इमाम रजि अल्लाह अन्हु ने दुआ की और अपना पांव गाय पर मारा गायी खड़ी हुई और चलने लगी* !

*📝मुख्तसर ज़िक्र किताब “बारह ईमामेंन ए मासुमीन” से लिया गया है*।

*🔵हज़रत इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु इस्लाम के महान धर्माधिकारी हुए हैं. आप पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की छठी पीढ़ी में थे और उमय्यद वंश के अंतिम व अब्बासी दौर के प्रारम्भ में हुए हैं*.

*🔵आपके ज़माने में इस्लाम की खुशबू पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। और यह खुशबू थी इस्लाम के ज्ञान और सच्चाई की। ज्ञान की तलाश में भटकते दूर दराज़ के लोग इस्लामी विद्वानों से आकर मिलते थे और फायदा हासिल करके वापस जाते थे*।

*🔴अब मैं आपको ऐसा ही वाक़िया बताने जा रहा हूं जब एक हिन्दुस्तानी चिकित्सक हज़रत इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु से आकर मिला। वह इमाम को अपना ज्ञान देना चाहता था, लेकिन हुआ इसका उल्टा और वह खुद इमाम से ज्ञान हासिल करके वापस हुआ*।

*🔴यह वाक़िया दर्ज है शेख सुद्दूक (अ.र.) की लिखी ग्यारह सौ साल पुरानी किताब अललश-शरअ में निम्न शीर्षक के अंतर्गत “(भाग 1 बाब 87) वह सबब जिस की बिना पर इंसान में आज़ा व जवारेह पैदा हुए” । उपरोक्त किताब उर्दू में आसानी से उपलब्ध् है और कोई भी इसे हासिल करके तस्दीक कर सकता है। किताब में लिखा पूरा वाकिया मैं हूबहू उतार रहा हूं*।

*🟣एक दिन हज़रत इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु दरबार में तशरीफ लाये। उस वक्त खलीफा मंसूर के पास एक मर्द हिन्दी (हिन्दुस्तानी) चिकित्सा की किताबें पढ़कर मंसूर को सुना रहा था*।

*🟣 इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु खामोश बैठे सुनते रहे। जब वह मर्द ए हिन्दी अपनी बात सुनाकर फारिग हुआ तो इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु से बोला जो कुछ मेरे पास है वह आपको चाहिए*❓

*🟣तो इमाम ने फरमाया नहीं, इसलिये कि तुम्हारे पास जो कुछ है उससे बेहतर हमारे पास खुद मौजूद है*।

*🟣उसने कहा आपके पास क्या है*❓

*🔵इमाम ने फरमाया मैं सर्दी का इलाज गर्मी से करता हूं और गर्मी का सर्दी से। तरी का खुशकी से इलाज करता हूं और खुशकी का तरी से और तमाम फैसले खुदा के हवाले कर देता हूं। रसूल अल्लाह ससल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो कुछ फरमाया है उसपर अमल करता हूं। चुनान्चे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ये फरमाया कि वाजय रहे कि मेदा (पेट) बीमारियों का घर है और बुखार खुद एक दवा है और मैं बदन को उस तरफ पलटाता हूं जिस का वह आदी है*।

*🌸मर्द ए हिन्दी ने कहा कि यही तो तिब (चिकित्सा) है इस के अलावा और क्या है। इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने फरमाया क्या तुम्हारा ये ख्याल है कि मैंने किताबें पढ़कर ये सबक हासिल किया है*❓
*🌸 उस ने कहा जी हाँ*।

*🔮आपने फरमाया नहीं, खुदा की कसम मैंने जो कुछ लिया है सिर्फ अल्लाह से लिया है। अच्छा बताओ मैं इल्म तिब ज्यादा जानता हूं या तुम*❓
*🌸 मर्द ए हिन्दी ने कहा नहीं आप से ज्यादा मैं जानता हूं।*

*🔮 इमाम जाफिर सादिक रजि अल्लाह अन्हु ने फरमाया अच्छा ये दावा है तो मैं तुम से कुछ सवाल करता हूं*❓

*🔮ऐ हिन्दी ये बताओ कि*…❓

*🔮सर में हड्डियों के जोड़ क्यों है*❓

*🔮उसने कहा मैं नहीं जानता।*

*🌸आपने फरमाया और सर के ऊपर बाल क्यों बनाये गये हैं*❓

*🔮उस ने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया और पेशानी (माथे) को बालों से खाली क्यों रखा गया है*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया और पेशानी पर ये खुतूत और लकीरें क्यों हैं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया दोनों भवों को दोनों आँखों के ऊपर क्यों बनाया गया*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸 फरमाया बताओ आँखें बादाम की तरह क्यों बनाई गयीं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया ये नाक दोनों आँखों के दरमियान क्यों बनाई गयी*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸फरमाया नाक के सुराख नीचे क्यों हैं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया होंठ और मूंछें मुंह के ऊपर क्यों बनाई गयीं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम।*

*🌸फरमाया बताओ सामने के दाँत तेज़ क्यों हैं*❓
*🌺दाढ़ के दाँत चौड़े और साइड के लम्बे क्यों हैं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया मर्दों के दाढ़ी क्यों निकलती है*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸फरमाया बताओ नाखूनों और बालों में जान क्यों नहीं होती*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया बताओ इंसान का दिन सुनोबरी शक्ल में क्यों बनाया गया*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸फरमाया बताओ फेफड़ों को दो टुकड़ों में क्यों बनाया गया*❓
*🌺और उसकी हरकत अपनी जगह पर क्यों है*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया बताओ जिगर उभरा हुआ कुबड़े की शक्ल में क्यों है*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸फरमाया बताओ गुरदा लोबिया की दाने की शक्ल में क्यों है*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🌸इमाम ने फरमाया बताओ घुटने पीछे की तरफ क्यों मुड़ते हैं*❓

*🔮उसने कहा मुझे नहीं मालूम*।

*🔴इमाम जाफिर सादिक अलैहिस्सलाम ने फरमाया तुझे नहीं मालूम ये दुरुस्त है लेकिन मुझे मालूम है*।

*🔮अब मर्द हिन्दी ने कहा आप बताईए*❓

*🌸इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि*….

*🔊सर में हड्डियों के जोड़ इसलिए हैं कि ये अन्दर से खोखला है अगर ये बिला जोड़ और बिला फस्ल हों तो बहुत जल्द सर में दर्द होने लगेगा। जोड़ व फस्ल की वजह से सरदर्द दूर रहता है*।

*🔊 सर पर बालों की पैदाइश इसलिए है ताकि उसकी जड़ों के जरिये तेल वगैरा दिमाग तक पहुंचे और उस के किनारों से नुकसानदायक बुखारात निकलते रहें और सर गर्मी व सरदी के असर को दूर रखे*।

*🔊पेशानी (माथे) को बालों से खाली इसलिए रखा गया कि वहाँ से आँखों की तरफ रोशनी की रेजिश होती है*!

*🔊और पेशानी पर खुतूत (लकीरें) इसलिए हैं कि सर से जो पसीना बह कर आँखों की तरफ आये वह इस पर रुका रहे जिस तरह ज़मीन पर नहरें और दरिया जो पानी को फैलने से बचाते हैं*।

*🔊और आँखों पर दोनों भवें इसलिए पैदा की गयीं ताकि आँखों तक ज़रूरत से ज्यादा रोशनी न पहुंचे*।

*🔊ऐ हिन्दी क्या तुम नहीं देखते कि रोशनी तेज़ होती है तो लोग अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं ताकि हद से ज्यादा रोशनी आँखों तक न पहुंचे*।

*🔊 इन दोनों आँखों के दरमियान नाक अल्लाह ने इसलिए रख दी ताकि दोनों के बीच रोशनी बराबर से तक़सीम (वितरित) हो जाये*।

*🔊आँखों को बादाम की शक्ल में इसलिए बनाया ताकि उसमें सुरमे की सलाई दवा के साथ मुनासिब तौर पर चल सके और आँखों का मर्ज दूर हो सके*।

*🔊नाक के सुराख इसलिए नीचे रखे ताकि दिमाग से जो खराब माद्दा निकले वह नीचे गिर जाये और नाक से खुशबू ऊपर जाये। अगर ये सुराख ऊपर होते तो न दिमाग का फासिद माद्दा नीचे गिरता और न किसी शय की खुशबू वगैरा मिलती*।

*🔊और मूंछें व होंठ मुंह के ऊपर इसलिए रखे गये ताकि वह दिमाग से बहते हुए फासिद माद्दे को रोके और मुंह तक न पहुंचे ताकि इंसान के खाने पीने की चीज़ों को गंदा न करे*।

*🔊और मरदों के चेहरे पर दाढ़ी इसलिए ताकि एक नज़र में औरत मर्द की पहचान हो सके। और पता चल जाये कि आँखों के सामने मर्द है या औरत*।

*🔊सामने के दाँतों को तेज़ इसलिए बनाया कि इससे चीज़ों को काटते हैं*।

*🔊 और दाढ़ के दाँत चौकोर इसलिए कि उससे गिज़ा को पीसना है*।

*🔊और किनारे के दाँतों को लम्बा इसलिए रखा ताकि दाढें और सामने के दाँत मज़बूती से जमे रहें। जिस तरह किसी इमारत के सुतून (पिलर) होते हैं*।

*🔊हथेलियों को बालों से अल्लाह ने इसलिए खाली रखा कि इंसान इसी से छूता और मस करता है। अगर इनमें बाल हों तो इंसान को पता न चले कि क्या चीज़ छू रहा है*।

*🔊और बाल व नाखून को जिंदगी से इसलिए खाली रखा कि उनका लम्बा होना गन्दगी का सबब है। उनका तराशना अच्छा है। अगर दोनों में जान होती तो इंसान को उन्हें काटने में तकलीफ होती*।

*🔊और दिल सुनोबर के फल की तरह इसलिए है कि वह सरंगूं रहे और उस का सर पतला रहे, इसलिए कि वह फेफड़ों में दाखिल होकर उससे ठंडक हासिल करे। ताकि उसकी गरमी से दिमाग भुन न जाये*।

*🔊 फेफड़ों को दो टुकड़ों में इसलिए बनाया ताकि उन दोनों के भिंचने और दबाव में वह अन्दर रहे और उन की हरकत से राहत हासिल करे*।

*🔊और जिगर को कुबड़े की शक्ल इसलिए दी ताकि वह मेदे पर वज़न डाले और पूरा उसपर गिर जाये और निचोड़ दे ताकि वह बुखारात वगैरा जो उसमें हैं निकल जायें*।

*🔊और गुरदे को लोबिया के दानों की शक्ल इसलिए दी क्योंकि मनी (वीर्य) का अनज़ाल इसी पर बूंद बूंद होता है। अगर ये चौकोर या गोल होता तो पहला कतरा दूसरे को रोक लेता और उस के निकलने से किसी जानदार को लज्ज़त न महसूस होती। क्योंकि मनी रीढ़ की गिरहों से गुर्दे पर गिरती है जो कपड़े की तरह सिकुड़ता और फैलता रहता है और मनी को एक एक क़तरा करके मसाने की तरफ फेंकता रहता है जैसे कमान से तीर*।

*🔊और घुटने को पीछे की तरफ इसलिए अल्लाह ने मोड़ा कि इंसान अपने आगे की तरफ चले तो उस की हरकत मातदिल (बैलेन्स्ड) रहे, अगर ऐसा न होता तो आदमी चलने में गिर पड़ता*।

*🟣उस मर्द ए हिन्दी ने कहा आपको ये इल्म कहाँ से मिला*❓

*🔮फरमाया मैंने ये इल्म अपने आबाये कराम से और उन्होंने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से और उन्होंने हज़रते जिब्रील (अलैहिस्सलाम) से और उन्होंने उस रब्बुलआलमीन से जिसने तमाम अजसाम व अरवाह को खल्क किया*।

*🔴उस मर्द हिन्दी ने कहा आप सच फरमाते हैं*,

*🔊मैं गवाही देता हूं कि नहीं है कोई अल्लाह सिवाय उसी अल्लाह के और मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसी अल्लाह के रसूल और बन्दे हैं। और आप अपने ज़माने के सबसे बड़े आलिम हैं*। इमाम अबु हनीफा रजीयल्लाह तआला अन्हु की 70 साल की उम्र मे किसी ने पुछा आपकी उम्र कितनी है तो फरमाने लगे 2 साल फिर पुछने वाले ने कहा हमे तो आपकी उम्र लगभग 70 साल लगती है फिर इमाम अबु हनीफा ने कहा मेंरी ज़िन्दगी मेंसे वो 2 साल निकाल दिये जाये तो कुछ भी नही हुँ
फरमाया वो 2 साल जिसमें मेने इमाम इब्ने इमाम सखी इब्ने सखी हाजत रवा इब्ने हाजत रवा मुश्किल कुशा इब्ने मुश्किल कुशा सय्यदना इमाम जाफर सादिक अलेहीस्सलाम इब्ने इमाम बाकर अलेहीस्सलाम की खिदमात गुलामी में गुजारे |
एह्लेबैत अलेहीस्सलाम के दामन को थामलो
🕋

Life of Hazrat Syedah Fatima Zahara AlahisSalam..part 4

The Life of Hazrat Saiyeda AlahisSalam

It is not that Hazrat Fatima AlahisSalam profile was similar to that of Huzoor ﷺ, but every part of her being was reflecting Huzur ﷺ appearance. Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha has written in “Sunan-i-Tirmizi” Vol-1, P-227;

Translation: I have never and nowhere seen the noble life-style, stainless character and virtues that Hazrat Fatima AlahisSalam has inherited from her holy father

The description contains words that imply the highest ethical virtues, liberal thinking and positive attitude towards all situations and living beings. In these matters, she resembled very greatly to her father. And why should she not, when the blood that ran in her veins was the one of Huzur ﷺ. Imam Malik says, “I do not consider anyone else better than Huzur’s holy inheritance (blood)”.
So far as the moral values are concerned, truth and honesty are at the top of all other virtues, and, none was equal to her in these matters. Hazrat Ayesha says in Vol-2, pg#772;

Translation: “I have not seen anyone better than Hazrat Fatima AlahisSalam in the matter of speaking truth. Of course, her holy father ﷺ it is an exception. No other better life sketch can be imagined than the picture of Hazrat Fatima AlahisSalam character and her way of life that has been presented by Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha in the golden words. No one can say anything more than this on this subject; hence, the chapter is closed here.



Hazrat Muhammadﷺ affection and love towards Hazrat Saiyeda AlahisSalam and her place in his eyes

Whenever Hazrat Saiyeda AlahisSalam is came to serve Huzur ﷺ, he would stand up and offer her his own seat, Hazrat Saiyeda AlahisSalam is also followed the same practice. When Huzoor ﷺ used to go to her place, she would get up from her seat and offer it to him. (Sunan-i-Tirmizi, Fazail-i-Fatima, Vol-2 p227 / Sunan-i-Abi Daud Vol-2, p-352) It was Huzur ﷺ usual practice that whenever he set for any journey, he would visit Hazrat Saiyeda AlahisSalam in the last and while returning from the journey, he would visit her first, and then only he would see other people.

Once, there was some misunderstanding between Hazrat Ali AlaihisSalam and Hazrat Saiyeda AlahisSalam. Nabi Pakﷺ immediately went there, patched the relation up and returned with great happiness. The Sa’ahabas asked, “O’ Rasulallah ﷺ, when you went, you were different mood, but as you return, you seem very happy.” He said, “I have removed their misunderstanding because they are very dear to me.”


Hazrat Fatimah AlaihisSalam. and Hazrat Ali AlaihisSalam were the dearest to Huzur ﷺ. It is given in Sunan-i-Tirmizi, Vol-2, p-227, Chapter, Fazal-i-Fatima that once a person asked Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha “Who was the dearest to Huzur ﷺ ?” She said, “It is Hazrat Fatima AlahisSalam husband. I say with confidence that he used to observe fast on many days and offer lots of prayers for him.”