A brief sketch of some of Hazrat Saiyeda AlahisSalam Hadiths. Hazrat Saiyeda AlahisSalam is the leader of all the women of the Momins (Believers)
When Huzurﷺ was on his death-bed, he told Hazrat Saiyeda AlahisSalam:
Translation: “Are you not happy with the fact that you are the leader of all the Momin-women who deserve heaven?” (Bukhari Vol-1)
The description given by Mustadarik is very clear. It is in the following words: Translation; “Are you not happy with the fact that you are the leader of all the Momin-women, women of all the generations to come hereafter in the world?” (Khasais-ul-Kubra Vol-2).
In the explanation of “Saiyedatun-nisa-ul-Alamin” Hazrat Sheikh AbdulHaq Mohaddith Dehlvi writes in Ashiatullm’aat Vol-4, p-684:
Translation: “Let all the people know that this hadith supports the view that Hazrat Fatimah AlaihisSalam is superior to all the women. So much so that she is superior to Hazrat Mariyam , Hazrat Aasiya, Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha and Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha
(Imam) Suyutiwa also says the same thing:
“Hazrat Sheikh Mohaddith Dehlvit has told the truth. Really, Hazrat Saiyeda AlahisSalam is superior to Hazrat Mariyam Hazrat Aasiya, Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha and Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha. Hazrat Saiyeda Fatema AlahisSalam is greater than her too. The evidence is provided by the Hadith wherein Hazrat Saiyeda Fatema AlahisSalam has been narrated as the leader of all the women of the world. This point puts Hazrat Saiyeda Fatema AlahisSalam above Hazrat Mariyam. And, there is no room for any more discussion about the point After going through the arguments, Imam Suyuti also has supported the statement in the following words: “The conclusion derived from all the premises is that Hazrat Fatima is greater than Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha (Hashiya Bukhari p-32 and Ashiatullm’aat Vol-4, p-684)
What a fundamental and concrete point Imam Subki Rehmatullah alaih has said:
“We do accept this fact, and it is our religion to say that Hazrat Fatimah AlaihisSalam is greater.” Her holy mother Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha also comes after her and Hazrat Khadija SalamUllahAlaiha is followed by Hazrat Ayesha SalamUllahAlaiha
हज़रत यह्या अलैहिस्सलाम के ज़माने में एक बादशाह था जिसकी बीवी किसी कद्र बुढ़िया थी। उस बुढ़िया के पहले शौहर से एक नौजवान लड़की थी। बुढ़िया को यह शक हुआ कि मैं तो बुढ़िया हो गई हूं। ऐसा न हो कि यह बादशाह किसी गैर औरत से शादी कर ले और मेरी सलतनत जाती रहे। इसलिये यह बेहतर है कि अपनी जवान लड़की से इसका अक्द कर दूं। इसी ख्याल से एक दिन शादी का इंतज़ाम करके हज़रत यहया अलैहिस्सलाम को बुलाकर पूछा कि मेरा यह इरादा है। हज़रत यह्या अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि यह निकाह हराम है, जायज़ नहीं। यह फ़रमाकर हज़रत यह्या वहां से तशरीफ़ ले आये। उस बद ख्याल दुनियादार बुढ़िया को बहुत गुस्सा आया । आपकी दुशमन हो गई । एक दिन मौका पाकर बादशाह को शराब पिलाकर अपनी बेटी को बनाव सिंगार कर बादशाह के पास खलवत में भेज दिया। जब बादशाह अपनी सौतेली बेटी की तरफ़ रागिब हुआ तो बुढ़िया ने कहाः मैं इस काम को खुशी से मंजूर करती हूं मगर यह्या इजाज़त नहीं देते। बादशाह ने यह्या अलैहिस्सलाम को बुलाकर पूछा । हज़रत यया अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि यह तुम्हारी हकीकी बेटी की तरह तुम पर हराम है। बादशाह ने जल्लाद को हुक्म दिया कि यह्या को ज़बह कर दो। फौरन जल्लादों ने हज़रत यया अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिया। शहीद होने के बाद हज़रत यह्या के सरे अनवर से आवाज़ आती है कि ऐ बादशाह! यह औरत तुझ पर हराम है। ऐ बादशाह! यह औरत तुझ पर हराम है। ऐ बादशाह! यह औरत तुझ पर हमेशा के लिए हराम है। (सीरतुस-सालिहीन सफा ८०).
सबक : फासिक व फाजिर हाकिम अपने नफसानी ख्वाहिश की तकमील के लिये बड़े बड़े जुल्म ढाते है। फासिका व फाजिरा औरतों के खुश करने की खातिर अल्लाह के प्यारों के पीछे पड़ जाते हैं । अल्लाह वाले पैगामे हक़ पहुंचाने में जान तक की परवाह नहीं करते।
अंग्रेज़ों पर यह बात ज़ाहिर हो चुकी थी कि वे अकेले कभी भी सुलतान को नहीं हरा सकते, चुनांचे उन्होंने एक बार फिर सुलतान के खिलाफ साज़िश की और मरहटों और निज़ाम हैदराबाद को अपने साथ मिला लिया। अंग्रेज़ी फ़ौज के सिपहसालार जिसका नाम कारनिवाल्स था। उसने मरहटों और निज़ाम को लालच दिया कि वे मैसूर के इलाका बालाघाट पर कब्जा करके उसे आपस में बांट लें। निज़ाम और मरहटों ने खुश होकर तुरन्त जंग की तैयारी शुरू कर दी।
दूसरी तरफ़ अंग्रेजों ने मैसूर में भी साज़िश का जाल फैला दिया। सुलतान के कई अमीर और वज़ीर दौलत के लालच में आकर अंग्रेजों के साथ हो गए और अंग्रेजों को सुलतान के सुरक्षा व्यवस्था के सिलसिले में राज़ पहुंचाने लगे। उन गद्दारों में सबसे ऊपर किशन राव, सादिक और पुरनया थे। उनकी गद्दारी का हाल आगे बयान किया जाएगा।
मैसूर पर चढ़ाई
. निज़ाम हैदराबाद, मरहटों और अंग्रेजों ने मुकम्मल तैयारियों के बाद मैसूर पर हमला कर दिया। सुलतान टीपू को उनके आने की ख़बर हुई तो वह भी अपना लश्कर लेकर मैदान में आ गया। दुश्मन फ़ौजों ने अचानक सुलतान के लश्कर पर हमला कर दिया जब वे पड़ाव के खैमें लगा रहे थे। लेकिन सुलतान ज़रा न घबराया और उस के बहादुर सिपाहियों ने इस तरह जम कर दुश्मन का मुकाबला किया कि दुश्मन के सैंकड़ों सिपाहियों को गिरफ्तार करके कैदी बना लिया।
अंग्रेजों ने अगले दिन मैसूर के शहर बंगलौर पर हमला कर दिया। सुलतान की फ़ौज ने बड़ी बहादुरी से बंगलौर को बचाने की कोशिश की, मगर सुलतान के एक अमीर किशन राव ने सुलतान से से गद्दारी की। वह अंग्रेजों से मिला हुआ था और सुलतान की तमाम ख़बरें अंग्रेजों को पहुंचाता रहता था। उसकी गद्दारी के सबब बंगलौर पर अंग्रेज़ों का कब्जा हो गया और उन्होंने शहर को बुरी तरह लूटा और फिर उन्होंने बंगलौर के किले पर कब्जा कर लिया। किशन राव की गद्दारी का किसी को पता न था। सुलतान भी बेखबर रहा और हार के बाद उसने किशन राव को श्रीरंगापटनम भेज दिया।
नमक हराम किशन राव को जल्द ही अपनी गद्दारी की सज़ा मिल गई। उसकी बीवी बड़ी नेक और वतन से मुहब्बत करने वाली थी। उसने किशन राव की मुल्क के ख़िलाफ़ सरगरमियां देखीं तो एक दाई के ज़रिए सुलतान की मां को किशन राव की साजिशों और मनसूबों से सूचित किया। सुलतान की मां ने तुरन्त सुलतान के पास एक जासूस भेजा। उस जासूस ने सुलतान को बताया कि “किशन राव गद्दार है और अंग्रेजों से मिला हुआ है, उसने कुछ दूसरे गद्दारों के साथ मिल कर एक ऐसी साज़िश तैयार की है जिसके मुताबिक़ अंग्रेज़ जल्द ही श्रीरंगापटनम पर हमला कर देंगे, इस लिए गद्दार किशन राव के ख़िलाफ़ तुरन्त कार्यवाई की जाए।”
श्रीरंगापटनम पर हमला
निज़ाम हैदराबाद, मरहटों और अंग्रेजों ने मैसूर के इलाकों में लूटमार मचा रखी थी। एक तरफ़ मरहटों और निज़ाम की फौजों ने मैसूर के कई किलों पर कब्जा कर लिया और दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ फौज आगे बढ़ते हुए श्रीरंगापटनम तक पहुंच गई और उसने श्रीरंगापटनम का मुहासिरा कर लिया जो मैसूर की राजधानी थी। अंग्रेज़ी फ़ौज का सेनापति जनरल कारनिवाल्स था। बरसात का मौसम था। श्रीरंगापटनम के लोगों ने अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया और हर बार अंग्रेजों के हमले को नाकाम बनाकर उन्हें पीछे धकेल दिया।
दूसरी तरफ़ सुलतान के छापामार दस्तों ने अंग्रेजों के रसद पहुंचने के तमाम रास्ते बन्द कर दिए। बीस दिन के मुहासिरा के दौरान अंग्रेजों ने श्रीरंगापटनम को फ़तह करने की हर मुमकिन कोशिश की, मगर नाकाम रहे। इस कोशिश में उनके हज़ारों सिपाही मारे गए और रसद में न पहुंचने के सबब अंग्रेज़ सिपाही भूकों मरने लगे। गिज़ा की कमी के सबब अंग्रेज़ अपनी तोपें खींचने वाले बेल भी खा गए। जब किसी तरफ़ से रसद पहुंचने की उम्मीद न रही तो अंग्रेज़ मुहासिरा उठाने पर मजबूर हो गए। मुहासिरा ख़त्म करके अंग्रेज़ फ़ौज वापस चली और अलवरवाक के किले में जा पहुंची।
सुलतान टीपू के कुछ सरदारों की राय थी कि वापस जाती अंग्रेज़ फ़ौज पर सख़्त चोट पहुंचाने और उनका हमेशा के लिए किस्सा तमाम करने का यह सुनहरी मौका है, लिहाज़ा इस वक्त अंग्रेज़ फ़ौज पर हमला कर दिया जाए तो भूक से निढाल अंग्रेज़ सिपाही मुकाबला न कर सकेंगे और उनकी ताकत हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी। फिर वे दोबारा कभी मैसूर पर हमला करने की हिम्मत न कर सकेंगे।
सुलतान ने उन सरदारों के मश्वरों से इत्तिफ़ाक न किया, लेकिन बाद में सुलतान को अहसास हो गया कि उसे अंग्रेज़ों को बचकर निकल जाने का मौका नहीं देना चाहिए था।
यह अहसास सुलतान को उस वक्त हुआ जब बरसात का मौसम गुज़र जाने के बाद अंग्रेज़ सेनापति जनरल कारनिवाल्स ने दोबारा श्रीरंगापटनम पर हमला करने की जबरदस्त तैयारियां करके निज़ाम हैदराबाद की फ़ौजों की मदद से मैसूर की राजधानी श्रीरंगापटनम पर हमला कर दिया। उनके रास्ते में सुलतान के जो किले आए, वहां के किलादारों ने सुलतान से गद्दारी की। उन्होंने अपनी जान बचाने और दौलत के लालच में अंग्रेज़ों को रोकने और उनका मुकाबला करने से परहेज़ किया और अंग्रेज़ी फ़ौजें श्रीरंगापटनम तक पहुंचने में आसानी से कामयाब हो गई। उन्होंने आते ही श्रीरंगापटनम का मुहासिरा कर लिया।
सुलतान को दुश्मन के आने का पता चल चुका था। चुनांचे उसने श्रीरंगापटनम के किले का बचाव के लिए किले के बुरजों और दोवार पर अपनी फ़ौज के बहादुर और जंगजू सिपाहियों को मुकर्रर कर दिया जिनके पास हर किस्म के हथियार थे, जबकि सुलतान ने , ने दीवार की ख़ास-खास जगहों और मोरचों पर तोपें और दूसरे आतिशी हथियार भी नसब कर दिए। जनरल कारनिवाल्स पूरी तैयारियों के साथ आया था और वह इस खुशफ़हमी में था कि इस बार वह बड़ी आसानी से किले को फ़तह कर लेगा। लेकिन जब सुलतान की फौज ने बड़ी बहादुरी और बेजिगरी से अंग्रेज़ फौज का मुकाबला किया तो अंग्रेज़ सिपहसालार की उम्मीदें ख़ाक में मिल गई।
मुहासिरे के तीसरे दिन अंग्रेजों की मदद के लिए मरहटों की फौज भी वहां पहुंच गई, लेकिन दोनों फ़ौजें मिलकर भी श्रीरंगापटनम पर कब्जा न कर सकीं। सुलतान की बहादुर फौज ने उनके छक्के छुड़ा दिए। इस तरह मुहासिरा लम्बा होता चला गया।
सुलतान की मजबूरी
अंग्रेजों ने महसूस कर लिया कि श्रीरंगापटनम को फ़तह करना बहुत मुश्किल है। सुलतान टीपू को भी अहसास हो गया था कि तीन दुश्मनों (अंग्रेज़, निज़ाम हैदराबाद और मरहटों) का मुकाबला आसान नहीं है। इसी तरह मरहटों का सरदार नाना फ़रनवैस भी यही महसूस कर रहा था। उसने अंग्रेज़ों पर जोर दिया कि सुलतान टीपू से सुलह कर ली जाए। सुलतान टीपू भी यही चाहता था और अंग्रेज़ भी सुलह के लिए सोच रहे थे। चुनांचे उन्होंने अपने एलचियों के जरिए सुलह की बातचीत की। अंग्रेजों की शर्ते इतनी सख़्त थीं कि सुलतान की गैरत उन शर्तों को कबूल करने पर राजी न थी, लेकिन वह तीन दुश्मनों के बीच घिरा हुआ था। गद्दारों और साज़िशियों ने उसे इतना बेबस व लाचार कर दिया था कि ज्यादा देर तक दुश्मन का मुकाबला करना मुश्किल नज़र आ रहा था। चुनांचे श्रीरंगापटनम को बचाने के ने होकर सुलह की शर्तो को कबूल करके सुलह के समझौते पर दस्तखत कर दिए। सुलह की शर्ते ये थीं: लिए सुलतान मजबूर होकर
1. सुलतान अंग्रेजों को जंग के तावान के तौरपर तीन करोड़ रुपए नकद अदा करे और जब तक रकम अदा न हो जाए उस वक्त तक के लिए सुलतान के दोनों बेटे जमानत के तौरपर अंग्रेजों के पास यरगमाल रहेंगे।
2. सुलतान अपने वे इलाके अंग्रेजों, निज़ाम और मरहटों के हवाले कर दे जिनकी सालाना आमदनी तीन करोड़ रुपए हो।
यह समझौता 3 फ़रवरी 1794 ई० को तय पाया। इन शर्तों की वजह से तीन करोड़ रुपए सालाना आमदनी वाले इलाके सुलतान ने दुश्मन के हवाले कर दिए जबकि एक करोड़ रुपए नकद अदा किए गए। बाकी दो करोड़ की अदाएगी का इंतिज़ाम न हो सका और सुलतान ने दोनों शहज़ादे अंग्रेजों के हवाले कर दिए। इस सुलह के बाद दुश्मन फ़ौजें श्रीरंगापटनम का मुहासिरा ख़त्म करके वापस चली गई। उनके जाने के बाद सुलतान टीपू ने सलतनत के मामलों और मसाइल पर ध्यान दिया और सलतनत के निज़ाम को सुधारने और मुल्क की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए।
सुलतान के इकदामात
1. सुलतान टीपू को जिन नमकहरामों और गद्दारों की वजह से अंग्रेजों की ज़िल्लत आमेज़ शर्ते कबूल करना पड़ीं, उन्हें तलाश करके इबरतनाक सजाएं दी गई।
2. फ़ौज में इज़ाफ़ा किया गया। ज़मीनी और समुद्री फ़ौज में नई भरती की गई। फौजी ट्रेनिंग के लिए स्कूल बनाए गए।
3. उन किलों की मरम्मत कराई गई जिन्हें जंग में नुकसान पहुंचा था।
4. राजधानी श्रीरंगापटनम के किले की ख़ास तौरपर मरम्मत की गई और उसे पहले से ज़्यादा मजबूत बनाया गया।
5. दूसरे मुल्कों के मुसलमान हुकुमरानों से अच्छे सम्बंध बनाने के लिए सुलतान ने काबुल, ईरान और हिन्दुस्तान के हुकुमरानों को बहुत से तोहफ़ों के साथ दोस्ती और मुहब्बत के पैगाम भेजे और उन्हें इस्लाम के ख़िलाफ़ अंग्रेजों के इरादों से सूचित किया।