सुलतान टीपू शहीद पार्ट 3

कुडनूर पर हमला

अर्काट और उसके बाद दूसरी जंगों में हैदर अली ने अंग्रेज़ी
फ़ौज के सालार करनल ब्रैथ वैट को बहुत शर्मनाक शिकस्त दी थी और उसे गिरफ्तार कर लिया था। करनल ने गिरफ्तारी के बाद हैदर अली और टीपू से जान बख्शने की दरख्वास्त की। उन्होंने करनल की जान बख़्श दी। फिर अंग्रेज़ों ने हैदर अली से सुलह करने की कोशिश की, मगर हैदर अली ने सुलह से इनकार कर दिया और उनके एक फ़ौजी शहर कुडनूर पर हमला कर दिया। अंग्रेजों को यहां भी हार का सामना करना पड़ा और हैदर अली ने कुडनूर को जीत लिया।

कुडनूर के बाद हैदर अली की फौजों ने अरनी पर हमला किया जहां जनरल आयरकोर्ट अंग्रेज़ी फ़ौज के साथ मौजूद था। वह हैदर अली के आने की खबर सुन कर ख़ौफ़ज़दा हो गया और अपनी फ़ौज को लेकर वहां से निकल भागा। चुनांचे हैदर अली ने अरनी पर कब्जा कर लिया। अरनी से भाग कर अंग्रेज़ फ़ौज मद्रास पहुंची और दूसरी अंग्रेज़ फ़ौज के साथ मिल कर मद्रास की सुरक्षा को मजबूत बनाने लगी। फिर अंग्रेजों ने योजना बनाई कि हैदर अली को दूसरे इलाकों में उलझा दिया जाए ताकि वह मद्रास का रुख न कर सके। इस नई पालीसी के तहत उन्होंने मालाबार के साहिली इलाकों में गड़बड़ फैला दी।

टीपू मालाबार में

अंग्रेजों ने करनल हैमरस्टोन को एक बड़ा लश्कर देकर मालाबार की तरफ़ रवाना कर दिया था जहां उन्होंने अपनी साजिशों से बदअमनी पैदा कर दी थी। मालाबार के लोग मुख्तलिफ़ ग्रुपों में बट गए और वहां खाना जंगी हो रही थी। अंग्रेजों की योजना यही थी कि हैदर अली और टीप इस इलाके में उलझे रहें और उन्हें मद्रास पर हमला

करने का मौका ही न मिले। बम्बई से करनल हैमरस्टोन को फौज देकर इसलिए मालाबार की तरफ़ भेजा गया कि वह हैदर अली की फौज को शिकस्त देकर वहां के तमाम साहिली इलाकों पर कब्जा कर ले। यह इलाका फ़ौजी और तिजारती लिहाज़ से अंग्रेजों और हैदर अली के लिए बहुत अहम था। उन दिनों हैदर अली बीमार थे। उनकी पीठ पर सरतान का फोड़ा निकल आया था। उन्हें जब मालाबार के हालात की खबर मिली तो उन्होंने फ़तेह अली टीपू को फ़ौज के साथ मालाबार भेजा कि वह हालात पर काबू पाकर ख़ाना जंगी का ख़ातिमा कर दे। टीपू के साथ हैदर अली की फ़ौज का एक मशहूर जंग में माहिर और फ्रांसीसी जरनेल भी रवाना किया गया था। टीपू मालाबार पहुंचा और उसने अपनी हिम्मत, बहादुरी और समझदारी से जल्द ही हालात पर काबू पा लिया। इस तरह अंग्रेज़ो की यह चाल भी असफल हो गई।

सोनापति का किला

अंग्रेज़ करनल हैमरस्टोन फ़ौज के साथ मालाबार पहुंचा तो वहां बहादुर टीपू सुलतान हालात पर काबू पा चुका था। टीपू को वहां मौजूद पाकर अंग्रेज़ करनल को उसका सामना करने की हिम्मत न हो सकी और उसने मालाबार के इलाके से निकल जाने में ही अपनी बेहतरी समझी। चुनांचे वह अपनी फ़ौज लेकर सोनापति नदी की तरफ़ रवाना हो गया जहां एक मजबूत किला था।

टीपू को पता चला तो वह भी अपनी फ़ौज के साथ अंग्रेज़ी फौज के पीछे चल दिया। लेकिन अंग्रेज़ी फ़ौज तेज़ी से सफ़र करके सोनापति पहुंच गई। टीपू के वहां पहुंचने से पहले ही करनल हैमरस्टोन से ने अपनी फ़ौज के साथ सोनापति के किले में पनाह ले ली। टीपू ने
वहां पहुंच कर सोनापति के किले का मुहासिरा कर लिया और किला जीतने के लिए उसपर हमले करने लगा। किले का हिफ़ाज़ती निज़ाम काफ़ी मज़बूत था। इसलिए उसे जीतने में परेशानी हुई और मुहासिरा लम्बा हो गया।

टीपू की वापसी

मैसूर की राजधानी श्रीरंगापटनम में सलुतान हैदर अली बीमार पड़े हुए थे और बेहतरीन इलाज के बावजूद उनकी बीमारी जोर पकड़ती जा रही थी। जब हैदर अली को अपने बचने की कोई उम्मीद न रही तो उन्होंने टीपू की तरफ़ कासिद (खबर पहुंचानेवाला) भेजा कि वह तुरन्त वापस आ जाए। लेकिन कासिद के वहां पहुंचने से पहले ही हैदर अली की मृत्यु हो गई। चुनांचे पहले कासिद के टीपू के पास पहुंचने के बाद दूसरा कासिद हैदर अली की मृत्यु की खबर लेकर पहुंचा। हैदर अली की 6 दिसम्बर 1782 ई० को मृत्यु हुई। पिता की मौत की खबर सुन कर टीपू को सोनापति फ़तह किए बगैर ही वहां से वापस आना पड़ा था।

टीपू की तख्त नशीनी

सुलतान हैदर अली के दो बेटे थे। बड़ा शहज़ादा टीपू और छोटा शहज़ादा करीम। जब हैदर अली की मृत्यु हुई तो टीपू मौजूद नहीं था। उसके आने तक मैसूर का तख्त खाली नहीं छोड़ा जा सकता था। चुनांचे सलतनत के लोगों ने बाहमी मश्वरा और इत्तिफ़ाक़ से कुछ दिन के लिए शहज़ादा करीम को तख्त पर बिठा दिया ताकि हुकुमत के इंतिज़ाम चलते रहें। जल्द ही टीपू मालाबार से वापस आ गया। टीपू वापस आया तो शहज़ादा करीम उसके लिए तख़्त से हट गया।

26 दिसम्बर 1782 ई० को टीपू मैसूर के तख्त पर बैठा और सुलतान फ़तेह अली टीपू के नाम से अपनी हुकूमत की शुरूआत की। तख्त नशीनी के मौके पर शानदार जश्न मनाया गया। मैसूर के लोगों ने खुशी मनाई और घर-घर चिराग जलाए गए।

सुलतान टीपू

टीपू ने मैसूर का सुलतान बनने के मौके पर सब सरदारों, सलतनत के हाकिमों, और हुकूमत के खैरख्वाहों को इनाम दिया। ज़रूरतमन्दों की ज़रूरतें पूरी की और गरीबों में खैरात की। बहुत से शायरों ने ताजपोशी के जश्न पर सुलतान टीपू की तारीफ़ में कसीदे (तारीफ़ी नज़्म) पढ़े। सुलतान टीपू ने उन शायरों को भी बहुत इनामात दिए और उन्हें मालामाल कर दिया। मैसूर की जनता सुलतान टीपू के जंगी कारनामों से बहुत खुश थी और उससे मुहब्बत रखती थी।

मैसूर का हुकुमरान बनने के बाद सुलतान टीपू ने फैसला कर लिया कि अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से निकालने का जो मिशन उसके बाप हैदर अली ने शुरू किया था, वह उस मिशन को पूरा करेगा।

हैदर अली की तरह सुलतान टीपू भी अंग्रेजों के इरादों से बखूबी आगाह था और वह जानता था कि मक्कार अंग्रेज़ हिन्दुस्तान पर कब्जा करके अपनी हुकूमत कायम करना चाहते हैं। उसने पक्का इरादा कर लिया कि वह अपने वालिद हैदर अली की तरह अंग्रेजों के लिए नाकबिले तसखीर चट्टान बन जाएगा।

टीपू के दुश्मन

जब सुलतान टीपू ने मैसूर का तख्त संभाला तो उस वक्त हरतरफ़ अफरा-तफरी फैली हुई थी। शुरू में हैदर अली की मौत की ख़बर को छुपाया गया ताकि मैसूर के दुश्मनों के हौसले न बढ़े लेकिन जब हैदर अली की मृत्यु की ख़बर फैल गई तो कुछ इलाकों के सरदारों ने बगावत कर दी थी। मरहटों की तरफ़ से भी ख़तरा था और अंग्रेज़ भी मैसूर के दुश्मन थे। लेकिन सुलतान टीपू ने हिम्मत न हारी। बाप की तरह उसके हौसले बुलन्द थे। उसने अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया और बागियों को भी एक-एक करके ठिकाने लगा दिया। उनसे निमट कर सुलतान टीपू ने रियासत की खुशहाली और तरक्की के लिए कदम उठाए।

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