
हमारी कौम ७३ फ़िरकों में बटी है। हर फ़िरका अपने पास एक आइना रखा है, जिसके आईने में जितना इस्लाम दिखता है, वह उसे ही पूरा मान लेता है, बाकि ना जानने की कोशिश करता है और ना ही समझने की ही कोशिश करता है।
वक्त से बहुत कुछ नेक लोगों ने इस उम्मत को एक करने की कोशिशें की हैं लेकिन कामयाब नहीं हो सके और कामयाब हो पाना बहुत मुश्किल भी है। अक्सर मैं देखता हूँ कि लोग कहते हैं, “कलमे की बुनियाद पर एक हो जाओ.” , मेरे अपनों कलमा इख्तिलाफ़ की वजह नहीं है, कलमा तो यजीदी फौज़ भी पढ़ रही थी, हुसैनी लश्कर भी। कलमे के अल्फाज़ भी एक से थे। लेकिन किसका कलमा वाकई कलमा था?
आज के दौर की अगर बात करें तो भले ही इस्लाम में तकरीबन 73 फिरके बन चुके हैं लेकिन सबमें एक बात एक-सी है कि तौहीद को सब मानते हैं, रिसालत पर भी सबका ईमान है, जब बात विलायत की आती है, तब लोगों के अकीदे उस नाव की तरह डोलने लगते हैं, जो नदी में तो उतर गई लेकिन उसे ना मंज़िल पता है, ना ही रास्ता।
अगर वाकई में इत्तेहाद चाहते हो तो आओ विलायत को बुनियाद बनाकर इत्तेहाद करें, आयत ए विलायत पर इत्तेहाद करें, मन कुन्तो मौला की हदीस पर इत्तेहाद करें। आओ हम और तुम, अली को मौला मानकर कलमे की बुनियाद पर इत्तेहाद कर लें। मुझे मालूम है कि खारिजी, राफ़जी, नासबी, कभी इत्तेहाद नहीं होने देंगे।
लेकिन एक बात ये भी हक़ है कि इत्तेहाद आज करो या इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के आने के बाद करो, इत्तेहाद की बुनियाद वह ही बनाना होगी जो लोगों ने जानबूझकर बिगाड़ी है, मेरे मौला को मौला माने बिना इत्तेहाद हो नहीं सकता। अगर चाहते हो कि उम्मत एक हो जाए तो विलायत ए अली को थामकर एक हो जाओ।
ऐसा नहीं है कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को, उम्मत के फ़िरकों में बँटने की ख़बर ना थी बल्कि वह तो हमें इससे बचने का रास्ता भी बता गए हैं और वह रास्ता है, कुरआन और अहलेबैत को थामना।
एक दूसरे से लड़ने, एक दूसरे से बुरे अल्फाज़ कहने से बेहतर है, इल्म को सीखना, हक़ कहना और हक़ को मुहब्बत के साथ औरों तक पहुँचाना। अल्लाह को भी ये ही पसंद है कि हम सब आपस में लड़ने भिड़ने की बजाय एक दूसरे से मुहब्बत करें और आपस में भाई-भाई की तरह रहने की कोशिश करें।

