मौला अली का इल्म ::एस्ट्रोलोजी और एस्ट्रोनोमी

मेरे मौला अली अलैहिस्सलाम ने एक दफा, खुत्बे के बीच में फरमाया, “ऐ लोगों, नजूम के सीखने से परहेज़ करो, मगर इतना कि जिससे खुश्की और तरी में रास्ते मालूम कर सको। इसलिए कि नजूम का सीखना कहानत हैअ और गैब-गोई की तरफ़ ले जाता है और मुनजिम हुक्म में मिस्वा काहिन के हैं। काहिन मिस्ले साहिर है और मिस्ले साहिर, काफिर है। काफिर का ठिकाना जहन्नुम है। बस अल्लाह का नाम लेकर चल खड़े हो।”

ये मेरे मौला ने आज से तकरीबन १४०० साल पहले बता दिया, जिसे हम आज के इल्म से तौलकर देख सकते हैं। दरअसल एस्ट्रोलोजी और एस्ट्रोनोमी दोनों ही लैटिन लफ्ज़ एस्ट्रोनोमिया से बने हैं जिसका मतलब होता है तारों का चलना या बदलना।

अब देखते हैं दोनों में फर्क क्या है, एस्ट्रोनोमी में हम अंतरिक्ष के ग्रह, तारे, चाँद, सूरज के बारे में पढ़ते हैं, उनका चलना, अपनी जगह बदलना, वक्त के साथ आ रहे बदलावों को समझते हैं, जिससे हम गणित के जरिए सटीक जवाब पा सकते हैं, ये रास्तों का पता लगाने में भी-भी मदद करती है।

इसके अलावा होती है एस्ट्रोलोजी, जिसमें अंतरिक्ष में ग्रह और तारों में हो रहे बदलावों को ज़मीन या किसी इंसान की ज़िन्दगी में पड़ रहे प्रभाव से जोड़कर भविष्य बताया जाता है, जो कि ग़लत भी हो सकता है यानी कोई दावे के साथ सही जवाब नहीं दे सकता।

जिस वक्त लोग ये भी नहीं समझते थे कि पृथ्वी से बाहर भी कुछ होता है, उस वक्त मेरे, “सलूनी-सलूनी” , कहने वाले मौला अली अलैहिस्सलाम, एस्ट्रोलोजी और एस्ट्रोनोमी का फर्क भी बता रहे थे, साथ ही साथ ये भी नसीहत कर रहे थे कि कौन-सा इल्म मुफीद साबित होगा और कौन-सा इल्म तुम्हें बर्बादी की तरफ़ ले जाएगा।

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